Tuesday, September 8, 2026
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एक नया गंतव्य स्थल बन गया है ‘क से कविता’ का साहित्योत्सव

बहुत सारी साहित्यिक गतिविधियाँ इस  बीच हुईं और हो रही हैं, लेकिन इन सब के बीच से एक आयोजन ने अपनी जगह कुछ ऐसी बना ली है कि एक दो घंटे नहीं बल्कि पूरे दस घंटे के आयोजन में लोग घर जाने के मूड़ में नहीं होते, बल्कि चाहतें है कि दूसरे कामकाज भी हों तो, या तो पहले निपटा लिये जाएँ या फिर किसी और दिन के लिए रख लिये जाएँ। इस वर्ष जब 9 अगस्त को इसका आयोजन हुआ तो, फिर से इस आयोजन ने सिद्ध किया कि सुनियोजित रूप से कुछ आयोजित किया जाए तो लोग रुचि लेने लगते हैं। खास कर कविता और साहित्य को लेकर इन दिनों सार्वजनिक मंचों पर जो उपेक्षित माहौल है, इस आयोजन को उसके जवाब के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। शायद इसी ज़मीन से जुड़ा एक सवाल क से कविता के मंच पर उद्घाटन समारोह में उठा था।

सवाल बहुत स्वाभाविक था और सटीक भी। हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार नंदकिशोर आचार्य ने अपने उद्घाटन भाषण में मंच से पूछा कि लोग कविता क्यों पढ़ते या सुनते हैं? हो सकता है कि इसके बहुत सारे उत्तर हों, लेकिन क से कविता का वार्षिक आयोजन इसके कुछ ऐसे उत्तर दे गया कि लोग इस कार्पाम को अपनी स्मृतियों का हिस्सा बनाकर अपने साथ ले गये। आज के सोशल मीडिया और रील के पल-पल बदलते दौर में यह साहित्योत्सव शहर के हिन्दी-उर्दू सांस्कृतिक गलियारों में टॉक ऑफ दी टाउन बना हुआ है।

 

हैदराबाद में मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी का दूरस्थ शिक्षा केंद्र सुबह से शाम तक चहल-पहल, ठहाकों, तालियों और साहित्यिक गोष्ठियों, सभाओं और सम्मेलनों से जगमगा गया। नंदकिशोर आचार्य ने आठवीं कक्षा में लिखी अपनी कविता को याद किया। उनकी यादों से निकल आये कुछ पलों में मिर्जा गालिब थे फ़िराक भी और समय-समय पर बनी कविता की व्याख्या और उनमें उत्कृष्ठ जगह पर रखे गये सर्वोत्कृष्ट शब्दों के अर्थ भी। यह भी कि कविता केवल भावनाओं को अभिव्यक्त करने का साधन नहीं है, बल्कि वह अपनी भावनाओं को समझने का साधन है।

कविता केवल जानने नहीं, बल्कि संवेदनात्मक स्तर पर अनुभूत करने की कला है। वार्षिकोत्सव के मुख्य आकर्षणों में से एक थे- नवगीतकार यश मालवीय। उन्होंने अपने जनवादी स्वर में अपने पिता उमाकांत मालवीय, निराला और अन्य कवियों के साथ जुड़ी कई यादों के साथ काव्य-जगत की सैर करवाई और कविता के अर्थ एवं उसके उद्देश्य के कई पहलुओं को साझा किया।

स्टोरी टेलर डॉ. केनाश्री की आकर्षक प्रस्तुति और रंगमंच एवं फिल्म कलाकार डिंपी मिश्रा द्वारा गुलज़ार की कहानियों, गीतों और ग़ज़लों के माध्यम से सीमाओं में बंटकर सिसकती मानवता को अनुभूत तथा भावुक करने वाले मंचन ने स्टैंडिंग ओवेशन की कसर भी पूरी कर दी। साहित्योत्सव की इस वर्ष की कुछ खास बातों में इसकी रचनात्मक कार्यशालाएं भी थीं, जिसे संवारने में कवि हरजिंदर सिंह लाल्टू, एफ एम सलीम, यश मालवीय, आरती मालवीय, प्रो. गोपाल शर्मा, डिंपी मिश्रा, हर्षिता मिश्रा और क से कविता की टीम के अन्य सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

कई विद्यालयों के विद्यार्थियों ने खुली हवा में अपने बाल-मन को टटोलते हुए कोमल विचारों को काग़ज़ के हवाले किया। इसी क्रम में मुख्य मंच से विद्यार्थियों के काव्य-पाठ के बीच सारा हॉल कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। क से कविता का मंच सालभर हिन्दी-उर्दू के कवियों की रचनाओं के पाठ इस शर्त के साथ प्रस्तुत करता है कि अपनी रचना न पढ़ें, लेकिन केवल एक दिन अर्थात वार्षिकोत्सव के अवसर पर कवियों से उनकी रचनाएं सुनी जाती हैं, कवि सम्मेलन-मुशायरे में।

इस बार मंच पर छ कवि मौजूद थे। डॉ. ऋषभदेव शर्मा की तेवरियाँ, यश मालवीय का नवगीत, लालटू और नंदकिशोर आचार्य की गंभीर चिंतन से भरी कविताएं और एहतेराम इस्लाम की ताज़ा ग़ज़लें, लेकिन वो मंच पर हों और है तो है न हो तो बात कहाँ बनती है। श्रोताओं की मांग पर सुनाना पड़ा-

जिंदगी का लम्हा लम्हा उसपे भारी है तो है
क्रांतिकारी व्यक्ति कुछ हो, क्रांतिकारी है तो है
देश की सम्पन्नता कितनी बढ़ी है, देखिए
सोचिए क्यों? देश की जनता भिखारी है तो है
दिल्लियों अमृतसरों की भीड़ में खोई हुई
देश में अपने कहीं कन्याकुमारी है तो है

समारोह के मुख्य अतिथि शीन काफ निज़ाम उर्दू गज़लों में अपना जहाँन रखते हैं। कई बरस बाद वो राजस्थान से हैदराबाद आये थे, उत्सव में जान फूँक गये। देर तक ग़ज़लें सुनाईं और महफिल लूट ली।

ख़ामोश तुम थे और मिरे होंठ भी थे बंद
फिर इतनी देर कौन था जो बोलता रहा

निश्चित रूप से यह काव्य रसिकों के लिए तो एक दिन का उत्सव रहा हो, लेकिन इसकी योजनाओं और तैयारियों में प्रवीण प्रणव, मोहित और उनकी टीम के सदस्यों सुदर्शन विज, ग़जाला यासमीन, रंजीता, ज़ीनत, योगेश पांडे, डॉ. आशा मिश्रा मुक्ता, डॉ. रक्षा मेहता, डॉ. मंजु शर्मा, स्वाति बालुरकर, वालेंटियर और शुभचिंतकों की महीनों की मेहनत का रंग साफ झलकता है। यही कारण है कि हैदराबाद में यह उत्सव एक नये डेस्टिनेशन के तौर पर उभरा है और लोग अब इसका इंतज़ार करने लगे हैं।

 

  • एफ एम सलीम, हैदराबाद
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