संपादकीय : भारत में ऑक्सीजन का आपातकाल 3

पुरवाई पत्रिका भारत सरकार को एक सलाह देना चाहेगी। कोरोना पर हर मन्त्री कोई वक्तव्य न दे। कोरोना को लेकर वैज्ञानिकों एवं डॉक्टरों की एक कमेटी बनाई जाए। बस हर दोपहर उस कमेटी का अध्यक्ष, भारत के प्रधान मन्त्री एवं स्वास्थ्य मन्त्री देश के सामने मिल कर स्थिति साझा करें। कम से कम ब्रिटेन के प्रधान मन्त्री बॉरिस जॉन्सन तो यही करते रहे हैं। मुख्य बात वैज्ञानिक या डॉक्टर ही बताएं। मन्त्री केवल सरकार की ओर से आश्वस्त करें।

भारत में इस समय कोरोना काल बेबसी का काल बनता जा रहा है। सब केवल विनाश लीला देख रहे हैं मगर कुछ भी कर पाने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। किसी हस्पताल में ऑक्सीजन के लीक हो जाने से मरीज़ मौत के मुंह में जा रहे हैं तो कहीं ऑक्सीजन की कमी से। आम आदमी ऑक्सीजन सिलण्डर कंधे पर उठाए उसे भरवाने के लिये परेशान इधर से उधर घूम रहा है और कहीं पुलिस से गालियां खा रहा है तो कहीं गैस भरने वाली एजेंसियों से। आँखों में आँसू लिये अपने प्रियजनों की मौत से ख़ौफ़ज़दा… बस बेबस है!
सवाल यह है कि अचानक यह सब हो कैसे गया। कोरोना के पहले चरण के बाद भारत विश्व में एक नेता के रूप में उभरा था और विश्व भर को वैक्सीन मुहैय्या करवा रहा था। एकमात्र ऐसा देश जहां दो दो वैक्सीन एक साथ बनाई गयीं और चार-चार और बनने की प्रक्रिया जारी थी। फिर अचानक दूसरी लहर में यह सब गड़बड़ियां कैसे?
दरअसल भारत के नेताओं, वैज्ञानिकों, डॉक्टरों किसी ने भी नहीं सोचा था कि दूसरी लहर इतनी भयानक होगी। सच तो यह है कि दूसरी लहर में संक्रमण की गति चार गुणा अधिक है। अब यदि आपने अपने हस्पताल में एक हज़ार मरीज़ों के लिये ऑक्सीजन की व्यवस्था कर रखी है और वहाँ अचानक चार हज़ार मरीज़ आ जाएं तो तंत्र बेचारा हो कर ही रह जाएगा।
एक बात याद रखनी होगी कि पूरे विश्व में कोई भी सरकार वर्तमान विश्वमारी का सामना करने में अबतक सफल नहीं हो पाई है। जब जब और जहां जहां कोरोना की नयी लहर आई है उसने वहां तबाही मचायी है। अमरीका, ब्रिटेन, युरोप, खाड़ी देश हर जगह कोरोना की मार महसूस की जा सकती है। ब्रिटेन ने तो भारत समेत 22 देशों को रेड लिस्ट में डाल रखा है जहां की उड़ानों पर प्रतिबन्ध लगा दिये हैं।
भारत में राजनीतिज्ञ हर विषय पर राजनीति करने के लिये कुख्यात हैं। चुनाव पूरे हो जाने के बाद विपक्ष के पास जैसे एक ही मुद्दा होता है कि सरकार को गिराया कैसे जाए। सत्ता पक्ष एवं विपक्ष एकता कपूर के टीवी सीरियलों की तर्ज़ पर सास-बहू के षड़यन्त्रों में व्यस्त रहते हैं। किसी को यह महसूस नहीं होता कि राजनीतिक दलों का मुख्य काम देश को प्रगति की राह पर चलाना और आम आदमी की ज़िन्दगी को बेहतर बनाना है। 
अब भारत में इस बात को लेकर राजनीति हो रही है कि हस्पतालों और आम आदमी के लिये ऑक्सीजन का इन्तज़ाम करना राज्य सरकारों के कार्यक्षेत्र में आता है या फिर केन्द्रीय सरकार के। विपक्ष का रवैय्या थोड़ा हैरान करता है। जिस जिस राज्य में भाजपा सरकार है, विपक्ष उस उस प्रदेश के मुख्यमन्त्री को दोषी ठहरा रहा है और जहां जहां विपक्ष की सरकार है वहां वहां केन्द्रीय सरकार पर उंगली उठा रहा है। 
दिल्ली उच्च-न्यायालय ने भी एक अजीब सी टिप्पणी इस विषय पर की है। दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि किसी से उधार लो, भीख मांगो या चोरी करो, जो करना हो करें लेकिन आपको ऑक्सीजन देना है। ऑक्सीजन लेकर आइए, हम मरीज़ों को मरता हुआ नहीं देख सकते हैं।” यहां उच्च-न्यायालय की मंशा पर उंगली नहीं उठाई जा सकती मगर एक उच्च-नयायालय किसी भी सरकार को चोरी करने का आदेश कैसे दे सकता है। हमें याद रखना होगा कि न्यायधीष भी अंततः इन्सान ही होते हैं और कई बार भावनात्मक टिप्पणी करने की ग़लती कर बैठते हैं।
इस बेबसी के काल में हमारे निजी संस्थान जैसे कि टाटा और अंबानी बिना किसी प्रकार को शोर मचाए या फ़ोटो खिंचवाए अपने अपने संस्थानों से लाखों टन ऑक्सीजन देश को मुहैय्या करवा रहे हैं। राजनीतिज्ञ उन पर कीचड़ तो उछालते रहते हैं मगर इन मानविक कार्यों की तारीफ़ करना भी ज़रूरी है। एक बात और देखने में आई कि भारत के कुछ मंदिर व गुरूद्वारे भी अपनी अपनी सामाजिक भूमिका निभा कर कोरोना से लड़ने के लिये बेहतरीन योगदान दे रहे हैं. 
एक बात तो साफ़ है कि भारत में ऑक्सीजन की कमी नहीं है। दरअसल किसी ने यह सोचा ही नहीं था कि इतनी अधिक मात्रा में अचानक ऑक्सीजन की आवश्यक्ता पड़ने वाली है। इसलिये ऑक्सीजन का भण्डार होते हुए भी उसे हर जगह पहुंचाया नहीं जा सका। रक्षा मन्त्री राजनाथ सिंह ने भारतीय एअर फ़ोर्स के विमानों द्वारा ऑक्सीजन को देश भर में पहुंचाने की ज़िम्मेदारी सौंपी है और भारतीय एअर फ़ोर्स इसमें जुट भी गयी है।
पुरवाई पत्रिका भारत सरकार को एक सलाह देना चाहेगी। कोरोना पर हर मन्त्री कोई वक्तव्य न दे। कोरोना को लेकर वैज्ञानिकों एवं डॉक्टरों की एक कमेटी बनाई जाए। बस हर दोपहर उस कमेटी का अध्यक्ष, भारत के प्रधान मन्त्री एवं स्वास्थ्य मन्त्री देश के सामने मिल कर स्थिति साझा करें। कम से कम ब्रिटेन के प्रधान मन्त्री बॉरिस जॉन्सन तो यही करते रहे हैं। मुख्य बात वैज्ञानिक या डॉक्टर ही बताएं। मन्त्री केवल सरकार की ओर से आश्वस्त करें।
एक सलाह टीवी चैनलों को भी। टीवी चैनल इस आपदा को टीआरपी से मिला कर न देखें। कोरोना पर बातचीत करवाएं… बहस नहीं। इसलिये किसी भी राजनीतिक दल के प्रतिनिधि या समर्थक को कोरोना पर बातचीत के लिये निमंत्रित न किया जाए। कोरोना पर चिल्लाना नहीं है… बात जनता तक पहुंचानी है। बस यही टीवी चैनलों का कर्तव्य होना चाहिये। 
याद रहे हमें घबड़ाहट और अफ़रा-तफ़री से बचना होगा। सही नेतृत्व की माँग है कि परिपक्व एवं सही निर्णय लिये जाएं और उन्हें लागू भी किया जाए। जिनके प्रिय जन अपनी अपनी जान गंवा चुके हैं उनके नुक़्सान की भरपाई नहीं हो सकती। मगर भविष्य में और जानों के नुक़्सान से बचने का प्रयास तो किया ही जा सकता है।
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

1 टिप्पणी

  1. बहुत सधा हुआ संपादकीय लिखा है…किसी भी आपदा के समय जितना सकारात्मक माहौल बनाया जा सके उसके लिए प्रयत्न होने चाहिए ताकि जनता की पीड़ाओं को राहत मिले। तेजेन्द्र जी आपके लिए हार्दिक शुभकामनाएं

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