“माँ!” … “एरी माँ!”
सोयी पड़ी माँ को ऐसे लगा जैसे रमेश सपने में पुकार रहा है, बड़ी मुश्किल से तो आज आँख लगी थी। दिल घबरा रहा था। थोड़ी देर पहले ही पानी के गिलास में होमियोपैथी की आर टू की 10 बूंदे घोल कर पी थी कि घबराते दिल को जरा आराम आये।
जब दुबारा पुकार सुनी तो हडबडा गयी और आँखें खोलकर रमेश की तरफ देखा जो उनके पलंग के दाई तरफ फ़ोन हाथ में लेकर खड़ा था |
“आधी रात नै कोई बुरा सुपना देख लिया के? यो छोरा भी ना, रात नै देर तक पढाई करै, फेर तड़कै देर तक मुंह ढाक न्यू ही पड़या रह्वै सै।”
“मेरे जी नै तो चैन ही कोन्या…इब तो गोड्डे भी दुखण लागरे। कितनी बर कह लिया, मनै किसी डागदर कै दिख्या ल्याओ, बस हकीम धोरे तै गुग्गल लाके धर दी और रामदेव का तेल धर दिया, ले कर ले मालिस ..|”
“बोल ईब, के कह्वै?”,भुनभुनाती हुए मीनल की अम्मा ने रजाई एक तरफ सरकायी। चारपाई से पैर नीचे को लटका दिए और पैर मार कर जुत्तियाँ खोजने लगी।
तब तक रमेश अम्मा के और पास आ पहुंचा। उसका रंग पीला पड़ रहा था, चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं| आवाज़ काँप रही थी। उसकी बदहवास हालत देख कर अम्मा का दिल जोर से धड़क उठा।
“ए छोरे , के होग्या ? क्यूं सारा घर सर पै ठा राख्या सै तन्नै? कित आग लाग ग्यी?”
“अम्मा! वोह .वॊऒऒऒऒऒऒऒ ”
“के वॊओ वॊऒओ करे जा सै? बोल के होग्या, ईब दही जम ग्यी तेरे मुंह मैं?”
“इब बोल भी!”
“अम्मा! वो जीजी जी ….जी इ इ इ इ इ ”
“हाय रे राम! के हो ग्या मेरी फूल-सी लाडो कै…?”
“जीजी अस्तपताल मैं भरती सै। इबे उसकी सहेली का फ़ोन आया ।”
अम्मा का दिल जोर से धड़क उठा। दो बेटों और एक बेटी की अम्मा की पहली संतान बेटी मीनल थी | चौधरियों के घर पहली संतान लड़की हो गयी कितना रुक्का तारा था तब उसके सास-ससुर नै। उनके खानदान में आज तक किसी बहू ने पहली संतान छोरी न पैदा की थी। उसकी दादी-सास तो लड़की को नमक संग दाबने को तैयार थी। वो तो उसने ही कस के थाम ली थी चौधरी की बाँह, ” जे मेरी छोरी को कुछ कर दिया तो आज ही रात ने घेर में जाकै जल मरूँगी, गेल्याँ ही तूड़ी मैं आग लगाके सारे डांगरां नै भी फूँक दयूंगी।”
चौधरी जानते थे अपनी लुगाई के जिद्दीपने को, सो माँ की मिन्नतें करके अपनी बेटी को वापिस ले आये थे | उनके गाँव में गिनी चुनी छोरियां थीं। जिनमें इंग्लिश स्कूल में पढ़ने वाली पहली छोरी उनकी ही बेटी थी। बाद में देखा-देखी औरों ने भी अपनी लड़कियों को भेजना शुरू कर दिया।
“अम्मा सुण री सै के, जीजी हस्पताल मैं भरती सै।”
“हाय रे !”
“लाग ग्यी होगी ठण्ड, मर जाणी शिमले की ठण्ड भी तो।”
“मीनल कै ही आग लाग री थी शिमले जाकै बड़े कॉलेज मैं पढण..”
“कितनी बर समझायी या छोरी, अक गरम लत्ते पहर्या कर, पर आजकल की छोरी भी… !”
इबकै तो लाडू भी तो नी भेजे मनै बणाकै।
“पिछली बर भी कितनी खाँस्सी होगी थी, अर बुखार भी .. ”
अम्मा थी कि बुदबुदाये जा रही थी। खुद ही खुद पर , “खुद मास्टरनी बन री सै। पर इलाज तो माँ के ही काम आवैं सैं ना। चार कत्याब पढ़ लेण तै जिन्दगी पढनी कोन्या आ जाती इन बालकां नै।”
अलमारी से अपने गरम कपडे निकाल कर बैग में ठूंसती अम्मा अनजान थी कि रमेश अपने बाबूजी के कान में क्या कह रहा है। उन्हें तो अपनी फूल-सी मीनल याद आ रही थी। कितनी मेधावी थी उनकी बिटिया। उनकी बिरादरी वालो ने बहुत चाहा था कि अम्मा अपनी मीनल का ब्याह कर दे अच्छा घर बाहर देखकर , सिरसा से उनकी ननद ने अपने जेठ के लड़के के साले की खातिर रिश्ता मांगा था | बी ए पढ़ा छोरा १०० किले जमीन का मालिक था लेकिन निरा शराबी। “ना!” अम्मा ने झट मना कर दी थी, तब से ननद ने आना-जाना ही बंद कर दिया था।
“ना आवै मेरी बला तै।”
मीनल के मामा ने भी अपने साले के छोरे के लिए मीनल का हाथ माँगा वहां चौधरी साहेब ने ही ना कर दी,” जिब लड़के की बुआ ही उनका मान ना करती, काल नै बेटी को ससुराल मैं कितने चणे चब्वावेगी। ना बाबा हम ना देवैं इसे घर मैं अपणी सोने की कनी … खुली आँख्यां माखी ना निगली जावै।”
फिर अम्मा को मीनल का सपना पूरा करना था उसको प्रोफेसर बनना था।
चंडीगढ़ एम सी एम से उसने पढ़ाई की। अब उसको बी एड करनी थी।
“चंडीगढ़ में भी बहुत स्कोप हैं। यही से करने से अच्छी नौकरी मिलेगी लेकिन यहाँ जगह खाली नही हैं कहीं लेकिन शिमला के अच्छे कॉलेज से जगह मिल गयी हैं।”, मीनल के आग्रह पर अम्मा ने उसे शिमला भेज दिया।
“कितनी खुश थी लाडो। परसों ही तो फ़ोन पै बात करी उसने के अम्मा आप परेशान मत होना। मैं यहाँ ठीक हूँ ।”
जानती है अपनी बेटी को बहुत ही संस्कारी लड़की है। ऐसा नहीं कि उसने अपनी बेटी को नए ज़माने के साथ चलना नही सिखाया था परन्तु उसकी बेटी ही इतनी गुणवान और संस्कारी थी कि कुछ भी करती थी तो माँ के संज्ञान में …
“राम जाणै किसी होगी?
नहा कर जब बाहर आई तो देखा कि रमेश के बापू भी तैयार होकर खड़े थे। कितने खिलाफ थे, ये मीनल के शिमला जाने के … ” जमाना बहुत ख़राब सै, छोरी की जात सै, एक बै ब्याह कै अपणे घर की हो ज्या, उत् जाकै जो मर्जी करै, जितना मर्जी पढै..।”
आज बिटिया की तबियत जरा-सी नासाज हुई नहीं कि साथ चलने को तैयार हो गये, जबकि न तो कभी कॉलेज छोड़ने गये थे न ही शिमला।
अम्मा मन ही मन मुस्कराने लगी .. “छोरी तै प्यार तो करैं सैं, यैं जाट लोग होवैं ही इसे ,मन की बात लुगाइयां के स्यामी ना बोलते, कदे सर ना चढ़ ज्यां यें|”
चौधरी के लिए दिल में और प्यार व मान उमड़ आया।
रमेश ने सूमो निकाल ली थी। सुरेश के 12वीं के छमाही पेपर चल रहे थे | उसको जगाकर अपना ख्याल रखने को कह कर, पड़ोस की चाची के घर रोटी खा लेने की बात कह कर अम्मा सूमो में बैठ गयी | पर्स से माला निकाल कर भगवान को मन ही मन नमस्कार करके यात्रा शुभ हो की कामना करने लगी।
सुबह के चार बजने को हैं सुबह ट्रैफिक कम होता है फिर भी रिवाड़ी से शिमले की दूरी बहुत है| रमेश ने गाड़ी तेज स्पीड से चलानी शुरू कर दी
“शायद भाण की फ़िक्र है इसनै भी , भगवान इन भाण-भाइयाँ का प्यार सदा बणा कै राखै।”
उसने नजर भर कर रमेश के बाबूजी को देखा, ” किसा पीला पड़ रह्या सै मुँह…. बेटी की फ़िक्र ही इतणी बखत उठण की वजह सै.. जो भी हो जब बेटी का हाथ हाथा मैं लेवैगे और वा कह्वेगी अक बाबूजी ताश खेलैं भाभो में हर बार की तरिया इस बार भी मैं ही जीतूंगी तब देखियो क्यूकर मड़ा-मड़ा-सा मुस्करावैंगे?”
गाड़ी तेजी से दौड़ रही थी साथ ही मन भी …. “बस मीनल की पढ़ाई पूरी हो ज्या अर वा अपणे पैरां पै ख़ड़ी हो ज्या तो इसका ब्याह कर दयूंगी| … छोटे-छोटे दयोहते-दयोहतियाँ के गेल्याँ खेलण का बड़ा जी करै-सै। साथ आली रामो जिब अपणे बालकाँ गेल्या पीहर आवै सै अर उसके बालक जिब उस तै भी गोरी नानी कह्वैं तो जी नै ठंडक-सी मिलै। मेरे नाती भी मनै गोरी नानी कह्या करैंगे या आज-काल के माँ-बाप्पाँ की ढाल मीनल भी उन्हानै बड़ी मम्मा कहना सिखावेगी।
विचारों के सागर में गोते खाती अम्मा एक पल को भी सो नहीं पायी थी | उसको याद आने लगा जब मीनल ने पहली बार पाँचवीं क्लास में अपने पूरे स्कूल में टॉप किया था तो प्रिंसिपल ने माता पिता को भी स्कूल में बुलाया था | रमेश सुरेश भी पढ़ाई में ठीक-ठाक थे लेकिन मीनल के नम्बर हमेशा सबसे ज्यादा आया करते थे। उस दिन चौधरी बड़ी मुश्किल से उसके साथ स्कूल गये थे | दादी ने रमेश सुरेश को २० _ २० रूपये इनाम के दिए थे जब मीनल ने अपने लिए इनाम माँगा था तो दादी ने एकदम झिडक कर कह दिया था ….”दिमाग ना ख़राब करै, जिस दिन पूरी रोटी खुद बणा कै खिलावेगी उस दिन मिलेगा इनाम।”
रोती हुयी मीनल को उसने पूरे सौ रूपये देकर कहा था, “तू मेरी राजकुमारी सै ना , आज खुद इतनी आच्छी पढ री सै, काल नै दुनिया भर के लोग मिन्नत करते हाँडेंगे कि म्हारे बालक नैन भी पढणा सिख्या दो|” गुदगुदाते हुए मीनल की हंसती हुयी सूरत कितनी प्यारी लग रही थी।
अम्मा को याद आया कि वो खुद भी कितना पढना चाहती थी लेकिन १२वीं के बाद उसको घर बिठा दिया गया था कि ज्यादा पढ़ जायेगी तो इतना पढ़ा-लिखा लड़का नहीं मिलेगा | बिरादरी में कोई पढ़ी लिखी बहू बना कर नहीं ले जाएगा | वो तो चौधरी ने एक ब्याह में उसको छत पर संगीत में नाचते देख लिया था और अपने दोस्त को “यो छोरी किस गाम और गोत की सै? “ कह कर सब खबर निकलवायी थी | बाद में दोस्त की भाभी ने रिश्ता बापू जी के पास भेजा था | सब ठीक लगने पर आती बैसाख में लगन हो गया था लेकिन गौना एक साल बाद किया गया था |
मीनल बचपन से ही बड़ी समझदार थी | अम्म को याद आया, “एक बै वा अपणे भाई के ब्याह में जाण खात्तर लत्ते खरीद री थी | उसके पीहर में पहला ब्याह था। दो साडी खरीदने के बाद जिब उसने तीसरी साडी देखनी चाही तो मीनल बाजार में जोर तै रोवण लाग गी। पूछ्या तो बोली आप तो मेरे बापू के सारे पैसे ख़तम कर द्योगी। फेर मैं बड़ी होकै २० क्लास तक क्यूकर पढूंगी?”
बहुत प्यार आगया था उसको मीनल पर। उसने दोनों साड़ी उठाई और फिर कुछ भी खरीददारी नहीं की और घर लौट आई | बचपन से मीनल कहीं से भी मिले पैसे एक गुल्लक में जमा कर लेती थी | अपनी गुल्लक के जमा पैसो से ही उसने अपनी साइकिल खरीदी थी | अपने गाँव में घूमती बंजारन उसको बड़ी अच्छी लगती थी | अक्सर उनके साथ खड़े होकर उनके बहुते घेरे वाले घाघरे को देख कर कहती थी “ माँ मने भी इसो घाघरो चाहिए , इसी इसी पिघ तै उघड़ी चोली भी।”
“चाल भीतर, तेरे बापू नै सुण लिया तो तेरी गेल्याँ मनै भी काट कै धर देगा। अक या छोरी किसे लोग्गां की रीस कर री सै? ”
मीनल को कभी लड़कों से डर नहीं लगता था, गाँव के सब छोरों संग धड़ल्ले से बात करती थी , सब उसकी इज्ज़त करते थे | अगर कोई लड़का कुछ गलत बोल भी देता, बाकी छोरे उसे वहीँ सूत देते थे |
‘दूध पीण की चोर थी यो मीनल | ज्यां तै ही आज कमज़ोरी आगी अर बुखार भी चढ़ ग्या। आज-काल की छोरियाँ के गात मैं ताक़त ही कित रह री सै ? घी, मलाई, मक्खन तै परहेज जो राखैं यैं।
हाय! मोटी हो ज्यांगी। जणु हाड निकाल कै कोय इनाम मिलता हो , काल नै ब्याह पाछै जब बालक जनैगी, फेर बेरा पटैगा….”
विचारों का रेला कभी सर्पीली सड़कों की माफिफ़ घूमता तो कभी सरपट हाईवे पर दौड़ता लेकिन कहीं कोई रम्बल स्ट्रीप्स नहीं थी।
मीनल को उसने लड़ना नही सिखाया था लेकिन उसने सहना भी नहीं सिखाया था | नम्र होकर बात करो सामने वाले को अपनी बात समझाने का प्रयास करो। न माने तो छोड़ दो सबको सबके हाल पर, समय उनका इलाज़ करेगा लेकिन अगर आपके आत्म-सम्मान पर हमला हो, तो बिलकुल मत रुको उसकी रक्षा के लिए उस समय जो उचित लगे कर आना।
उसको याद है चंडीगढ़ में स्नातक की पढाई के दौरान एक क्लास में पढ़ने वाली लड़की का भाई उसको ख़त दे गया था| उसने पहले होस्टल में सब लड़कियों के सामने ख़त पढ़ा और फिर उसे होस्टल के बाहर बुलाकर वही ख़त उसकी बहन को देकर कहा था, “सोच मेरे भाई ने तेरी बहन को ख़त दिया …बोल इब क्या करना चाहिए तेरी बहन को…वही मुझे करना तेरे संग।”
माँ को ना जाने कितनी बातें याद आ रही थी। अचानक चौधरी साहेब को खांसी सी उठी, उसने पानी की बोतल पकड़ाई। दो घूँट पानी पीकर उन्होंने जब बोतल वापिस की तो उनकी आँखों में लाल डोरे चमक रहे थे।
‘ये बाप भी कितने ड्रामेबाज़ होवैं सैं | किसी सख़्ती दिखावैं? अपणी बेटी नै जान तै ज्यादा प्यार करैं, पर कदी कहत्ते नी। बस जादा प्यार आण पै सर पै हाथ धरकै कह देंवैं जीती रह बोबो। पहल्यां छोरी न ज्यादा न पढ़ाणा चाहत्ते अर जिब वा आकै फीस के पीसे मांगै तो चुपचाप उसके हाथ मैं बटुआ धर दैं।’
सड़क पर धुँधलका छटने लगा था। लेकिन कोहरा घना था। सामने बमुश्किल एक कार ही नजर आ रही थी। रमेश ने भी आगे वाली कार के पीछे अपनी गाड़ी लगा दी। पेड़-पौधे खेत सब पानी से भीगे से खड़े थे।
चौधरी ने लोही को कसकर लपेट लिया और धीमे से हुँकार भरी “ हे प्रभु! बस तेरा ही आसरा सै। म्हारी इज्जत राखिये।”
उसने भी ईश्वर से यही कहा, ‘हे ईश्वर! यो कोहरा ख़त्म कर। हम भी मीनल धोरै ठीक-ठाक पहुंच ज्यां। एकली ह्स्तपताल मैं डर री होगी वा..”
सूमो रिवाड़ी से चंडीगढ़ पहुँच गयी सोच में गुम माँ को पता भी नहीं चला। गाड़ी पी जी आई अस्पताल के सामने रुक गयी। रमेश तेजी से रिसेप्शन पर पहुँचा | धीरे-धीरे चलती माँ सामने रखी कुर्सी पर बैठ गयी। अख़बार में सुबह-सुबह अखबार पढ़ने का आनद ही कुछ और होता है। उसने मेज पर रखे अख़बार पर नजर मारी …पहले पेज के आखिरी कालम में एक खबर पर नजर एक पल को रुकी, “पंचकुला में एक लड़की के साथ तीन लड़कों ने गंग रैप किया। लड़की शिमला से अपनी एक सहेली के साथ चंडीगढ़ किसी सेमीनार में आ रही थी| रास्ते में टैक्सी को रोक कर ड्राईवर ने अपने दो साथियों के साथ घटना को अंजाम दिया। एक लड़की की अधिक रक्तस्त्राव से मृत्यु हो गयी दूसरी को चंडीगढ़ में भरती कराया गया है। अभी लड़कियों की पहचान नहीं हो सकी है। लड़के वारदात के बाद टैक्सी समेत फरार।”
“निगोड़े ,” के हो ग्या यो आज-काल के छोर्यां कै! नाजुक-सी छोरियां आजकल की….” मन ख़राब-सा हुआ पढ़ कर और अखबार सामने रख कर देखने लगी कि रमेश किधर गया?
सामने से दो पुलिस वालियों के संग रमेश आ रहा था। “इसकी आँखें रोई-सी क्यूँ सैं?” माँ का मन आशंकित हुआ, “कहीं मेरी ही बेटी के स्………
ना … ना! बाबा खाटू शाम जी मेरी बेटी कै मेरी भी उम्र लग जावे। पूरे ५०१ रपीये का प्रसाद चढ़ावे में चढ़ाऊंगी।”
” अम्मा जी, हिम्मत रखो हम अपराधी को छोडेंगे नहीं।”
“अपराधी ……………………ए के होग्या मेरी छोरी कै, रे होया के?”
वह जोर से चीखी। अस्तपताल में मौजूद सब लोग उसे देखने लगे।
” मेरी बच्ची कै के होया ?”
“एरे रमेश! के बोल री या, थारे बाबू कित गये?”
” माँ, बाबू भीतर सै मीनल के धोरै!”
तेजी से कदम रखती वो आई सी यू की ओर उधर ही दौड़ी जिधर से रमेश आ या था। घुटने साथ नहीं दे रहे थे लेकिन जितना तेज चल सकती थे, वह चलती गई।
“हाय! मेरी बच्ची! भगवान् मेरी भी उम्र तेरै ला दै।”
मन ही मन बलाए उतारती उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। चौधरी माथा पीट रहे थे। रमेश की आँखे खून के आंसू रो रही थीं। सामने शीशे के उस पार मीनल बेहोश पड़ी थी, जिससे मिलने की अभी किसी को इज़ाज़त नहीं थी। पुलिस वाली ने हाथ थाम कर जो शब्द कहे वे उसके कानों में सीसा उंड़ेल रहे थे।
वो सब। जिसको कभी कोई माँ- बाप नहीं सुनना चाहेगा। कोई भाई इस दिन को देखने से पहले मर जाना चाहेगा। अपनी हाथ की राखी का फ़र्ज़ न निभा सका, बहन की रक्षा करने का। उसके सामने अखबार की वो खबर घूम गयी -उफ्फ्फ वो मीनल थी। धच्च! से वोह जमीन पर गिर गयी।
वो तो अख़बार की लड़की की खबर पढ़ के खौल रही थी. लेकन, अब तो बात उसी की बेटी की थी।
“कौन था वो कमीण….?” उसने पुलिस से पूछा।
चौधरी साहब ने उसको चुप रहने का इशारा किया और उसको कन्धों से थाम कर सामने कुर्सी पर बैठाना चाहा। “चुप बैठण का टैम नी सै यो,
जिसनै म्हारी फूल-सी बच्ची का यो हाल कर्या, उनै तो कती छोडूँ मैं।” चौधरी साहब बिरादरी समाज शहर सबकी दुहाई देते रहे लेकिन उसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
“रमेश रपट लिखवा …..”, उस ने जोर की दहाड़ लगाई।
चोधरी साहब! एक बार आपनै अपनी दादी तै मेरी बेटी को बचा कै मेरतै जीवन दान दिया था ……आज भी ओ क़र्ज़ मैं तारण जाऊंगी ……….मेरी बेटी के गेल जो होया उसका इलाज़ हो ही जावेगा ………….गलती जिसकी सै, उसतै सज़ा दिलवाणी ही होगी …. किसी और छोरी कानी आँख न उठाण ना देंगे उन नै दुबारा …कसूर उन कमीणां का सै, मेरी मीनल का नहीं | इज्ज़त उनकी खराब होगी। मेरी बेटी को कुछ ना होवेगा …. मेरे राम जी उसकी रक्षा करेंगे।”
“जे हम माँ-बाप ही छोरी नै गलत मानैंगे तो काल नै म्हारे छोरे भी किसी की बहू-बेटी की इज्ज़त पे हाथ गेरांगे।”
“चोधरी साहब! ज्युकर उस टैम हिम्मत करी थी न ………….आज भी करणी सै। उस टैम मीना के पाछै गाम की बाकी छोरी भी पढ़ण शहर आई ………आज अगर हम मुंह बोच लैंगें तो आगै कोई छोरी शहर पढ़ण नहीं आ पावेगी। सब मीनल नै कोसेंगे ………….. म्हारी बेटी कमजोर कोणी सै………………..न उसकी माँ अर ना ही बाबू…………”
“छोरी की इज्ज़त किसी छोरे के एक बार छू लेने तै ख़तम ना हो जाती ………..वो मम्हारा मान सै, सम्मान सै…………इज्ज़त तै खड़ी होगी।”
माँ के घुटनों में दर्द हो रहा था, लेकिन झुकने को तैयार नहीं थे उनके घुटने।
चौधरी साहेब अपने जान पहचान वाले एसएसपी को फ़ोन लगा रहे थे ….रमेश अपने दोस्तों को फ़ोन कर रहा था …मीनल के होश में आने पर उस का ब्यान लेने की पूरी तैयारी के साथ पुलिस वाले बाहर खड़े थे …………………
अम्मा आई सी यू में बेहोश बिटिया का सिर सहला रही थी।

बहुत मार्मिक कहानी।
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नीलिमा जी!
आपकी पूरी कहानी एक साँस में पढ़ गए।
समझ ही नहीं आ रहा कि क्या कहें! हमारा तो अपना पूरा उपन्यास ही इसी विषय पर है। एक बार फिर वह सारी घटनाएँ आँखों के सामने जीवन्त हो उठीं जिसे हमने बहुत तकलीफ से लिखा था।
इस अपराध पर वरीयता के स्तर पर काम होना जरूरी है।
पूरी कहानी में अपनी बेटी के लिए माँ की चिंता मार्मिक धारा सी बहती रही।
स्थानीय भाषा की दृष्टि से हरियाणा के इस परिवेश से हम पूरी तरह परिचित हैं।
कन्या का जन्म होते ही नमक में गड़ा कर मारने के कई प्रसंग पहले भी पढ़े हैं।
कहानी लड़कियों को लेकर अनेक प्रश्न खड़े करती हैं।
हम अक्सर कहते हैं कि स्त्रियाँ ही स्त्रियों की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं ।जैसा इस कहानी में कहा गया कि दादी नमक के साथ दबाने को तैयार थी।
इस कहानी के मीनल की माँ एक आधुनिक सोच रखने वाली दबंग स्त्री की तरह अपनी लड़की को बचा ले गई। न सिर्फ उसे बचाया
बल्कि अपने दम पर, अपनी जिद पर उसे खुले आकाश में पंख फैलाने का, पढ़ा लिखा कर आगे बढ़ने का अवसर भी दिया, पर शिकारियों की गिद्ध दृष्टि ऊपर आसमान के उड़ान पर भी रहती है।
पूरी कहानी में माँ की रममता ,चिंता व भय छलकता नजर आया।
अंत में जब उसे पता चलता है कि उसकी बेटी के साथ क्या हुआ तो माँ यहाँ पर भी कठोर और दृढ़ नजर आती है।
कहानी का अंत सकारात्मक संदेश के साथ होता है। *लड़की का कोई दोष नहीं होता।*
सबके लिए यह समझना बहुत जरूरी है। विशेष तौर पर समाज के लिये।
मीनल की पूरी कहानी ममता के फ्लैशबैक में चली, वर्तमान के भय और चिंता से जुड़कर। स्थानीय भाषा ने इसमें प्राण फूँक दिये।
कहीं-कहीं कुछ शब्दों के अर्थ समझ में नहीं आए लेकिन जहाँ भावों की प्रधानता होती है, वहाँ अर्थ अपने आप खुल जाते हैं।
शीर्षक आखिरकार वहां सार्थक सिद्ध होता है जहां मीनल की मां एक सकारात्मक निर्णय लेती है। एक सकारात्मक संदेश देती है।
एक महत्वपूर्ण विषय पर लिखी इस कहानी के लिए नीलिमा जी को बहुत-बहुत बधाई।
बहुत मार्मिक कहानी नीलिमा जी…
बहुत संवेदनशील व मार्मिक कहानी, नीलिमा जी