Tuesday, September 8, 2026
होमHomeनरेश मेहन की कविताएँ

नरेश मेहन की कविताएँ

टहनियां उदास रहती है
मुझे
 रोक लिया था
कल पीपल के पेड़ ने
 और कहा था
देखो मेरी तरफ।
मैं
वहीं पेड़ हूं ।
जिसकी टहनियों पर लटककर
तुम इतने बड़े हुए।
तुम गिरे थे
 मेरे तने से
कई बार
 चढ़े थे कई बार । तुम्हारे नन्हें पैरों की गुदगुदाहट
अभी भी मुझे याद है।
तुम खेला करते थे
कुरां डंडी
तपती दोपहर में।
 फिर सोते थे
 गहरी नींद
 मेरे बदन की छाया में। मैं कितना खुश रहता था।
 तुम्हारे साथ।
ये जो खुदे नाम
 तुम देख रहे हो
 यह तुम्हारे ही खोदे हुए हैं।
मैंने इन नामों को
बहुत सहेज कर रखा है।
अनायास
पीपल का पेड़ कराहा और कहने लगा
 क्या हो गया है तुम्हें और तुम्हारे शहर को।
क्यों नहीं तोडते
मेरी टहनियां और पत्ते उन पर क्यों नहीं लटकते
तुम्हारे बच्चे?
सच पूछो तो
 मेरा तना
 आजकल
 बहुत तड़पता है। टहनियाँ उदास रहती है नन्हे हाथों और पैरों के कोमल स्पर्श के लिए।
भाई
कहो ना
अपने बच्चों से।
भले ही
ठोक जाएं
अपने नन्हें हाथों से
एक कील या खोद जाएं अपना नाम मेरे बदन पर।
बहुत उदास था
पीपल का पेड़
 रुआंसा हो कर
 देख रहा था।
 छत पर लगे
डिस्क  एंटीना को
और
कान पर लगे मोबाइल को
 मन ही मन
 बुदबुदा रहा था
 इस ने छीनी है
 मेरी खुशी
 मेरे बच्चे मुझसे।
…………….
 माँ की किस्मत
कितना सजाया
उस चिड़िया ने
तिनका -तिनका लाकर रोशनदान में अपना घर ।
चिडया के बच्चों ने बदल दिया
विरानी को
चाहचहाती खुशहाली में ।
नन्हों ने
 मिलाई चोंच
अपनी मां की
चोंच में ।
मैंने देखी उनमें अपनी मां ।
कुछ दिनों बाद
नन्हे बड़े हो गए
 उड़ गए किसी के साथ।
उस सजे -सजाएं
घर में
अब चिड़िया अकेली थी।
घर फिर विरान था।
फिर
एक दिन
 वह घोंसला
बाहर फेंक दिया गया।
मैं सोचता हूं
हर मां
ऐसी किस्मत लेकर क्यों आती है।
….
अकेलापन 
हर रोज
हर सुबह
हर बूढ़ी काया को
दस से पांच बजे तक
अकेलेपन की
भोगनी पड़ती है
असीम यंत्रणा
करे भी तो
किससे मंत्रणा।
जब घर के
जवान स्त्री पुरुष
चले जाते है
दफ्तर में
खेत में
खलिहान में
मील में
रोटी की जुगाड में
और
दो आंक सीखने
बच्चे स्कूल में।
घर में
पसरा रहता है
काट खाने को आतुर
केवल सन्नाटा।
रहता है इंतजार
अपने नाती-पोतों का
सांझ ढले तक।
लेकिन आते है
जब घर के सारे लोग
और टांग देते है
संबंधों को
जैसे टांगते है
बच्चे अपने बस्ते
खूटियों पर।
सब बतियाते है
टीवियों से
बीवियों से
मोबाइल से
और बूढ़े जिस्म
सांसों में उलझी
अपनी बेबस जिंदगी से।
……
 पगडंडिया 
अपनी
पदचाप सुनना
मुड़कर अपने पैरों के
निशान देखना
लगता है
कितना मधुर।
झाड़ियों से
लताओं से
बातें करना
भंवरो का
संगीत सुनना
लगता है
कितना मनोरम।
जहां पर
हर कदम
हर ताल में
संगीत की
रचना हो
तुम उनके संग
वह तुम्हारे संग।
पगडंडियों का
यह संगीत
दुनिया भर की
हिंसक सड़कों
धुआं उगलते
वाहनों का
कितना
मासूम सा जवाब है।
पगडंडियां
सदा सुहावनी
मन- मोहक
अपनी सी लगती है ।
सड़कों पर
परायेपन की
गंध आती है।
हिंसा
सड़कों का धर्म है
स्नेह
पगडंडियों का मर्म है।
आओ
स्नेह की महक से
हिंसा की गंध मिटाए।
सड़कों की
पथरीली लयहीन
आंधी दौड़ से बचें
जड़ों से जुड़ना सीखे।
अगर आप भी
लेना चाहते हैं
प्रकृति के संगीत का
भौरों की गुंजार का
पेड़ों से आती
शीतल बयार का आनंद
तो पेड़ों को
काटो मत
झाड़ियों लताओं
को उखाड़ो मत।
उनके बीच
तलाशो कोई पगडंडी
जो थी कभी
हमारे आस -पास।
  …..
सिर 
मैं
घर से निकलते हुए
अपना सिर
धड़ से
अलग कर
हथेलियों पर
रख लेता हूँ।
पता नहीं
कब मैं
कुचला जाऊं
बस -ट्रक  के
नीचे
या फिर
किसी अमीर जादे की
कार के नीचे
हिट एंड रन हो जाऊं।
हो सकता है
मैं किसी आतंकवादी
विस्फोट का शिकार हो जाऊं।
या फिर
मारा जाऊं
सड़क पर सरेआम
मॉब लांचिग में।
यह भी
हो सकता है
पुलिस की गोली से
मारा जाऊं।
इसलिए
जब मैं
घर आता हूँ।
तब अपना सिर
धड़ पर लगाकर
शाम को गिनता हूँ
परिवार के सिर ।
कहीं
किसी का सिर
हथेलियों पर तो
नहीं रह गया।
…..
 औरत 
सच मानिए
एक औरत
मेरे भीतर
हमेशा से रहती है।
कभी
बहुत प्यारी सी
कभी बहुत गरूर
कभी
कपड़ों से लदी- फदी
कभी एकदम निर्वस्त्र
रहती है मेरे भीतर हरदम।
कभी
 होती है मां
कभी बेटी
कभी बहन
कभी पत्नी
कभी प्रेयसी
कितने रूपों में
समायी रहती है वह।
हम सब
औरत से है
औरत के लिए
औरत के द्वारा
बगैर औरत
हमारा कोई वजूद नहीं है।
इस धरती पर
औरत
दुनिया की सबसे
खूबसूरत नियामत है।
जो
मेरे ख्यालों में
हमेशा बनी रहती है।
मैं अंत तक
अपने  भीतर
एक औरत को
बचाए रखता हूँ।
  • नरेश मेहन, ढिल्लन कॉलोनी, हनुमानगढ़, राजस्थान।
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest