कल्पना मिश्रा की लघुकथा - संघर्ष 3

  • कल्पना मिश्रा

अचानक खट की आवाज़ से नींद खुल गई.. तेज़ हवाओं के साथ बारिश हो रही थी इसीलिये शायद  कुछ गिर गया होगा।तकिये के नीचे से मोबाइल निकाल कर देखा तो रात के दो बज रहे थे। अभी थोड़ी देर और सो सकते हैं ; ये सोचकर उन्होने फिर से आँखें बंद कर ली। पर नींद नही आ रही थी.. ना जाने क्यों पुराने दिन याद आने लगे।
पिताजी की असमय मौत के समय वो दस वर्ष के थे!  तब घर चलाने की समस्या के चलते खेलने खाने की उम्र में ही वह अख़बार बाँटने का काम करने लगेे।मौसम चाहे कोई भी हो;सुबह तीन बजे उठकर अख़बार का बंडल लाते और चार बजे से घर-घर बाँटना शुरू कर देते। दस बजे से तीन-चार साइकिल की दुकान में झाड़ू पोंछे का काम करने के बाद खाली समय में पढ़ाई भी कर लेते। बचपना ही था;कभी उठने में अलसाता,नानुकुर करता तो अम्मा समझातीं कि “कठिनाइयों से लड़ो,उनसे संघर्ष करो.. अगर नही करोगे तो हार जाओगे”और वह फिर उठकर उतने ही जोश से काम में लग जाते।
जैसे-तैसे करके आठवीं कक्षा तक पढ़ाई भी कर ली.. फिर अम्मा ने जल्दी ही ब्याह कर दिया । चौबीस का होते-होते दो बेटे भी हो गए। पर अब खर्चे बढ़ गए थे तो वह दिन रात ख़ूब मेहनत करतें ताकि बच्चे उनकी तरह दर दर ना भटके..बल्कि पढ़ लिखकर बड़े आदमी बने! फिर जब तक बच्चे छोटे थे.. उन्हें स्कूल और कोचिंग में छोड़ने, लेने जाना..यही मकसद रह गया ! धीरे-धीरे ज़िंदगी ढर्रे पर चलने लगी!  कभी वो थक भी जाते या मन हारने लगता तो अम्मा की सीख याद आती और फिर से स्फूर्ति आ जाती।बच्चे शुरू से ही पढ़ने में तेज़ थे इसीलिए पहले छात्रवृत्ति ,फिर बड़ी क्लास में कोचिंग संस्थानों ने आधी फीस भी माफ कर दी ।
दोनों बेटे इंजीनियर बन गए तो ऊँची कंपनियों में नौकरी भी लग गई, फिर अच्छे घरों की लड़कियों से शादी कर दी! दो तीन सालों में पोते पोतियों से घर गुलज़ार होने लगा ! खुशियाँ आने लगी थीं..मन को सुकून मिलता!
“पापा अब आप काम नहीं करेंगे!सुबह से कितनी मेहनत करते हैं?बहुत हुआ,अब आपके बेटे कमाने लगे हैं”  बड़े बेटे ने कहा तो छोटा भी कैसे पीछे रहता ..मनुहार करने लगा “हाँ मम्मी,पापा!हमारे साथ चलिये आप लोग, बाकी दिन चैन से अपने बच्चों के साथ बिताइये !
सुनकर मन में घमंड सा आ गया! कितना अच्छा भाग्य है उनका.. आज के जमाने में जब बुढ़ापे में कइयों के बच्चे अपने माँ, बाप के बेसहारा छोड़ देते हैं.. ऐसे में मेरे बच्चे एक दूसरे से ज़्यादा करने की होड़ में लगे हुए हैं!
“बाबा मेरे साथ खेलने चलो”तभी पोते ने कहा।
“नही! बाबा मेरे हैं.. पहले मुझे कहानी सुनायेंगे”..पोती उसकी शर्ट पकड़कर अपनी ओर घसीट रही थी,दोनों में खीचातानी होने लगी!
अचानक पत्नी की आवाज़ सुनकर उनकी नींद खुल गई …”उठो! आज पेपर बाँटने नही जाना है क्या?” वह झझकोरते हुए उन्हें जगा रही थी!
वह चौंक पड़े..ओह्ह…तो वो सपना देख रहे थे? हाँ सोचते-सोचते नींद आ गई थी शायद… ये सपना ही तो था।ऐसे शब्दों को तो हकीकत में सुनने के लिए कान तरस गए थे। क्योंकि दोंनो बच्चे हमेशा के लिए विदेश चले गए थे!एक अख़बार बेचने वाले को अपना बाप कहने में अब उन्हें शर्म जो आने लगी थी।
हड़बड़ाते हुए वह उठ बैठे। संघर्ष अभी बाकी हैै! अभी तक अपनों के लिए मेहनत करते थे;अब अपने लिए करेंगे..सोचते हुए जल्दी से बरसाती पहनकर घर से निकल पड़े।

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