साज़ – बाज़ : प्रियंका ओम (उपन्यास), मूल्य ₹300 मात्र, पृष्ठ 170, प्रकाशक – शिवना प्रकाशन, सीहोर, प्रथम संस्करण – 2025.
एक लंबे समय बाद दिल की तरह धड़कने वाला, सफर की तरह रवानी भरा और पढ़ने के दरमियाँ साँसें थाम देने वाला उपन्यास ‘साज़-बाज़ ‘ पढ़ने को मिला. दक्षिण अफ्रीका में रहने वाली और प्रवासी भारतीय प्रियंका ओम के इससे पूर्व 2016 से 2023 के बीच तीन ताज़गी भरे कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. और अब, 2025 में प्रकाशित यह उपन्यास हिंदी उपन्यास के राहगीरों के लिए खुलने वाली एक नई और हैरत-अंगेज़ खिड़की है.
प्रेम का मुगालता पालने वाली, कच्चे अनुभवों वाली, टूटने, बिखरने और फिर संभलने वाली नई पीढ़ी पर बेशक हिंदी में और भी बहुत कुछ लिखा जा रहा है. पर प्रियंका ओम ने जिस ‘इंटेंस’ के साथ यह उपन्यास लिखा वह लगभग अकल्पनीय है. जिस उपन्यास की शुरुआत ही नायिका देविका के आत्महत्या करने के लिए औजार और तरीके के चयन की उलझन से शुरू होती है. वह पाठक को केवल तब पलकें झपकाने ने या सांस लेने का मौका देता है जब देविका के बहनों की सगाई, शादी और उसके शाही घर का वर्णन आता है. पाठक को बस यही एक ब्रेक मिलता है. पर उसके बाद वही ‘इंटेंस ‘, वही रवानी.
जेन ऑस्टिन जैसा कथाकार बनना प्रियंका का सपना है. इस उपन्यास के लेखन के समय भी रचनाकार के अवचेतन में ऑस्टिन की खूबियां रही होंगी. शायद इसीलिए वे स्त्रियों के स्वाभिमान,स्वतंत्रता को जीवंत और कसावट भरे संवादों व कठनों के साथ प्रस्तुत करने में सफल रही हैं. उपन्यास के छोटे -पैने संवाद ‘पंच’ की तरह पाठकों के दिल-दिमाग में घर कर जाते हैं. मसलन – शिवन की मौजूदगी देविका के लिए उनीन्दी आँखों का काजल है, तुम मुझ में इतनी ज्यादा हो कि मैं अब खुद में कम बचा हूं, देविका का मन ना भेजी गई चिट्ठियों का लिफाफा है, देविका का मन ढोल पर अनिपुण हाथों की थाप है, आदमी के लिए शादी सुविधा है स्त्री के लिए रिश्ता, स्त्री के लिए प्रेम भूख है तो पुरुष के लिए मुखवास, पति-पत्नी मूल व्यक्ति से भिन्न होते हैं, यह अलगाव मिलन की प्रस्तावना है, आंसू छुपाने के खातिर पुरुषों ने हँसी को ईजाद किया, मौन के बाद टेलीपैथी इस दुनिया की सबसे सुंदर भाषा है……
प्रियंका की नायिका अपनी तमाम कमियों के साथ पाठक से आँख मिलाती हुई अपने प्रेम को पाने और समझने की बेहिचक पुरजोर कोशिश करती है. बेशक वह “बहरकैफ, बतदबीर बस जीतना जानती है,उसे जीत का नशा है. जानते हुए भी वह हार स्वीकार नहीं करती.” बेशक वह खुद को मारिया समझती है जिसे मार्टिन फ्रांस की गलियों में ढूंढता है. देविका बाजमर्तबा जेन अग्रे को पढ़ते हुए रुक कर किताब चूम लिया करती जहाँ मिस्टर रोचेस्टर का जिक्र होता, लिंगरी के लिए मॉडलिंग करना भी देविका का ख्वाब रहा है, ‘द ब्यूटी मिथ’ की अमेरिकी नारीवादी लेखिका और पत्रकार की वह प्रशंसिका है तो दुर्गा सप्तशती भी उसे बखूबी याद है. यह सच है कि पहली बार उसे कट्टर मुस्लिम अदीब से प्यार होता है पर अंततः उसे भाई सात्विक की कही बातें सच महसूस हुईं “शरीयत को मानने वाले पूरी दुनिया को दारुल ए इस्लाम में बदल देना चाहते हैं. इसलिए कई शादियाँ, अनेक बच्चे और धर्म परिवर्तन के बाद अब उन्होंने प्रेम जिहाद के नाम पर धर्म युद्ध का निहायत ही जलील ढंग अपनाया है. और तुम, उन्हें सुगम साध्य हो.”
शिवेन के साथ प्रेम के अपने अनुभूति को जैसे वह अपने पहले कड़वे अनुभव के कारण मानो समझ कर भी उस पर केंद्रित होना नहीं चाहती. अंततः शिवेन का बाकायदा प्रेम प्रस्ताव देविका की तमाम उलझनों को दूर करता है. पर इस स्वीकारोक्ति और फिर विवाह से उसकी असल उलझने शुरू होती हैं. ख्वाबों की दुनिया में रहने वाली, रोमानियत को प्रतिपल जीने की चाहत रखने वाली देविका इसके इतर कुछ भी स्वीकार नहीं कर पाती है. पर उसके अस्वीकार का अर्थ है नींद की ढेर सारी गोलियाँ खाकर लुढ़क जाना, जगने पर आत्महत्या के तौर-तरीकों के बारे में पूरी शिद्दत से सोचना और हालात को बेहतर बनाने वाले पलों में भी ‘मुझे भारत जाना है, मेरा टिकट बुक कर दो, जैसा हठ करना.
उपन्यास की नेरेटर देविका की दिवंगत माँ है जो यह बदस्तूर मानती है कि देविका का नाम हठिका होना चाहिए था. अब यह सहज ही सोचा जा सकता है कि खुद को प्रेम से पगी मानने वाली इस तुनकमिजाज लड़की के लिए गृहस्थी की पालना करना कितना मुश्किलों भरा सफल रहा होगा ! देविका-शिवेन के नवदाम्पत्य पत्र में प्रेमिल पलों से ज्यादा तो तंज भरे जुमले और ना मना सकने वाले रूठने जैसे बेतरटीबी पल थे. किसी पल जब लगने को होता कि अब संभवत: सब ठीक हो जाएगा, उस पल कभी ठीक ना हो सकने वाले लम्हों का उतर आना उनके दांपत्य को और दुरुह बनाते जाते हैं. अंततः शिवेन अब सब स्वभावत: सब ठीक हो जाएगा के मुगालते से मुक्त होते हुए बेशक एक कष्ट भरा तरीका अपनाते हुए नीम बेहोशी के बाद जागी और शिवेन को एक बार फिर प्यार से आलिंगन कर चूम कर प्रेमिल पलों की फिर कोई भुरभुरी शुरुआत करे, उससे पहले उसके हाथों में भारत लौट जाने का टिकट थमा देता है।
उपन्यास पढ़ने के बाद एक डरावना सवाल सामने खड़ा हो जाता है कि अगर इस टूटी-फूटी देविका के जीवन में परिपक्व अनुभवों के आंच में तपी मृदुला नहीं आती, शिवेन की जिंदगी में सुदीप और ज्योति की जोड़ी नहीं आती तो देविका-शिवेन के दांपत्य जीवन और प्रेम का क्या होता! यह अलग बात है कि अब भी महीने में कम से कम दो बार देविका की “अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती, मुझे तुमसे अलग होना है, मुझे भारत जाना है, मेरी टिकट करवा दो” की रट जारी है।
पूरा ‘साज़-बाज़’ झीने अनुभवों, ईमानदार प्रेमिल रुसवाइयों, रोमानियत भरा जीवन जीने की मासूम चाहतों का ऐसा उपन्यास है जिसमें स्त्रीवाद पर अंतत: प्रेमवाद विजय पाता है. बेशक उपन्यास में बारीक से जज्बातों के लिए सबसे माकूल लफ्जों का प्रयोग हुआ है जिसमें बच्चों के यौन शोषण को बताने के लिए हिंदी के चर्चित कवि बाबा का भी बेलाग चित्रण है. अपनी बेमिसाल रवानी, चुस्त ‘फॉर्मेट’ के कारण भी यह उपन्यास पाठकों को अपनी कैद से कभी रिहा नहीं करेगा.