Friday, June 21, 2024
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कर्नल गिरिजेश सक्सेना की लघुकथा – एक दूजे के लिए

रेखा राकेश बचपन के मित्र थे, एक साथ एक ही मोहल्ले में रहते थे, सहपाठी थे| बचपन साथ बीता स्कूल कॉलेज और साथ ही साथ वय सोपन भी तय किए| बचपन के सारे खेल साथ खेले थे, ग्रैजुएशन में साथ साथ पठन पाठन भी रहा| पोस्ट ग्रैजुएशन में विषयान्तर होने के कारण क्लास रूम और समय अलग अलग होने लगा| अब साथ लाइब्रेरी में बैठना भी नहीं होता था| राकेश को धीरे धीरे एहसास हुआ उनके बीच की दूरियां बढ़ गई थी| 
छः माह से अधिक का समय होने लगा था| एक दिन राकेश ने कॉलेज कॉरिडोर में रेखा को देखा “हैलो, रेखा!” उसने आगे बढ़कर कहा|
“हैलो!”  रेखा भी ठिठककर रुक गई|
“हैलो क्या बात है? आजकल मिलना ही नहीं होता?”
“यूँ ही, क्लास अलग समय अलग, संयोग नहीं बैठ पाता|” 
“तो क्या? इतनी पुरानी दोस्ती, मिलने का मन नहीं करता?”
“उससे क्या फर्क पड़ता है, फिर समय भी तो हो|”
“समय होता नहीं, निकालना पड़ता है, मन हो तो|”
“वो ठीक कहा, मन हो तो|”
“क्या? मन हो तो? तुम्हारा मन नहीं होता मेरे लिए समय निकालने का?
“हाँ तो क्या दोस्ती ही तो थी, रिश्तेदारी तो नहीं| जब साथ पढ़ते थे तब बात दूसरी थी| तब भी तो लोग बातें बनाते थे, अब तो अर्थहीन बातों के भी लोग अर्थ निकालने लग जाएंगे| बातों के बतंगड़ बन जायेंगे|”
“हाँ सोचने वाली बात तो है| तुम क्या सोचती हो, जमाने से डर जाए?”
“हाँ तो फायदा भी क्या है? तुम तुम्हारी राह चलो मैं अपनी राह|”
“तुम्हारी राह मेरी राह ये क्या बात बोल दी तुमने?”
“बात का बतंगड़ मत बनाओ यहाँ रास्ते में, मेरा वैसे भी क्लास का समय हो रहा है”-रेखा ने रास्ता कट कर निकलने का प्रयास किया| 
राकेश ने राह रोक ली,”एक क्लास से कोई फर्क नहीं पड़ जायेगा,चलो थोड़ी देर कैंटीन में बैठते हैं|’ 
“रेखा ने राकेश की आँखों में देखा आज वहाँ बचपन वाला राकेश नजर नहीं आया| कुछ तो था जो पहले से अलग था| वह कुछ न कहकर कैन्टीन की ओर मुड़ गई| 
कैंटीन में जानें कैसे कोने की टेबल खाली थी, उसे ‘’परिंदों की टेबल’’ कहते थे राकेश के कदम उसी ओर बढ़ गए| रेखा एक पल को ठिठकी पर राकेश को निर्बाध जाते देख उसके पीछे चल पड़ी| उस टेबल का रिवाज था, जब तक ऑर्डर के लिये ना बुलाया जाए, बेटर भी उस ओर नहीं जाता था| राकेश ने आगे बढ़कर कुर्सी खींची और रेखा की ओर सौजन्य से देखा| अनजाने ही रेखा ने आभारी नज़रों से राकेश को देखा,वहां एक उत्कट सागर उमड़ता देख रेखा के कपोलों पर लालिमा छा गई| रेखा को बिठाकर राकेश ने पास की कुर्सी खींची और बैठ गया| एक अनगढ खामोशी थी| ऐसा लग रहा था खामोशी टूटना तो चाहती थी पर पहल कौन करे|
कैंटीन में भीड़ नहीं थी फिर भी बेटर आस पास की टेबल्स पर मंडरा रहा था| आशय समझ राकेश ने इशारे से उसे बुलाया, रेखा को मुखातिब होकर पूछा-“क्या लोगी?”
“लेना क्या है? कुछ भी ले लो| हम यहाँ क्यों आए है?” 
“दो स्पेशल कॉफी” वेटर को ऑर्डर कर “ओके रेखा?जैसे रेखा से कन्फर्म कराना चाहता हो| फिर रेखा की तरफ मुड़ कर कहा “हाँ तो क्या कहा था तुमने? दोस्ती ही तो है कोई रिश्तेदारी तो नहीं?” 
“डोंट कैच माय वर्ड्स| मेरा मतलब…”
“तुम्हारा मतलब कुछ भी हो मेरा मतलब साफ है, मैं तुम्हें मिस करता हूँ| दोस्ती में लोग बातें करते हैं तो रिश्तेदारी ही सही| वहां खामोशी के मध्य कॉफी की चुस्कियों की आवाज गूंज रही थी बस| राकेश ने ही यह खामोशी-“तोड़ी हाँ तो रेखा क्या सोचा है?” 
“थोड़ा समय तो दो ना”
“नो मेम साहिब मेडम| आपके घर में आप बात करेंगी या मैं आऊं?”
“रेखा ने कुछ नहीं कहा, कॉफी खाली कप टेबल पर रखते हुए बोली- “चलें?” 
एक अरसा बीता| उस दिन राकेश रेखा के घर आया यूंही जैसे बचपन से आता था पर दोस्ती रिश्ते गढ़मढ़ अनगढ़ से ही रहे| रेखा पूर्वत सहज नहीं थी| 
इधर कुछ समय से उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था आज सारी जांचों के नतीजे आ गए थे रेखा के जन्मजात एक ही किडनी थी और वह भी अत्यंत क्षतिग्रस्त हो चुकी थी| चिकित्सकीय निदान अंग प्रत्यारोपण यानी किडनी प्रत्यारोपण प्रस्तावित था जो रेखा की जीवन रक्षा के लिए नितांत आवश्यक था| परिवार में किसी की भी अंग-समानता न होने के कारण समस्या भीषण थी| राकेश ने वस्तुस्थिति को समझा और अपनी एक किडनी प्रत्यारोपण है हेतु प्रस्तावित कर दी| परिवार के पास कोई विकल्प नहीं था पर रेखा बिफ़र पड़ी-“नहीं माँ! मैं किसी के अहसान तले नहीं जी सकती|”
“ना बेटा न, यह एहसान कैसे हो गया| वह तुम्हारा बचपन का दोस्त है, संगी साथी है| अंग प्रत्यारोपण में किसी न किसी का अंग तो होगा, फिर राकेश में क्या बुराई है?” माँ ने प्रतिवाद किया| 
“पर माँ पराया अंगदान करके अपना पैसा धेला लेकर चला जाता है,एहसान तो नहीं होता|
“बेटा! पर भावनाएँ अर्थ से ऊपर होती है| उसने तो शादी का प्रस्ताव भी किया था अगर शादी हो गई होती तब? तब भी क्या ये एहसान होता?”माँ का प्रश्न था|
“नहीं माँ तब वह उसका फर्ज होता”-रेखा ने कहा|
“हाँ तो ठीक तो है ना”-राकेश जो पूरा वार्तालाप सुन रहा था, ने आगे आकर कहा-“रेखा तुम्हें दोस्त की तरह जब मैंने कैंटीन में प्रस्ताव किया दोस्ती को रिश्ता बनाने के लिए तब तो दोस्ती का ही वास्ता था| तब तो तुम्हारा रोग मुझे पता भी न था|” 
“तो अब तो पता है| अब क्यों गले से बांध रहे हो?” 
“रेखा इसे गले से बाँधना नहीं कहते, “”हम बने तुम बने एक दूजे के लिए|’” “रिश्ता बराबरी का दोनों की एक किडनी, एक साथ जीवन| अब मना मत करना|”- राकेश ने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर अपनी कातर नजरें उसकी नजरों से मिला दी| रेखा चुप थी दोनों की आँखों से अविरल धार बह रही थी|

कर्नल गिरिजेश सक्सेना 
भारत पाक युद्ध 1971 से मार्च 2003 तक दीर्घ सेवा के पश्चात् मिलिटरी अस्पताल भोपाल से सेवा निवृति| सेवा निवृति के पश्चात् ई सी एच एस पॉलिक्लिनिक भोपाल तथा जे के हॉस्पिटल भोपाल में मेडिकल सुपरिंटेंडेंट  पद  पर कार्य किया।
वर्तमान में  प्राइवेट प्रक्टिस, अस्पताल एवं स्वास्थ प्रबंधन सलाहकार तथा  नेशनल  एक्रीडीटीटेशन बोर्ड ऑफ़ होस्पिटल (NABH) के  सलाहकार के रूप में कार्यरत। 
हिंदी साहित्य में सृजन साठ के दशक  से सदा सर्वदा निर्बाध ,परन्तु सैनिक के बंजारा खानाबदोश जीवन के कारण स्वान्तः सुखाय|
“दी एक्स मैन “ ( द्विभाषी  ) पत्रिका – सेवा निवृति के बाद 2003 से 2012  तक का लेखन ,संपादन एवं प्रकाशन किया। 
बीस से अधिक स्थानीय ,प्रादेशिक एवं अखिल भारतीय संस्थागत पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त।



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1 टिप्पणी

  1. आदरणीय सर!
    आपकी लघुकथा “एक दूजे के लिए पढ़ी”
    द्रवित हुए। बचपन में इस तरह की शारीरिक कमजोरी संभवतः समझ में ना आए पर बड़े होने पर जब पता चल जाता है कि दिक्कतें कितनी बड़ी हैं , तो ज़िंदगी किसी ऐसे मोड़ पर खड़ा कर देती है जहाँ एक आवश्यक निर्णय लेना ही पड़ता है। बड़े होने पर जब रेखा को अपनी शारीरिक किंतु गंभीर कमी का पता चला होगा तो उसने कितनी ही मुश्किलों से अपने आप को समझाया होगा! कितनी आंतरिक पीड़ा झोली होगी। किस अंतर्द्वंद्व से वह गुजरी होगी!अपने मन को कितना कड़ा किया होगा ताकि वह उसकी ज़िन्दगी स्वयं ही दूर हो जाए।प्रेम के लिये रेखा ने गंभीर निर्णय लिया और पीछे हट गई। लेकिन जब राकेश राकेश को सच्चाई का पता चलता है तो वह अपनी एक किडनी रेखा के लिए दान कर देता है और उसे शादी के लिए राजी कर लेता है। दोनों ही एक दूसरे के लिए त्याग कर रहे थे ।वास्तव में यही प्रेम की सच्ची परीक्षा है।
    एक पल के लिए साधना और राजेंद्र कुमार की काफी पुरानी एक पिक्चर याद आ गई जिसमें राजेंद्र कुमार का एक पैर कट जाता है और वह साधना से स्वयं को दूर करने का प्रयास करता है पिक्चर का नाम याद नहीं आ रहा।
    एक फेमस गाना भी है उसका- बेदर्दी बालमा तुझको मेरा मन याद करता है! अँखियों के झरोंखों से पिक्चर भी याद आई।
    बेहतरीन कहानी के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर!

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