Sunday, August 9, 2026
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सुधा गोयल का संस्मरण – मन्नत के धागे

सन् 1965 की बात है।खारिज टूर पर आगरा घूमने गये थे।घूमते देखते हम सब सलीम चिश्ती की कब्र पर पंहुच गये‌।कौन सलीम चिश्ती,कब्र का क्या मतलब या महत्व हम कुछ नहीं जानते थे।जीवन में कभी किसी कब्र पर नहीं गए , कोई दरगाह नहीं देखी।यह पहला अवसर था।पंद्रह सोलह साल की उम्र , आश्चर्य से सब देख रही थी।गांव की बेटी गांव की दहलीज से बाहर निकल कर खुश थी और सब कुछ चकित भाव से देख रही थी। इतनी खुश कि कुछ जानने समझने की फुर्सत ही नहीं थी। थोड़ी सी आजादी और थोड़ा सा खुलापन मिला था जिसे जी भर जी लेना चाहती थी।पंख होते तो आकाश की सैर कर आती। जाने कितने नजारे आंखों में कैद हो गये। यहां मजार पर दर्शन के लिए लम्बी सी कतार लगी थी।
हम सब का दुआओं से क्या मतलब।हम तो महज दर्शनार्थी थे।सो खाली हाथ ही लाइन में लग गए। ज्यादातर स्त्रियों और पुरुषों के सिर पर लाल रखें थे जिनमें फल फूल , मिठाई और चादरें रखीं थीं।खैर हम भी अंदर पहुंचे और जैसे भगवान को प्रणाम करते हैं वैसे ही करबद्ध हो मस्तक झुका दिया। हमने अपने यहां किसी को भी दरगाह पर जाते नहीं देखा था। हमें भी कोई सलीका नहीं था।हो सकता था कि दरगाह पर जाने की खबर से ही घर में डांट पड़ती। पहले टी.वी.नहीं था। बहुत सी बातें टेलीविजन और मोबाइल ने जेहन में भर दीं।
हम जैसे अंदर गए वैसे ही बाहर निकल आए।बाहर निकल कर देखा कि मुस्लिम स्त्री पुरुष मकबरे के झरोखे में धागा बांध रहे थे। क्यों बांध रहे हैं हमें नहीं मालूम।हम सबने भी धागे लिए और देखा देखी बांध आए।तभी एक मुस्लिम लड़की ने कहा-“अपनी कोई विश जो पूरी करनी हो मांग लेना। यहां सबकी इच्छा पूरी होती है।यह मन्नत का धागा है।”
मैं सोच में पड़ गयी कि मेरी कोई खास इच्छा भी हो सकती है,ऐसा कभी महसूस नहीं किया।जिंदगी में जो चाहिए मिल ही रहा था-इससे अलग भी कुछ हो सकता है।मेरे जेहन में ऐसा कोई विचार भी नहीं आ रहा था।धागा मेरे हाथ में था और मैं सोच रही थी कि इसका क्या करुं?किसी को दे दूं या जहां से लिया है वहीं रख दूं।एक जरा सा धागा क्या विश पूरी करेगा।
तभी मेरी नजर साथ आई लड़कियों पर पड़ी। मैंने अपनी सहेली उमा से जो उम्र में मुझसे दो साल बड़ी थी।
पूछा-“तूने क्या मांगा?”
वह अदा से मुस्कराई, आंखों में चमक कौंधी, बोली -“मन की बात किसी को बताते नहीं है।”
“पर मुझे बता दें।किसी को नहीं बताउंगी। मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या मांगू? प्लीज मेरी सहायता कर।”
“अपने लिए अच्छा सा दूल्हा मांग ले।”
“तूने यही मांगा?”
“हां , मां बाबूजी सारे समय विवाह की बातें करते रहते हैं।”
“छीं—यह भी कोई ख्वाहिश हुई।मैं ऐसा कुछ नहीं मांगूंगी।”
उमा हंस पड़ी। मैंने आंखें बंद कर मन ही मन प्रार्थना की-“यदि यहां इच्छा पूर्ति का वरदान मिलता है तो प्रभु मुझे खूब पढ़ाना।मेरी कलम कभी रुके नहीं।”
वह दिन और आज का दिन ,अभी तक कागज कलम का नाता नहीं टूटा।बस यही पहली विश पूरी हुई।मैं जीवन में कितनी ही बार मन्नत के धागे लिए खड़ी रही।पति देर सबेर लौटते,क्लब में जमे रहते।।मैं बच्चों के साथ अकेली पड़ी उनके लिए दुआ करती रहती।उनके लौटने तक कलेजा धौंकनी बना रहता।बुरे ख्याल आते रहते।।मैं फिर एक धागा थाम प्रार्थना करती-“प्रभु, वे जहां भी हो सलामत हों। ठीक डाक अपने घर पहुंचे।अपना घर परिवार संभालें। परिवार के मायने पर मैं सवालों के ढेर पर खड़ी हो जाती।मैं सोचती -क्या कभी मेरी उलझन सुलझेगी।
उलझन नहीं सुलझी ,और मैं ने हाथ में पकड़ा धागा खूंटी पर टांग दिया।वक्त यों ही घिसटता रहा। बच्चे बीमार पड़ जाते या स्कूल से लौटने में देर हो जाती, फिर दुआ को हाथ उठ जाते। बड़े पुत्र को मस्क्युलर डिस्एट्राफी हुई तो मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे ,है दरगाह पर,हर चौखट पर मन्नत के धागे बांधती रही।उन धागों के साथ अपना जु भी कि मेरे जीवन के बदले कि पुत्र को नया जीवन मिले। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।धागे बांधे ही रह गये।कभी खुलने का समय नहीं आया।
बेटी के लिए वर की तलाश में फिर एक धागा हाथ में आ गया।धागा तो बांधा पर खुला नहीं क्योंकि बेटी का जीवन बनते बनते बिखर गया। धागों पर धूल को चढ़ना था, चढ़ती रही। पुत्र को पढ़ने विदेश जाना था। पैसों की व्यवस्था करनी थी। फिर एक धागा हाथ में आ गया।ऐसी विश पूरी हुई कि पुत्र विदेश में ही बस गया। यहां भी धागा नहीं खुला और धूल चढ़ती रही।
एक बार नेपाल घूमने गयी। भारत नेपाल बार्डर पर ही मनोकामना देवी का मंदिर है। देवी दर्शन के लिए ट्राली में बैठकर दो पहाड़ों और बीच में बहती नदी को पार करके जाना पड़ता है। अद्भुत रोमांचकारी है। प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर मन अभिभूत था।असीम शक्ति मिल रही थी।दर्शन करने के लिए मंदिर की ओर कदम बढ़ाए ही थे कि एक व्यक्ति हाथ में बकरी के बच्चे का आटा सिर और दूसरा आदमी उसका धड़ लेकर निकला।मेमने की आंखें दर्द और भय से फट गई थीं।अभी इस दृश्य से नजर हटी भी नहीं थी कि एक व्यक्ति कबूतर का धड़ और सिर अलग अलग हाथ में लेकर निकलता नजर आया।
अब मेरी नज़र नीचे फर्श पर पड़ी। चारों ओर खून के छींटें पड़े थे।पांव रखने की जगह नहीं थी।इतना विभत्स दृश्य जीवन में पहली बार देखि था।मेरा मन नहीं था कि मैं मंदिर के अंदर जाऊं। लेकिन सहयात्रियों के अनुरोध पर मंदिर में गई।वह कोई बहू प्राचीन मंदिर था। उसमें होने वाली पूजा तांत्रिक पूंछ थी।जो वहां आ रहे थे अपने साथ पशु-पक्षी लेकर आ रहे थे। पुजारी देवी के सामने छुरी से धड़ से सिर अलग कर देता।और दोनों टुकड़े भक्त को पकड़ा देता। यहां इसी प्रकार मन्नत मांगी जा रही थीं।खून वहां से सीधा नारी में जा रहा था। जैसे मंदिर में नारियल तोड़ कर उसका पानी चढ़ाया जाता है, वैसे ही यहां पशु-पक्षी को मारकर उसका खून चढ़ाया जाता है।
पुजारी ने मुझसे पूछा-“आपने मन्नत नहीं मांगी।”
“मांगूंगी,पर यहां की तरह नहीं।”और मैंने सबके सामने हाथ जोड़ कर कहा-“से मनोकामना पूर्ण करने वाली देवी,मेरी यही इच्छा है कि आप मनोकामना पूर्ण करने के नाम पर अभी से बेजवान पशु पक्षियों की बलि देना बंद कर दें।आप कैसी देवी हैं जो प्रतिदिन सैकड़ों पशु पक्षियों के रक्त से अभिषेक करती हैं।”
पुजारी अचम्भित सा मुझे देखता रहा। जितना विभत्स। कार्य उतनी। ही विभत्स मूर्तियां। मुझे लगा कि जितनी जल्दी यहां से निकल जाएंगे उतना ही अच्छा।उस दिन मेरे हाथों में कोई धागा नहीं था,हाथ खाली थे और दिल करुणा से भरा था।अभी भी जब कभी उस मंदिर का स्मरण हो आता है मन से यही दुआ निकलती है कि प्रभु यदि तू सचमुच कहीं है तो यह अत्याचार बंद कर।तू तो दयालु और सब पर दया करने वाला है।
जिंदगी बार बार परीक्षा लेती है।एक धागा छूटता दूसरा आ जाता।सलीम चिश्ती की दरगाह पर क्या गयी। इन मन्नत के धागों से मेरा रिश्ता ही बन गया।पति को केंसर हुआ।इलाज के साथ साथ मन्नत के धागे भी हाथ में आ गए।इतनी फुर्सत नहीं मिली कि। किसी दरगाह पर बांध आऊं।दवाई और डाक्टरों में पैसा खर्च करती रही।और धागे घर के मंदिर की चौखट पर बंद कर रही। गये। उन्हें न खुलना था नन खुले।
केंसर की आखिरी स्टेज पर जब पति को तड़पते देखती फिर से। धागा थाम प्रार्थना करती-“प्रभु ,इनकी तड़प दूर कर।मैं नहीं देख पा रही।”
क्या कोई औरत ऐसी भी मन्नत मांग सकती है।मैं स्वंय से यह सवाल पूछती और प्रतिदिन कष्ट मुक्ति की प्रार्थना करती।
चौखट पर बंधे कितने ही धागे अपनी चमक खो चुके हैं।।अब तो यह भी भूल गयी हूं कि कब और क्यों मन्नत के धागे बांधे थे।वक्त सारे घाव भर देता है ।जीवन में अकेली खड़ी सोच रही हूं कि अब तो कोई मन्नत नहीं मांगनी।जब मांगी तब क्या मिला और अब नहीं मांगूंगी तो क्या चला जाएगा।अब जाने को तो कुछ बचा ही नहीं है फिर चिंता किस बात की।
आज गंगा के किनारे खड़ी सभी मन्नत के धागों का विसर्जन कर उन्हें मुक्त कर रही हूं और मैं भी भारत मुक्त
हो रही हूं।

  • सुधा गोयल 
290-ए, कृष्णानगर, डा दत्ता लेन, बुलंदशहर -203001
मोबाइल नंबर -991786962
यह संस्मरण मौलिक व अप्रकाशित है।
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1 टिप्पणी

  1. अत्यंत मार्मिक अनुभूति.जन्य भावप्रवण संस्मरण सुधा दी।लगा जैसे जीवन की व्यथा कथा का कोई चलचित्र देख.रही हूं।सब कुछ यथार्थ,कटु सत्य आधारित भावनाएं शायद हर नारी मन की अकथ कहानी कहती हैं। जीवन के झंझावातों से घिरा मन ऐसे ही किन्ही कमजोर पलों में जब.साहस छोड देता तब ये मन्नत के धागे उसके हौसलों में एक विश्वास भरते हैं।निःशब्द हूं बेहद भावुक पलों से गुजरता मेरा पाठकीय मन आपके साहस के सम्मुख नतमस्तक है। बहुत बहुत बधाई! प्रणाम।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

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