28 नवंबर, 2021 को प्रकाशित पुरवाई के संपादकीय ‘क्या संविधान सच में सर्वोपरि है?’ पर निजी संदेशों के माध्यम से प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं

स्मृति शुक्ला
आदरणीय तेजेंद्र जी नमस्कार। आप ने पढ़ा बहुत है इसकी झलक इस लेख में है । विपक्ष द्वारा संविधान दिवस का विरोध करना ग़ैरबाजिब था। आप की तार्किकता और विश्लेषण क्षमता का पता देते हैं आपके सम्पादकीय लेख । बधाई
कमला नरवरिया
हमेशा की तरह बहुत बढ़िया संपादकीय सर…संविधान को लेकर आपके सामसायिक प्रश्न मन को सोचने को विवश करते है, साथ ही यह जानकर कष्ट होता है कि आज संविधान की बात करनेवाले ही सबसे ज्यादा संविधान का उल्लंघन करते हैं।
राम वृक्ष सिंह, लखनऊ
प्रणाम सर.
बहुत वाजिब सवाल.
संविधान है, और उसमें विहित सभी अधिकार सुरक्षित हैं, इसीलिए विपक्ष के लोग इतनी बकबक कर पा रहे हैं.
संविधान न होता तो रेलवे लोग कहीं अंधेरी काल कोठरियों में पड़े मरने की बाट जोह रहे होते. यदि इनमें दम है तो जेपी जैसा आंदोलन खडा़ करें. संविधान इन्हें यह विकल्प भी देता है. बात बात पर रूठना तो बिलकुल पंगु  लोगों का तरीका है. और कुछ, या कहिए कि सकारात्मक कुछ नहीं कर पा रहे तो संविधान पर ही सवाल उठा दिया. ऐसे नाशुक्रा नेता सत्ता पा गये तो क्या करेंगे!
तरुण कुमार, ग़ाज़ियाबाद
बहुत सही सवाल किया है आपने कि क्या संविधान सचमुच सर्वोपरि है ? संविधान हमेशा से ही सत्ता पक्ष के हाथों का खिलौना रहा है . सुविधानुसार इसमें बदलाव किए गए और अपने अनुकूल व्यवस्थाएँ की गई . परंतु इसका मतलब यह नहीं कि इसका कोई महत्व नहीं . हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हमारा संविधान ही है . आज भी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा संविधान के साये में ही संभव है . इसलिए संविधान दिवस के आयोजन में विपक्ष की अनुपस्थिति दुर्भावना पूर्ण है.
नीलम वर्मा
तेजेन्द्र जी इस सटीक संपादकीय के लिए बधाई ।
संविधान दिवस के उत्सव को ना मनाना संविधान की गरिमा को बनाये रखने के लिए अनिवार्य नहीं पर वांछित अवश्य है। इस प्रकार संवैधानिक रूप से चुनी सरकार को नीचा दिखाने का प्रयास विपक्ष की ही दुर्बुद्धि का परिचायक है।
विनोद पांडेय
संविधान सर्वोपरि है सर लेकिन जब संविधान की दुहाई देनी हो l कहाँ कोई अपना रहा है l गरीब सवर्ण को कोई नहीं पूछ रहा क्योंकि वोट बैंक नहीं है और दलितों से भी दिखावा ही चल रहा है l प्रदेशों में जितनी सरकार है सब दलित शोषित के साथ खड़ी है लेकिन ज़मीन पर सब नदारद केवल वोट के लिए l सामाजिक समरसता और समानता का अधिकार बस कहने को है l सत्तर साल में संविधान में सब अपने हिसाब से परिवर्तन करते रहें हैं l बढ़िया आलेख सर ,काश राजनेता भी पढ़ लेते तो कुछ विचार बदलता 🙏
कैलाश  मुंशी, भोपाल

आदरणीय तेजेन्द्र भाई

अति सुन्दर सम्पादकीय शब्द… भारत गणतंत्र के गठन के अनुसार संविधान सर्वोपरि है। आज परिस्थिति ऐसी है कि संविधान को पढ़े बग़ैर हर व्यक्ति संविधान की व्याख्या कर रहा है।  जितने लोग, नेता, टीवी डिबेट के भागीदार, एंकर हर कोई संविधान का ज्ञाता बना हुआ है… संविधान का पढ़ना तो दूर जिसने उसकी प्रति को देखा या छुआ तक नही वो गली रास्तों चौराहों पर संविधान को ग़लत बताते हुए मन-घड़ंत, अनाप-शनाप कुछ भी बोल रहा है। जब भारत आज़ाद हुआ था अथवा जब संविधान लिखा गया तब यहाँ शिक्षित जनसँख्या 15 या 20 प्रतिशत थी आज भी सराहनीय स्थिति नहीं, फिर भी सांसद, विधायक, मंत्री या कोई भी राजनीति पद पर शासकीय नियुक्ति हेतु संविधान का ज्ञान आवश्यक होना चाहिए। तब ही संविधान सर्वोपरि सिध्द हो पायेगा अन्यथादिल के बहलाने को ग़ालिब ख़्याल अच्छा है !

या फिर… समय बिताने के लिए करना है कुछ काम, शुरू करो संविधान पर बहस… Right to speak बोलने का अधिकार

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