Thursday, August 6, 2026
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क्लासिक पुस्तकों का भविष्य..

बहुत बार ऐसा हुआ है कि मैंने कोई उपन्यास, कहानी या ग्रंथ पढ़ा और मुझे महसूस हुआ कि यह कृति मैंने क्यों नहीं लिखी!… कभी ऐसा भी चाहा कि किसी किताब का अंत बदल दिया जाए… हर काल की अपनी मान्यताएँ होती हैं… मुझे पुरानी मान्यताएँ पसंद नहीं हैं, इसलिए मैं पुरानी रचनाओं को दोबारा ठीक करके अपने हिसाब से लिखूँ।

अभी हाल ही में वाशिंगटन पोस्ट की एक ख़बर ने मुझे लगभग चौंका ही दिया, जब मैंने पढ़ा कि जो मैं सोच रहा हूँ, एआई यानी कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वह कर रही है। अमेरिका में तो इसकी रिपोर्टिंग हो भी रही है… क्या भारत में भी ऐसा कुछ हो रहा है या फिर होने वाला है?… विषय चिंता बढ़ाने वाला तो अवश्य ही है।

आम तौर पर किताबें दो तरह से अच्छी लगती हैं… एक तो वे पढ़ने पर आनंद देती हैं और ज्ञानवर्धन करती हैं… दूसरे, वे घर की शेल्फ़ पर रखी आँखों को एक अलग तरह का सुख प्रदान करती हैं। मगर ऐसी भावनाएँ केवल एक आम इंसान के दिलो-दिमाग़ में उत्पन्न होती हैं। एआई कंपनियाँ इससे बिल्कुल अलग ढंग से सोचती हैं। ज़ाहिर है कि मशीन तो इंसान से अलग ही सोचेगी। मगर यदि उस मशीन के मालिक खलनायक बन जाएँ, तो मशीन तो पूरी तरह से विध्वंसक बन जाएगी।

जब से सोशल मीडिया और किंडल बुक्स लोकप्रिय हुए हैं, किताबों के प्रति मोह या भावनात्मक लगाव बहुत कम होता जा रहा है। आज का युवा टेलीफ़ोन या आईपैड पर किताबें पढ़ना पसंद करता है। तथाकथित जेन ज़ी एक अलग किस्म की भाषा का विकास कर रहा है। और क्लासिक किताबें पढ़ने के प्रति तो उन्हें अधिक लगाव है ही नहीं। हो सकता है कि यह संपादकीय उन्हें उन क्लासिक पुस्तकों का ही आभास दे, जिन पुस्तकों के बारे में अब बात होने जा रही है।

हुआ कुछ यूँ है कि एआई की कुछ कंपनियाँ लाखों पुरानी, दुर्लभ किताबें ख़रीद रही हैं, जिनका पुनर्प्रकाशन होने की संभावना नहीं है। उनका उद्देश्य भाषाई मॉडल को प्रशिक्षण देना है और वे इन किताबों की बाइंडिंग को काटकर अलग कर देती हैं। फिर उन्हें तेज़ गति की स्कैनिंग मशीनों से स्कैन किया जाता है और मूल पुस्तक का गूदा बनाकर उन्हें नष्ट कर दिया जाता है।

हाल ही में कनाडा की डिजिटाइज़ेशन कंपनी ए.बी. टेक सॉल्यूशन्स से मिले एक वीडियो फुटेज में यह प्रक्रिया दिखाई गई है, जिसमें स्कैनिंग की तैयारी के लिए अनगिनत किताबों की बाइंडिंग को व्यवस्थित तरीके से काट दिया गया, जिससे वे पढ़ने वालों के लिए लगभग बेकार हो गईं।

शायद इस ट्रेंड का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यूरोप और अमेरिका में किताब बेचने वालों का कहना है कि उन्हें दुर्लभ, ख़ास और अब दोबारा न छापी जाने वाली किताबों के लिए बड़ी संख्या में असामान्य ऑर्डर मिल रहे हैं। इससे यह चिंता पैदा हो रही है कि इनमें से कुछ किताबें शायद बुक-शेल्फ़ से पूरी तरह गायब हो सकती हैं।

एक छोटे किताब विक्रेता ने इस प्रक्रिया के बारे में विस्तार से बताया है कि यह काम किस बड़े पैमाने पर हो रहा है। उस किताब विक्रेता के अनुसार, पहले वह हफ़्ते में लगभग 20 किताबें बेचते थे, लेकिन अब सैकड़ों बिक रही हैं, विशेष तौर पर ऐसी किताबें, जो आसानी से नहीं मिलतीं या जिनकी छपाई बंद हो चुकी है।

लगभग ख़ुश होते हुए किताब विक्रेता ने आगे कहा, “इससे मुझे आर्थिक फ़ायदा तो होता ही है, साथ ही पुराना स्टॉक भी निकल जाता है, जिसके बिकने की संभावना कम होती है।”… “मेरे पास विदेशों से आया स्टॉक और विदेशी भाषाओं की किताबें होने की वजह से मैं ऐसी बिक्री के लिए अच्छी स्थिति में हूँ। दूसरी ओर, मैं यह भी कहना चाहूँगा कि मुझे इसका अंतिम इस्तेमाल पसंद नहीं है और मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता कि दुर्लभ किताबों को लुगदी बनाने के लिए नष्ट किया जा रहा है।”

नीदरलैंड भी इस प्रक्रिया से अछूता नहीं है। डच न्यूज़ साइट बीएनआर के अनुसार, पूरे यूरोप में ऐसी ही माँगें आ रही हैं। पुरानी किताबें बेचने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि उन्हें सिंगापुर की एक कंपनी से ईमेल मिला था, जिसमें अलग-अलग वर्गों की 3,000 अंग्रेज़ी किताबों की प्रतियाँ माँगी गई थीं। हालाँकि ईमेल में कहा गया था कि यह “कई भाषाओं में किताबें इकट्ठा करने वाले एक नए प्रोजेक्ट” के लिए है, लेकिन कई लोगों को शक है कि इसके पीछे एआई कंपनियाँ हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि एआई इंडस्ट्री प्रशिक्षण डेटा के नए स्रोत ढूँढ़ रही है, क्योंकि इंटरनेट पर मौजूद ज़्यादातर डेटा का इस्तेमाल पहले ही हो चुका है।

2022 से पहले छपी प्रिंट किताबों की ख़ासियत यह है कि उनमें एआई से बना कंटेंट नहीं होता। लेकिन जैसे-जैसे नई चीज़ें बनाने की होड़ तेज़ हो रही है, हमें स्वयं से यह पूछना चाहिए कि इस प्रक्रिया में हम क्या खो रहे हैं।

आज यह चिंता भी बढ़ती जा रही है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इतिहास के बारे में हमारी समझ को आकार देने और उसे ग़लत तरीके से पेश करने में भूमिका निभा सकता है। एआई सिस्टम जवाब और नतीजे तैयार करने के लिए जानकारी के विशाल और लगातार बढ़ते डेटाबेस पर निर्भर करते हैं। जैसे-जैसे और डेटा जुड़ता है, समय के साथ “सच” माने जाने वाले तथ्यों की व्याख्या भी बदलती जाती है।

हम आज के समाज में ऐसे उदाहरण देख सकते हैं, जहाँ ऐतिहासिक हस्तियों के बारे में नई जानकारियों से उन्हें याद करने के तरीके में बड़े बदलाव आते हैं। मूर्तियाँ हटाई जाती हैं, छुट्टियों पर फिर से विचार किया जाता है और उपलब्धियों का दोबारा मूल्यांकन किया जाता है या उन्हें कम करके आँका जाता है।

एक दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेज़ी के उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल ने 1946 में ही अपने उपन्यास ‘1984’ में मशीनों के ज़रिए कहानी कहने को स्वचालित यानी ‘ऑटोमेट’ करने की संभावना के बारे में सोचा था…एक ऐसा विचार जो आज, खासकर एआई और बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) के दौर में, भविष्य की भविष्यवाणी जैसा लगता है। मशीनों से चलने वाली कहानी का ऑरवेल का विचार, जिसमें इंसानी रचनात्मकता कम से कम होती है, आज के रचनात्मक टूल्स से काफ़ी मिलता-जुलता है और लेखक की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।

जॉर्ज ऑरवेल ने भविष्यवाणी ही तो की थी, जब उन्होंने लिखा था- “शायद किसी तरह की घटिया और सनसनीखेज कहानियाँ बची रहें, जिन्हें ऐसी मशीनी प्रक्रिया से तैयार किया जाए, जिसमें इंसानी सोच-समझ या पहल की गुंजाइश बहुत कम हो। मशीनों से किताबें लिखना शायद इंसानी हुनर के दायरे से बाहर की बात नहीं होगी…”

मुझे एक मित्र ने बताया कि उसने एआई से कहा कि उसे एक ख़ास विषय पर गुलज़ार के स्टाइल की कविता चाहिए। और पल भर में गुलज़ार की शब्दावली से भरपूर कविता उसके सामने थी। क्या एआई कंपनियाँ भी कुछ ऐसा ही सोच रही हैं?

यह संभव है कि किसी भी बड़े लेखक के नाम से कुछ भी हम सबको परोस दिया जाए। इससे अगला कदम तो यह भी हो सकता है कि जिन किताबों को नष्ट किया जा रहा है, उनके भीतर लिखे हुए शब्दों में बदलाव कर दिया जाए। यानी कि यदि मुझे किसी लेखक की कोई रचना या उसका कोई अंश पसंद नहीं है, तो मैं उस अंश को बदलकर उसी के अंदाज़ में एआई से लिखवा दूँ। और ख़तरा तो यह भी है कि कोई सिरफिरा किसी बड़े लेखक की रचना में कुछ परिवर्तन करके पूरी पुस्तक अपने स्टाइल में लिखवा ले और ऑनलाइन अपने नाम से ही छपवा भी दे।

एक चिंता और भी है… अमेरिका और यूरोप में तो एआई कंपनियां सब सच-सच बता भी रही हैं; यदि भारत में यह प्रक्रिया शुरू हो गई तो किसी को कुछ मालूम नहीं होगा कि कहां क्या हो रहा है… भारतीय भाषा की पुस्तकों के बारे में सोच कर तो झुरझुरी सी आ रही है!

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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32 टिप्पणी

  1. गंभीर तथा चिंताजनक पहलू से अवगत कराने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर। अति महत्त्वपूर्ण संपादकीय है।

  2. वाकई ये चिंताजनक स्थिति है और ऐसे में दिमाग़ के घोड़े कम AI के घोड़े ज्यादा दौड़ रहे हैं अब कोई भी आपकी कृति को AI की मदद से अपनी बना सकता है और ये वास्तव में खतरनाक है रचनाधर्मिता के लिए

  3. अभिवादन सर
    ये वास्तव में गहन चिंतन का विषय है कि कैसे इस तरह के तरीकों से बचा जाए। अभी कुछ दिनों पहले किसी ने बताया कि एक लेखक महोदय जो कभी नहीं लिखते थे ए आई की मदद से दो पुस्तकें लिख लीं । कई लोगों को ऐसा भी देखा है कि ए आई की मदद से रचनायें लिख भी रहे हैं और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो रही हैं किन्तु जब वे बात कर रहे होते हैं उससे उनके भाषाई ज्ञान की सारी पोल खुल जाती है । यह भी एक तरह से साहित्य पर संकट है ।

    • रेणुका जी आपने लिखा है कि – कई लोगों को ऐसा भी देखा है कि ए आई की मदद से रचनायें लिख भी रहे हैं और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो रही हैं किन्तु जब वे बात कर रहे होते हैं उससे उनके भाषाई ज्ञान की सारी पोल खुल जाती है । यह भी एक तरह से साहित्य पर संकट है। – आपसे पूरी तरह सहमत।

  4. आदरणीय संपादक महोदय

    आपका यह लेख केवल क्लासिक पुस्तकों के भविष्य पर विमर्श नहीं करता, बल्कि बदलते समय में साहित्य, पाठक और सांस्कृतिक चेतना के संबंधों पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। आपने अत्यंत सहज भाषा में यह स्पष्ट किया है कि क्लासिक रचनाएँ केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की बौद्धिक संपदा हैं। विशेष रूप से डिजिटल युग में पढ़ने की बदलती प्रवृत्तियों पर आपकी चिंता विचारोत्तेजक है। यदि युवा पीढ़ी तक क्लासिक्स को पहुँचाने के कुछ व्यावहारिक उपायों पर भी थोड़ा विस्तार होता, तो लेख और अधिक समृद्ध बन जाता। फिर भी यह संपादकीय साहित्य-प्रेमियों के लिए एक सार्थक और आवश्यक हस्तक्षेप है।

    • शैलेश भाई, आपने लिखा है कि – आपका यह लेख केवल क्लासिक पुस्तकों के भविष्य पर विमर्श नहीं करता, बल्कि बदलते समय में साहित्य, पाठक और सांस्कृतिक चेतना के संबंधों पर गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। – यही हमारा प्रयास भी है।

  5. नमस्कार सर
    आज आपने एक सामयिक और सनसनीख़ेज़ विषय उठाया है। कितनी तेज़ी से साहित्यिक रूप बदल रहा है। आप के लेख को पढ़ते हुए मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई दैत्याकार मशीन अपने फ़ौलादी हाथों से पुस्तकों को चबा रही हो।
    AI कितना कुछ बदल रहा है और हम शायद उतना जान भी न पायें कि क्या क्या हो रहा है। बहुत बढ़िया झकझोबने वाला विषय उठाया है।

    • रीता आपने लिखा है कि – आप के लेख को पढ़ते हुए मुझे ऐसा लग रहा था जैसे कोई दैत्याकार मशीन अपने फ़ौलादी हाथों से पुस्तकों को चबा रही हो। – डर यही है… हम सब को मिल कर इस चुनौती से लड़ना है।

  6. तेजेंद्र जी, आपने साहित्यिक उपलब्धियों में एआई की संभावित घुसपैठ जैसे अत्यंत चिंताजनक विषय को सशक्त संपादकीय में रेखांकित किया है। आज कल भारत में कुछ सत्ताधारी इतिहास के साथ बलात्कार करके देश की प्रगति का सारा श्रेय लेने में लगे हैं और लगता है बाक़ी की कसर साहित्यिक संपदा के साथ खिलवाड़ करके एआई सांस्कृतिक परिदृश्य को विकृत कर देगी। इस विषय की ओर ध्यान आकर्षित करना संपादकीय दायित्व की सही दिशा में पहला कदम है। अगला कदम?

  7. बहुत ही चिंता का विषय है। मनुष्य को बुद्धि का प्रयोग करते हुए अच्छी बुरी जैसी भी रचना हो खुद लिखना चाहिए एआई के माध्यम से लिखवाना गलत है।
    बहुत बढ़िया संपादकीय लिखा है आपने मैं बार-बार पढ़ रही हूं

  8. यह तो भयावह है. क्या यह बौद्धिक संपदा अधिकार का उल्लंघन नहीं होगा . विश्व के लेखकों और पत्रकारों को इसके नियंत्रण हेतु सरकारों को प्रभावी कानून बनाने के लिए जोर देना चाहिए. इस खबर से दुखी और चिंतित हूँ.

  9. भारतीय धार्मिक साहित्य में छेड़छाड़ अंग्रेज़ी शासनकाल में हुई ही है।अब तो और भी भयानक रूप से प्रभावित होकर नुकसान करेगा।

  10. आपने इस सप्ताह संपादकीय में AI के सामर्थ्य का साहित्यिक क्षेत्र में निहित स्वार्थों के लिए बढ़ते दुरुपयोग जैसे सामयिक और व्यापक रूप से असरदाई विषय को चुना है, उसके लिए पुरवाई के सभी पाठकों की ओर से आभार और अभिनंदन। आपने AI कंपनियों द्वारा हमारी सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीकों-रूपी पुरानी और कम पढ़ी जाती पुस्तको के व्यवस्थित तरीके से किये जा रहे विनाश के बारे में जो जानकारी दी है वह हर पुस्तक-प्रेमी पाठक के लिए निराशात्मक मनोभाव उत्पन्न करती है। जहाँ AI द्वारा किसी विषय पर विभिन्न स्रोतों से एकत्रित विस्तृत आगत के सम्मिलित किए जाने पर उसकी पृष्ठभूमि सहित पूरी जानकारी हमें अपने पूर्वाग्रहों से हट कर सोचने और स्वतंत्र धारणाएं बनाने में सहायता करती है, मगर चिंता का विषय है कि भला उन मूल स्रोतों की ही विलुप्ति के पश्चात कैसे कोई स्वतंत्र और निष्कपट जांच संभव होगी। इस विषय पर गहन चिंतन की आवश्यकता है। आजकल देखा जा रहा है कि AI के सौजन्य से लेखकों, कवियों और समीक्षकों की एक नई जमात पैदा हो गई है। जॉर्ज ऑरवेल द्वारा जिस कहानी लिखने वाली मशीन के इजात की उनके द्वारा उपन्यास 1984 में कल्पना की गई थी, उसे प्रख्यात उपन्यासकार आर के नारायण द्वारा भी उनकी कहानी वेंडर ऑफ स्वीट्स में दिखाया गया था बाद में जिसका फिल्मी रूपांतर टीवी सीरियल मालगुडी डेज़ में किया गया।

  11. पुरवाई

    के इस अंक में ए.आई.
    के व्यापक वैश्विक प्रभाव को उसके नकारात्मक पहलुओं और भावी आशंकाओं सहित सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा ने उजागर किया है । आई टी कम्पनियों द्वारा पुरानी दुर्लभ पुस्तकों को ए आई के उपयोग में लाने के उद्देश्य से नष्ट करने का काम चिंताजनक है । ज्ञान का भंडार सुरक्षित रहने पर कभी न कभी उपयोग साबित हो ही जाता है । हमारी सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीनतम हैं । जहाँ अनुसंधान की अपरिमित संभावनाएं छिपी हुई हैं ।सम्पादक ने यूरोप अमेरिका में इस्तेमाल हो रही इस पद्धति का विस्तृत विवरण दिया है । भारत के संदर्भ में ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर ए आई द्वारा प्रस्तुत किया जाना वाक़ई गंभीर मसला है । विज्ञान और तकनीक का प्रयोग सकारात्मक रूप से यह विचार इस सम्पादकीय का केन्द्रीय उद्देश्य है । सम्पादक के इस कथन पर ग़ौर किया जाना चाहिए- “लेकिन जैसे-जैसे नई चीज़ें बनाने की होड़ तेज़ हो रही है, हमें स्वयं से यह पूछना चाहिए कि इस प्रक्रिया में हम क्या खो रहे हैं।” चिंतनशील और विचारणीय ।
    बहुत बधाई ।
    अंक पठनीय है।
    — मीनकेतन प्रधान
    भारत

  12. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    ​’पुरवाई’ का ताज़ा संपादकीय ‘क्लासिक पुस्तकों का भविष्य….’ आधुनिक तकनीक के उस भयावह और विनाशकारी चेहरे से पर्दा उठाता है, जिसकी ओर सामान्य दुनिया का ध्यान प्रायः नहीं जाता। एआई और भाषा मॉडलों के प्रशिक्षण के नाम पर दुर्लभ, पुरानी और अप्राप्य क्लासिक पुस्तकों को ख़रीदकर, उनकी बाइंडिंग काटकर और अंततः उनका गूदा बनाकर नष्ट किए जाने की जिस प्रक्रिया को आपने उघाड़ा है, वह साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के प्रेमियों के लिए सचमुच सिहरन पैदा करने वाली घटना है।
    ​संपादकीय में कनाडा की ए.बी. टेक सॉल्यूशन्स, सिंगापुर और नीदरलैंड्स से सामने आए वैश्विक तथ्यों व आँकड़ों के माध्यम से आपने इस संकट की भयावहता को बहुत ही प्रामाणिक ढंग से रेखांकित किया है। जॉर्ज ऑरवेल के कालजयी उपन्यास ‘1984’ की उस भविष्यवाणी, जहाँ मशीनों से कहानियाँ गढ़ने और इंसानी सोच को हाशिये पर धकेलने की बात कही गई था, का संदर्भ देकर आपने यह सिद्ध कर दिया है कि जिसे हम ‘तकनीकी प्रगति’ समझ रहे हैं, वह वास्तव में हमारी ऐतिहासिक और बौद्धिक चेतना को मिटाने का एक सुनियोजित प्रयास भी हो सकती है।
    ​विशेष रूप से किसी लेखक की शैली में कृत्रिम रचनाएँ गढ़ने, मूल ग्रंथों के पाठ में स्वेच्छाचार से बदलाव करने या किसी की रचना पर अपना नाम चिपका देने के जिस भावी ख़तरे की ओर आपने संकेत किया है, वह बेहद चिंताजनक है।
    भारतीय भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकों को लेकर व्यक्त की गई आपकी आशंका हर भारतीय संवेदनशील मन को झकझोरती है कि यदि यह प्रक्रिया हमारी पांडुलिपियों और दुर्लभ ग्रंथों तक पहुँची तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ जाएँगे?
    ​एक अत्यंत गंभीर, अद्यतन और सभ्यतागत संकट पर इस सतर्क, बेबाक और मार्गदर्शक संपादकीय के लिए आपको हृदय से साधुवाद‌।
    सद्भावनाओं सहित।
    ​ आपका
    चन्द्रशेखर

  13. एक महत्वपूर्ण संपादकीय है जो क्लासिक पुस्तकों ,दुर्लभ पुस्तकों और कहीं दूर किसी प्रकाशक के गोदामों पड़ी पुनः अनुपलब्ध पुस्तकों की बात करता है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कहर और उन कंपनियों की जो उक्त पुस्तकों को प्रोजेक्ट के नाम पर खरीद कर उसे ए आई के हवाले करके उनका चुनिंदा डिजिटलीकरण और फिर सबकी लुगदीकरण भी कर रहे हैं ताकि फिर वे पुस्तकें मानव की वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को न याद रहें और न दिखें????!!!
    संपादकीय यह तथ्य यूरोप और अन्य भूभागों की बात करता है चूंकि वहां पर इस सच्चाई को कंपनीयां बता देती है।
    संपादकीय भारत के बारे में इंगित मात्र करता है।
    भारत के प्रकाशन उद्योग की बात करें तो कुछ सरकारी संस्थान और निजी क्षेत्र के नामचीन प्रकाशकों के अतिरिक्त दुकानदारी और क्षमा याचना के के साथ चवन्नी छाप मानसिकता के साथ बेशर्मी से संचालित है।पैसा खेलता है और पाठक रोता है बस यही सच्चाई है ,,, इसका एक इशारा दिल्ली पुस्तक मेले का आयोजन बंद होने में देखा जा सकता है??!
    खैर समीचीन और आँखें खोलने वाला बढ़िया संपादकीय।

  14. आदरणीय,क्लासिक पुस्तकों के संरक्षण की आवश्यकता, साहित्य की मौलिकता और प्रामाणिकता बनाए रखने का संदेश तथा एआई के अनियंत्रित उपयोग से उत्पन्न संभावित खतरों के प्रति जागरूक करता आपका यह संपादकीय अपने शीर्षक के अनुरूप रोचक, विचारोत्तेजक एवं जिज्ञासापूर्ण है। इसमें समसामयिक एवं प्रासंगिक विषय को तथ्य और उदाहरणों के प्रभावी उपयोग के साथ प्रस्तुत किया गया है, जो पाठकों में सहज चिंतन, संवेदनशीलता और साहित्यिक उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न करता है। एआई के संभावित दुष्प्रभावों के कारण भविष्य में मूल साहित्य के साथ होने वाली हेराफेरी, दुर्लभ पुस्तकों के विलुप्त होने की आशंका, साहित्यिक धरोहर के क्षरण, तथा रचनात्मक मौलिकता ऐतिहासिक तथ्यों के विकृतिकरण पर मंडराते संकट के प्रति यह संपादकीय गंभीर चेतावनी देता है। साथ ही यह तकनीकी प्रगति और साहित्यिक विरासत के संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को भी प्रभावशाली ढंग से रेखांकित करता है।इस सामयिक और अर्थपूर्ण विषय पर संपादकीय लिखने के लिए आपको साधुवाद।

  15. अत्यंत विचारोतेजक संपादकीय है क्लासिक पुस्तकों का भविष्य…
    आपने वाशिंगटन पोस्ट से मिली सूचना के आधार जो लिखा है, वह बेहद शोचनीय है, अगर वास्तव में ऐसा हुआ तो मौलिकता तो रहेगी ही नहीं। A I के द्वारा लिखी किसी भी कहानी कविता में वो इमोशन नहीं आ सकते जो इंसान महसूस करके उसे शब्दों में ढाल सकता है लेकिन आजकल तो तुरंत-फुरंत का जमाना है। जहाँ एक लेखक को एक कहानी को लिखने में हफ्तों गुजर जाते हैं वही काम A I के द्वारा कुछ घंटों में ही हो जाए तो नई पीढ़ी के लिए अभिशाप ही होगा।
    पुस्तकों का इस तरह से विनष्ट होना हम जैसों के लिए बहुत ही बुरा होगा। बाकी अभी न जाने और क्या-क्या देखना बाकी है।

  16. जितेन्द्र भाई: आपके इस सप्ताह के सम्पादकीय ने तो शरीर में एक तरह की कंकपी पैदा करदी। जो आनन्द हाथ में किताब लेकर पढ़ने में आता था उसका कोई जवाब नहीं। समय के साथ साथ ऑडियो पुस्तक आ गयीं जहाँ पर कार में या घर पर टेप या सीडी लगाओ और बिना पढ़े पुस्तक में जो लिखा है उसे आंखें बन्द करके सुनते जाओ। इसी के साथ साथ किण्डल ने किताबों के पढ़ने का तरीका ही बदल दिया। यह प्रथा इस लिए भी लोकप्रिय हो गई क्योंकि वही पुस्तकें जिन्हें अपने शैल्फ़ पर रखा देखकर जो आनन्द मिलता था वहाँ यह कहकर कि अब छोटे घर होने के कारण यह पुस्तकें अब एक प्रकार का आइसोर बन गई हैं। इस सब बदलाव के बाद भी पुस्तकों के ढ़ाँचे में बदलाव नहीं आया।
    AI की जिस नई सोच से आपने हमें जागृत किया है वहाँ तो पुरानी पुस्तकों को, जिन्हें मैं ग्रंथ की श्रेणी में रखता हूँ, कॉड़ियों के दाम ख़रीदो, जिल्द की धज्जियाँ उड़ा दो, पुस्तक के पन्नों को फ़ास्ट स्कैनर में स्कैन करके उन्हीं पन्नों की लुगदी बना दो। यानि, धीरे धीरे इन ग्रंथों को जड़ से ही मिटा दो। AI की इस सोच में और नालन्दा में जो ख़िलजी ने धर्मगंज में रखी लाख़ों पुस्तकों को जलाके ख़ाक किया था, उस सोच में क्या अंतर है। पैसा कमाने के चक्कर में बहुत से पुस्तक विक्रेता भी अपना पुराना स्टॉक निकाल कर बेच रहे हैं। इस नई सोच और पुराने ग्रंथों का इस धर्ती से सफाया करने का आने वाली पीढ़ी पर क्या असर होगा, यह एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है????

  17. क्लासिक पुस्तकों का भविष्य आपका सम्पादकीय महत्वपूर्ण एवं विचारोत्तेजक है।ए आई के दुरुपयोग से हमारी सांस्कृतिक धरोहर के विनाश और बदलाव की सम्भावनाएँ चिंताजनक हैं। कृत्रिम लेखन में वो संवेदनाएँ कभी नहीं आ सकतीं, जो बौद्धिक लेखन से आती हैं।मशीन में बुद्धि हो सकती है, दिल नहीं।
    मैं हर बार आपका शोधपरक सम्पादकीय पढ़कर अचम्भित हो जाती हूँ। ज्ञानवर्धक और रोचक। साधुवाद तेजेंद्र जी।

  18. नमस्कार,
    आज के समय की भयावह स्थिति। एआई के आने पर कई आशंकाओं ने सर उठाया। जैसे झूठ पसरना, किसी का भी मान मर्दन कर देना, आलसियों की फौज खड़ी होना, सच्चे मेधावी की भी मेधा का इस्तेमाल नहीं होना आदि।
    पर किताबों की महकती दुनिया को ही नष्ट कर देना बहुत चिंतित करनेवाला है। भविष्य में हम एआई के और गुलाम बनेंगे।
    जिस तरह लुगदी की बात आपने वताई , यह सबसे भयंकर हानि है। क्लासिक पुस्तकों को नष्ट करना अपराध की श्रेणी में आता है।
    बहुत जरूरत थी ऐसे संपादकीय की।

  19. अत्यंय आवश्यक विषय पर सचेत करता आलेख तेज भैया।जैसा नाम,वैसा काम।
    अब इस विषय पर थोथी चिन्ता करने से तो कुछ न होगा।अब तक जो पुस्तकें टाल रखी थी कि बाद में लेकर पढ़ेंगे,वह सभी, अपने पुस्तकालय को भेंट कर बचा लेनी हैं।हम जितनी पुस्तकें बचा लें वही भविष्य में बच्चों के काम आएंगी।
    अब ये न कोई कहे कि बच्चों को पुस्तक पढ़ने का शौक नहीं है।ये शौक तो मेरे परिवार में मेरे सात साल के नाती को भी लगा दिया हम सभी ने।बाहर लंच करने भी जाते तो अपनी कोई किताब ले कर जाते।
    जितना हो सके ,हमे अपनी बहुमूल्य पुस्तकें बचानी है,ए आई दैत्य से!

  20. वर्तमान संदर्भ में एक अत्यंत जरुरी विषय पर आपने ध्यान आकृष्ट किया है। जब AI की चर्चा होती है और लिखने पढने की तात्कालिक सुविधा मिलने की बात कही गई तब सबसे ज्यादा मुझे यही डर लगा कि मौलिक एवं बौद्धिक लेखन पर सबसे अधिक खतरा आयेगा।आज आपके संपादकीय ने जो सच उजागर किया है वह सचमुच डराने वाला है।क्लासिक पुस्तकें जो अनमोल धरोहर की तरह हैं उनमें मौलिक चिंतन सामयिक अनुभवों इतिहास की गहराई शामिल है परंतु AI के द्वारा उनका पुनर्लेखन पुरानी क्लासिक पुस्तकों का लुगदी में बदल देना गंभीर लेखकों और सुहृद पाठकों के लिए भी दुखद है। मशीनें पुस्तकें लिख सकती हैं पर भावनाएं सम्वेदनशीलता अनुभूति.जन्य गहराई कहां से लायेंगी? उनके मशीनों द्वारा पुनर्लेखन से शैली व शाब्दिक भाषाई परिवर्तन का भी भय है।लेकिन वर्तमान समय में तेजी से भागने और शीर्ष तक पहुंचने की होड में शायद किसी के पास समय नहीं होगा कि मौलिक चिंतन कर पुस्तकें लिख सकें।यह एक चुनौतीपूर्ण चेतावनी है गंभीर लेखन के लिए। बहुत बहुत बधाई और आभार भाई इस अति आवश्यक मुद्दे से परिचित कराने के लिए। सादर प्रणाम।

  21. आपका लेख पढ़कर एक विचार मस्तिष्क में कौंध आया। संभवतः इसीलिए पूर्व में किसी भी विद्या को लेकर इतनी सार्वजनिकता नहीं थी।
    कोई भी सामग्री सभी तक इतनी आसानी से नहीं पहुंच सकती थी। किसी भी कला के लिए गुरु और ढेर सारे कठिन नियम होते थे।
    धीरे धीरे साहित्य, कला और अन्य विद्याएं सोशल मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक होती गई। आरम्भ में ये अच्छा लगा क्योंकि वो सब जानने/ पढ़ने को मिल रहा था जो पहले आसान नहीं था। अब दूसरों की मेहनत और विद्याओं को तोड़ मरोड़ कर स्वयं का नाम देना आसान है और इतना आसान की मूल रचनाकार को भी स्वयं पर भ्रम होने लगे कि क्या यह मैने ही लिखा था।

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