Monday, June 17, 2024
होमलघुकथाकपिल कुमार की तीन लघुकथाएँ

कपिल कुमार की तीन लघुकथाएँ

(1)
आज से करीब 45-50 साल पहले की बात है | उस दौर में हम थे तो बच्चे लेकिन लोकगीत सुनने और गाने का हमें बड़ा ही शौक था | लोकसंस्कृति के त्यौहार में चढ़-बढ़ कर हिस्सा लेता था | घरों में होने वाले लोकगीत ज्यादातर शादी, घर में बच्चों के जन्म के समय इत्यादि शुभ अवसरों पर होते थे | जब भी घर में ऐसा अवसर आता था, हम कोई अवसर नही छोड़ते थे छुप-छुप कर देखने सुनने का | कई दफ़ा कान पकड़े भी गए और कान पकड़ कर बाहर भी किया गया, मग़र हमने कभी हार नही मानी न ही पीछे हटे | शायद ये शुरुआत थी गीत संगीत नृत्य को समझने की और सीखने की | धीरे-धीरे गीत संगीत के प्रति लगाव बढ़ा और किशोरवस्था तक लेखन में रूचि लेने लगा | किशोरावस्था में लेखन के साथ अभिनय का शौक हमें एक बार रामलीला के मंच तक ले गया,जहाँ हमें राम के छोटे भाई लक्ष्मण का किरदार निभाना था | हमें भी खूब जबरदस्त एक्टिंग की और सबसे खूब तारीफ बटोरी | मुझे खूब भी लगने लगा कि लक्ष्मण का रोल अब हमसे बढ़िया यहाँ कोई कर ही नहीं सकता है | मगर यह भ्रम जल्द ही टूट गया |
एक दिन जो राम का जो रोल कर रहा था यानी हमारे बड़े भाई राम का ,उसके भाई से मेरे भाई का झगड़ा हो गया | उस वक़्त हम अपने मेकअप में लगे थे,हमें ख़बर मिली  बस फिर क्या था लक्ष्मण यानी हमने राम के भाई को कूट दिया | उसकी सज़ा ये मिली राम ने मेरे साथ रोल करने से इंकार कर दिया | अब चूँकि मैं राम का रोल करने वाले और उसके भाई का विरोधी था इसलिए रावण का रोल करने वाले को मैं पसंद आ गया और उसने मुझे मेघनाद का रोल दिलवा दिया | मुझे भी मालूम था एक्टिंग में मेरा कोई सानी नहीं है और मैं कोई भी रोल कर लूंगा | अगले दिन रामलीला शुरू हुई | मैं मेघनाद का रोल कर रहा था जबकि इससे पहले लक्ष्मण का रोल करता रहा | थोड़ी देर तक तो ठीक-ठाक रहा लेकिन उसके बाद मेघनाद वाला डायलॉग भूल गया | काम चलाने के लिए लक्ष्मण वाला डायलॉग ही शुरू कर दिया | कई बार तो राम जी के तारीफ में डायलॉग निकल गए | मुझे लगा मैं एक्टिंग करके सब संभाल लूंगा लेकिन दर्शक तो दर्शक हैं | फिर दर्शक दीघा से चप्पलों और गालियों की बरसात शुरू हुई और मुझे वहाँ से भागना पड़ा और रामलीला भी उस दिन वहीँ पर खत्म हो गयी | मेरा एक्टिंग वाला घमंड चूर-चूर हो गया | तब समझ में आया कि आजकल आदमी भी इसीलिए आदमीयत खो रहे हैं कि वो जल्दी जल्दी किरदार बदल देते हैं |
उस घटना के अगले दिन माफ़ीनामा हुआ और लक्ष्मण यानी मैं फिर बड़े भाई राम के बग़ल में खड़ा था और मैने जिसे कूटा था राम का वो भाई ताली बजा रहा था,मैं भी राम जी की तारीफ़ में मंच पर डायलॉग बोल रहा था, राम  की लीला जारी थी |
(2)
आँखे खुली थी और साँसे भी अपने अंतिम चरणों मे थी मग़र यादों ने अभी साथ नही छोड़ा था | वो एक-एक करके चलचित्र की तरह आँखों के सामने चल रही थी|  दो बच्चों का हाथ पकड़े मैं अपनी पत्नी के साथ नए जीवन की तलाश में एक अंजान देश में एयरपोर्ट से बाहर आ रहा था ,सभी अंजान चेहरे, अंजान भाषा, हमने जल्द ही अपने को विदेशी परिवेश में ढाल लिया,बच्चों को विदेशी विधालय में डाल दिया और ख़ुद  मैं भी पत्नी सहित काम की तलाश में जुट गया | मग़र जहाँ भी हम जाते भाषा की समस्या, इंग्लिश को जानने वाले तो थे मग़र सिर्फ अपनी भाषा के सिवा किसी और भाषा में बात करना पसन्द ही नही करते थे | अब हमे समझ आ गया था कि इनकी भाषा सीखना जरूरी है इसलिए दिन में दोनों पति पत्नी ने छोटा सा काम ढूँढ़ लिया और शाम के विद्यालय में भाषा सीखने जाने लगे ,वक़्त पँख लगाकर उड़ने लगा ,भाषा का ज्ञान भी हो गया ,पति-पत्नी को अच्छी नौकरी भी मिल गई ,बच्चे भी पढ़ाई में आगे जाने लगे ,मैं विदेशी साथियों के साथ इतना घुल मिल गया कि मुझे वो मुल्क अपना सा लगने लगा | मेरा एक खास अंग्रेज मित्र था जो शादी शुदा था मग़र कोई बच्चा नहीं था क्योंकि जवानी में उन्होंने इसकी उन्हें जरूरत महसूस नही हुई मग़र अब देर हो चुकी थी ,उम्र ढलाव पर थी ,याद आ रहा है ऐसे ही जब बातों-बातों में एक दिन जब उसने कहा था ,तू किस्मत वाला है बच्चे हैं ,कोई तो पास होगा जब तुम रिटायर्ड होंगे ,कोई तो देखने वाला है तुम्हे, हमारा क्या एक दिन एम्बुलेंस आएगी और हॉस्पिटल ले जाएगी,हम या तो वहाँ अकेले दम तोड़ देंगे या फिर ओल्ड ऐज होम में आखिरी साँसे ले रहे होंगे ,संपत्ति भी सरकार के पास चली जाएगी, और मैं हमेशा उसको दिलासा देता था,और दिल ही दिल में अपनी किस्मत पर नाज़ करता था,  बच्चे बड़े हो गए ,अच्छी नौकरी भी मिल गई ,मुझे याद आ रहा है बड़े बेटे की शादी पर मैने अपने अंग्रेज मित्र को भी बुलाया था ,वो अपनी पत्नी के साथ रिसेप्शन पर आया था और उसने बहुत तारीफ़ की थी मेरी किस्मत की और मेरी संस्कृति की ,दूसरे बेटे की शादी से पहले मैं और मेरा अंग्रेज मित्र रिटायरमेंट ले चुके थे |
मैने उसका पता किया तो पता चला कि उसकी पत्नी का देहान्त हो चुका था वो अकेला ओल्ड ऐज होम में रहता था फिर भी ढूँढ़ कर उसे बुलाया,बहुत ही खुश थे हम एक दूसरे से मिलकर और वो खुश था मुझे परिवार के साथ देखकर, याद आ रहा है उसने कहा था कि आपकी संस्कृति और हमारी संस्कृति में ये ही फ़र्क़ है मै अकेला हूँ आप सब इकठ्ठे हैं | मैं भी अपनी संस्कृति पर गर्व कर रहा था और बच्चों को देखकर खुश हो रहा था | धीरे-धीरे वक्त बीता | दोनों बच्चों की शादी हुई , उन्होंने अपना-अपना घर ले लिया और अपने तरीके से बसाना शुरू कर दिए | शुरू-शुरू में तो मेरा बहुत आना जाना रहा लेकिन धीरे-धीरे कम होता गया |समय के साथ-साथ मेरी जरुरत न के बराबर महसूस होने लगी |
कब दिन हफ्ते में बदले कब महीनों मे कब सालों में ,बच्चो के पास वक़्त नही रहा क्योंकि उनके बच्चे हैं उनको देखना है नौकरी करनी है हमें क्या देखते | धीरे-धीरे शरीर भी साथ छोड़ रहा था | सात जन्म का साथ भी छूट गया पत्नी भी ईश्वर में लीन हो गई |एक दिन मैं घर में बैठा बच्चों के आस-पास ही शिफ्ट होने को सोच रहा था ताकि कम से कम पोते-पोती को देखकर मन बहल जाये | लेकिन यह क्या किस्मत को कुछ और मंजूर था |
एक दिन दोनों बच्चे आए और सबने मिलकर यही निर्णय लिया कि अब मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट होना चाहिये | मुझे ओल्ड एज होम भेज दिया गया | मैं कुछ नहीं कर सकता था | यह जीवन के ढलान के दिनों का सत्य था | मेरे दोनों बच्चे मुझे ओल्ड एज होम में पहुंचा दिए | मैं धीरे-धीरे अपना सामान अंदर जाने लगा तभी एक आदमी मेरे सामने से मुझे घूरता हुआ  गुजरा | मैंने ध्यान से देखा तो यह मेरा वही अंग्रेज मित्र था जिसे हमारी संस्कृति बहुत अच्छी लगती थी | मैं नजरें चुराते हुए उससे मिला लेकिन धीरे-धीरे हम दोनों पहले की तरह घुलमिल गए | उसका परिवार था नहीं और मेरा होते हुए भी मेरा न हुआ | हम दोनों कुछ दिन एक दूसरे से सुख -दुःख साझा करते रहे | लेकिन कब तक ?
कल ही उसे दफ़ना के आया हूँ और मेरी साँसे साथ छोड़ रही हैं ,न संस्कृति नज़र आ रही है न संस्कार और न ही कोई आवाज़ | सिर्फ एक शून्य है सिर्फ शून्य |
(3)
जसविंदर आज बड़ा खुश था | उसका बचपन का दोस्त सालों बाद कनाड़ा से लौट रहा था, दोनों ने बचपन साथ गुजारा था ,साथ साथ पढ़ाई पूरी की, जसविंदर की नोकरी कुलविंदर से पहले लगी,कुलविंदर बेरोजगार था, इसी बीच कुलविंदर की बहन जो कनाड़ा में रहती थी वो अपने भाई को कनाड़ा ले गई | कुछ वक्त तक ख़तों के माध्यम से दोनो की बात होती रही ,कभी कभार पड़ोस के टेलिफोन पर भी फ़ोन आ जाता था , मोबाइल का चलन न के बराबर था ,मग़र अब इतने सालों में सब कुछ बदल चुका है ,आज जसविंदर के घर फोन लगा हुआ है ,लेकिन वही पुराना मूढा वही पुरानी खाट जसविंदर का मुहँ चिढ़ा रही है, क्योंकि एक छोटी सी नौकरी में और कुछ संभव ही नही हुआ,
जसविंदर की बेताबी खत्म हुई कुलविंदर एक मर्सडीज से गाँव पहुँचता है,जसविंदर उसके ठाट बाट देखकर दंग रह जाता है, उसे मिलने भी शर्म आती है अपने कपड़े और अपनी हालात देखकर, लेकिन कुलविंदर आगे आकर हाथ मिलाता है गले लगाता है ….ओये जस्से आ गले लग न  आज राती महफ़िला जमाने हां  रात को दोनों पुराने दोस्त शराब पीते हैं और पुराने दिनों की याद करते हैं, जसविंदर पूछता है कि वो कनाड़ा में क्या करता है, कुलविंदर बताता है कि वो वहाँ बिजनेस करता है और वहाँ उसका बहुत बड़ा बंगला है नोकर चाकर हैं, ये सुनकर जसविंदर की आँखों मे सपने पलने लगते हैं ,वह कुलविंदर से कहता है कि वो भी कनाड़ा जाना चाहता है , कुलविंदर बताता इसके लिए बहुत खर्चा होगा ,तकरीबन 30 लाख का खर्चा आएगा , अगर वो अपना सब कुछ बेच दे, घर ज़मीन तब भी 25 लाख के आसपास जमा होंगें , 5 लाख कहाँ से लाएगा , जसविंदर उदास हो जाता है,तभी कुलविंदर उसके कंधे पर हाथ रखता कहता है ओये जस्सेया क्या मैं तेनू 5 लाख की मदद नही कर सकना,  ..जस्से मैं इस गाँव विच में तेरे ही वास्ते ते आया हेंवा  कल चलकर किसी प्रोपर्टी डीलर नाल गल करने हां ,  जसविंदर … पा जी मैं ते किसी वी प्रॉपर्टी डीलर नू नई जानना  कुलविंदर… जस्से मैं एक प्रोपर्टी डीलर को शहर विच समझना ,कल सवेरे चलते हैं उदे कोल,चल उठा इसी नाम ते इक होर चियर्स,  अगले दिन सवेरे तैयार होकर जसविंदर ,कुलविंदर के घर जाता है दोनों शहर मर्सडीज़ से रवाना हो गए,  वहाँ जाकर दोनों प्रोपर्टी डीलर से मिलते हैं , प्रोपर्टी डीलर जमीन के और घर के पेपर देखने के बाद जमीन और मकान की कीमत 20 लाख लगाता है जसविंदर उदास हो जाता है ,  प्रोपर्टी डीलर कहता कि अगर जल्दी कैश चाहिए तो 20 लाख ही देगा ,अगर 6 महीने का वक़्त दोगे तो 25 लाख,जसविंदर अपने सपनो को जल्दी पूरा करना चाहता है ,मग़र फिर 5 लाख कम कहाँ से आएँगे मग़र कुलविंदर फिर  जसविंदर को दिलासा देता ,जस्से ..जित्थे मैं 5 दे रया सी उत्थे 10 लाख दे सां मैं तेनू, तू कनाड़ा विच कमा के मेनू दे देइँ,  जसविंदर…… कुलविंदर मैं किस तरह तेरा अहसान चुकावांगा  कुलविंदर ,झल्ले दोस्ती विच कोई अहसान नही होंदा ,चल पेपरां ते साइन कर दे  जसविंदर साइन कर देता है , और प्रोपर्टी डीलर साइन कराके कैश जसविंदर के हाथ मे देता है दोनों  वापस गाँव की तरफ रवाना हो जाते हैं |
रास्ते मे खूब पीते खाते मस्ती करते हुए जाते हैं ,गाँव पहुँचकर कुलविंदर ….जस्से  तेरे कोल पासपोर्ट ते है न,  अगर नही है ते बनवाना पै सी  जसविंदर… बिलकुल है पा जी पिछले साल बनवाया सी ओ बैंकाक जाने खातरों नौकरी ते सारे नाल वालेयां दा प्रोग्राम सी  लेकिन पा जी नई होया हुन सीधा कनाड़ा तुसाडे नाल,  कुलविंदर ….बिल्कुल जा तू पासपोर्ट ले आ, मैं कल सवेरे ही एम्बेसी जा के वीजे दा इंतजाम करना  जसविंदर… पा जी मैं वी ते नाल चलना  कुलविंदर…. जस्से पहले मैं पेपरां तैयार कर लेवां ,जमा करा देवां ,स्पॉन्सर नाल गल करके पेपरां मंगाने हैं ,तेनू ते जाना ही पैसी अगली दफ़ा साइन करन वास्ते ,  जसविंदर…. ठीक है पा जी  इसी ना ते चुक्को इक होर चियर्स,  अगले दिन सवेरे जसविंदर कुलविंदर को  मिलता है ,  कुलविंदर….. जस्से मैं 2 दिन विच मुड़ आना , तब तक तु चलने दी तैयारियां कर  जसविंदर… जी पा जी ,रब राखा  कुलविंदर को रब राखा किए एक हफ्ता गुजर गया मग़र न तो वो वापस आया न  ही कोई ख़बर ,जसविंदर ने बहुत कोशिश की कुछ ख़बर मिले ,प्रोपर्टी डीलर ने घर और खेत पर कब्जा कर लिया ,आखिर वो  पुलिस स्टेशन गया और सारी बात कह सुनाई , पुलिस अफसर जसविंदर के साथ  प्रोपर्टी डीलर के पास गया ,प्रोपर्टी डीलर ,सर मैने तो साइन कराके पैसे भी इसी के हाथ मे दिए थे , और पिछले हफ्ते वो अपना घर और जमीन भी कैश में मुझे  बेच कर गया था और बोला कि मेरा दोस्त भी जमीन घर बेचकर मेरे साथ ही कनाड़ा जा रहा है, अब इसमें मेरी क्या गलती हैं मैने तो पैसे देकर सौदा किया है,  पुलिस अफसर लाचार,वापिस आकर जसविंदर के दिए कनाड़ा के नम्बर पर फोन करता है ,जो फ़ोन उठाता है वो बताता है कि कुलविंदर नाम का वहाँ कोई  पहले किराए पर रहता था ,मग़र आपराधिक मामलों के चलते उसे 1 साल पहले कनाड़ा से इंडिया डिपोर्ट कर दिया गया था ,और जो मर्सडीज का नम्बर पुलिस को जसविंदर ने दिया था वो किराए पर ली गई थी वो भी नकली आई डी से…….   वैसे जसविंदर ठीक है  मग़र जब कोई उसके सामने कनाड़ा का नाम ले तो बाल खोल लेता है और पागलों की तरह पत्थर मारता है और इसलिए गाँव मे कनाड़ा के नाम लेने पर सख्त मनाई है  जसविंदर के गाँव के पास से सिर्फ मर्सडीज ही नही गुजर सकती जसविंदर सिर्फ मर्सडीज पर पत्थर मारता है ,इसलिए गाँव वालों ने गाँव से 5 किलोमीटर पहले बोर्ड लगा रखा है आने वाले गाँव में कनाडा का नाम अपने रिस्क ओर ले और मर्सडीज वाले अपने रिस्क पर आगे जाएँ…|

कपिल कुमार, बेल्जियम
ईमेल –
kapilbelgium@hotmail.com

 

RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest