मगन लाल जी का मन आज बहुत विचलित था। बहुत दिन हो गये थे बहन,बहन दामाद और ,भाँजे-भाँजियों से मिले हुए। एक ही शहर में रहते हुए इस कोरोना महामारी के चलते हुए लॉकडाऊन ने इतना मजबूर कर दिया था कि रिश्तेदारों का मुँह देखना भी मुहाल हो गया था।  गहरी सोच और चिंता में डूबे  मगनलाल जी अपने पुराने दिन याद करने लगे। पैतालीस साल पहले पिता की  अचानक टीबी से मृत्यु के बाद  जब गाँव छोड़कर और गाँव से सब कुछ समेट कर इस शहर में आये थे तो जिम्मेदारियों के सिवा कुछ भी तो नहीं था पास में। गाँव में जो कुछ था वह तो पिताजी की बिमारी के चलते पहले ही दवा और डॉक्टरों की भेंट चढ़ चुका था। इस कठिन परिस्थिति और दुखों को न झेल पाने के कारण माँ पहले ही चल  बसी थी। अब सर पर पत्नि, दो छोटे बच्चे और पन्द्रह साल की बहन रत्ना की जिम्मेदारी  थी  और  हाथ में कुछ बर्तन, पत्नि के कुछ छोटे मोटे सुहाग के जेवर जिसके सहारे जिन्दगी की नई शुरुआत कैसे करनी है यह भी नहीं सूझता था। हाँ  पत्नि यशोदा जरूर इस दौर में भी उनकी हिम्मत बँधाते रहती और ढाँढ़स देती रहती कि ‘जब अच्छे दिन नहीं रहे तो बुरे दिन भी हमेशा नहीं रहेंगे। कान में पिताजी के अंतिम शब्द भी गूँजते हुए हिम्मत देते  रहते कि ‘बेटा  अब तुम्हें ही सब संभालना है ,हिम्मत और लगन से काम लेना,रत्ना का ख्याल रखना ये अब तुम्हारी जिम्मेदारी है, कोशिश करना कि इसे कभी कोई तकलीफ न पहुँचे,अच्छे घर में इसकी शादी करना।’
            उन्होंने भी तो पिताजी को इस बात का भरोसा दिलाया था।वाकई दिन पलटे थे, पत्नि की हिम्मत और प्रोत्साहन के बाद उसके बचे खुचे जेवर बेचकर घर – घर डबलरोटी और बेकरी का सामान बेचने की मेहनत इतनी रंग लाई थी कि आज उनकी गिनती शहर के बड़े किराना व्यापारियों में होती थी। उन्हे खुशी थी कि अपनी मेहनत और लगन के बल पर कमाये धन और नाम के कारण रत्ना की शादी स्टील कारोबार से जुड़े बड़े कारोबारी और प्रतिष्ठित परिवार में शान शौकत के साथ करने में सफल हुए। मगनलाल जी ने सोचा कि  रत्ना और उसके खुशहाल परिवार को देखकर माँ-पिताजी की आत्मा जरूर प्रसन्न होगी।  ‘अजी तुम तो रत्ना जीजी के यहाँ जाने वाले थे न बैठे- बैठे क्या सोच रहे हो।’ यशोदा की आवाज से मगनलाल जी तन्द्रा टूटी , नम हो आई आँखो को कमीज की बाँह से पोंछते हुए रत्ना के यहाँ ले जाने के लिए पत्नि द्वारा साथ रखे सामानों को सहेजने में लग गये। इस बीच  घर के बगीचे के पपीता, कच्चे आम,घर के बने आटे के लड्डू, और न जाने क्या क्या यशोदा ने जोड़ दिया था कुछ रत्ना की पसंद के,कुछ दामाद जी और कुछ भाँजे-भाँजियों की पसंद का।  यशोदा को कुछ कह पाते तभी मगनलाल जी  को हल्की खाँसी का एक दौरा उठा ,कमीज की बाँह से मुँह ढ़ँकते हुए उन्होने प्यार भरे गुस्से से यशोदा को देखा और उसे छेड़ते हुए बोले –‘मैंने तो तुम्हें पहले ही कहा था न ये लस्सी वगैरह का चाव अभी रहने दो,मौसम अभी बदल ही रहा है और मुझे ठण्डी चीजें अधिक ‘सूट’ भी  नहीं करती लो हो गई ना ये खाँसी। अभी ही होना था इस कलमुँही खाँसी को।’
‘ ओ हो हो… बात का बतंगड़ बनाना तो कोई तुमसे सीखे,वैसे भी डॉ. मिश्रा चेक कर चुके हैं और बता चुके हैं यूँ ही मौसमी सर्दी खाँसी है,गरम पानी ,  अदरक वाली चाय पियो  एक दो दिन में ठीक हो जायेगी लेकिन तुम तो उस लस्सी के पीछे ही पड़े हुए हो। तुम्हे तो मुझे दोषी ठहराने का कोई बहाना होना चाहिए बस।’  –हँसते हुए यशोदा ने जवाब दिया तो मगनलाल जी भी मुस्कुराने लगे।
     इस हँसी मजाक के बीच  और खाँसी का एक हल्का ठसका फिर लगा और  मगनलाल जी पत्नि के जोड़े हुए सामान सहेजने लगे, सब कुछ समेट कर अपनी पुरानी और प्यारी मारूति 800 में बैठकर निकल गये थे मगनलाल जी  शहर के  एक छोर में दस पन्द्रह किलोमीटर दूर बसे रामनगर की ओर। बहुत ही पॉश कॉलोनी थी सारे मकान   कई –  कई मंजिलो के थे, और हो भी क्यों न  आखिर शहर के अधिकाँश बड़े लोग इसी कॉलोनी में ही तो रहते थे । बस अब कुछ दूर ही रह गया था रामनगर कि अचानक स्कूटी पर शहर की ओर जाता हुआ  छोटा भाँजा मनोज उन्हे दिख गया।  मनोज ने भी उन्हे देख लिया था मगनलाल जी ने एक किनारे  कार रोक  ली ,मनोज भी समीप आ गया था।  ‘कहाँ जा रहे हो बेटा, मैं तो तुम्ही लोगों से ऊँहूँ ऊँहूँ  तुम्ही  –उहूँ,उहूँ  … मैं तो तुम्ही लोगों से मिलने  जा रहा था।’ खाँसी को मुँह में दबाते हुए मगनलाल जी ने अपनी बात पूरी की।
    मनोज ने दूर से ही प्रणाम करने का इशारा किया और बताया कि ‘शहर से कुछ जरूरी सामान लेने जा रहा हूँ बस थोड़ी देर में वापस आता हूँ वर्ना दूकानें बंद हो जायेंगी।’  मगनलाल जी ने सहमति में सिर हिलाया और पूछा -‘वैसे घर में सब लोग कुशल से तो हैं ना’
 -‘हाँ हाँ सभी लोग बिल्कुल ठीक हैं। सुबह से रामधन आ जाता है नाश्ता-खाना बना देता है  अब तो रोज एक से एक डिश तैयार करके अपना हुनर दिखाते रहता है। दुलारी,मानो,लता, रामू , छन्नो और गुड़िया भी अपने समय में आकर सब काम निपटा जाते हैं किसी बात की कोई चिंता फिकर नही है।’ मनोज की बातों से मगनलाल जी को बड़ी निश्चिंतता हुई अपने ऊपर गर्व भी हुआ कि कैसे  अच्छे और हँसते – खेलते घर  में उन्होंने बहन का ब्याह किया है।  उऊहूँ, ऊहूँ… खाँसी को अपनी कमीज की बाँह से दबाते हुए उन्होने मनोज को जल्दी घर लौटने का ईशारा किया और कार रामनगर की ओर बढ़ा दी। बस दो तीन मिनट के बाद ही उनकी कार  कॉलोनी के बड़े से गेट के सामने खड़ी थी।
        दरबान ने ईशारे से उन्हे रोका  और पूछा ‘ कहाँ जाना है? किनसे मिलना है?’ मगनलाल जी ने एक बार खँखारा और गर्व भरी मुस्कुराहट के साथ बताया – ‘बंगला नम्बर ग्यारह , रोहित जी के घर,मेरे दामाद हैं वो’
 ‘अच्छा तो आप मगनलाल जी हैं। ‘ दरबान ने जैसे ही कहा तो मगनलाल जी की बाँछे खिल गई, जरूर मनोज ने मेरे पहुँचने से पहले ही घर में और गेट में फोन कर दिया है। गर्व से एक बार फिर मगनलाल जी का चेहरा खिल गया,उन्होने गर्व और हर्षमिश्रित नजरों से एक बार फिर दरबान को देखा।
–‘वो क्या है कि ग्यारह नम्बर वाली रत्ना मैडम जी का अभी अभी  गेट पर फोन आया है कि आप उनसे मिलने आ रहे हैं ।’ दरबान ने बताया।बात पूरी करते हुए दरबान ने आगे कहा—‘उन्होंने कहा है कि आपको खाँसी जैसी कुछ हो रही है तो आपको अंदर मत आने देना वो क्या है ‘कोरोना’ का दौर है ना तो थोड़ा सावधानी रखनी पड़ेगी । ‘ — ‘माफ करेंगे बाबूजी, आप यहीं से लौट जाईये , उन्होने आपको अ़दर भेजने के लिए मना किया हुआ है।अब हम लोग तो ठहरे नौकर, मालिक जैसा कहते हैं वैसा ही करना पड़ता है ना,  कृपया बुरा नहीं मानेंगें।’
मगनलाल जी जैसे आसमान से जमीन पे गिरे हों भौचक्के,  हतप्रभ।एकाएक कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे आँख के आगे अँधेरा सा छा रहा था ,कानों पर  भरोसा नहीं हो रहा था कि जो कुछ सुन रहे हैं वह कहने के लिए रत्ना ने ही कहा  है। रत्ना ने कहलवाया है यह,जिस घर में इस कोरोना के दौर में भी छैः सात घरेलू नौकरों के आने जाने पर मनाही नहीं है उसी घर में खुद के भाई के आने की मनाही।  आँखे भर आई थी मगनलाल जी की। अचानक बीमार से लगने लगे थे, थोड़ी देर आँखे बंद किये कार में ही बैठे रहे  फिर जैसे तैसे खुद को संभाला और कार की पिछली सीट पर रखे हुए सारे सामान को  काँपते हाथों से उठाकर दरबान को देते हुए बोले -‘कोई बात नहीं भाई तुम्हे तो अपनी ड्यूटी करनी ही है,मेरा एक काम करना ये सारा सामान ग्यारह नम्बर वाली कोठी में पहुँचा देना कहना मगनलाल जी दे गये हैं,  इसमें  मेरे भाँजे मनोज की पसंद के कच्चे आम, मेरे बहन दामाद रोहित जी को बेहद पसंद आटे के लड्डू और घर के पपीते हैं,घर के और लोगों के पसंद की और भी छोटी – मोटी सी चीजें हैं।’
       –‘ना बाबूजी ना  रत्ना मैडम ने यह भी कहा है कि यदि आप कुछ सामान दें तो उसे भी नहीं लेना है क्योंकि ‘ आजकल ‘कोरोना’का बड़ा प्रकोप है। उन्होंने बताया है कि ‘कोरोना’   का वायरस तो सामान के साथ भी आ जाता है । माफ करना बाबूजी मैं ये सामान मैं  नहीं ले सकूँगा। ‘
–    अब तो मगनलाल जी की रही सही हिम्मत भी टूट चुकी थी,  सिर निढा़ल होकर कार की स्टीयरिंग व्हील पर टिक गया था।आँख से छल छल आँसू बहने लगे और फूट फूटकर रोने लगे ,जो कुछ सुन रहे थे उसपर विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन विश्वास नहीं करने का भी कोई कारण नहीं था। खाँसी का एक तेज ठसका इस बीच उन्हें लगा । स्टीयरिंग से सिर  उठाते हुए उन्होने बेबस नजर से  दरबान की ओर देखा। दरबान की दया और सहानुभूति भरी नजर भी उनकी ओर ही टिकी हुई थी।
            फिर एक नजर कॉलोनी के गेट से दूर ग्यारह नम्बर बँगले की ओर उन्होने देखा  उन्हें लगा कि अभी अभी ग्यारह नम्बर की कोठी की बॉल्कनी में खड़ा हुआ कोई व्यक्ति तेजी से अंदर की ओर गया है फिर उन्होने खुद को समझाया कि नहीं वहाँ कोई नहीं था  जरूर उन्हें भ्रम हुआ होगा। एक नजर घर से लाये हुए सामानों की ओर देखा जो कार की सीट पर ही रखे हुए थे। उन्ही की तरह रूँआसे और  उदास। मगनलाल जी ने इग्निशन में काँपते हाथों से चाबी घुमाई,गाड़ी स्टार्ट की और वापस घर जाने के लिए मुड़ गये। अनेक विचार,अनेक यादें,जेहन में उमड़ घुमड़ रही थीं। ‘यशोदा को क्या कहेंगे,बच्चों को क्या बतायेंगे, बुआ ने क्या भेजा पूछेंगे तो क्या दिखायेंगे?’
    मगनलाल जी को लग रहा था कि जीवन की कड़ी से कड़ी परिस्थिति में वे इतना नहीं टूटे थे जितना आज।  क्या कोई महामारी  शरीर के अलावा रिश्तों को भी इतना बीमार कर देती है।तन की  बिमारी का तो फिर भी  डॉ. मिश्रा कुछ न कुछ ईलाज कर ही देंगे पर इन बीमार रिश्तों का ईलाज कैसे होगा। ये ‘कोरोना’तो आज है कल चला ही जायेगा, शरीर किसी न किसी तरह इस वायरस से लड़ ही लेगा, लेकिन रिश्तों की बुनियाद में स्वार्थ और डर का जो वायरस घुस गया है उससे कौन लड़ेगा  कैसे लड़ेगा और कब तक लड़ेगा।

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