पेड़ ये- जिजीविषा
पेड़ ये
ऐसे हरियाये फिर
जैसे कभी झड़े न थे,
खा पटकी ओलों से
धरती पर पड़े न थे।
मुस्काते पत्तों के होंठ मोड़,
खिलखिलाते
पतझड़ की याद छोड़।
पेड़ ये,
बस पेड़ नहीं,
चिड़ियों के घर हैं
बच्चों का बचपन,
चहक-चहक चढ़ जिन पर
विजयी से हर्षाए,
यौवन की प्रेम पाती
तने-तने लिख आए।
वृक्षों की ठंडी साँसें
तपते तनों पर पंखा झलतीं हैं,
गरीबों का महल हैं
मन्नत के धागे पहन खड़े
विपदाओं के प्रहरी हैं।
तने तले बैठे मुस्काते हैं
सालिगराम,
स्वीकारते सबका प्रणाम
वर्ग और वर्ण भेद बिना ।
एक पूरी दुनिया है इस पेड़ में
जड़ से फुनगी तक..
सब कुछ….
मंत्र है, तंत्र है,
सबसे प्यार जताने को पॆड़,
पूर्णत: स्वतंत्र है।
………………..
इंद्रधनुष
डॉ. शैलजा सक्सेना
रिंगा रिंगा रोज़ेज़……
पॉकेट फुल ऑफ़ पोज़ीज़….
बच्चियाँ खेल रहीं थीं,
एक दूसरे का हाथ पकड़े
भूरे, पीले, गोरे, काले रंगों की बच्चियाँ खेल रहीं थीं!
धरती पर इंद्रधनुष रचतीं,
अपनी सफ़ेद हथेलियों में
एक दूसरे के रंगों को थामें, वे मगन थीं!
उन्हें मतलब नहीं था
ज़मीन के नीचे दबे इतिहास से!
दिमाग़ों में ठुकी नफ़रत की कीलों सें
जो दिखती नहीं,
पर हाथ लगाने पर चुभती हैं…!
वे पिछली सदियों की हवाओं से
बाहर थीं!
वे मुक्त थीं अभी,
पुरखों के ख़ून में बहे पक्षपात से!
वे हवा से होड़ लेती घूम रही थीं!
आसमान की तरफ़ ताकतीं हँस रहीं थीं!
घास पर चमकीली आँखें लिये,
एक साथ गिरती थीं,
जैसे गिर रहे हों फूल
विविधवर्णी..
वे अभी तितली, पेड़, फूल थीं!
वे अभी हवा, पानी, आसमान, मिट्टी थीं!
वे इस पल भविष्य रचती ब्रह्मा थीं!
………..
कनाडा में बसंत
हवा…
अपनी बासंती अंगुलियाँ,
डैफ़ोडिल्स और ट्यूलिप के रंगों में डुबो
लिख रही है धूप को निमंत्रण
अप्रैल के आखिरी पन्नों पर….
धूप…
बेख़बर खेल रही है,
आँख मिचौली, बादलों के संग!
उधर हवा,
पेड़ों को जगाती हिमनिद्रा से,
घास को मुस्कुराने का आदेश देती,
कलियों का मस्तक सूँघती,
पाँव दबा,
महकती, छलकती
फिर रही है यहाँ से वहाँ!
पाहुन धूप के आने की तैयारी में जुटी.
अप्रैल के आख़िरी पन्नों पर…….॥
…………
स्त्री होने का अर्थ
स्त्री होने का अर्थ
होना है सौभाग्यवती!
सौभाग्य,
निर्भर नहीं किसी के नाम के साथ जुड़ने पर..
सौभाग्य स्त्री के खून में
उत्सव सा नाचता है,
अंग-अंग गाता है
पाँवों में हँसी की पायलें
बजती हैं खनाखन
आकाश
कलाइयों पर चूड़ी बन, सिमट आता है !
स्त्री,
नदी, झरना, फूल होती है
अपने में बहती,
अपने में उगती है,
आवेग में उमड़,
समुद्र हो जाती हैं,
अपनी ही माँ बन,
अपने ज़ख्मों को दुलारती,
अपने को सँभालती, उठाती है।
सूरज सी उगती है दिन में,
रात में डूब कर
चाँद हो जाती है,
अपने जीवन के ब्रह्माण्ड को
हर पल रचती,
ब्रह्म हो जाती है।
दुनिया उसकी ताकत को जानती है
इसीलिए तो उसे बेड़ियों में बाँधती है
रीतियों की रस्सियों से बाँध कर
सिखाती है,
कोमलता, निर्भरता और कर्तव्य के मंत्र
पुरुषों का शारीरिक बल रचता है तंत्र!
पर स्त्री धरती है!
वह बेल नहीं
कि चाहे पुरुष-वृक्ष का साथ!
मिट्टी और हवा पर
पानी और आग पर उसका भी है
बराबर से अधिकार..
हथियाती नहीं वह उसे
कर्तव्य रूप लौटाती है
प्रकृति को प्रेम से बार-बार!
वह है पूर्ण, वह है स्वतंत्र..
गढ़ लेगी वो
अपने जीवन के,
सारे नव-सौभाग्य-मंत्र!
“मैं अधीर हूँ”
(होली की रात श्री कृष्ण का रुक्मिणी जी से राधा के बारे में संवाद)
आज फाग की रात प्रिय, मैं अधीर हूँ!
उससे दूर, माथ का जिसके अबीर हूँ!!
वह कर पल्लव कहाँ, लाल गुलाल लगाते
पिचकारी की धार बहाने हम मिल जाते,
हवा फागुनी मदन जगा, बहा ले जाती
गहन प्रेम के स्रोत ह्रदय में, खुल-खुल जाते!
बींधा प्रिय का हिय स्वयं, मैं वही तीर हूँ!
आज फाग की रात प्रिय मैं अधीर हूँ……………….!!
मृदंग-थाप की छाप ह्रदय पर पड़ती है,
भरी नगरिया, यह मुझ को सूनी लगती है
आज स्वर्ण की पिचकारी, पर रंग नही है
रहा अधूरा कृष्ण, जो राधा संग नहीं है!
सागर के तल में घुमड़े अथाह, मैं वही पीर हूँ!
आज फाग की रात प्रिय मैं अधीर हूँ……………….!!.
नहीं भुलाना चाह रहा वह मीठा सपना
मेरे मन से अनजान, वह मेरा इतना अपना
आँसू से जीवन आँचल पर कथा लिख रही,
जान रहा हूँ जीवन भर हमको है तपना!
उसकी आँखों से जो टपका, मैं वही नीर हूँ!
आज फाग की रात, प्रिय मैं अधीर हूँ!
डॉ. शैलजा सक्सेना
Co- Founding Director- Hindi Writers Guild, Canada
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