Saturday, April 18, 2026
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संपादकीय- सफ़ेदी भी स्याह हो सकती है!

इंसान की बनाई हुई कोई भी ऐसी चीज़ नहीं है, जो प्रकृति के लिए हानिकारक न हो। नहाने, कपड़े धोने, भोजन और दवाइयों आदि में इस्तेमाल की गई सामग्री का इंसान के शरीर पर या पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता ही है।

मेरे कुछ मित्र हमेशा शरीर पर एलर्जी की शिकायत करते हैं, मगर उन्हें यह समझ नहीं आ रही कि उन्हें किस चीज़ से एलर्जी है। शरीर पर खुजली भी होने लगती है और कई बार छाती पर लालिमा उभर आती है। मुझे स्वयं भी एक-आध बार ऐसा महसूस हुआ। मैंने इस विषय पर गंभीरता से सोचना शुरू किया। भाग्यवश मेरी नज़रों के सामने यूट्यूब पर एक वीडियो आया, जो कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट में शामिल तत्वों की व्याख्या कर रहा था। यह वीडियो सच में आँखें खोलने वाला था। ब्रिटेन के अग्रणी लॉन्ड्री डिटर्जेंट पाउडरों एवं लिक्विड डिटर्जेंट आदि मनुष्य के शरीर के लिए कितने नुकसानदेह साबित हो सकते हैं, इसकी गहराई से पड़ताल की गई थी।

ज़ाहिर है, साहित्यकार का मन कहाँ संतुष्ट होता है। कल्पना की उड़ान सोचने लगी कि जब ये साबुन और डिटर्जेंट मौजूद नहीं थे, तो इंसान कैसे नहाता और कपड़े धोता होगा। हमारे राजा-महाराजाओं और रानियों के वस्त्र तो आलीशान होते थे, भला उन्हें धोया कैसे जाता होगा? स्नान तो उन्हें भी करना पड़ता होगा, तो फिर हज़ारों सालों में कपड़े धोने और नहाने के साधन क्या रहे होंगे।

यह तो ज़ाहिर है कि आम आदमी और अमीर लोगों के कपड़े धोने और नहाने के साधन अलग-अलग होते होंगे। चाहे किसी भी युग में कितनी भी खुशहाली हो, सुदामा और कृष्ण तो हर युग में होते होंगे। यह भी एक शोध का विषय बनता है कि रामायण और महाभारत काल में नहाने और कपड़े धोने के साधन क्या होते होंगे। वैसे महारानियों को दूध, दही और उबटन से नहाते तो दिखाया गया है, मगर रामायण काल का धोबी कपड़े कैसे धोता था, इसका ज़िक्र कहीं मुझे नहीं मिला।

ऐसा माना जाता है कि वैदिक काल, यानी कि ईसा से लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व, नहाने और कपड़े धोने के लिए नीम, रीठा, शिकाकाई और हल्दी का इस्तेमाल किया जाता था। नीम की पत्तियों और तेल को विशेष रूप से जीवाणु-रोधी माना जाता था। रीठा तो नहाने और कपड़े धोने का राजा कहा जाता था। बाद में महिलाएँ रीठा और शिकाकाई का विशेष रूप से बाल धोने में भी उपयोग करती रहीं। आज तो हमें रीठा और शिकाकाई के शैम्पू भी बाज़ार में दिखाई दे जाते हैं।

गाँव का आम आदमी भी तो यह काम करता ही होगा। खोजने पर पता चला कि नदी और तालाब के किनारे एक सफेद-सा पाउडर बिखरा रहता है, जिसे ‘रेह’ कहा जाता है। इस पर कोई खर्च भी नहीं होता था और भारत में यह प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। बस इस ‘रेह’ को पानी में मिलाकर कपड़े धो लिए जाते थे। हाँ, इस विधि में कपड़े धोने की थापी की ज़रूरत तो पड़ती ही थी। आज के इंसान में नज़ाकत बढ़ गई है, थापी का इस्तेमाल कम से कम शहरों में तो लगभग बंद ही हो चुका है।

हो सकता है कि यह बात ऐसा अहसास दे कि हम प्राचीन भारत की बात कर रहे हैं, मगर सच तो यह है कि कुछ दशक पहले तक भारत के गाँवों में मिट्टी और राख को बदन पर रगड़कर लोग नहाया करते थे। मगर एक ध्यान देने लायक बात यह भी है कि राख और मिट्टी का इस्तेमाल बर्तनों को साफ़ करने के लिए भी होता था। इंसान मिट्टी से बना है, इसलिए सफ़ाई के लिए मिट्टी की ओर ही आकर्षित होता था।

जिसे साबुन की बट्टी कहते हैं, भारत में उसका आगमन अंग्रेज़ी राज के दौरान सन 1897 में लाइफ़बॉय साबुन के रूप में हुआ। वहीं कपड़े धोने के लिए इसी साबुन के निर्माता लीवर ब्रदर्स (भारत में ‘हिंदुस्तान लीवर’) ने सनलाइट साबुन बनाया। हमारे बचपन में ये दोनों ब्रांड बहुत ही लोकप्रिय थे। मगर तब तक हमाम, सिंथॉल, रेक्सोना और लक्स जैसे नहाने के साबुन और कपड़े धोने के देसी साबुन आम मिलने लगे थे।

भारत में पहला लॉन्ड्री डिटर्जेंट ‘लीवर ब्रदर्स’ का ‘सर्फ़’ ही था। उसके बाद तो ऐसे कपड़े धोने के पाउडरों की कतार ही लग गई। रिन कंपनी का विज्ञापन तो उस ज़माने में वायरल ही था-“भला उसकी कमीज़, मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे?” दरअसल यह केवल डिटर्जेंट द्वारा कमीज़ में पैदा की गई सफ़ेदी तक सीमित नहीं था, यह वाक्य जीवन में ईर्ष्या का पर्याय बन गया था। इसे जीवन के हर पहलू में इस्तेमाल किया जाने लगा था।

1988 तक भारत के घरों में कपड़े हाथ से ही धोए जाते थे, चाहे गृहिणी कपड़े ख़ुद धोए या फिर काम करने वाली बाई। 1988 में वीडियोकॉन ने भारत में पहली घरेलू वॉशिंग मशीन से भारतीय घरों का परिचय करवाया। मुझे याद है, यह हरे रंग की होती थी और हमारे घर में भी सबसे पहली वॉशिंग मशीन यही थी। वैसे अमेरिका और यूरोप में तो वॉशिंग मशीन का निर्माण 1939 से ही शुरू हो गया था। वीडियोकॉन की इस मशीन को ट्विन-टब मशीन कहा जाता था, जिसमें दो खाने होते थे-एक में कपड़े धोए जाते थे और दूसरे में उन पर पानी डालकर उनमें से साबुन निकालकर खंगाला जाता था।

फिर यहाँ से टॉप-लोडिंग ऑटोमैटिक मशीन बनी और अंततः आज की आधुनिक फ़्रंट-लोडिंग वॉशिंग मशीन। जब तक कपड़े हाथ से धोए जाते थे, डिटर्जेंट सरल, सादे और हाथों के लिए तुलनात्मक रूप से सुरक्षित होते थे। मगर जैसे-जैसे वॉशिंग मशीनें अत्याधुनिक होने लगीं, डिटर्जेंट आसमान छूने वाले वादे करने लगे और अपनी प्रवृत्ति में कठोर से कठोर होते गए। तमाम कंपनियाँ अपने डिटर्जेंट में इस्तेमाल की गई सामग्री के स्थान पर अधिक पैसा विज्ञापनों पर ख़र्च करने लगीं। उपभोक्ता को विश्वास दिला दिया जाता है कि “उनकी कमीज़ से अधिक सफ़ेद किसी की कमीज़ नहीं।”

ब्रिटेन में जिन आठ लॉन्ड्री डिटर्जेंट्स पर प्रयोग किए गए, उनमें शामिल हैं- सर्फ़, डैज़, बोल्ड, फ़ेयरी नॉन-बायो, एरियल, कंफ़र्ट, पर्सिल और एरियल पॉड्स (Surf, Daz, Bold, Fairy Non-bio, Arial, Comfort, Persil, Arial Pods)। और पाया गया कि इन आठों में जैसे एक प्रतियोगिता चल रही है कि कौन-सा डिटर्जेंट सबसे अधिक हानिकारक है। याद रहे कि ये लॉन्ड्री डिटर्जेंट वहाँ के सबसे अधिक बिकने वाले डिटर्जेंट हैं।

इन उत्पादों के लगातार इस्तेमाल से त्वचा एवं श्वसन संबंधी समस्याएँ, हार्मोनल असंतुलन एवं प्रजनन संबंधी समस्याएँ, और यहाँ तक कि कैंसर का खतरा भी हो सकता है। होता यह है कि डिटर्जेंट में उपस्थित केमिकल पूरी तरह पानी के साथ बह नहीं जाते, वे कपड़ों के ऊपर चिपके रह जाते हैं, और वही इन तमाम बीमारियों का कारण बनते हैं।

इन उत्पादों में सोडियम लॉरिल सल्फेट (SLS) और सोडियम लॉरेथ सल्फेट (SLES) उपयोग किए जाते हैं, क्योंकि ये झाग बनाने वाले एजेंट हैं, जो डिटर्जेंट को झाग बनाने और गंदगी हटाने में मदद करते हैं। मगर इनसे त्वचा में जलन, एक्जिमा और डर्मेटाइटिस होने की पूरी संभावना रहती है, विशेषकर संवेदनशील व्यक्तियों में। ये त्वचा के प्राकृतिक तेलों को हटा सकते हैं, जिससे त्वचा रूखी और जलनयुक्त हो जाती है।

यदि इसमें डाइऑक्सेन की मिलावट भी हो, तो कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। डाइऑक्सेन एक कैंसरकारी रसायन है, जो डिटर्जेंट निर्माण का उप-उत्पाद होता है, और लेबल पर इसका उल्लेख अक्सर नहीं होता।

फ़ॉस्फेट और ईडीटीए (एथिलीनडायमाइनटेट्राएसिटिक एसिड) का उपयोग कठोर जल (हार्ड वॉटर) को नरम (सॉफ़्ट वॉटर) करने और सफ़ाई की क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाता है। ये शरीर पर तो असर करते ही हैं- त्वचा में जलन और एलर्जी पैदा करते हैं- साथ ही वातावरण को भी दूषित करते हैं। ये बायोडिग्रेडेबल नहीं होते और वॉशिंग मशीन से निकलने वाले पानी में जीवित बने रहते हैं, जिससे पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुँचता है।

ऑप्टिकल ब्राइटनर्स (कपड़ों में चमक पैदा करने वाले पदार्थ) का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि कपड़े अधिक सफ़ेद और चमकदार दिखाई दें। ये अल्ट्रा-वायलेट किरणों का उपयोग करके कपड़ों को अधिक उजला दिखाते हैं, मगर इनसे एलर्जी और त्वचा में जलन हो सकती है। साथ ही हार्मोनल असंतुलन भी हो सकता है। कपड़े धोने के बाद भी ये कपड़ों में चिपके रहते हैं, जिससे त्वचा पर इनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहता है।

कृत्रिम सुगंध उपभोक्ताओं को आकर्षित करती है। विज्ञापनों में जब एक सुंदर नारी धुले हुए कपड़ों को सूँघकर मस्ती में आँखें बंद कर लेती है, तो उपभोक्ता के मन में लॉन्ड्री डिटर्जेंट के प्रति आकर्षण पैदा होता है। ताजगी भरी खुशबू के लिए कृत्रिम सुगंध मिलाई जाती है, लेकिन इनमें अक्सर हानिकारक रसायन होते हैं। इनसे श्वास संबंधी समस्याएँ, सिरदर्द और एलर्जी हो सकती है।

क्लोरीन ब्लीच (सोडियम हाइपोक्लोराइट) दाग-धब्बे हटाने और कपड़ों को सफ़ेद करने वाले डिटर्जेंट में पाया जाता है। मगर यह ब्लीच विषाक्त गैसें छोड़ता है, जिससे श्वसन संबंधी समस्याएँ और आँखों में जलन हो सकती है। अन्य रसायनों के साथ मिलकर यह कैंसरकारी उप-उत्पाद उत्पन्न कर सकता है। यह जल स्रोतों को दूषित करता है, जिससे जलीय जीवन को नुकसान पहुँचता है। सोचिये विश्व भर में कितनी करोड़ों वाशिंग मशीनें हर रोज़ कितना प्रदूषण वातावरण में फैला रही होंगी और पर्यावरण को किस कदर नुकसान पहुंचा रही होंगी।

अमोनिया से बने ‘क्वाट्स’ (Quats) जीवाणुरोधी एजेंट होते हैं, जो दुर्गंध दूर करने में सहायक होते हैं। मगर ये स्वयं अस्थमा, फेफड़ों में जलन और त्वचा की संवेदनशीलता से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न कर सकते हैं। साथ ही ये एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया के विकास में भी योगदान दे सकते हैं।

तो आपने देख लिया कि आजकल के कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट में मौजूद रसायन त्वचा में जलन से लेकर हार्मोनल असंतुलन और कैंसर के खतरे तक, कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकते हैं। प्राकृतिक और विष-रहित विकल्पों को चुनकर आप अपने स्वास्थ्य और पृथ्वी, यानी कि पर्यावरण-दोनों की रक्षा कर सकते हैं।

पर्यावरण के अनुकूल कपड़े धोने वाले डिटर्जेंट का इस्तेमाल शुरू करें, हानिकारक रसायनों से बचें और अपने घर को एक सुरक्षित और स्वस्थ स्थान बनाएं। अब समय आ गया है कि हम सफ़ाई को और अधिक बेहतर बनाएं, न कि कठोर।

आज हमने आपके सामने सफ़ेदी का दावा करने वाली डिटर्जेंट कंपनियों का स्याह चिट्ठा प्रस्तुत कर दिया है। सच ही कहा गया है कि सफ़ेद भी स्याह हो सकता है!

 

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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4 टिप्पणी

  1. अच्छी जानकारी लेकिन ये तलाश करना कि कौन सबसे कम हानिकारक ही मुश्किल है क्योंकि सभी कहीं न कहीं हानिकारक तो हैं ही, हम सब एक नकली हानिकारक और मिलावटी वस्तुओं के उपयोग करने को अभिशप्त हो चुके हैं, यही है हमारे आधुनिक जीवन का सच

  2. इंसान प्रकृति के करीब था तो बीमारियां भी कम थीं अब जीवन जीने के कृतिम साधन रासायनिक तत्वों से भरे हुए हैं अतः तरह तरह की बीमारी देखने सुनने में आ रहीं हैं।बचपन में माँ को रीठा उबालकर उसके पानी से उलन के कपड़े धोते देखा था शिकाकाई से हम बाल धोते थे, लंबी चोटियों का जमाना याद आ गया दुनिया बहुत आगे बढ़ गई।
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

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