- सुधा जुगरान
रेनू मंडल की भावभीनी कहानियों की नई पुस्तक ‘रुहानी रिश्ते’ । रेनू तीन दशक से भी अधिक समय से लेखन में संलग्न हैं। राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाएं जैसे कदंबिनी, साहित्य अमृत, मेरी सहेली, वनिता, फेमिना, पुरवाई, विभोम स्वर, अंतरदेश, दिल्ली प्रेस की पत्रिकाएं और कई पत्रों में भी उनकी रचनायें प्रकाशित हो चुकी हैं। दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं की चर्चित लेखिका होने के नाते रेनू मंडल 2004 में उत्तरप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल द्वारा भी दिल्ली प्रेस के एक कार्यक्रम में पुरस्कृत हुई हैं।
इसके अलावा रेनू की बाल कहानियां प्रसिद्ध बाल पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी हैं। बाल-साहित्य पर उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा 2026 का सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार प्राप्त हुआ है। बाल साहित्य संस्थान अल्मोड़ा की अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता-2023 में भी रेनू की बाल-कहानी को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ है। अलग-अलग पत्रिकाओं की कहानी प्रतियोगिताओं में भी रेनू की कहानियां पुरस्कृत हुई हैं। प्रस्तुत कहानी संग्रह की शीर्षक कहानी, “रुहानी रिश्ते” पर विष्णु प्रभाकर संस्थान द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में उन्हें प्रथम पुरस्कार मिल चुका है। संग्रह की एक सशक्त कहानी,” नेमप्लेट” प्रसिद्ध डॉ. कुमुद टिक्कु कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से नवाजी गई है। रेनू की कहानियों का सबसे बड़ा गुण उनकी संवेदनशीलता है। उनकी कहानियां इतनी मार्मिक होती हैं की न चाहते हुए भी कहानी की समाप्ति पर आंखें भर जाती हैं।
रिश्तों को बहुत गहराई से समझने और समेटने वाली रेनू की कहानियों में उनके अपने व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी कहानियां सीबीएसई एवं आईसीएसई बोर्ड की विभिन्न कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में पढ़ाई जा रही हैं। कई बाल कहानियों का ऑडियो बन चुका है और वयस्कों के लिए लिखी कई कहानियां यूट्यूब पर भी सुनी जा सकती हैं।
बुजुर्गों की जो दशा और दिशा आज अधिकतर परिवारों में दिखाई दे रही है वह बहुत ही सोचनीय है। इसका बहुत बड़ा कारण परिवार का आकार छोटा होना है। इकलौते-दुकलौते बच्चों की आधुनिक जीवन शैली में बुजुर्ग मखमल में टाट के पैबंद के माफिक हो गये हैं। इस डिजिटल युग में उनकी सोच-समझ, विचारों और अनुभवों का खजाना अब आउट डेटेड हो गया है इसलिए उनकी उपयोगिता भी समाप्तप्रायः है। भावनाओं व संवेदनाओं का कमजोर पड़ जाना रिश्तों के जोड़ों को छीज रहा है।
ऐसी ही कहानी है ‘नेम प्लेट’ जिसमें बुजुर्ग अकेली मां जब तक ताकतवर है, अपने बच्चों के लिए उपयोगी बनी रहती है। पति के जाने के बाद बच्चों के हर तरह से देखभाल के कारण खुद को भाग्यशाली समझती है और अपना घर, पैसा सब बच्चों की जरूरत पर खर्च कर देती है। उसी मां को जब आंखों का ऑपरेशन कराने की आवश्यकता होती है तो बेटा फ्री कैंप में ऑपरेशन के लिए ले जाता है। घर में पार्टी है और मां अपने कमरे में बंद है। उनको खाना सबसे बाद में मिलता है… फुर्सत में। घर में क्या-क्या बना है बुजुर्ग मां सिर्फ कल्पना कर रही हैं। खुशबू से अपना पेट भर रही है और अपनी भूख को दबाए अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ी है।
यह दृश्य दिल को तोड़ देता है। हमारे भारतीय संयुक्त परिवारों की परंपरा में बच्चों का बचपन और बुजुर्गों की वृद्धावस्था सुरक्षित थी। इनकी समाप्ति के साथ ही बच्चों का बचपन बिखर गया और बुजुर्गों की वृद्धावस्था बेसहारा हो गई। बहुत ही मार्मिक कहानी प्रथम आने की हर प्रकार से योग्य है।
प्रस्तुत संग्रह कि एक और बहुत ही मार्मिक कहानी है ‘रुहानी रिश्ते’। जिसे पढ़ते हुए कई बार आंखें छलक जाती हैं। यह कहानी अखिल भारतीय स्तर की प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी है। रेनू की कहानियां हर उस रिश्ते के मर्म को छूती हैं जो हमारी दिनचर्या के अंग हैं। युवाओं को नैतिक शिक्षा देती हैं। आज के युवाओं के लिए इस कहानी का कथानक मात्र एक कल्पना भर हो सकता है परंतु कल्पनाएं भी तो समाज से ही आती हैं और समाज भी कल्पना करता है। आज के युवा जब अपने माता-पिता से भी सीधी बात नहीं करना चाहते तब एक युवती का अपने प्रेमी, जो कि विवाह से पहले दिवंगत हो जाता है… उसके माता-पिता की देखभाल के लिए खुद को समर्पित कर देती है। यह भाव बहुत पवित्र है क्योंकि जाने वाले से युवती का रुहानी रिश्ता बन चुका था। उसकी जिंदगी में एक अंतराल के बाद एक दूसरा युवा आता है जो उसकी इस भावनाओं को समझता है। वह अपने माता-पिता के लिए एक परफेक्ट बहू और अपने लिए अच्छा जीवनसाथी उसमें पाता है। बहुत ही सुंदर कहानी जो खत्म करते हुए दिल में उतर जाती है। साधुवाद।
अनचाहे रिश्ते भी कभी बेहद अपने बन जाते हैं। जाने रिश्ते का वह कौन सा तंतु होता है, भावनाओं का वह कौन सा रेशा होता है जो बिना कारण बिना सच्चाई जाने जुड़ जाता है और जो इन रिश्तों को निभा ले जाते हैं, वे रिश्तों को जीत लेते हैं। ऐसी ही कहानी है ‘अनचाहा रिश्ता’। कहानी की नायिका को जब पता चलता है कि जो युवक उसकी बेटी से बहन का रिश्ता निभा रहा है… उससे बेटे का रिश्ता निभा रहा है, जो अनजाने में उनका अवलंबन बन चुका है। वास्तव में वह उसके धोखेबाज पति की दूसरी पत्नी की संतान है । क्या होता है उसके बाद? क्या नायिका अपना पाती है अपने सौतेले बेटे को या नहीं? कहानी बहुत धीरे-धीरे अपना रहस्य खोलती है और पाठक को स्वयं में डुबो देती है।
दिलकश प्रेम कहानी ‘एक भूल मासूम सी’। कभी-कभी हम अपने नजरिए से सोचते हुए दूसरे की भावना महसूस नहीं कर पाते हैं। दूसरे की भावनाएं कभी-कभी इतनी गहरी होती हैं कि हमारी एक लापरवाही से गहरी ठेस लग जाती है। ऐसी ही है यह कहानी। नायक और नायिका… जिसमें नायिका, नायक के मजाक का मंतव्य नहीं समझ पाती है और उनका बिछोह वर्षों के लिए हो जाता है। क्या वे फिर मिल पाते हैं? यह उत्सुकता पूरी कहानी में बनी रहती है और यही कहानी की सफलता है।
कहानी ‘क्लाइमैक्स’ रिश्तों के आदान-प्रदान पर आधारित है। अक्सर लड़कियां कल्पनाओं में बहुत कुछ सोच लेती हैं कि विवाह के बाद जीवन शायद इतना रुपहला होगा कि उनको कोई भी परेशानी नहीं उठानी पड़ेगी किंतु हकीकत का धरातल कुछ अलग होता है और जैसे ही उन्हें परेशानियां उठानी पड़ जाती हैं, रिश्ते निभाने पड़ जाते हैं, या त्याग करना पड़ता है, उनके उस काल्पनिक दृश्य में हलचल मच जाती है। यह कहानी बहुत आवश्यक व ज्वलंत विषय पर है। सभी को पढ़नी चाहिए। इसका एक वाक्य दिल को छू जाता है कि ‘लड़कियां अक्सर कल्पनाओं में जीती हैं।’
शक का बीज कभी-कभी इंसान के दिलो-दिमाग की शांति खो देता है। शक हमेशा निराधार नहीं होता है। यह दूसरे की व्यवहारजनित स्थितियों पर भी निर्भर करता है लेकिन जब वही इंसान अनजाने में दूसरे के दिल की थाह पा लेता है तो पता चलता है कि यह मात्र उसके खुद के दिमाग की ही उथल-पुथल थी। यहां पर मैं यह अवश्य कहना चाहूंगी कि रिश्ता चाहे कोई भी हो अगर शक करने जैसी परिस्थितियां सामने आएंगी तो प्यार करने वाले, स्नेह देने वाले इंसान के दिमाग में शक उत्पन्न होना स्वाभाविक है। इसलिए ऐसी बातों से दूर रहना चाहिए। विश्वास को बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि एक बार किसी भी रिश्ते में शक का कीड़ा घर कर जाए तो जुड़ भले ही जाएगा किंतु दरार अपनी उपस्थिति हमेशा दर्ज कराती रहेगी। बहुत ही सशक्त कथानक है खूबसूरत कहानी,”अंतर्द्वंद’ का।
एक अन्य सशक्त कहानी है संग्रह की, ‘फुर्सत के पल’। चाहत का ढिंढोरा बहुत लोग पीटते हैं लेकिन बुनियादी चाहत कम ही लोगों में होती है। किसी के प्रति प्रेम सबसे पहले आदर मांगता है। प्रेम कभी अकेला नहीं होता। प्रेम अपने साथ आदर व मान- सम्मान की भावना साथ लेकर चलता है। कहानी में प्रेम को बहुत खूबसूरती से और विवाह और अविवाहित रहने को बहुत संतुलित तरीके से लेखिका ने दिखाया है। कहानी प्रभावित करती है और बहुत से आयामों को विमर्श के लिए खोलती है।
अत्यंत व्यवहारिक कहानी ‘पदचिन्ह’। पुरानी कहावत है कि अपने ही कर्म अपने आगे आते हैं। जैसा हम अपने बड़ों के साथ करते हैं। घर में खेल रहा बचपन उन सब बातों को आत्मसात कर रहा होता है। कभी एक समय था लोग खानदान देखकर रिश्ता तय किया करते थे, कारण शायद यही रहा होगा कि उन घरों में बच्चों ने अच्छे संस्कार लिए होंगे। यही सार है इस कहानी का जिसमें मां-बाप अपने बच्चों के उदासीन व्यवहार से दुखी हैं घायल हैं और इसी अवस्था के दौरान उन्हें अपने माता-पिता से किया अपना व्यवहार की याद आ जाता है। वे महसूस करते हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को संस्कार तो दिए ही नहीं… आखिर जैसे पदचिन्ह उन्होंने बनाए हैं उन्हीं पर तो बच्चे चलेंगे। एक बहुत ही समसामयिक व सार्थक रचना।
संग्रह की एक बहुत ही समझदारी व संतुलन से लिखी हुई कहानी जो आज के संदर्भ में बहुत प्रभावित करती है, ‘एक बार फिर’ युवतियां आज महत्वाकांक्षी है व उन्हें इसके लिए ठोस जमीन भी अभिभावक उपलब्ध कराते हैं। युवा पुरुषों में भी स्त्री के प्रति बदलाव आया है। वे अपनी खुद की पहचान बनाने वाली युवती को पसंद करते हैं। यही सशक्त कथानक है इस कहानी का जो हर उम्र के लोगों को पसंद आएगी।
कहानियां या तो मस्तिष्क में बसें या दिल में उतर जायें, ऐसी कहानियां ही पाठकों की पसंद बन पाती हैं। संवेदनशील मार्मिक दिल में उतर जाने वाले भावों को गूंथ कर कहानी में ढाल लेने में रेनू सिद्धहस्त हैं। पेपर बैक में इंडिया नेटबुक्स से प्रकाशित पुस्तक बहुत ही सुंदर व स्तरीय छपी है। आकर्षक कवर पेज, पेपर व छपाई सबकुछ बहुत ही बेहतरीन। 260 रुपए व 127 पेज की यह पुस्तक एमेजॉन पर उपलब्ध है।
- सुधा जुगरान
देहरादून, उत्तराखंड
मो-9997700506
