शिरीष पाठक की दो कविताएँ 3
  • शिरीष पाठक

खुद को ढूँढना
तुम्हारे साथ जीता हूँ मैं अब तो
तुम्हारे हाथ को थाम के चलना अच्छा लगता है
बिना तुम्हारे एक अँधेरा लगता है फैला हुआ
चाहे जो भी कर लूँ मैं मिटा नहीं सकता उसको
आज मैं घुमने निकला अकेले एक सुनसान सी सड़क पर
रात में रौशनी से नहाई हुई सड़क पे ठण्ड ज्यादा लगने लगी मुझको
मगर फिर भी लौटने को मन नहीं है हमको
आज बस लग रहा था खुद को ढूंढ लूँ
सोचने लगा क्या मैं खुश हूँ तुम्हारे साथ
क्या मुझे वक़्त बिताना वाकई में पसंद है
जब मैं आता हूँ तुम्हारी गली में
उस भीड़ में भी बस तुम ही नज़र आती हो
जब तुम आती हो मेरे सामने
मेरा दिल जोरो से धड़कने लगता है
तुम जानती हो कितना अच्छा लगता है तुमको साथ में बैठाकर घूमना
जब मैं पूछता हूँ और तुम कहती हो “जहाँ ले चलो”
लगता है जैसे तुम मुझपे भरोसा कर चुकी हो
उसी तरह जैसे किसी पंछी को अपने परों पे होता है
जब मैं तुमको कहता हूँ क्या चाहिए तुमको
तुम न जाने क्यों बस देख के मुस्कुरा देती हो
जैसे तुम समझ जाती हो मैं बस तुम्हारी ये मुस्कराहट देखना चाहता हूँ
और मेरा वक़्त बस वही थम जाता है
तुम जादू कर देती हो मुझपे
बाँध देती हो अपनी नजरों से मुझको
शायद ये बंधन भी मुझको पसंद है
जैसे किसी पतंग को धागे से बंधना पसंद है ऊँचा उड़ने के लिए
तुम मेरी अपनी हो और तुम्हारे साथ खुश रहना मुझे उतना ही पसंद है
जितना किसी इंसान को अपनी सांसो से होता है
तुम्हारा मुस्कुराना
सुबह उठने के बाद शायद सबसे पहले तुम्हारा नाम पढता हूँ मैं
तुम्हारी आवाज़ सुबह की पहली अज़ान की तरह ही मुझको उठती है
सुबह की हलकी सी ठंड की तरह ही तुम मुझमें समा जाती हो रोज़ एहसास बनकर
और मैं भी ओढ़ लेता हूँ तुमको गर्म सी एक चादर बनाके
जानती हो न तुम मुझे तुम्हारा मुस्कुराना कितना अच्छा लगता है
लगता है जैसे ओस की बूंद बंद हो गयी हो किसी फुल के अन्दर
और फिर नीचे टपक पड़ती हो अपनी बोझ से किसी सूखे से पत्ते पे
तुम बस हमेशा ही मुस्कुराती रहा करो दुनियां की फ़िक्र किये बगैर
तुम जब चलती हो बेख़ौफ़ सी होकर
ऐसा लगता है मानो कोई राजकुमारी अपने रियासत को निहारने निकली हो
मैं बस देखता रह जाता हूँ तुमको जब तुम चल पड़ती हो मुझसे आगे होकर
क्यूंकि तुम हमेशा ही किसी दिशा बताने वाले यंत्र की तरह ही मुझको सही रास्ता दिखाती हो
तुम्हारी आँखें न जाने क्या क्या कह जाती है मुझको
जब भी तुम्हारे होंठ सिल जाते है कुछ कहने में
जब तुम्हारी आँखें भर जाती है तो लगता है मानो किसी सुखी सी नदी में अचानक बाढ़ आ गयी हो
तुम रोक तो लेना चाहती हो उनको लेकिन ऐसा करना कहीं भी आसान नहीं होता
तुमको चाहता हूँ मैं हर वक़्त अपने पास
क्यूंकि अपनी साँसों में तुम्हारी खुशबु हर वक़्त महसूस कर रहा हूँ मैं
क्यूंकि अपनी धडकनों में तुम्हारी आवाज़ सुन रहा हूँ मैं
जानती ही हो तुम मेरे लिए किसी खुबसूरत सी ख्वाब को हकीक़त बनाने की कोशिश जैसी हो

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