होमकविताशिरीष पाठक की दो कविताएँ कविता शिरीष पाठक की दो कविताएँ By Editor June 16, 2019 0 335 Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp शिरीष पाठक खुद को ढूँढना तुम्हारे साथ जीता हूँ मैं अब तो तुम्हारे हाथ को थाम के चलना अच्छा लगता है बिना तुम्हारे एक अँधेरा लगता है फैला हुआ चाहे जो भी कर लूँ मैं मिटा नहीं सकता उसको आज मैं घुमने निकला अकेले एक सुनसान सी सड़क पर रात में रौशनी से नहाई हुई सड़क पे ठण्ड ज्यादा लगने लगी मुझको मगर फिर भी लौटने को मन नहीं है हमको आज बस लग रहा था खुद को ढूंढ लूँ सोचने लगा क्या मैं खुश हूँ तुम्हारे साथ क्या मुझे वक़्त बिताना वाकई में पसंद है जब मैं आता हूँ तुम्हारी गली में उस भीड़ में भी बस तुम ही नज़र आती हो जब तुम आती हो मेरे सामने मेरा दिल जोरो से धड़कने लगता है तुम जानती हो कितना अच्छा लगता है तुमको साथ में बैठाकर घूमना जब मैं पूछता हूँ और तुम कहती हो “जहाँ ले चलो” लगता है जैसे तुम मुझपे भरोसा कर चुकी हो उसी तरह जैसे किसी पंछी को अपने परों पे होता है जब मैं तुमको कहता हूँ क्या चाहिए तुमको तुम न जाने क्यों बस देख के मुस्कुरा देती हो जैसे तुम समझ जाती हो मैं बस तुम्हारी ये मुस्कराहट देखना चाहता हूँ और मेरा वक़्त बस वही थम जाता है तुम जादू कर देती हो मुझपे बाँध देती हो अपनी नजरों से मुझको शायद ये बंधन भी मुझको पसंद है जैसे किसी पतंग को धागे से बंधना पसंद है ऊँचा उड़ने के लिए तुम मेरी अपनी हो और तुम्हारे साथ खुश रहना मुझे उतना ही पसंद है जितना किसी इंसान को अपनी सांसो से होता है तुम्हारा मुस्कुराना सुबह उठने के बाद शायद सबसे पहले तुम्हारा नाम पढता हूँ मैं तुम्हारी आवाज़ सुबह की पहली अज़ान की तरह ही मुझको उठती है सुबह की हलकी सी ठंड की तरह ही तुम मुझमें समा जाती हो रोज़ एहसास बनकर और मैं भी ओढ़ लेता हूँ तुमको गर्म सी एक चादर बनाके जानती हो न तुम मुझे तुम्हारा मुस्कुराना कितना अच्छा लगता है लगता है जैसे ओस की बूंद बंद हो गयी हो किसी फुल के अन्दर और फिर नीचे टपक पड़ती हो अपनी बोझ से किसी सूखे से पत्ते पे तुम बस हमेशा ही मुस्कुराती रहा करो दुनियां की फ़िक्र किये बगैर तुम जब चलती हो बेख़ौफ़ सी होकर ऐसा लगता है मानो कोई राजकुमारी अपने रियासत को निहारने निकली हो मैं बस देखता रह जाता हूँ तुमको जब तुम चल पड़ती हो मुझसे आगे होकर क्यूंकि तुम हमेशा ही किसी दिशा बताने वाले यंत्र की तरह ही मुझको सही रास्ता दिखाती हो तुम्हारी आँखें न जाने क्या क्या कह जाती है मुझको जब भी तुम्हारे होंठ सिल जाते है कुछ कहने में जब तुम्हारी आँखें भर जाती है तो लगता है मानो किसी सुखी सी नदी में अचानक बाढ़ आ गयी हो तुम रोक तो लेना चाहती हो उनको लेकिन ऐसा करना कहीं भी आसान नहीं होता तुमको चाहता हूँ मैं हर वक़्त अपने पास क्यूंकि अपनी साँसों में तुम्हारी खुशबु हर वक़्त महसूस कर रहा हूँ मैं क्यूंकि अपनी धडकनों में तुम्हारी आवाज़ सुन रहा हूँ मैं जानती ही हो तुम मेरे लिए किसी खुबसूरत सी ख्वाब को हकीक़त बनाने की कोशिश जैसी हो Share FacebookTwitterPinterestWhatsApp पिछला लेखसाक्षात्कार – मैत्रेयी पुष्पा के साथ डॉ. महालक्ष्मी केशरी की बातचीतअगला लेखदिलीप कुमार की व्यंग्य-कथा : लघुकथा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड Editor RELATED ARTICLES कविता निज़ाम फतेहपुरी के दोहे October 3, 2026 कविता सीमा द्विवेदी की दो कविताएँ October 3, 2026 कविता निधि गुप्ता की कविता-घर आँगन October 3, 2026 कोई जवाब दें जवाब कैंसिल करें टिप्पणी: कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें! नाम:* कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें ईमेल:* आपने एक गलत ईमेल पता दर्ज किया है! कृपया अपना ईमेल पता यहाँ दर्ज करें वेबसाइट: Save my name, email, and website in this browser for the next time I comment. Δ This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed. Most Popular कविताएँ बोधमिता की November 26, 2018 कहानीः ‘तीर-ए-नीमकश’ – (प्रितपाल कौर) August 5, 2018 शोध आलेख : हिन्दी ग़ज़ल का संक्षिप्त इतिहास एवं नवछंद विधान – हिंदकी March 22, 2020 अपनी बात…… April 6, 2018 और अधिक लोड करें Latest फ़्रांस जल रहा है… लंदन में स्कूल बंद… October 10, 2026 निज़ाम फतेहपुरी के दोहे October 3, 2026 दीपक शर्मा की कहानी कुर्सी के कवि October 3, 2026 सीमा द्विवेदी की दो कविताएँ October 3, 2026 और अधिक लोड करें