…हमारी आज़ादी से आप इतना डरते क्यों हैं?
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डॉ. रूपा सिंह
इक्कीसवी सदी में बनने वाली हिन्दी फिल्मों में एक विशेष बदलाव चिन्हित हुआ कि उसने स्त्री को जुबान दी। कई फिल्मों में स्त्री प्रतिनिधि रोल में नजर आती हैं और अपने सशक्तीकरण के दावों को इस सशक्त माध्यम द्वारा बेहतर तरीके से प्रस्तुत करना चाहती है। स्त्री-विमर्श का आधुनिक पाठ अभी समाज में भले ही प्रचलित न हुआ हो लेकिन उसके कई घटक फिल्मों की विषय वस्तु का हिस्सा बन रहे हैं। जैसे लिव-इन-रिलेशनशिप, विवाहहेतर संबंध, समलैंगिकता इत्यादि। साथ ही यह भी सच है कि प्रायः सभी फिल्में समाज के उस सामंतवादी दृष्टिकोण को जरूर सामने रखती है जिससे स्त्री शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर है। उसका समय, ऊर्जा, विवेक, पितृसत्ता की दुभिसंधियों से लोहा लेने में ही व्यतीत हो जाता है। कई बार स्त्री स्वयं भी अपनी नियति दोयम दर्जा का ही होना स्वीकार कर लेती है। ऐसे में वह उस परंपरागत धारणा को पुष्ट करती है जिसमें वह अबला, कमजोर, मासूम, दीन-हीन, पापों से डरने वाली घर-गृहस्थी में वापस लौटने वाली, पति और बच्चों की क्रूरता भूल उन्हें पुचकारती महिमामयी देवी है। एक प्रकार से यह एक ऐसा सामाजिक नैतिक दबाव है जो दूर तक स्त्री की पालतू कंडीशंड छवि को पुष्ट करता है यह पूरे समाज के साथ स्त्री को भी मैसेज देता है कि उसका कत्र्तव्य क्या है? उसे कैसे रहना है? ’मदर इंडिया’ हो या ’खून भरी मांग’ स्त्री का पूरा लौह वजूद पति-बच्चों और खानदानी मर्यादा को सुरक्षित रखने में त्यागमय व्यतीत हुआ। बदले में उसे क्या मिला ? आधुनिक स्त्री ने विभिन्न स्त्री-आंदोलनों द्वारा स्व चेतना की जागरूकता से सोचना शुरू किया तो वह चकित रह गयी। उसे मनुष्य योनि भी मिली है? उसकी अपनी इच्छायें भी हैं ? उसके सपने भी हंै ? वह विकलांग नहीं। न मन से न शरीर से। बल्कि यदि उचित शिक्षा और अवसर मिले तो वह पुरूषों से भी आगे जा सकती है। उस स्त्री ने अब स्वयं पर ध्यान देना शुरू किया और सबसे पहले यह घोषणा की कि, ’स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है।’
लेकिन किसी ने शायद ही ध्यान दिया कि बुर्का (परदा) जो सदियों से स्त्रियों को ढक-छिपकर रखने की वकालत करता है, उसमें आधुनिक प्रसाधन सामग्री लिप्सटिक का क्या काम ? क्या यह ऐसा प्रतीक है जो परंपराओं में इच्छाओं का जलता हुआ मशाल है ? जो स्त्रीमन में सदियां से दफन इच्छाओं, सपनों और मार दिये गये स्पंदनों की दहकती रोशनी लेकर आया है ? इस दहकन में दहकते हुये सवाल हैं। स्त्रियों के प्रश्न है दुनिया की सबसे अश्लील मानी जाने वाली सेक्स -इच्छा की डिमांड है। जी लेने की शर्तो की अपने र्की अनुकूल बना लेने की जदोजहद में इस फिल्म की चारों नायिकायें संलग्न होती है और अपनी दिलेरी से अपनी ताबूत के कीलों से भिड़ने की कोशिश करती है। फिल्म के सभी पात्र हमारे अड़ोस-पड़ोस की लडकियों/स्त्रियों के हैं जिन्हें ’उषा’ पढ़ती है, फिल्म निर्देशिका (अलंकृता श्रीवास्तव) सामने लाती है और ये चारों नायिकायें जीवित स्पंदनों के साथ हमारे सामने आ खड़ी होती है।
प्रोफेसर सुश्री रूपा सिंह ने ‘लिप्स्टिक अंडर माई बुर्क़ा…’ के माध्यम से स्त्री की विवशता को उकेरा है। छोटे शहरों में कमोबेश यह स्थति है, पर बड़े शहरों की महिलाएं इस स्थिति से कुछ हद तक उबर चुकी हैं। फैशन करना और अपने सपने पूरा करना हर नारी का उद्येश्य है पर समाज को यह स्वीकार्य नहीं है। पुरुषप्रधान समाज उसे स्वीकारेे भी कैसे, इससे उसका अहम् आहित नहीं होगा।
फिर भी रूपा ने इस फिल्म के माध्यम से नारी स्थिति को उजागर करने की कोशिश की है, वह प्रसंशनीय हैैै। वांशिगटन इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखायी गयी यह फिल्म टोकियो इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2016 में ‘विनर ऑफ़ द स्प्रिट ऑफ़ एशिया अवार्ड’ के लिए चुनी गयी है। इसफिल्म के निर्माता बधाई के पात्र हैं।
बहुत बढ़िया लेख
बेहद अच्छी प्रतिक्रिया, आज शाम की ही देखती हूँ इस फ़िल्म को। धन्यवाद।