…हमारी आज़ादी से आप इतना डरते क्यों हैं?

  • डॉ. रूपा सिंह

लिप्स्टिक अंडर माई बुर्क़ा - एक दृष्टिकोण (प्रो. रूपा सिंह) 1इक्कीसवी सदी में बनने वाली हिन्दी फिल्मों में एक विशेष बदलाव चिन्हित हुआ कि उसने स्त्री को जुबान दी। कई फिल्मों में स्त्री प्रतिनिधि रोल में नजर आती हैं और अपने सशक्तीकरण के दावों को इस सशक्त माध्यम द्वारा बेहतर तरीके से प्रस्तुत करना चाहती है। स्त्री-विमर्श का आधुनिक पाठ अभी समाज में भले ही प्रचलित न हुआ हो लेकिन उसके कई घटक फिल्मों की विषय वस्तु का हिस्सा बन रहे हैं। जैसे लिव-इन-रिलेशनशिप, विवाहहेतर संबंध, समलैंगिकता इत्यादि। साथ ही यह भी सच है कि प्रायः सभी फिल्में समाज के उस सामंतवादी दृष्टिकोण को जरूर सामने रखती है जिससे स्त्री शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कमजोर है। उसका समय, ऊर्जा, विवेक, पितृसत्ता की दुभिसंधियों से लोहा लेने में ही व्यतीत हो जाता है। कई बार स्त्री स्वयं भी अपनी नियति दोयम दर्जा का ही होना स्वीकार कर लेती है। ऐसे में वह उस परंपरागत धारणा को पुष्ट करती है जिसमें वह अबला, कमजोर, मासूम, दीन-हीन, पापों से डरने वाली घर-गृहस्थी में वापस लौटने वाली, पति और बच्चों की क्रूरता भूल उन्हें पुचकारती महिमामयी  देवी है। एक प्रकार से यह एक ऐसा सामाजिक नैतिक दबाव है जो दूर तक स्त्री की पालतू कंडीशंड छवि को पुष्ट करता है यह पूरे समाज के साथ स्त्री को भी मैसेज देता है कि उसका कत्र्तव्य क्या है? उसे कैसे रहना है? ’मदर इंडिया’ हो या ’खून भरी मांग’ स्त्री का पूरा लौह वजूद पति-बच्चों और खानदानी मर्यादा को सुरक्षित रखने में त्यागमय व्यतीत हुआ। बदले में उसे क्या मिला ? आधुनिक स्त्री ने विभिन्न स्त्री-आंदोलनों द्वारा स्व चेतना की जागरूकता से सोचना शुरू किया तो वह चकित रह गयी। उसे मनुष्य योनि भी मिली है? उसकी अपनी इच्छायें भी हैं ? उसके सपने भी हंै ? वह विकलांग नहीं। न मन से न शरीर से। बल्कि यदि उचित शिक्षा और अवसर मिले तो वह पुरूषों से भी आगे जा सकती है। उस स्त्री ने अब स्वयं पर ध्यान देना शुरू किया और सबसे पहले यह घोषणा की कि, ’स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है।’
स्त्री की इस आधुनिक छवि को अभिव्यक्त करने वाली अनेक फिल्में बनी। जिनमें मिर्चमसाला, मोहरा, रूदाली, वाॅटर, चिंगारी, प्रोवोक्ड, डोर, पाच्र्ड आदि महत्वपूर्ण हैं। समाज में स्त्री की स्थिति को बताने वाली और ऐसी कंडीशंड स्थितियों से स्वयं स्त्रियों की बगावत उन फिल्मों का महत्वपूर्ण कथ्य है। स्त्री ने स्वयं को पहचाना और अपने मन, शरीर की आवाज को दबाने से इंकार कर दिया। उसके मन में भी इच्छायें है, सपने पलते हैं और उन सपनों को पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। दबाकर रखने वाले समाज और पुरूषों के व्यवहार के पाखंड को भलीभांति समझ कर अपनी शारीरिक, आर्थिक सबलता की ओर वह आकृष्ट हुयी।
‘लिप्सटिक अंडर माई बुर्का’ फिल्म स्त्री की इन्ही चाहतों की फिल्म है जो आर्थिक सबलता के बावजूद समाज के आदर्शीकरण के खिलाफ अपनी इच्छाओं को तरजी देने और स्त्री विमर्श के सूत्रों को बहुत आगे तक ले जाने में पूर्णतः सक्षम है। इस फिल्म को समीक्षकांे के कई स्टार मिले। कई अन्र्तराष्ट्रीय अवार्ड मिले लेकिन यह जानकर दुख और अचरज होता है कि भारत में संेसर बोर्ड ने उसे छह महीने तक ‘बैन्ड’ कर रखा। अधिकतर सिनेमाघरों में तो लगते ही बगैर नोटिस किये तुरंत उतार भी ली गयी। इतने वर्षो से मजबूत जडें जमाये रूढ़ियों, परम्पराओं और स्त्री विरोधी मानसिकता वाले समाज को ऐसी फिल्मों से भय क्यों लगता है यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। शीर्षक मनोरंजक जरूर लगा।लिप्स्टिक अंडर माई बुर्क़ा - एक दृष्टिकोण (प्रो. रूपा सिंह) 2 लेकिन किसी ने शायद ही ध्यान दिया कि बुर्का (परदा) जो सदियों से स्त्रियों को ढक-छिपकर रखने की वकालत करता है, उसमें आधुनिक प्रसाधन सामग्री लिप्सटिक का क्या काम ? क्या यह ऐसा प्रतीक है जो परंपराओं में इच्छाओं का जलता हुआ मशाल है ? जो स्त्रीमन में सदियां से दफन इच्छाओं, सपनों और मार दिये गये स्पंदनों की दहकती रोशनी लेकर आया है ? इस दहकन में दहकते हुये सवाल हैं। स्त्रियों के प्रश्न है दुनिया की सबसे अश्लील मानी जाने वाली सेक्स -इच्छा की डिमांड है। जी लेने की शर्तो की अपने र्की अनुकूल बना लेने की जदोजहद में इस फिल्म की चारों नायिकायें संलग्न होती है और अपनी दिलेरी से अपनी ताबूत के कीलों से भिड़ने की कोशिश करती है। फिल्म के सभी पात्र हमारे अड़ोस-पड़ोस की लडकियों/स्त्रियों के हैं जिन्हें ’उषा’ पढ़ती है, फिल्म निर्देशिका (अलंकृता श्रीवास्तव) सामने लाती है और ये चारों नायिकायें जीवित स्पंदनों के साथ हमारे सामने आ खड़ी होती है।
फिल्म में दो मुस्लिम युवा लड़की हैं। एक किशोरावस्था को पारकर अभी-अभी काॅलेज में प्रवेश लिया है। अपने साथियों के समान युवा सपनों को भरपूर जी लेना चाहती है। दकियानूसी, रूढिग्रस्त अब्बू, अम्मी के यहां सीलन से भरी अंधेरी कोठरी में सिलाई मशीन पर बुर्के सिलने के पुश्तैनी धंधे ने उसके सारे समय का पैबंदों से पाट रखा है लेकिन रात को धड़कते सपने जीवित होकर उसे खिडकी फलाँद कर नाइट-पार्टी, पब और मित्रों की डांस पार्टियों में लिये जाते हैं। अपनी भडकती चहकती इच्छाओं की पूर्ति के लिये वह अपने काले बुर्के का इस्तेमाल करती है और बाजार के बडे-बडे माॅल्स से सैंडल, लिप्सटिक, इत्र, मेकअप के अन्य सामान आसानी से चुराकर पार हो जाती है। ब्ब्ज्ट कैमरे के चक्कर में एकाध बार फंसती भी है तो मासूमियत भरी चालाकी से स्वयं को बचाकर भाग खडी होती है। निश्चित ही यह गलत है। लेकिन यह भी तो जायज सवाल है न कि किसने तय किया है उन मापदंडों को जिनसे इज्जत रखने की सारी दारोमदारी स्त्री के नाजुक कंधों पर डाल दी जाती है? एक दिन चोरी पकड़ी जाती है। खोजती पुलिस घर पहुंचती है और अब्बू, अम्मी की इज्जत को चूर-चूर कर देने वाली इस लडकी के लिये घर के दरवाजे बंद हो जाते हैं।
दूसरा चरित्र एक अन्य मुस्लिम स्त्री ‘शीरीन’ का है जिसका किरदार कोंकाणा सेन ने बखूबी निभाया है। इसके लिए उन्हें बेस्ट ऐक्टेªस के अवार्ड से नवाजा भी गया है। प्रतिभा से भरी मुस्कुराहट और उसे छिपा कर रखने की हिदायतों से बेबस होता उसका चेहरा मानो स्त्री को प्रतिभा देने की इतनी शर्मिन्दगी पर अल्लाहताला से बार-बार दुहायी मांगता है। न होती प्रतिभा, न सहने पड़ते इतने दुख। मोटी चमडी में दुखो के जखीरे का पता ही नहीं चलता। सचेत जागरूकता कितनी पीड़ा पहुंचाती है यह इस स्त्री के चेहरे और एक-एक अंग से टपकता है। मार्केटिंग सेल्स में उसकी कार्यकुशलता देख कुशल बिजनेस-वूमेन का खिताब मिलता है और आकर्षक वेतन सहित नौकरी का प्रस्ताव भी। लेकिन वह भयभीत है। फिल्म ‘भय और हिंसा’ का यह विमर्श सामने लाती है जिसका संकेत मनोवैज्ञानिक थियोडोर रीक (1888-1969) ने दिया था। पुरूष स्त्री के प्रति एक ईष्र्या-चक्र, शत्रुता और प्रतिक्रिया-संघटन की भावना से जुड़ा रहता है जिसमें प्रायः स्वयं से असंतुष्टि अन्य की आत्मतुष्टि के प्रति ईष्र्या, दुर्भावना जाग्रत करती है।’
शीरीन ऐसे पति (सुशांत सिंह) की पत्नी है जो दुबई में कार्यरत है। वह जब-जब भारत आता है दिन-रात उसके बदन को झंझोड़ता है और बार गर्भवती बना जाता है। उसके लिये वह मात्र एक देह है। बच्चों के सामने निहायत बेहूदगी के अंदाज में उनकी मां का वह अपमान करता रहता है। बिना ख्याल रखे ही निश्चित ही उन बच्चों में भी वही ंपंुसवादी मानसिकता का आरोपण होता चलेगा जिसमें एक दिन उन्हें पिता और पति बनकर स्त्री को निरंतर जलील करते जाना है। निश्चित ही वह परिवार को इतनी आर्थिक सहूलियतें भी देने में सक्षम नहीं जिससे स्त्री को घर-घर सेल्स-गर्ल का काम न करना पड़े। लेकिन इस स्किल में भी वह बेहद प्रतिभावान सिद्ध होती है और अपना एक रूतबा हासिल करती है। पति जब घर की इज्जत को मार्केटिंग बाजार की कुशल कर्मचारी की आइडेंटिटी में तब्दील होता देखता है तो ईष्र्या, भय और हिंसा से भरा उसका मर्दवाद उससे बदला लेने पर उतारू हो जाता है। जब चाहा खेल लिया जब चाहा सजा दे दी। पुरूष की उस मर्दवादी गुत्थी का मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन करते हुये भी वी.गीता ने लिखा था कि स्त्री के अन्याय होने के तथ्य से पति के भीतर डर और मनोविमुक्त का जन्म होता है। ये मनः स्थितियां अंततः सता की अभिव्यक्ति बन जाती है। स्त्री देह और अस्तित्व के नियंत्रित और नामांकित करने की इच्छा उसी सता के गर्भ से मर्दानगी के रूप में पैदा होती है। यह सत्ता दाम्पत्य के संसार का अपनी शर्तो पर विन्यास करती है जिसके तहत आतंक प्रेम का, डर काम का और आक्रामकता यौनानंद का पर्याय बन जाती है। रेप भी घरेलू हिंसा है इसे कौन समाज, कौन अदालत स्वीकारने को तैयार है? दुबई से लौटा उसका पति अपनी सत्तासीन मनःस्थितियों के अन्र्तगत उसका बलात्कार करता है। उसे इस प्रकार सजा देता है। इसके बाद भी लहुलुहान मन, दहशत से उबलती आंखे, जिस्म पर नीले खरोंच लिये वह घर की देहरी से बाहर धकेल दी जाती है।
उसकी युवा पड़ोसन ‘लीला’ (आहाना कुमार) बिंदास है। घर में पिता, भाई, पुत्र जैसे मर्दो की चैकस निगाहों से अलग मां के साथ रहती है। मां भी अपने आर्थिक संबल के लिये अपने शरीर का ही सहारा लेती है। स्त्री-शरीर कई मायनों में आमदनी का जरिया भी है। वह न्यूड माॅडल है जिसे घंटो नंगी बैठाकर चित्रकार अपनी कलाये गढते हैं। मां पैसे और परिवार की कीमत जानती है। मां, बेटी को बार-बार चेताती है कि समाज में सम्मान से रहने के लिये एक अदद कमाता खाता पीता पति और परिवार आवश्यक है। युवा पुत्री का अफेयर एक फोटोग्राफर (मुकेश आदित्य) से है। वह उसके साथ विवाह-समारोहों में इवेंट फोटोग्राफर के रूप में अपने भविष्य के सपनों में मशगूल है। दोनों एक दूसरे को प्रेम करते है लेकिन मां की हिदायतों और अपनी जिंदगी का सुरक्षित आश्वासन उसे एक अन्य सुसंस्कृत अमीर मंगेतर से प्राप्त होता है। मां की मर्जी पर वह घुटने तो टेक देती है। लेकिन मन भी छटपटाता है, तन भी। सगाई के बाद भी वह फोटोग्राफर की ओर ख्ंिाचती है। फोटोग्राफर उसे भाग चलने की पेशकश देता है। वह तैयार भी हो जाती है लेकिन ऐन वक्त पर फोटोग्राफर उसे धोखा देता है। किसी और के साथ वह घनिष्ट हो रहा है। सवाल जवाब के लिये वह उसके पास पहुंचती है और पुराने स्नेह-बंधन की तरलता में बहकर उसी संसर्ग की कामना करती है। जिसे ’प्रेम’ का नाम देकर दोनों भरपूर इज्जाॅय करते थे। उसकी मंगनी, उसके आत्म-निर्णय पर बौखलाया और बेइज्जत महसूस करने वाला यह फोटोग्राफर इतना नृशंस हो उठता है कि उसे धक्का देकर न केवल कमरे से बाहर धकेल देता है बल्कि उस अन्तरंग कामना का भरपूर तिरस्कार करता है। रंडी, वेश्या या ’गली की कुतिया’ जैसे विशेषणों से स्त्री की सेक्स इच्छा को लांछनीय और अवांछित घोषित करता, वह उसे घसीटता बाहर धकेल देता है और अपने कमरे के पट बंद कर लेता है। कुमकुम संगारी ने लिखा है पुरूष के समान स्त्री की सेक्स-इच्छा को उसके आत्म का भाव नहीं माना जाता। सच है कि स्त्री तमाम उम्र सेक्स को प्रेम की भंगिमा मान भ्रमित रहती है और पुरूष के लिये मात्र सेक्स तक पहुंचना ही उसके तमाम भावात्मक प्रदर्शन का कारण बनता है। कमरे से धक्का खाकर निकलते हुये उसका मंगेतर उसे देख लेता है और भूलवश छूट गये उसके फोन से उसके तमाम ैडै डडै देख उसके मंुह पर  फोन मारकर चल देता है। उसे साफ-सुथरी, नैतिक, आदर्श स्त्री की चाह है जो न केवल कुंवारी हो, बल्कि जिसके मन में आने वाला प्रथम पुरूष भी वही हो।
चैथी स्त्री है ’उषा’ (रत्नाशाह)। जो पढ़ती है किताबें और जीवन को जिंदा नजरों से देखती है। यह पढ़ना वैचारिक विमर्श के लिये नहीं है और वैसे भी स्त्रियों की शिक्षा, पढने-पढाने को लेकर इतने अवरोध हैं कि छोटे शहरों की छोटी गलियो की स्त्रियां या तो ‘बाला बोधिनी’ सरीखी नैतिक कत्र्तव्यों से भरपुर पुस्तकंे पढे़ं या गीता रामायण जैसी धार्मिक पुस्तकें। अन्य कोई विकल्प नही। पति की जवान मृत्यु के पश्चात लीला ने विवाह नहीं किया है और एक बडे़ माकान में बंधु-बांधवों के साथ शादियों की इवेंट-मैनेजमेंट संभालती है।
यहां यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इस फिल्म के चारों स्त्री किरदार आर्थिक रूप से स्वावलंबी हंै लेकिन इसके बावजूद एक को भी अपने मन से जीने की छूट नहीं है। अपने-अपने कार्य-क्षत्रों में महारथी होने के बावजूद उनकी उस निपुणता का घर में कोई सम्मान नहीं है। उनके ’इटैलेक्चुअल्स’ की साफ नकार है।  उषा ‘बुआजी’ के रूप में समादृत हैं। उम्र 55 वर्ष। दौलतमंद। स्वाभिमानी। लेकिन इच्छायें अतृप्त। क्या कीजे उस परिवेश का जहाँ पत्नी की मृत्यु के तेरह दिन बाद पुरूष के लिये स्त्री का बन्दोबस्त हो जाता है। विवाह न होने की दशा में कभी किसी स्त्री केे साथ पकडे़ जाने पर ’बेचारा क्या करे’ कहकर जो माफी उसी समाज में सहज ही प्राप्य है। वह भला स्त्री के लिये ऐसी उदारता कहाँ से लाये ?
रेलवे स्टेशनों पर, बस-स्टैंड की पटरियों पर मिलने वाले खुदरा सेक्सी (इरोटिक लिटरेचर) किताबें, यथा ’रचना की रासलीला’, पडोस वाला लड़का, जलती जवानी, इहकते बदन जैसे शीर्षक और मजमून वाली पतली किताबें वह रस ले-लेकर पढती है और जाहिर है उसी फैंटेसी में डूबती भी है। विधवा होने के बाद अपने स्त्रीत्व की आध्यात्मिकता को मेन्टेन रखने के लिये वह यह पतनशील अध्ययन धार्मिक गुटकों के आवरण तले करती है। समाज में सम्मानित, सत्संगी या अधेड़, विधवा किसी दिन अचानक किसी बच्चे को डूबने से बचाने के लिये अकबका कर स्वीमिंग पुल में कूद जाती है। युवा स्वीमिंग टेªनर किसी प्रकार उसे बचाकर लाता है और विभिन्न शारीरिक मुद्राओं की मदद से उसकी सांसे दुरूस्त करने में मदद करता है। यहाँ से शुरू होनी है अनछुयी, कामनाओं के फिर से जीवंत होने की कहानी जो अब तक फैंटंसियो में गुम थी। सोये पडे़ अंगों की हरारत जग पड़ती है। टेªनर के कहने पर कि वह भी स्वीमिंग सीख सकती है, कई दमित वासनायें उसमें फन काढ़ने लगती है। यहां एक और प्रसंग का जिक्र महत्वपूर्ण है जब टेªनर द्वारा नाम पूछने पर वह हडबड़ाकर कहती है- ’बुआजी’। नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामा की मंजी हुयी अभिनेत्री ’रत्नाशाह’ ने यह रोल निभाया है और अपने लाजवाब अभिनय से अपना नाम ’बुआजी’ बताकर दूर तक स्त्री की उस पीड़ा का विस्तार किया है जिससे स्त्री का अवचेतन तक पितृसत्ता दिये गये विशेषण को ऐसे धारित करता है कि वह स्वयं अपना नाम तक उच्चरित करना भूल जाती है। किसी न किसी रिश्ते में बंधी वह वस्तु मात्र है। उसका अपना नाम तक नहीं। वह एक खोयी हुयी अस्मिता है। स्वयं भी कोई इच्छा करने से डरती है। जाने कितनी सदियों से दमित है ? जाने कितना डराया गया है? लीला चोरी-छुपे स्वीमिंग डेªस खरीदने जाती है। टेªनर ने उसे आश्वस्त किया है कि स्वीमिंग वह भी सीख सकती है। ज्ञान भी तो आनंद है। दो दुर्निवार आकर्षणों में फंसी स्वीमिंग डेªस खरीदने में उसकी पुरातनता और आधुनिकता का द्वन्द्व देखने योग्य है। वहां सेल्स गर्ल की नौकरी निभाने वाली कोंकाणा सेन उसे देखती है और दुविधा ग्रस्त,डरी सहमी रत्ना शाह से सामान्य व्यवहार करती हुई उसे स्वीमिंग डेªस खरीदने में मदद करती है। स्त्री ही समझती है स्त्री-संसार के दुखों को। उसके मन को। यही ‘सिस्टर-हुड’ है।
चोरी-छुपे स्वीमिंग डेªस खरीदना, स्वीमिंग के लिये न न करते हुये टेªनर की चैड़ी छाती से लग जाना, उसकी गोद में आश्वस्ति से दुबक कर पानी से बाहर निकलना और उन अधकचरी किताबों का सच्चा-कच्चा रस घोल घोल कर पीना अब ’उषा’ की जिंदगी का सुनहरा अध्याय है। रचनात्मक जीवन को समृद्ध करने के लिये सपने और कल्पनायें कितने पोषक तत्व हैं लेकिन जब उन्हें दमित किया जाता है तो यह किन्ही और रास्तों से विस्फोट की मानिंद बाहर निकलते है जिसमें निश्चित ही समाज और जीवन दोनों में विकृतियां आ सकती हैं। यह स्त्री अपनी अधूरी कामनाओं के वशीभूत हो अपनी उम्र, पद, सामाजिक हैसियत सबको बिसरा कर आधी-आधी रात को उस टेªनर से फोन पर बाते करती है। अपने को गुमनाम रखते हुये वह अपने प्रेम का इजहार करती है। टेªनर पहले तो अचंभित होता है लेकिन बाद में अपनी एक युवा स्वीमिंग शिष्या ’कोमल’ की उम्मीद में उससे जुड़ जाता है। दोनों तरफ अग्नि की ज्वाला। रात का आधा पहर। यौन-रस में डूबी कहानियां जिन्हें फुसफुसाते मद भरे होंठ। चलता है उत्तेजना का लंबा दौर और दूरियों की यह विवशता फोन सेक्स में परिवर्तित हो जाती है। एक-एक क्रियाओं को स्त्री महसूसना चाहती है और अपने तन से कपड़े दूर करती जाती है।
फिल्म का अंत इन चारों स्त्रियों के सामाजिक बहिष्कार और मार-कुटाई से होता है। स्त्री के लिये अब तक आधुनिक न हो सकने वाले समान में ये आधुनिक संजाल कैसे सहे जायेंगे ? अब्बू, खाविंद, फोटोग्राफर और मंगेतर की करतूतों से जख्मी मंगेतर द्वारा जख्मी, प्रताड़ित, निष्कासित तीनों स्त्रियां उस चैथी स्त्री का बुरी तरह बेइज्जत होना देखती है। ’उषा’ अपने घर के लोगों द्वारा सामान सहित उसी घूरे पर फेंक दी जाती है। भांडा फूटा है उसके रंगीन किस्सों वाली उस किताब से जो किसी तरह उस ट्रेनर के हाथ लग चुकी। उसी के किस्से बयान करती वह मादक, सेंसुअस ड्रीम में खुद भी जाती थी, उसे भी ले जाती थी। ‘बूढ़ी, अधेड़, कुतिया अपनी शक्ल नही ंतो उम्र ही देख लिया होता’- असफल शिकारी का आहत हृदय बेइज्जती का चाबुक धाड-धाड उस मन पर कोडे बरसाता है जहां इच्छायें वास करती हं।ै उम्र से परे लिंग से परे। जेंडर से परे। हृदय की इच्छायें। सत्संग की उम्र में ’व्यभिचार’ की कल्पना करने वाली ’बुआजी’ की अब तक की कुर्बानियों को एक बार भी घरवाले याद नहीं करते और गंदी गालियां देते हुये सामान सहित उसे उठाकर बाहर सड़क पर फेंक देते है जैसे वह किसी कचरे का ढेर हो और उनसे आस-पास के निर्मल वातावरण के प्रदूषित होकर किसी संक्रामक रोग के खतरनाक सायरन बज उठने का भय फैल रहा हो।  लैम्पपोस्ट पर घर से बाहर निकाल दी गयी बाकी तीन स्त्रियां उसे उठाती हैं, सहारा देती हैं और कैमरा उन चारों स्त्रियों के दारूण चेहरे पर आकर टिक जाता है।
मनुष्य को अंतरंगता का दिलासा चाहिये। विवाह, परिवार इत्यादि संस्थाओं की आवश्यकता मनुष्य को इसीलिये तो है क्योंकि वह सामाजिक प्राणी है। उसे अंतरंगता चाहिये। उसी अंतरंगता की तलाश में पुरूष अपने कार्य-क्षेत्र से जुड़ता है। बाहर की दुनिया से जुड़ता है और फिर घर-परिवार से। स्त्री की अन्तरंगता घर-परिवार से ही शुरू होती है। उसका अपना आपा कुछ नहीं। घर-परिवार को बचाने के लिये वह आत्म-त्याग करती है। अपना नाम तक भूल जाती है लेकिन मारपीट, बलात्कार, बेइज्जती और गृह-निष्कासन के सिवा उसे क्या प्राप्त होता है ?
यह फिल्म अंतरंगता के एक महत्वपूर्ण डिस्कोर्स को सामने लाती है। अब तक के विमर्शो में ‘सिस्टर-हुड’ या ’बहनापा’ प्रमुख था जो स्त्री, स्त्री के बीच दुखों की सहजानुभूति है। एक दूसरे को समझ पाने की संतुष्टि है। यह फिल्म उससे आगे बढकर ’सेल्फ डिस्क्लेसिंग इंटीमेसी’ का विमर्श सामने रखती है जिसका अन्र्तपाठ गूंजता है कि पहले की तरह चुपचाप पारिवारिक जीवन जीने या जेण्डर अस्मिताओं के सहारे रहने से अब काम नहीं चलने वाला है। अब उन्हें अपनी इयत्ता का कहीं अधिक आत्मसचेत आख्यान गढ़ना होगा। फिल्म को लिखने वाली एक स्त्री ही है। जैसा कि जाॅन स्टूअर्ट मिल ने कहा था- ‘स्त्री अपने बारे में क्या सोचती है, क्या चाहती है, जब तक वह स्वयं नहीं कह डालेगी तब तक उसके सत्य को कोई नहीं जान पायेगा।’ इस रूप में लेखिका ने इस फिल्म के माध्यम से न केवल स्त्री का सामान्य समस्याओं दैनंदिन की चाहतों और सपनों को जुबां दी है बल्कि स्त्री-विमर्श के उन अध्याओं के अन्तर्पाठ को प्रस्तुत किया है जिसमंे उससे पहले ’डोर’ और ’पाच्र्ड’ जैसी फिल्में बन चुकी थीं। आधुनिकता का सह संबंध यहां उत्तर आधुनिकता के संजाल में ज्ञान के सह-संबंध के रूप में उभारा गया है। हो सकता है कईयांे को इसमें स्त्री देह की प्रमुखता या उसकी पूर्ति की मांग ही केन्द्रीय भाव लगे लेकिन उन चीखों और चीत्कारों पर ध्यान देना लाजिमी है जिसमें स्त्री आजिज आकर सवाल करती है- आखिर हमारी आजादी से आप इतना डरते क्यूं है ?
फिल्म के अन्तिम दृश्य में चारों स्त्रियों के चेहरे और आंखों पर कैमरा घूमता है। चारों तरफ अंधकार है। वे एक लैम्प पोस्ट की मद्धिम रोशनी से टिककर बैठी हैं। पस्त हंै, लेकिन उदास नहीं। उनके पास प्रश्न नहीं है लेकिन वे जवाबों से घिरी है। सबसे बड़ी स्त्री की आवाज गूंजती है अपनी फटी किताब को अपने सीने से चिपकाते हुये-हम सपने तो देखते है। हममें हौसला तो है। हम अपनी जिंदगी जीयेंगे। चारों की नजरें मिलती है। एक समतामूलक और लोकतांत्रिक जमीन की तलाश का नया अध्याय खुलता नजर आता है।
स्त्री पक्ष की उतनी सशक्त फिल्म छह महीने के लिये भारत में सेंसर बोर्ड द्वारा रोक कर दी गयी थी यह खबर इसके विस्फोटक होने के सबूत में इजाफा ही करती है। आखिर पितृसत्तात्मक समाज को स्त्री द्वारा लिखी स्त्री द्वारा बनायी, स्त्रियों पर आधारित इस फिल्म से इतना भय क्यूं लगा? क्या कोई पिरामिडी ढाँचा के ढह जाने का खतरा तो उनमें पैदा नहीं हो गया।
घोर विवादि इस फिल्म को भारत से बाहर खूब सम्मान मिला। यह फिल्म न्यूयार्क में भारतीय फिल्मों की शृंखला में पहली फिल्म के रूप में दिखायी गयी थी। वांशिगटन इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखायी गयी यह फिल्म टोकियो इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2016 में ‘विनर ऑफ़ द स्प्रिट ऑफ़ एशिया अवार्ड’ के लिए चुनी गयी।
लिप्स्टिक अंडर माई बुर्क़ा - एक दृष्टिकोण (प्रो. रूपा सिंह) 3
डॉ. रूपा सिंह, संपर्कः rupasingh17342@gmail.com

3 टिप्पणी

  1. प्रोफेसर सुश्री रूपा सिंह ने ‘लिप्स्टिक अंडर माई बुर्क़ा…’ के माध्‍यम से स्‍त्री की विवशता को उकेरा है। छोटे शहरों में कमोबेश यह स्‍थति है, पर बड़े शहरों की महिलाएं इस स्‍थिति से कुछ हद तक उबर चुकी हैं। फैशन करना और अपने सपने पूरा करना हर नारी का उद्येश्‍य है पर समाज को यह स्‍वीकार्य नहीं है। पुरुषप्रधान समाज उसे स्‍वीकारेे भी कैसे, इससे उसका अहम् आहित नहीं होगा।
    फिर भी रूपा ने इस फिल्‍म के माध्‍यम से नारी स्‍थिति को उजागर करने की कोशिश की है, वह प्रसंशनीय हैैै। वांशिगटन इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखायी गयी यह फिल्म टोकियो इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टिवल 2016 में ‘विनर ऑफ़ द स्प्रिट ऑफ़ एशिया अवार्ड’ के लिए चुनी गयी है। इसफिल्‍म के निर्माता बधाई के पात्र हैं।

  2. बेहद अच्छी प्रतिक्रिया, आज शाम की ही देखती हूँ इस फ़िल्म को। धन्यवाद।

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