कॉलेज लॉन में अकेली बैठी नेहा लॉन के बगल से बने फुटपाथ पर जाते समीर को एक टक निहारे जा रही थी। उसके क़दमों की टक-टक की आवाज़ धीमी पड़ती जान वह खुद को बिलकुल असहाय-सी महसूस कर रही थी। आखिरकार थोड़ी देर बाद ही समीर के जूतों की आवाज़ आनी बंद हो गयी| अब उसे उसके स्कूल के सहपाठियों की चुहलबाजियाँ अपने कानों में सहज सुनाई पड़ने लगी थीं। जिस राह पर समीर जा रहा था, उस राह पर दूर बस एक साया-सा जाता दिख रहा था। उसको लग रहा था जैसे जाता हुआ वह साया कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना आधा हिस्सा है। दुःख में, सुख में, सहायता करने में, प्रोत्साहन देने में, हर कदम में अब तक वह साया साथ-साथ रहता था उसके। साये के ओझल होते ही वह उसके साथ जी गयी अपनी पिछली जिन्दगी में खिंची चली जा रही थी। कानों में स्कूल के सहपाठियों की आवाज़ें तेज होने लग गयी थीं।
“यार नेहा, काश तेरे दोस्त समीर जैसा एक दोस्त अपना भी होता।” स्कूल के फेयरवेल पार्टी में कही यह बात नेहा के कान में जैसे श्रेया अभी-अभी बोल रही है| और वह यह कहकर उसे चुप कराती है “यार! नजर तो मत लगा हमारी दोस्ती को।”
वह वाकया याद करके नेहा हल्का-सा मुस्कराई। उस मुस्कराहट का सिरा पकड़े हुए वह स्कूल के उन दिनों में पहुँच गयी जब समीर से उसका पहला परिचय हुआ था। पहली बार स्कूल एडमिशन के बाद जब उसने कक्षा में प्रवेश किया था तो आगे की तीन पंक्तियाँ खाली नहीं थीं| लेकिन समीर ने अपने एक सहपाठी को पीछे भेजकर उसके लिए जगह खाली करवाकर उसे बैठने के लिए आमंत्रित किया था। वह सहमी हुई अपने बैग को अपने और समीर के बीच में रख सिमटकर बैठ गयी थी| दो लड़कों के मध्य बैठ तो गयी थी परन्तु मन दादी-नानी के समझाइशों के मध्य उलझ गया था|
बोर्ड की परीक्षा आते-आते नेहा और समीर पक्के दोस्त हो गए थे। ये दोस्ती की जमीन एकबारगी नहीं तैयार हुई थी बल्कि कक्षा-तीन से ही जब समीर ने उसके लिए जगह बनाई थी, तभी से धीरे-धीरे तैयार हो रही थी। कक्षा-बारह तक दोनों ने साथ-ही-साथ स्कूली शिक्षा पूरी की थी। पहले-पहल तो दोनों ही कक्षा में एक साथ होने से एक दूसरे को बस अच्छे से पहचानते थे। आवश्यकता पड़ने पर एक दूसरे की मदद भी कर दिया करते थे| मगर समय के साथ दोनों की दोस्ती में विश्वास, सहयोग, एक-दूसरे के लिए हर हाल में खड़े रहने की भावना प्रबल होने लगी थी। इन भावनाओं की नींव पर ही समीर और नेहा की दोस्ती का मजबूत पुल तैयार हुआ था।
कक्षा-नौ में प्रवेश करते ही दोनों ने एक साथ स्कूल के पास ही स्थित कोचिंग-सेंटर को ज्वाइन कर लिया था। स्कूल से निकलते ही कोचिंग भी साथ-साथ जाने की वजह से दोनों की मित्रता में दिनों-दिन घनिष्ठता बढ़ने लगी थी। अब तो दोनों हर पल, हर घड़ी साथ रहने लगे थे। स्कूल के पहले और कोचिंग के बाद अपने-अपने घर में ही बस वे एक दूजे के बिना रहते थे। वरना तो कोचिंग क्लासेस में भी बगल की सीट पर बैठना और स्कूल में भी तीसरी पंक्ति के किनारे वाली अगल-बगल की ही सीट पर उन दोनों का बैठना होता था। ऑडोटोरियम में सुबह की प्रार्थना हो या फिर स्कूल के ग्राउंड में होती पी०टी०, समीर और नेहा टॉम एन्ड जेरी की तरह साथ या एक दूसरे के आगे-पीछे ही दीखते थे। साथ पढ़ने वाले छात्र कहीं भी अकेले समीर को देखते तो हँसी उड़ाते हुए कहते कि पक्का नेहा भी यहीं कहीं आसपास ही होगी। नल से पानी दूर हो सकता है, आँखों से आँसू भी, लेकिन ये दोनों! नहीं, हरगिज़ दूर नहीं रह सकते हैं।
एक बार तो नेहा को साइबर-कैफ़े के सामने अकेला खड़ा देखकर स्कूल के कुछ दोस्तों ने शर्त रख ली। आधा दर्जन दोस्तों में से दो दोस्तों ने इस बात पर ज्यादा बल दिया था कि इस समय नेहा के साथ समीर नहीं है, और चार दोस्तों ने कहा कि समीर पक्का आस-पास ही कहीं होगा। शरीर से परछाई भला दूर रह सकती है क्या!
इसपर एक दोस्त ने हँसकर दोनों की खिल्ली उड़ाते हुए कहा था, चुम्बक हैं दोनों, इसलिए दोनों में दूरी हो ही नहीं सकती है।
दूसरे ग्रुप के चारों दोस्तों को अपने अनुमान पर पूरा भरोसा था अतः उन्होंने सौ-दो-सौ नहीं बल्कि सीधे हजार रुपए की शर्त लगा ली थी। विरोध में खड़े पहले ग्रुप के दोनों दोस्त को अपने पूर्वाभास पर पूर्ण विश्वास था अतः तुरंत हाथ मिलाते हुए उन्होंने शर्त पक्की की।
उधर नेहा साइबर कैफ़े के बाहर स्कूटी से टेक लगाए कोर्नेटो आइसक्रीम खाती हुई इत्मीनान से खड़ी थी। इस बात से अनजान कि उसके इस तरह से अकेले खड़े रहने पर कई सीसीटीवी कैमरे निगहबानी कर रहे हैं। आधे घंटे से खड़े सभी दोस्त उसी को लक्ष्य किए हुए अब बेचैन होने लगे थे। आधा घण्टा बीतने के बाद आपस में फुसफुसाहट तेज होने लगी थी- “यार! इतनी देर हो गयी लेकिन न ये नेहा टस से मस हो रही है। और न ही कहीं समीर ही दिख रहा है। हम लोगों की दूसरी कोचिंग का टाइम हो गया अब तो।”
“दूसरे ग्रुप के दोस्त ने फुलझड़ी छोड़ी, “अब कुछ पाने के लिए कुछ तो खोना पड़ेगा। तुमने दो पक्के दोस्तों के दोस्ती पर शक किया है तो तुम्हें अपने समय को तो कुर्बान करना ही पड़ेगा।”
“अब हजार रुपए निकालो, हम चलते हैं। तुम चारों अपने को हारा हुआ ही समझो।” उसकी खिलखिलाहट पर विराम लगाते हुए झल्लाकर पहले ग्रुप के दोस्त ने कहा।
उनकी उस बातचीत की ठंडी तासीर में गर्माहट आकर घुलती इससे पहले ही नेहा कैफ़े की तरफ देखकर मुस्कुराहट फेंकती दिखी। कैफ़े की तरफ से आते साये को देखकर शर्त की हामी भरने वाले दोनों छात्र के हाथों से तोते उड़ने लगे। थोड़ी ही देर में उनका खुद पर किया पूर्ण विश्वास घटकर पाव भर गया था। दोनों ही आपस में एक दूसरे की आँखों में देखकर जैसे कह रहे थे, “क्या जरूरत थी शर्त लगाने की, गये न हजार रुपए! कहाँ से देंगे अब पाँच-पाँच-सौ रुपए अपन दोनों।” दोनों अपने-अपने हाथ अपनी-अपनी जेबों में डालकर टटोलने लगे थे।
कैफ़े से बाहर आकर समीर ने एक मोटी-सी फाइल नेहा के हाथ में धर दी थी। जब तक नेहा अपने नोट्स देख रही थी तब तक सारे दोस्त उनके पास पहुँच चुके थे। उसके कुछ बोलने से पहले ही हारे हुए दोस्त में से एक ने दूसरे को कुहनी मारते हुए नेहा से बाहर अकेले खड़े रहने का कारण पूछने का इशारा किया।
“अरे नेहा! तू यहाँ इतनी देर से अकेली क्यों खड़ी थी?” दूसरे ने अपने पूर्वाभास की खिड़की को फट्ट से कसकर बंद करते हुए सवाल किया।
“अरे यार! कैफे में पीटर्स का एक लड़का बैठा था। जो अक्सर मुझे घूरता रहता है। इस कारण मैं अंदर नहीं गई। ये सारे नोट्स फोटोस्टेट कराने जरूरी भी थे। इसलिए समीर ने कहा कि तू यहीं खड़ी रह, मैं कराकर ले आता हूँ। बस इसलिए इधर अकेली खड़ी झक मार रही थी। कल स्कूल में स्मृति को नोट्स वापस भी देना है न, यह काम कल पर टाल भी तो नहीं सकती थी।”
सिर नीचे करके दोनों दोस्त भुनभुनाये, न जाने खुद पर कि उस नेहा पर। हजार रुपए यूँ ही चले जाने की शिकन उनके चेहरों पर तारी हो चुकी थी।
नेहा और समीर के जाते ही जीतने वाले दूसरे ग्रुप के दोस्तों ने उनकी तरफ हाथ बढ़ाते हुए खूब जोर से ठहाका मारकर हँसने लगे। दोनों ने कुछ समय तक आनाकानी की परन्तु अंततः उनकी हथेली पर चार सौ रुपया रखकर कहा कि और बाकी बचे रुपए वह बाद में दे देंगे। रुपए देने के बाद उनके चेहरे ऐसे मुरझाए जैसे तेज धूप से बिन पानी पाए पौधे मुरझा जाते हैं।
चारों दोस्त आपस में रुपए बाटकर हँसते हुए वहाँ से चले गए। इधर दोनों दोस्तों ने प्रण किया कि अब कभी नेहा और समीर की दोस्ती पर संदेह नहीं करेंगे और न ही ऐसी कोई शर्त कभी किसी से भी लगाएंगे। आज जो गलती हो गयी, सो हो गयी। उनकी दोस्ती क्या ! अब हम दोनों किसी की भी दोस्ती पर शक करके जोश-जोश में होश खोकर रुपयों की शर्त नहीं ही लगाएँगे। वह चाणक्य ही थे जो दूसरों की गलती से सबक लेते थे हम जैसे बेवकूफ अपनी गलती से ही सीखते हैं। आज का ये सबक जीवन भर याद रहेगा हमें।
उस दिन के बाद कोचिंग के बाहर या स्कूल के बाहर कहीं भी समीर और नेहा में से कोई भी अकेला दिख जाता था तो स्कूल का कोई भी बच्चा शर्त लगाने की गलती नहीं करता था। दोनों दिया और बाती नाम से मशहूर हो गए थे। क्योंकि अगले ही दिन शर्त वाली बात स्कूल में वायरस की तरह फैल गई थी।
नेहा ने हँसी करते हुए हारे हुए अपने दोस्तों से कहा था, “इशारा ही कर देता या फिर व्हाट्सएप कर देता, तो मैं समीर को सारी बात व्हाट्सएप करके वहाँ से चली जाती, फिर तुम दोनों जीत जाते। कुछ कमीशन हमें भी देना पड़ता, बस।” कहकर समीर और नेहा जोर-जोर से हँसने लगे। उनको इस तरह हँसता देखकर दोनों दोस्त सिर झुकाए वहाँ से उड़न-छू हो गए।
समय बीतता रहा दोस्ती की डोर मजबूत होती रही। दोनों ने एक ही कॉलेज में एडमिशन ले लिया था। एडमिशन ही नहीं बल्कि दोनों ने बी.टेक का कोर्स करने की ही ठानी थी। नोट्स लेना हो, प्रोजेक्ट बनाना हो, दोनों ही सब काम साथ-साथ करते थे। एक दूसरे की मदद करने के लिए हर घड़ी तैयार रहते थे। नेहा की राइटिंग बहुत अच्छी थी अतः वह कभी-कभार समीर का प्रोजेक्ट भी लिख दिया करती थी।
दोनों अलग-अलग लेकिन थोड़ी ही दूर पर स्थित हॉस्टल में रहने लगे थे। दोस्ती के धागे पर स्नेह, विश्वास और घनिष्ठता की मजबूत परत समय के साथ चढ़ती गई थी। कभी खरीदारी भी करनी होती तो दोनों साथ-साथ ही कॉलेज से मार्केट चले जाते थे। व्हाट्सएप ने भी दोनों की पढ़ाई और दोस्ती बढ़ाने में अपनी सहभागिता बख़ूबी निभायी थी।
अब तो कॉलेज में भी नेहा और समीर की दोस्ती की मिसाल दी जाने लगी थी। शिक्षक-शिक्षिकाओं तक उनकी गहरी दोस्ती की बात उड़ती-उड़ती पहुँच चुकी थी। एक बुजुर्ग शिक्षिका ने तो उनकी दोस्ती पर सवाल उठाते हुए यहाँ तक कह दिया कि “लकड़ी और आग की दोस्ती, असंभव!” परन्तु यहाँ तो प्रत्यक्ष रूप से उन दोनों के बीच घनिष्ट मित्रता दिख रही थी।
“मैडम! यह कहावत पुरानी हुई, इसे अब बदलनी पड़ेगी।” एक युवा टीचर के यह कहने के बाद स्टॉफ रूम में काफी देर तक इस मुद्दे पर तर्क-वितर्क होता रहा था । सबके अपने पुराने दिन अतीत से निकलर वर्तमान में खड़े हो गये थे। लेकिन समीर-नेहा जैसा उदाहरण ढूढ़े से नहीं मिल रहा था।
बी०टेक० के पहले साल तो वो दोनों सबकी नजरों में चढ़े थे। सब शक भरी निगाहों से उन्हें देखते और सनसनी खबर फैलाने की ताक में रहते थे। कुछ छात्र-छात्राएँ उनकी आपस की मनमुटाव की खबरें तलाशते रहते थे किन्तु उनकी सब मेहनत बेकार जाती, हासिल उन्हें कुछ न मिलता।
कॉलेज परिसर के कोने-कोने में बैठे जोड़ो को देखकर भी दोनों निर्विकार रहते थे। वातावरण का प्रभाव अवश्य पड़ता है लेकिन यहाँ तो समीर और नेहा की दोस्ती इन सब चीजों से ऊपर उठ चुकी थी।
कॉलेज परिसर में गुटरगूं में व्यस्त पेड़-पौधों के ओट में बिखरे जोड़े, हरियाली बिछी जमीन पर औंधे लेटे जोड़े, अपनी सुगंध से मदहोश करते फूल-पौधे के बीच रोमांस में मस्त जोड़े, नयनाभिराम, मनोरम-मनभावन स्थान और-तो-और खाली लुभावने कोने भी, जिनकी तलाश अक्सर लड़की-लड़कों के जोड़े करते रहते थे, ये सभी चीजें समीर और नेहा पर किसी भी प्रकार का असर डालने में कामयाब नहीं हुई थीं।
बी टेक दूसरे साल में कॉलेज का कोना-कोना उनकी दोस्ती के चर्चे करने में मशगुल रहने लगा था। जहाँ अब तक बस प्यार भरे जोड़ो की ही चर्चाएँ हुआ करती थीं, वहाँ उन दोनों की दोस्ती की मिसाले दी जाने लगी थी। तीसरा साल जब लगने को हुआ तो कुछ लोग तो उनकी मित्रता के अभ्यस्त हो गए थे, परन्तु फस्ट-इयर कोर्स के लिए कॉलेज में प्रवेश पाए जोड़ों में घूमते छात्र-छात्राएँ उनकी दोस्ती देखकर दाँतों तले उँगलियाँ दबाने लगे थे। जब उन्हें पता चला था कि उन दोनों की दोस्ती तो बचपन से ही है लेकिन उनके मध्य प्यार-व्यार जैसा कुछ नहीं है, जो है वो मित्रता वाला ही प्यार है। वो सभी तब और भी अधिक आश्चर्यचकित हो उठते थे और आते-जाते बस घूरते रहते थे उन्हें। उनके मन में भी इच्छा जाग्रत होती कि वे भी ऐसी ही मिसाल कायम करें परन्तु उन्हें पता था ये हलवा-पूरी खाने जितना सरल नहीं है|
बी०टेक० अंतिम साल के सातवें सेमेस्टर के पहले दिनों में कभी-कभी नेहा कॉलेज में अकेले दिखने लगी थी। उन्हें एक दूसरे के पास न पाकर कॉलेज के दोस्त यह कहकर मजाक उड़ाने लगे थे कि “हंसों का जोड़ा बिछड़ गयो रे! हाय रामा गजब भयो रे !” हवाएँ आकर समीर और नेहा के कानों में भी उड़ती हुई सारी खबरें फुसफुसा जाती थीं, लेकिन दोनों अनसुना कर देते थे। जैसे वे कुछ सुन ही नहीं रहें हों, बिलकुल बहरे हो गए हों दोनों ही।
आठवें सेमेस्टर के दिनों में दोनों का व्यवहार एक दूसरे के प्रति कुछ अधिक ही बदलने लगा था। वह नेहा से ज्यादा नजदीक होने की कोशिश करने लगा था। यदा-कदा वह नेहा को एहसास कराने लगा था कि उनका रिश्ता दोस्ती से कुछ ज्यादा है। या यूँ कहें कि नेहा का सिक्स-सेंस समीर के पास आते ही अब उसे आगाह करने लगा था।
नेहा और समीर का आपस में व्यवहार देखकर सबको भी लगने लगा था कि उनकी दोस्ती की लकीर अब धुंधली हो रही है। कहते हैं न कि जब हजार-लाख लोग एक ही चीज सोचते हैं तो वही होने लगता है। उनकी दोस्ती को भी हजारों भेदती आँखों ने नजर लगा दी थी।
एक दिन कॉलेज लॉन के कोने में बैठकर बात करते हुए समीर, नेहा के बहुत नजदीक आकर बैठ गया । दोस्ती को धीरे-धीरे पीछे धकेलता हुआ, नेहा के प्रति उसका प्यार लाइन में आगे को लग गया था। नेहा के बिल्कुल चेहरे के पास आकर समीर उससे कुछ बोलना चाहा था किन्तु घबराहट में उसकी जिह्वा उसका साथ देने को तैयार नहीं हुई। परन्तु आँखों को बंद करके थोड़ी ही देर में उसके हृदय की बात बाहर आ गयी थी। ये दिल भी चाहे स्त्री का हो या पुरुष का अपने उदगारों को दबा के नहीं रख सकता। समुद्र की तरह हर चीज बाहर निकाल देता है कभी न कभी?”
नेहा कॉलेज लॉन के कोने में बैठी बार-बार अतीत को टटोल आ रही थी। समीर अपनी बात कहकर कड़क ऑफिसर-सा कदम ताल करता वहाँ से चला गया था| एक बार उसने पीछे मुड़कर देखा भी परन्तु नेहा के शरीर में कोई हरकत न देख वह चला गया |
आखिर ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ? का उत्तर ढूढ़ती हुई, वह वहीं घास पर बैठी रही अब भी| समीर के बदल जाने का वह कोई भी कारण नहीं खोज पा रही थी। क्या उसपर यहाँ के वातावरण का प्रभाव पड़ा?
उसे कभी समीर का जाता हुआ साया ठहरा-ठहरा-सा दिखाई पड़ता तो अगले ही क्षण आँखों से ओझल होता प्रतीत होता| क्या समीर वापस आएगा याकि मुझसे दूर हो जाएगा हमेशा के लिए! क्या लोग सच कहते हैं कि आग-पानी की आपस में मित्रता असम्भव है? क्या मित्र का जीवन-साथी बन जाना ही मित्रता की परिणिति है? क्या बुजुर्गों के द्वारा कही कहावतों, परम्पराओं की निन्दा करती युवा पीढ़ी, उनके द्वारा खींची गयीं लकीरों के स्थान पर अपनी लकीर खींचने में अक्षम है? मस्तिष्क चलायमान था और आस भरी आँखें अभी भी उसी पथ पर जमी थीं, जिधर से अभी-अभी समीर गया था…
- सविता मिश्रा ‘अक्षजा’
- ब्लॉगर, साहित्यकार, यूट्यूबर
लघुकथा संग्रह ‘रोशनी के अंकुर’ एवं ‘टूटती मर्यादा’ एवं ‘करनी विष की लोय’, कहानी संग्रह : ‘सुधियों के अनुबंध’ एवं ‘मोड़ पर जिन्दगी’, अनुवाद : ‘अदहने क आखर’ अवधी अनुबाद (लघुकथा-संकलन) प्रकाशित।
सम्पादन : ‘खाकीधारी’ 2024(लघुकथा संकलन) ‘अदृश्य आँसू’ 2025 (कहानी संकलन) ‘किस्से खाकी के’2025 (कहानी संकलन) ‘उत्तर प्रदेश के कहानीकार’ 2025 (कथाकोश), विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कारों से सम्मानित।
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अच्छी कहानी, बधाई