Saturday, April 18, 2026
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प्रवीण बनजारा  की कहानी – दुख के साथी

सृजन ने अपनी चाल तेज कर ली थी। मुझे उसके साथ कदम मिला कर चलना कठिन होता जा रहा था और मैं शनैः शनैः पिछड़ती जा रही थी। मैं जानती थी कि अपने बचपन की सहेली से मिलने का उत्साह सृजन को प्रेरित कर रहा था। मैं उसके उत्साह पर पानी नहीं डालना चाहती थी। बचपन की दोस्ती होती ही ऐसी है।

कमलेश से बिछड़े सात बरस से ऊपर हो आए हैं। छः माह पहले जब दिल्ली स्टेशन पर पाँव रखा था मुझे सबसे पहले कमलेश की याद आई थी।

जाने से पहले कमलेश मुझ से घर मिलने आई थी। बहुत उत्तेजित थी। अपने घर जो जा रही थी। किराये के घर में रहते हुए वह प्रसन्न नहीं थी। सदा कहती रहती थी कब अपने घर जाना होगा, कब अपना घर होगा हमारा। सदा यही चिंता लगी रहती थी उसको।

बोली थी, ‘सुगंधा, कल सुबह ही निकल जाएंगे हम। उस समय मिलना न हो पाएगा। घर का सारा सामान भी संभालना होगा। सोचा अभी मिलती चलूँ।‘

‘हाय, जी में ठंड पड़ गई सुन कर। बहुत बहुत बधाई हो तुम सबको।‘

कुछ देर बैठी रही वह। हम दोनों पुरानी यादों को ताजा करने के साथ साथ भविष्य में भी उड़ानें भरते रहे।

कमलेश बोली, ‘सुगंधा, मैं रोज भगवान से प्रार्थना करूँगी कि तू भी अपने घर जाए। तुझे भी किराए के मकानों से छुट्टी मिले। तेरे सर पर भी अपने घर की छत हो।‘

‘तेरे मुंह में घी शक्कर। भगवान तेरी बात सच करे।‘, मैं जानती थी वह यह बात दिल से कह रही है।

कमलेश के पति जयदेव एक सरकारी महकमे में नौकरी करते थे। दो बच्चे थे। रीतिका दस साल की और विमल छः साल का। रीतिका की सृजन से बहुत बनती थी, दोनों एक ही उम्र के जो ठहरे। मेरी बेटी गीता सृजन से चार साल छोटी थी।

कमलेश दुखी रहती थी कि उसे एक छोटे से घर में रहना पड़ रहा है। ऐसा कभी सोचा भी न था। माँ का घर तो इतना बड़ा था। जयदेव का पुश्तैनी घर आगरा में था। परंतु क्या करते, नौकरी तो दिल्ली में ही लगी थी। यहाँ घर खरीद पाना अभी संभव नहीं था।

पिछले बरस कुछ ऐसा हुआ कि जयदेव के पिता ने अपनी एक संपत्ति बेचकर उससे मिला धन अपने बच्चों में बांट दिया। जयदेव जी के पास इतना धन आ गया कि वे दिल्ली में घर खरीदने की सोच सकते थे। और उन्होंने खरीदा भी।

उस शाम दोनों पुरानी यादों को ताजा करते रहे। कमलेश बहुत उत्तेजित थी। रह रह कर मेरा हाथ पकड़ती, मुझे गले लगाती, बिना वजह हँसने लगती।

‘सुगंधा, मुझे पूरा विश्वास है कि तू बहुत जल्द मुझे अच्छी खबर देगी और अपने इस सुंदर मुख मंडल से बताएगी कि तू अब अपने घर में जाने वाली है। जब वह दिन आएगा तो मुझे बताएगी न? भूल तो नहीं जाएगी?’

‘कैसी बातें करती है। सबसे पहले तुझे ही तो बताऊँगी मैं।‘

‘तो सुगंधा, यह जान ले, जिस दिन तू मुझे यह अच्छी वाली खबर देगी न, मैं हम दोनों का मुंह मीठा करूँगी।‘

इन प्यार भरी बातों के बाद हम दोनों ने कस कर गलबहियां डाली थी और अश्रु पूरित आँखों के साथ एक दूसरे से बिदा ली थी।

‘सृजन!’, मैंने परेशान होकर पुकारा, ‘माँ को छोड़ जाएगा क्या? थोड़ा थम ले।‘

मेरी बात सुन कर सृजन कुछ धीमा हो गया। परंतु अभी भी मुझे उसका पीछा ही करना पड़ रहा था।

‘मम्मी, बस कुछ ही आगे होगा रीतिका का घर। सलेटी रंग का दुमंजिला घर था उनका।‘

कुछ दूर चलने पर सृजन बोला, ‘आगे चल कर एक बड़ा सा गोल चक्कर आएगा। उसके उस तरफ जो सड़क है उस पर ही उनका घर है। बस पहुँच ही गए समझो मम्मी।‘

कमलेश से मेरी मित्रता बच्चों के माध्यम से हुई थी। एक दिन मैं गली में से गुजर रही थी तो मैंने देखा कि सृजन एक प्यारी सी छोटी बच्ची के साथ खेल रहा था। मैंने रुक कर सृजन से पूछा तो उसने बताया कि यह रीतिका है, यहां बगल में रहती है। कमलेश ने मुझे रीतिका से बात करते हुए देख लिया था। वह हमारे पास आ कर बोली, ‘और मैं रीतिका की मम्मी हूँ।‘

इस तरह से हमारी जान पहचान हुई तो वह बढ़ते बढ़ते एक अच्छी मित्रता में बदल गई। उससे कभी कभार मुलाकात होने लगी। कभी वह मेरे घर आ जाती और कभी मैं उसके घर चली जाती। बहुत सारी बातें होती रहतीं हमारी। परंतु उन बातों में एक बात सदा प्रमुख रहती थी, और वह थी किराए के घर में रहने की विवशता। चाहे बात कहीं से भी शुरु होती थी वह अंत में इसी विषय पर आकर रुक जाती थी। हम परिस्थितियों के सामने अपनी विवशता को स्वीकारने की मजबूरी पर दुखी होते। परंतु इन सब बाधाओं से पार जा कर कुछ अच्छा हो ही जाएगा, इस उम्मीद का दामन पकड़े एक अच्छे भविष्य की कामना भी करते रहते।

कमलेश का भाग्य बदला और उसका अपने घर में जाने का संयोग बना। मेरा भाग्य अभी स्पष्ट नहीं था। कब और कैसे अपने घर में जाना नसीब होगा उस समय कुछ समझ नहीं आ रहा था। कमलेश मुझे हौसला बँधाती और धीरज रखने को कहती।

‘सुगंधा, जरा भी निराश न हो। ईश्वर तेरी अवश्य सुनेगा।‘

 

उन दिनों को याद करती हूँ तो चिंता और परेशानी अभी भी अपने सारे शरीर में अनुभव करने लगती हूँ। विवशता की पीड़ा मेरे संपूर्ण अंतर्तम को झकझोर कर रख देती है। वैसी लाचारी मैंने जीवन में कभी अनुभव नहीं की थी।

हमारे मकान मालिक ने हमारे खिलाफ अदालत में केस कर दिया था। हमें अदालत से मकान खाली करने के नोटिस पर नोटिस आ रहे थे। कोर्ट समन के तामीलकर्ता को चाय पानी का खर्चा देकर जैसे तैसे हम पेशी को टाल रहे थे। दो तीन बार यह हो चुका था। पिछली बार तामीलकर्ता ने कह दिया था कि मेरी शिकायत हो गई है। इसके बाद मेरे पास समन की तामील करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाएगा। आप लोग अपना प्रबंध कर लीजिए।

वस्तुस्थिति यह थी कि जिस मकान में हम रह रहे थे उसके मालिक का परिवार नीचे रहता था और हम पहले तल पर रहते थे। मालिक बलराम जी के तीन बेटे थे जो उनके साथ ही रहते थे। बड़े बेटे की शादी अभी हाल ही में हुई थी। उसकी शादी से पहले ही उन्होंने मेरे पति अमरीश से कहा था कि अब उन्हें जगह कम पड़ रही है अतः आप कोई और घर देख लीजिए। अमरीश ने उन्हें आश्वासन दे दिया था कि वे चिंता न करें जल्द ही हम किसी और मकान में चले जाएंगे। इस काल में ही अमरीश के भुवनेश्वर के लिए स्थानांतरण के आदेश आ गए। यह सूचना मकान मालिक को दे दी गई। उन्होंने भी सज्जनता दिखाते हुए और समय दे दिया।

परंतु स्थिति में पेचीदगी तब आनी आरंभ हुई जब अमरीश का स्थानांतरण टलता चला गया। पांच छः माह तो शर्मा जी ने परिस्थिति को स्वीकार लिया। इसी अंतराल में उनके बेटे की शादी भी हो गई। तब भी अमरीश को उसके वर्तमान कार्यस्थल से कार्य मुक्त नहीं किया गया और न ही स्थानांतरण आदेश को वापस लिया गया। तीन तीन माह करके उनके स्थानांतरण को टाला जाता रहा। इस कारण से दूसरे घर में जाना भी संभव नहीं हो पा रहा था और हमारे परिवार में सदा तनाव की स्थिति बनी रहती थी। इन परिस्थितियों के कारण दोनों परिवारों के रिश्तों में दरार आती चली गई।

इधर तनाव से अमरीश को उच्च रक्त चाप रहने लगा। मुझ में भी चिड़चिड़ापन सदा बना रहता जो अक्सर क्रोध बन बच्चों पर फूट जाया करता था। बच्चे भी इस वातावरण में दुखी रहने लगे थे।

 

दूसरी ओर कमलेश भी अपने घर से संतुष्ट नहीं थी। घर छोटा था और मकान मालिक उसके रख रखाव के प्रति उदासीन था। देखा जाए तो उसकी परेशानी उतनी बड़ी नहीं थी जितनी हमारी थी परंतु दोनों की समस्या किराये के मकान के विषय में ही थी। अतः जब भी हम मिलते तो बातें किराये के मकानों और उनसे जुड़ी समस्याओं पर आ जाया करती थीं।

कमलेश के दोनों तरफ के परिवार समृद्ध थे। समस्या केवल दिल्ली में पति की नियुक्ति के कारण उत्पन्न हो गई थी। एक ओर हमारे बच्चों की आपसी मित्रता और दूसरी ओर हमारी एक ही विषय पर केंद्रित परेशानियां हमें एक धरातल पर जोड़ देती थीं। जब हम मिलते तो एक दूसरे के दुख दर्द को साझा करते, समझते और परस्पर दिलासा देते। कमलेश से बातें करने से मेरा दिल बहुत हल्का हो जाया करता था। उसके सकारात्मक बोल मेरे सिर से चिंताओं के बोझ को कुछ समय के लिए हल्का कर दिया करते थे। जब भी मैं उससे बात करके घर लौटती तो कुछ दिन अच्छे से बीत जाया करते थे। इतनी इतनी बातें करते हुए दोनों में एक सखी भाव उत्पन्न हो गया था। मुझे लगने लगा था कि इतनी बड़ी दुनिया में मेरा भी कोई साथी है।

उसके जाने के पाँच माह बाद अमरीश को भुवनेश्वर जाने के लिए आदेश मिल गए। कमलेश जाते जाते बोल गई थी कि एक बार अवश्य मिलने आएगी। परंतु उसका आना नहीं हुआ। वह नए घर की सँभाल में व्यस्त हो गई होगी। हम लोग भी एक दिन भुवनेश्वर जाने के लिए रवाना हो गए।

भुवनेश्वर में लगभग सात बरस का प्रवास रहा। उतने समय में हम ने यथा संभव धन जोड़ा। वापस दिल्ली आने तक मैं और अमरीश अपना घर बनाने की बात करने लगे थे। हमारी योजना थी कि दिल्ली पहुँच कर पहला काम यही किया जाएगा। जब हमारी गाड़ी दिल्ली स्टेशन पर आकर लगी थी तो गाड़ी से उतरते ही पहला खयाल मुझे कमलेश का आया था। उसकी वाणी फलीभूत होती दिख रही थी। मैं सोच रही थी कि जब अपने घर की नींव रखेंगे तो कमलेश से मिलने अवश्य जाऊँगी।

हमने दिल्ली आने के वर्ष भर में घर की नींव रख दी थी। अब तो उसके निर्माण का काम भी शुरु हो चुका था। मेरा कमलेश से मिलने का समय आ गया था। उसे जाकर यह खुशखबरी दूँगी और देखूँगी कि वह किस मिठाई से मुंह मीठा करवाती है। अपनी पसंद की या मेरी पसंद की।

‘वो देखो वह रहा!’, सृजन उत्तेजित हो एक घर की ओर इशारा कर रहा था। मैं ने दूर से देखा तो एक सलेटी रंग की ढाई मंजिल की कोठी दिख रही थी। ओह, तो यह है कमलेश का घर।

सृजन दौड़ कर कोठी के गेट पर खड़ा हो गया था और बेसब्री से मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैं धीरे धीरे चलती उसके पास तक पहुँची। गरमी में दस मिनट के चलने ने साँसों को उखाड़ दिया था। समय चेताने का प्रयास कर रहा था। हाँ भाई समझ गई। चालीस पार कर पचास की तरफ उमर बढ़ी जा रही थी। इतना तो बनता है। समय को कौन रोक पाया है। भगवान का शुक्र है कि अपना घर अब बनने ही वाला है। नहीं तो हिम्मत जवाब दे जाती।

मेरा पास तो कमलेश का पता भी नहीं था। उनके नए घर में जाने से पहले एक बार सृजन रीतिका और उसके पापा के साथ उनके नए घर हो आया था। कह रहा था मम्मी मुझे रास्ता याद है। और वास्तव में यह मुझे सीधा कमलेश के घर तक ले ही आया था आज्। मैं उसकी स्मरण शक्ति पर विस्मित हो रही थी।

सृजन के पास पहुँच कर एक पल को मन झिझका। कमलेश इतने बड़े घर में रहती है मुझे नहीं पता था। हाथ बढ़ा कर कॉल बेल बजाई। कुछ ही देर में छरहरे बदन की छोटे कद की एक लड़की बाहर निकली। हमें देख फिर से अंदर चली गई। कुछ पल में बाहर आकर बोली, ‘नमस्ते आण्टी।‘

‘नमस्ते बेटा। कैसे हो?’, वह रीतिका ही थी। बड़ी होने पर पहचान में नहीं आ रही थी। परंतु उसने मुझे पहचान लिया था।

‘ठीक हूँ। आप कैसे हैं?’

‘हम ठीक हैं। तुम्हारी मम्मी से मिलने आए हैं।‘

‘आइए आण्टी।‘, कहते हुए उसने गेट खोला, ‘ऊपर आ जाइए।‘

हम उसके पीछे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए पहली मंजिल पर आ गए। रीतिका ने हमें बैठक में बिठाया।

‘आप बैठिए, मम्मी अभी आ रही है।‘, यह कहकर वह नीचे चली गई।

मैं और सृजन बैठ गए और कमलेश के आने की प्रतीक्षा करने लगे। मैं ने देखा सृजन के चेहरे पर से सारी उत्तेजना विलुप्त हो चुकी थी। वह अन्यमनस्क सा बैठा खिड़की के बाहर देख रहा था। रीतिका ने उससे कोई बात नहीं की थी। मैं उसकी भावनाओं को समझ रही थी। मैंने उसे प्रसन्न करने के लिए मुस्करा कर देखा तो वह भी मुस्करा दिया।

यह घर सड़क से बहुत दूर था। यातायात का शोर यहां तक नहीं पहुँच पाता था। चारों तरफ शांति थी। बाहर से केवल कुछ चिड़ियों की आवाजें आ रही थीं। आस पास अन्य कोठियां दिख रही थीं जिन्हें देख कर अनुमान लगाया जा सकता था कि यहां धनाढ्य लोगों का वास था। अभिजात रहन सहन को मैं वातावरण में स्पष्ट अनुभव कर पा रही थी। यद्यपि कमलेश की बेटी को देख कर अथवा बैठक के रख रखाव से ऐसा नहीं लगता था कि इनके परिवार की वह जीवन शैली होगी जो आसपास दिख रही थी।

रीतिका के व्यवहार ने कुछ निराश अवश्य किया था। उसका ठंडा व्यवहार अप्रत्याशित था। परंतु मुझे इस बात को इतनी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि यह भी तो तथ्य है कि जब हम बिछड़े थे तो वह बहुत छोटी थी। इस अंतराल में वह एक युवा लड़की हो चुकी थी। यह कैसे अपेक्षा की जा सकती है कि वह सृजन से अब भी वैसे ही मिलेगी जैसे तब मिलती थी। तब तो वह सृजन की बहुत बड़ी भक्त थी। अंदर से अब भी होगी। लेकिन बच्चों वाला व्यवहार तो नहीं करेगी न।

मैं ने सृजन की ओर देखा। उसने एक बार दोनों हाथ और दूसरी बार एक हाथ दिखाया। ओह, पंद्रह मिनट बीत चुके हैं। मैंने इशारे से सब्र रखने को कहा। मैं कुछ नकारात्मक सोच कर वातावरण को बिगाड़ना नहीं चाहती थी।

और पाँच मिनट बाद रीतिका पानी के दो ग्लास एक ट्रे में ले आई और हमारे सामने रख दिए। मुझे देख मुस्करा कर जाने लगी थी तो मैंने पूछा, ‘मम्मी अभी व्यस्त हैं?’

‘आण्टी, मम्मी अभी आ रही हैं।‘, यह कह कर वह फिर से नीचे चली गई।

देखते देखते घड़ी की सुई दस मिनट और आगे सरक गई। सृजन अब यहां से चल देने के इशारे कर रहा था। मैंने उसे फिर से धीरज धरने को कहा। शायद किसी काम में फंसी हो। मैंने सामने पड़ी एक पत्रिका उठा ली और उसमें प्रकाशित ग्रीष्मकाल के व्यंजनों की विधि बांचने लगी।

दस मिनट और बीतने पर नीचे से किसी के सीढ़ियां चढ़ने की आवाज आई। कुछ ही देर में कमलेश मेरे सामने खड़ी थी।

‘नमस्ते, सुगंधा। कैसी हो?’

मेरे भीतर की उत्तेजना बाहर आना चाहती थे परंतु मैंने उसे रोकते हुए कहा, ‘मैं बढ़िया हूँ। तुम कैसी हो?’

‘अच्छी हूँ।‘, यह कहते हुए वह बैठ गई। ‘आप लोग आ गए दिल्ली वापस? भुवनेश्वर गए थे न?’

‘हाँ। कुछ समय हो गया आए।‘, मैं ध्यान दिया कि उसने देरी से आने की कोई वजह नहीं बताई थी।

खैर, बातें चल पड़ीं। सब कुछ वैसे ही चल रहा था जैसे इस तरह के मौकों पर चलना चाहिए था। परिवार की कुशल क्षेम, बच्चों की पढ़ाई, इत्यादि पर बातें होती रहीं। मैं प्रतीक्षा करती रही कि वह मेरे अपने घर के बारे में पूछेगी परंतु वह पल नहीं आया। सारे वार्तालाप में न तो कमलेश ने और न रीतिका ने ही सृजन से कुछ विशेष बातचीत की थी। उससे यह पूछ लिया कि वह किस कक्षा में पढ़ता है और फिर मुझसे यही सब बातें करने लगीं।

सृजन की कसमसाहट मैं स्पष्ट अनुभव कर पा रही थी। क्या इन दोनों महिलाओं ने नहीं देखा होगा? दस मिनट बाद रीतिका नीचे गई और कुछ ठण्डे के ग्लास और नाश्ता ले आई।

हमने वह पीया और औपचारिकता के लिए पाँच मिनट और बैठने के बाद मैंने सृजन को इंगित किया और हम उठ कर खड़े हो गए।

‘अच्छा कमलेश चलते हैं।‘

‘ठीक है सुगंधा। अच्छा लगा तुझ से मिलकर।‘

सीढ़ियां उतरकर नीचे आए। सृजन ने गेट खोला और हम बाहर आ कर खड़े हो गए। कुछ पल फिर से औपचारिक बातें हुईं। फिर मैं नमस्ते कर वापसी के रास्ते को मुड़ गई। सृजन बिना कुछ कहे पहले ही आगे जा चुका था। मैं उसकी आहत भावनाओं को समझ सकती थी।

दो मिनट तक हम माँ और बेटा चुपचाप चलते रहे। कहना न होगा कि कदम बहुत भारी भारी से पड़ रहे थे।

सृजन ने कहा, ‘माँ, उन्होंने न आपके नए घर की बात की और न हमारे घर का पता पूछा।‘

‘हाँ, बेटा। उसका यह व्यवहार देख कर मैंने भी उसे आने के लिए नहीं कहा।‘

‘सो तो ठीक है, मम्मी। पर, ऐसा क्यूँ? ये लोग इतना बदले बदले से क्यों हो गए? पहले तो इतना प्रेम करते थे? अब क्या हो गया?’, वह बेचारा परेशान था। मैं तो इससे पहले भी लोगों को बदलते देख चुकी थी परंतु उसके लिए यह नया सा अनुभव था। नया, परंतु जरूरी।

‘हम लोग उनके दुख के साथी थे, बेटा। अब उनका दुख का समय गुजर चुका है। अब वह समय उनके लिए कोई मायने नहीं रखता। उसे वह भूल जाना चाहते हैं। हम उन्हें उनके उस बुरे समय की याद दिलाते हैं। इसलिए हमें देख कर उन्हें अच्छा नहीं लगा।‘

सृजन कुछ देर मेरी ओर देखता रहा फिर उसने बात को समझते हुए सहमती में सर हिला दिया।

सूरज सर के ठीक ऊपर आ गया था। गरमी बहुत थी। हम धीरे धीरे कॉलोनी के बाहर सड़क की ओर बढ़ने लगे जहां से हमें घर जाने का वाहन लेना था।

प्रवीण बनजारा

दिल्ली विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातकोत्तर, सेवा निवृत्त बैंक अधिकारी।

एक कहानी संग्रह ‘मोरपंख’ 2025 में प्रकाशित। कहानियां और कविताएं ‘जानकीपुल’, ‘पाखी’, ‘प्रश्नचिह्न’, ‘पुरवाई’, ‘ककसाड़’ और ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित।

सम्पर्क – एच-0012, विंडसर कोर्ट, सेक्टर 78, नोएडा, उत्तर प्रदेश 201305

मो – 9717879719 मेल – [email protected]

 

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