- देवी नागरानी की कहानियों पर बी.एल. आच्छा का लेख
देवी नागरानी की कहानियाँ कथा-चक्र की निरंतरता में उन फलसफ़ों को बुनती हैं, जो नारी अस्मिता और मूल्य-बोध से समृद्ध हैं। उन में स्मृतियों का इतिहास है, पर वे आती हैं वर्तमान तक। सामाजिक विषमता में जीवन के कठिन प्रसंग हैं, पर अपने रास्ते तलाशते उजास तक आते हैं। वे देश-देशांतर या जातियों के भूगोल और समाजशास्त्र में अटकती नहीं है;मनुष्यता के स्वरों को पहचानती हैं। अलबत्ता मूल्यों के संघर्ष में मनःस्थितियों में पस्त मानसिकता को जगाती हैं।
पाकिस्तान के सिंध में जन्मी, आजादी के बाद भारत में विस्थापन और अब अमेरिकी जमीन पर। इसलिए इन कहानियों में स्मृतियों के परिवेश भी हैं, समयान्तर भी है और रिश्तों का विधायक मूल्य-बोध भी। सरल सी हिन्दी और घटनाओं से गुजरता कथा- विन्यास। इन्हीं के बीच कन्ट्रास्ट और आंतरिक मूल्य-बोध की अनुभूतियाँ पाठक को खींचती हैं।
“मैं बड़ी हो गयी” कहानी अपने दुखांत में जितनी पीड़ा से नारी अस्मिता को सवालिया बनाती है, उतनी ही माँ और मिनी के सवालों से। मां और बेटी में पूरा युगान्तर बोलता है। माँ का सहमा – सकुचाया व्यक्तित्व ,असहनीय को सहने, पति के आगे हर मुद्दे को बर्दाश्त करने, समर्पण से उपजी व्यक्तित्वविहीनता में खो जाने में ही नारी की सार्थकता। पर बेटी बेबाक है, सवालों को बेध देती है। हर उत्तर का प्रति-प्रश्न बन जाती है। औरत और मर्द के दोनों पलड़ों में समानता की चिंगारी लिए गृहस्थी की लाजवंती नहीं बनती। वह अतीत के जख्मों की समकालीन जबान है। पर पिता के साथ आए युवक की कामुक नजरों से गुजरती इस युवती के साथ ऐसा हादसा व्यथा को छोड़ जाता है – “अमानुष बनना ज्यादा आसान है। मनुष्य तो बस कीमत चुकाने के लिए होता है।” लेखिका ने मिनी की नटखट तरुणाई और उत्तरार्ध के हादसे के कंट्रास्ट से इस चुभन को तीखा बना दिया है।
‘जियो और जीने दो’ कहानी प्रेम के व्याकरण का नया संस्करण है। न देह की आकांक्षा, न संस्कार की, न लिव-इन की। सारी अंतरंग चाहत के बावजूद विवाह के बंधन से इन्कार -‘दोस्त हैं दोस्त रहेंगे।’ पर इस बिखरी जवानी में तन्हाई की नीरसता उस एहसास तक ले जाती है;जहाँ दांपत्य का सहचार ही रौशनी है- “औरत की फितरत ही शायद ऐसी है। वह पूर्णता चाहती है। जिसे अपना समझती है, उसे बंटा हुआ नहीं देख सकती, चाहे वह प्यार ही क्यों न हो।” यादों के गलियारे में भाई भी है, पर दोनों देशांतर में विस्थापित। प्रेमी उमेश की निर्बंध चाह में अधूरा जीवन। इस अकेलेपन में नौकरानी- सी अम्मा के साथ स्मृतियों में बसे बाबा के मकान में रहने की विवशता। उमेश का बंधन-विहीन प्रेम और दांपत्य की पूर्णता की चाहत में उर्वी का कचोटता हुआ अकेलापन।
प्रेम के इस त्रकोण से अलग प्रेम की मर्दाना मानसिकता में अटकी कहानी है- “सूर्यास्त के बाद”। मंगलू काका अपनी बेटी के लिए योग्य युवा चाहता है ।पुलिस की नौकरी करते जमाल के व्यवहार और सहयोग से आकृष्ट।बेटी रमिया के व्यवहार से जमाल भी। जमींदार के चंगुल से पुलिस मंगलू के मकान को छुड़ा देती है। पर शादी के बाद जमाल का नर्तकी शुगुफ़्ता के साथ रातें रंगीन करना रमिया के जीवन का कांटा बन जाता है।
लेखिका ने रमिया में उसके साहसिक प्रेम को उगाया है। शुगुफ़्ता के कोठे पर जाकर शुगुफ़्ता और जमाल से कहती है – “मैं भी शुगुफ्ता बनना चाहती हूं….वैसी ही दुनिया बसाऊंगी ,जैसी शुगुफ़्ता ने बना रखी है।”जमाल पर पत्नीत्व का अधिकार पाने के लिए समर्पित रमिया का यह रूप जितना निखार पाता है, शुगुफ़्ता का यह डिडक्टिव निष्कर्ष भी बहुत मार करता है-” यहां आनेवाला कोई भी मर्द किसी का पति नहीं होता। “पतित्व और पत्नीत्व” के इस चारित्रिक द्वंद्व को लेखिका ने आकर्षक कथा विन्यास दिया है।
‘कमली’ स्पर्शिल कहानी है। दस वर्ष की उम्र की दो बालिकाएँ- एक नानी की बेटी की बेटी, दूसरी मृत नौकरानी की बेटी। शब्दों में समानता, मगर दोनों के प्रति व्यवहार में विषमता। नानी ने मृत नौकरानी की बेटी को भी अपनी ही नातिन के रूप में अपनाया। पर जातीय और आर्थिक विषमता का स्तर भेद एक ही वाक्य में व्यंजित है- “गरीबी अमीरी भी दीवार ईंटों से भी ज्यादा मजबूत होती है। “यही नहीं,यह भीतर का सोच-“कमतर जात के लोग हैं…कितना भी भला करो,भुला देते हैं।” और नानी के व्यवहार को पहचानती असली नातिन की मनोभूमि-“नानी की नातिन मैं भी थी और वह भी। पर फर्क था, मैं सेज पर सोती थी और वह मेहनतकशी की चक्की में पिसती रहती थी। मैं पढाई के लिए स्कूल जाती, वह रसोईए का काम संभालती थी।”
लेकिन कथान्त में दोनों नातिनें समता की भूमि पर स्नेह पा गयी है। नानी के मनोभावों में रासायनिक परिवर्तन को लेखिका ने विस्थापन के परिदृश्य में संजोया है। सिंध (पाक)में जमींदारी का आलम और हिन्दुस्तान में कमतर सुविधाएँ। और नानू की दोनों नातिनों की प्रति समदृष्टि। कहानी में बाल-मनोविज्ञान, व समानता के सामाजिक मूल्यों और पात्रों में युगांतर को रचती इस कहानी का शिल्प प्रभावी है।
देवी नागरानी की ये कहानियां कथा- विन्यास में जितनी सतर्क हैं, उतनी समय के समाजशास्त्र को बुनती हुईं। इनमें युगीन परिदृश्य और मूल्य-बोध के लेखकीय सरोकार बहुत गहरे हैं।

बी. एल. आच्छा
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