- डॉ. साधना बलवटे
मैं और मेरी हिन्दी अक्सर ये बातें करते हैं कि तुम होती तो ऐसा होता, तुम होती तो वैसा होता, तुम भी कहती ये कहां आ गये हम यूं ही साथ साथ चलते देखो न, न तुम्हें कोई पूछता है, न ही मेरी कोई वखत है काश तुम इतनी वैज्ञानिक न होती,,इतनी तार्किक न होती, go गो और to टू ,but बट और put पुट के अतार्किक उच्चारणों की तरह होती, तो आज रटन्तु पाठ्यक्रम का माध्यम होती। काश कि तुम्हारी अंग्रेजी की तरह कुल जमा 26 अक्षरों की स्वीट एन्ड शार्ट फेमिली होती।
पर तुम्हें तो वसुधैव कुटुम्बकं का रोग लगा है 44 अक्षरों का भरापूरा कुनबा कौन ढोता है आजकल। शायद इसीलिए तुम प्रचलन से बाहर हो। प्रचलन से बाहर नहीं समझी अरे आऊट डेटेड हो। मुझे हिन्दी में समझाने की अपनी क्षमता पर संदेह हुआ।
काश कि तुम अंग्रेजी की तरह स्कर्ट पहनी बॉबकट होती। न अनुस्वार न मात्रा फिर भी दुनिया भर की यात्रा। पर तुम्हे कौन समझायें कि दुनिया सांइस का उपयोग सिर्फ अंतरिक्ष में जाने के लिए करती है भाषा के लिए नहीं। इस नये जमाने में तुम बहुत ओल्ड फैशन हो आज भी अनुस्वार की बड़ी सी बिन्दी लगाती हो, ई की मात्राओं का जुड़ा बाँधती हो,रेफ का पल्लू लटकाती हो, निम्न पदेन में ऋ की बिछिया पहनती हो और अकेले रहना तो तुम्हें आता ही नहीं, हमेंशा ही तुम्हारे चुन्नू मुन्नू बड़ा ऊ और छोटा उ की तरह पूंछ बनकर लटकते रहते हैं। क्या तुम नहीं जानती
कि वन बीएचके के फ्लैट में रहने वालों की कोई जमीन तो होती नहीं, और न गेस्ट रूम की गुंजाइश होती है। और तुम हो कि दालान भर रिश्तेदार साथ लेकर चलती हो, शायद इसीलिए तुम खुले दालान में पड़ी हो। भले जमीन और आकाश तुम्हारे हो पर तुम्हें घर में प्रवेश नहीं मिल सकता। काश कि तुम दिल से पेट की भाषा बन जाती, पर तुम कहाँ सुनती हो, जानती हो ना ऐसे लोगों को इमोशनल फूल कहते हैं।
मेरी इन बातों से उकता कर तुम भी कह उठती काश, काश कि तुम हिन्दी के लेखक नहीं होते तो अपनी गाँठ का पैसा लगा कर पुस्तकें खैरात में नहीं बाँट रहे होते।काश की तुमने अँग्रेज़ी में कोई बकवास सी किताब भी लिखी होती तो आज तुम बेस्ट सेलर होते। अरे कुछ नही तो किसी हिन्दी की किताब को अँग्रेजी में टीप मारा होता तो भी तुम वरिष्ठ लेखक होते, नहीं नहीं वरिष्ठ तो हिन्दी में होते हैं, अँग्रेजी में तो , द फेमस होते हैं। पर तुम भी ना, न जाने किस मनहूस घड़ी में मेरे प्रेम में पड़ गए। कहते हुए हिन्दी ने प्यार भरी नज़र से देखा। तभी फोन बजा – बहुत बहुत बधाई सर आपका नाम आया है हिन्दी के समाचार पत्र में मेरा नाम! क्यो?
मैं पढ़ के सुनाता हूँ सर हिन्दी के राइटर्स की मैन्युस्क्रिप्ट को मिली बुकग्राँट। इसमें आपका भी नाम है।
मैंने और हिंदी ने हिन्दी के अखबार की खबर सुनी और अफसोस एक दूसरे की तरफ देखा,ये हिन्दी के समाचार पत्र का समाचार था, वो सोचने लगे फिर अंग्रेजी अखबार वाले क्या लिखते होंगे। दोनों के चेहरे पर करुणा से उपजी मुस्कान थी। दोनों चोट सह सह कर व्यंग्यकार जो हो गए थे। मैं और मेरी हिंदी अक्सर ये बातें करते हैं।..
डॉ. साधना बलवटे
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