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निधि भार्गव मानवी का गीत – बोल मेरे व्याकुल मनुआ तू, इतना क्यूँ बेचैन है

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बोल मेरे व्याकुल मनुआ तू, इतना क्यूँ बेचैन है ।
दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।
सबको सब कुछ नहीं मिलता इस मायावी संसार में
सदा उजाले न रहते रे,कुदरत के व्यवहार में
होंठ मचलते कुछ कहने को,सहमें सहमें बैन हैं
दिन भर खोया खोया रहता, रोता सारी रैन है
मनचाहा यदि मिल भी गया रे, तो ही क्या हो जाएगा ।
हाथ  पसारे  आया  था  तू , हाथ पसारे जाएगा ।।
एक घड़ी को भी रे पगले, क्यों न तुझको चैन है
दिन भर खोया-खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।
कर्म का लेखा अरे अभागे,जैसे-तैसे काट ले ।
अपने जीवन की ये खाई, किसी जुगत से पाट ले ।।
किस उलझन में फँसा हुआ तू,भीगे-भीगे नैन हैं ।
दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।
जो मिला जितना भी मिला उतने में ही संतोष कर ।
कोसा मत कर परिस्थितियों को,ईश्वर पे मत दोष धर ।
पडे़ भोगनी पीड़ बावरे ,विधना की यह दैन है ।
दिन भर खोया खोया रहता,रोता सारी रैन है ।।

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