Tuesday, August 25, 2026
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ख़ुशबू से महकते अफ़साने

जूनिपर (कहानी-संग्रह), लेखिका : हंसा दीप
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन, सीहोर, मूल्य रु. 450/-  समीक्षा- मुकेश दुबे

साहित्य चाहे प्रवासी करार दिया गया हो अथवा अप्रवासी कहा जाए, सांस्कृतिक द्वंद, पहचान की तलाश, अलगाव, विस्थापन का दर्द और अतीत की यादों की महक अपने-अपने अंदाज़ में परिलक्षित होती है। हंसा दीप को पढ़ते हुए महसूस होता है, ‘पूरब की हल्दी’, ने ‘पश्चिम के चूने’ से मिलकर, कुमकुम का सुर्ख़ रंग बिखरा दिया हो पन्नों पर।

हर रचनाकार के सृजन में स्थानीय परिवेश स्वमेव समाहित हो झलक उठता है। अधिकांश प्रवासी सृजन में इस बात को महसूस किया जाता है। हंसा दीप की कहानियों में पश्चिम के आँगन के किसी कोने में पूरब की धूप भी दिखाई देती है। स्वदेशी स्मृतियाँ, पीले पत्तों सी उड़ती रहती हैं विचारों की आँधी में।

शिवना प्रकाशन, सीहोर से हालिया प्रकाशित कहानी संग्रह जूनिपर की 15 कहानियाँ नज़ीर हैं इस विचारधारा की। इस कहानी संग्रह का शीर्षक “जूनिपर” साइप्रस या सरू परिवार का एक सदाबहार झाड़ी या छोटा शंकुधारी पौधा है, जिसका लैटिन मूल अर्थ “सदाबहार” या जीवन और ऊर्जा देने वाला होता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि संग्रह की प्रत्येक कहानी में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह दिखाई देना स्वाभाविक है।

शीर्षक कहानी जूनिपर, तो जैसे सूर्य सरीखा ऊर्जा पिंड है, जिसमें शारीरिक विकृति, मजबूत इरादों को परास्त नहीं कर सकी, चाहे इंसान हो या चौपाया मूक प्राणी। जेस्टर और जूनिपर ने किसी और पर बोझ बनने के स्थान पर एक अंग की कमी को नजरअंदाज कर सामान्य जीवन जीने का रास्ता अपनाया।

व्यक्ति चाहे टोरंटो का हो अथवा लॉस एंजिलस का, दिल और दिमाग़ की कोशिकाओं का गठन व कार्यप्रणाली एक जैसी ही होती है। यह बात तब ज्यादा मानीखेज़ लगती है, जब कोई रिश्ता देश की सरहदों से ऊपर अपनी जगह बना चुका हो। खेल, हर किसी के जीवन का अभिन्न अंग है। कहा जाता है खेल को खेल की भावना से खेलना चाहिये परन्तु कब खेल भावना विजय के जश्न में दबकर रह गई, आभास तक नहीं हो पाया। कुछ देशों में तो खेल विशेष की दीवानगी, हार को स्वीकार ही नहीं करती और हताश दर्शक अपनी कुंठा, टेलीविजन को तोड़कर शांत करना चाहते हैं। खेल, मैदान से निकलकर मन व मस्तिष्क पर कब्जा कर लेता है और व्यक्ति खेल से ज्यादा हार-जीत का आनन्द लेने लगता है।

खेलखेल में, कहानी में इसी विषय को चुनकर, मैदान पर टीम या देश की विजय से आपसी रिश्तों तथा भावनाओं को कहीं ऊपर रखने तथा विजय या पराजय को मात्र टीम के खिलाड़ियों के उस दिन के श्रेष्ठ प्रदर्शन से जोड़कर देखने की पैरवी की गई है। इसी से जीवन में, देश, काल व परिस्थिति के अनुसार व्यवहार की बात को बल मिलता है।

शोक उत्सव, बर्फ की सर्दी में सुलगती आग से मन में जमी माँ-पापा की यादों को पिघलाकर आँखों से रिसने को मजबूर करती कहानी। अंतिम पंक्ति जैसे शाश्वत सत्य है //जाने वाले भी रह जाते हैं, अगर कोई उन्हें जीता रहे। // मृत्यु के शोक में विजयी श्रद्धांजलि का मर्मस्पर्शी उत्सव।

अल्ज़ाइमर या गंभीर डिमेंशिया की स्थिति में धीरे-धीरे याददाश्त और पहचान की क्षमता खत्म हो जाती है। इसके अलावा, मस्तिष्क के न्यूरोलॉजिकल विकारों जैसे एग्नोसिया या प्रोसोपैग्नोसिया (फेस ब्लाइंडनेस) के कारण भी व्यक्ति अपनों या खुद का चेहरा नहीं पहचान पाता। इसी मनोविकार अथवा दिमागी खलल को आधार बनाकर बुनी है कहानी झुरमुटी गलियारे। कोई कैसे उस आघात को सहन करे जब, अतीत की यादें मन के दर्पण से पूरी तरह से हट जाएँ, स्मृतियाँ थककर मौन हो जाती हैं और तब प्रेम अकेला साथ निभाता प्रतीत होता है ।

कान, मनुष्य को प्रकृति का ऐसा उपहार है जो ध्वनियों को सुनने तथा समझने के लिए दिया गया है। डेफनेस (बाधिर्य या बधिरता) को चिकित्सा विज्ञान ने मात्र श्रवण क्षति कहकर इसके उपचार की व्यवस्था की हो, परन्तु भावनात्मक और सांस्कृतिक संदर्भ में बधिरता से बड़ा कोई श्राप नहीं है जीवन में। रास्ते पर लगे चेतावनी बोर्ड ने शीना को अतीत के उस हिस्से में घसीट लिया, जहाँ वो पिता की बधिरता के तीव्र अनुनाद को सुन रही है। देख रही है उस अव्यक्त पीड़ा को जो पिता की आँखों से अनेक बार बही थी।

लेकिन ‘जूनिपर’ में नकारात्मकता के लिए स्थान कहाँ है! एक बच्चे के माध्यम से बताया है कि जब एक  दरवाज़ा बंद होता है, प्रकृति दूसरा खोल देती है। एक बच्चा, ध्वनि को कान के स्थान पर आँखों से सुन व समझ रहा है। शायद सीख रहा है वो जीना और इसी हौसले का नाम ज़िन्दगी है।

हंसा दीप जी की लेखनी की खासियत है यह कि वे समाज के चलन को संकेतों के माध्यम से प्रभावी तरीके से व्यक्त कर जाती हैं।

सफेद बत्तखें, प्रगतिशील समाज की सोच और आचरण का सूक्ष्म विश्लेषण करती कहानी है। श्मशानघाट पर अंत्येष्टि के समय अथवा दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना सभा में लोगों के दोहरे आचरण पर तीखा तंज है कहानी। पाती, महज़ कहानी या ख़त नहीं है। कन्यादान करते पिता के अपने हाथों से भींचे गये दिल से टपकते लहू की बूँदें हैं। जहाँ बेटी के स्नेह की तड़प है, वहीं जमाता के नवजीवन की तरफ़ उठने जा रहे कदमों की सतर्कता की सीख भी है। काश हर पिता, ऐसी एक पाती अपनी पुत्री के जीवन साथी को सौंपता विदा करते वक़्त, दिल को छूती कहानी, जिसमें सम्पूर्ण समाज के लिए एक संदेश समाहित है।

तागा, गुरु-शिष्य के मध्य तनी अदृश्य डोर की ऐसी प्रस्तुति जिसे हर शिक्षक महसूस कर सकता है। एक शिक्षक होने के नाते मैंने कहानी के हर शब्द को सिर्फ़ पढ़ा नहीं, घटित होते देखा है। जिया है उन लम्हों को जो लम्बी सेवा अवधि की धरोहर हैं। शिक्षक के लिए अपने विद्यार्थी की सफलता से बढ़कर कोई सम्मान नहीं हो सकता। शिष्य के विश्वास और गुरु के स्नेह की बेमिसाल नज़ीर है कहानी।

हम भारतीयों पर एक कहावत पूरी तरह से लागू होती है चाहे हम विश्व के किसी भी कोने में हों। अगर कोई कहे, “कौवा कान ले गया” तो हम अपने हाथ से कान को छूकर तसल्ली करना नहीं भूलते। भक्त, भी ऐसे ही मिजाज़ की प्यारी सी कहानी है। रुतबा, बाल मनोविज्ञान आधारित बेहतरीन कहानी बन पड़ी है। गिव एंड टेक वाली भावना, बचपन से ही विकसित हो जाती है। “चाँदी उगने लगी है बालों में, ये उम्र तुम पर हसीन लगती है” गुलज़ार साहब की नज़्म की इन पंक्तियों से बर अक्स है कहानी जेवर। कहीं पढ़ा था, दुनिया की सबसे संतुष्ट महिला भी अपने रूप-सौंदर्य से हमेशा असंतुष्ट रहती है। वैसे यह बात संतुष्टि दायक है कि एक स्त्री ने स्त्री की कमजोर नस पर हाथ रखा है।

पता नहीं मानवीय संवेदना में संप्रेषण के लिए किस भाषा का इस्तेमाल हुआ था। जितने देश, उतनी बोली। हर आदमी बहुभाषी हो, यह सम्भव नहीं है। भाषाई विरोधाभास और दो अपरिचित भाषाओं के मध्य निर्मित सेतु की मीठी सी कहानी है, घुँघराले बोल

संघर्ष के बिना जीवन की परिकल्पना सबसे बड़ा भ्रम है। एक गीत के बोल नेपथ्य में बजते सुनाई देते हैं, “जहाँ में ऐसा कौन है जिसे ग़म मिला नहीं…” और यह भी अकाट्य सत्य है कि संघर्ष ही व्यक्ति को कुंदन सा निखारते हैं और हर दु:ख की कोई न कोई काट मिल ही जाती है। एक बेंच को प्रतिमान स्थापित कर, कई मुद्दों को उजागर कर दिया कहानी ने। अंतर्राष्ट्रीय खेल चयन नीति पर बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न है कहानी, बेंच। प्रेम में पड़े इंसान के लिए दुनिया की हर सतह चिकनी होती है और कभी-कभी उसी फिसलन से उपजा घर्षण, जंगल की आग सी दहक बन जाता है और ज़िन्दगी झुलसने लगती है। एक बार फिर हंसा दीप जी ने जलते जंगलों में सुलगते प्रेम और अलगाव को ढाल दिया है, आग कहानी में।

अभावों में खुशी के रंग भरती कहानी है, पानी के रंग

बचपन में जब चुपचाप छत पर जाकर गीले मौजे में विश लिस्ट रखकर सांता की राह देखते थे, पापा कहते थे, सांता बहुत शर्माता है। तुम्हें देखकर नहीं आयेगा। बहुत बाद में पता चला था पापा ही सांता थे। इस कहानी ने फिर बचपन की उन्हीं पगडंडियों पर पहुँचा दिया, जहाँ बड़े होकर सांता बनने का बीजारोपण हुआ था। एंजेल ट्री जैसी संस्थाएँ आज भी बालमन के विश्वास को अच्छुण रखने में महती भूमिका निभा रही हैं।

स्कूल में जब डिवीजन आफ प्लांट किंगडम में “जूनिपर” जैसे पौधों के बारे में पढ़ा था, सोचा नहीं था कभी इसी उपेक्षित पौधे के नाम पर जीवन के अनगिनत रंगों को उजागर करती कहानियाँ पढ़ने मिलेंगी। हंसा दीप, इस अनमोल उपहार के लिए आपका हृदय की गहराइयों से आभार। सशक्त व सफल लेखन के लिए बधाई। आपकी रचनाधर्मिता से साहित्य जगत ऐसे ही समृद्ध होता रहे, अनेकानेक शुभकामनाएँ।


मुकेश दुबे
107, D.D. इस्टेट कॉलोनी
सीहोर, मध्यप्रदेश – 466001
मोबाइल – 9826243631

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