होम लघुकथा अशोक वर्मा की लघुकथा – ‘तुम यहीं हो…’

अशोक वर्मा की लघुकथा – ‘तुम यहीं हो…’

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4 जनवरी 2020
आज अर्पिता की बहुत याद आ रही है। सुबह अलमारी से कमीज़ निकालने लगा तो सामने हैंगर में लटकी अर्पिता की चार दर्जन साड़ियां दिखाई दीं। पिछले चार वर्षों से इन्हें किसी ने नहीं पहना। यह मैरून और नीले रंग की साड़ी उसे खूब पसंद थी। विवाह की पच्चीसवीं सालगिरह पर दिलवाई थी मैंने उसे। सिक्सटी-फोर…  भला  यह भी कोई  उम्र है दुनिया छोड़कर जाने की। मन रह-रह कर उदास हो रहा है।
5 जनवरी 2020
चालीस पैंतालीस वर्ष पहले जब हमारी शादी हुई थी तो मज़ाक में पूछा था अर्पिता ने–कितनी तनख्वाह  मिलती है आपको?  तीन सौ रुपये की बात सुनकर देर तक हँसती रही थी वह। और मैं अपना सा मुंह लेकर रह गया था।
6 जनवरी 2020
धीरे-धीरे गृहस्थी सँभाल ली थी अर्पिता ने। मुझे याद है एक बार आखिरी सप्ताह में पैसे खत्म हो गए थे। मैंने  बैंक से पैसे निकालने की बात की तो कहने लगी… जमा रकम क्यों निकालते हो। मैं रद्दी अखबार बेच दूँगी। पहली तारीख तक काम चल जायेगा। उसकी सूझ बूझ पर मैं मुस्करा दिया था। उस दिन हल्की बरसात हो रही थी। मेरा मन दफ्तर जाने का नहीं था। वह किचन में गयी और ट्रे में चाय पकोड़े मेरे सामने रख कर मुझसे सटकर बैठ गयी थी। 
7 जनवरी 2020
मेरा बेटा स्कूल जाने लगा था। ऑफिस में ओवर-टाइम करके रात्रि दस बजे कड़कड़ाती सर्दी में जब घर आता तो अर्पिता बेटे को होमवर्क करवाकर,उसे खाना खिलाकर सुला देती थी। मेरे आने पर  वह मुझे गरमागरम खाना परोस देती। और एक तृप्ति का भाव उसके चेहरे पर हुआ करता था। मेरी विभागीय प्रमोशन पर उसने सारे मोहल्ले में लड्डू बांटे थे जैसे वह खुद सेक्शन अफसर के पद पर आसीन हो गयी हो।
8 जनवरी 2020
बेटे का विवाह हो गया था। शिवानी के रूप में वह बहुत समझदार बहू चुनकर लायी थी। अर्पिता की आकस्मिक मौत के बाद शिवानी ने पूरे घर और मुझे संभाला हुआ है। जब कभी अर्पिता की याद आती है तो शिवानी ढाढ़स देकर कहती है… पापा जी, आप घर के मुखिया हैं। आप ही उदास रहेंगे तो हमें ढाढ़स कौन देगा। और मैं नज़रें बचाकर आँसू पोंछ लेता हूँ।
9 जनवरी 2020
अर्पिता को किसी न किसी ज़रूरतमंद को दान आदि देने में बड़ी रुचि थी। पूरे चार वर्ष हो गए हैं अर्पिता को बिछुड़े हुए। आज मैंने घर में काम करने वाली सहायिका को बुलाकर अर्पिता की साड़ियां, सूट, शॉल, चूड़ियां आदि उसे दे दी हैं। उसने वादा किया है कि वह अपनी बस्ती में रहने वाली सभी औरतों को एक-एक साड़ी वितरित कर देगी। खाली अलमारी और लटके हुए हेंगर उदासी और बेचैनी से जैसे पूछ रहे हों… बाबूजी, क्या इतना ही प्यार करते थे आप  मालकिन से?  
मैं निःशब्द हूँ।
10 जनवरी 2020
कल देर रात तक सो नहीं सका। आज सुबह तीन बजे नींद ने आ घेरा था। सपने में मैंने देखा कि बस्ती की सभी औरतें अर्पिता की दी हुई साड़ियों से सज्जित होकर, झूम-झूम कर डांडिया नृत्य कर रही हैं । उन सब के बीच अचानक अर्पिता भी प्रसन्न मुद्रा में नृत्य कर रही है। 
मैं चौंककर उठ बैठता हूँ और स्टूल पर रखा पानी का गिलास होंठों से लगा लेता हूँ। फिर समीप रखे ग़ज़ल  संग्रह को खोलकर पृष्ठ पलटने लगता हूँ। मेरे सामने कुछ शेर यूँ हैं…
वो जो  दूर सफ़र में है
उसकी पीर नज़र में है
चला गया, विश्वास नहीं
खुशबू अब तक घर में है…
(यह रचना श्री अशोक वर्मा के शीघ्र प्रकाश्य कहानी संग्रह में शामिल की जा रही है।)

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