Sunday, May 3, 2026
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संपादकीय – ख़ून चूसने में भी नख़रा…

क्या आपने कभी यह महसूस किया है कि एक ही कमरे में कुछ लोग मीटिंग कर रहे हैं… मौसम मच्छरों का है और उस कमरे के अँधेरे कोनों में कुछ मच्छर अपने-अपने शिकारों की ओर ताक रहे हैं। कमरे में बैठे तमाम लोग एक ही तरह के कपड़े पहने हैं और उनके जिस्म के लगभग एक समान अंग खुले हुए हैं। मगर मच्छर उनमें से कुछ गिने-चुने लोगों को ही काटते हैं, जबकि कुछ लोगों को तो ख़बर ही नहीं हो पाती कि कमरे में मच्छर मौजूद भी हैं।

वैसे, एक ही परिवार के सदस्यों में भी किसी-किसी को मच्छर अधिक काटते हैं, जबकि कुछ अन्य सदस्यों का ख़ून चूसने में मच्छरों की कोई रुचि नहीं रहती। क्या आपने कभी सोचा है कि मच्छरों के भी नखरे होते हैं? वे हर ऐरे-गैरे का ख़ून चूसकर अपना हाज़मा ख़राब नहीं करना चाहते। उनकी भी अपनी एक लैबोरेटरी होती है, जिसमें यह पता किया जाता है कि कौन-से ग्रुप का ख़ून उनकी सेहत के लिए बढ़िया है।

लगता है जैसे उनके सिस्टम में ही ख़ून के ग्रुप की जाँच करने का कोई यंत्र लगा रहता है। यदि गलती से वे किसी दूसरे ब्लड ग्रुप के व्यक्ति के शरीर पर बैठ भी जाएँ, तो उन्हें भीतर से एक चेतावनी मिल जाती है- “इस व्यक्ति का ब्लड ग्रुप तुम्हारे ऊँचे व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं है!”

करीब छह वर्ष पहले एक शोध किया गया था कि मच्छरों के काटने के पीछे क्या ब्लड ग्रुप का कुछ लेना-देना है। एक बात तो तय है कि मच्छर ‘समान अवसर’ वाली नीति में विश्वास नहीं रखते। उन पर किसी तरह का दबाव नहीं डाला जा सकता कि वे हर व्यक्ति का ख़ून समान रूप से चूसें। यह कोई ऐसी सरकार नहीं है जो समान अवसर की पॉलिसी में विश्वास रखती हो।

शोध में यह पाया गया कि मच्छरों को ‘ओ’ ग्रुप का ख़ून सबसे अधिक पसंद है। इस ग्रुप के लोगों का ख़ून उनकी पहली पसंद है। उसके बाद नंबर आता है ‘बी’ ग्रुप का, और ‘ए’ ग्रुप के ख़ून वाले लोगों में मच्छरों की विशेष रुचि नहीं होती। यदि विज्ञान न होता, तो हम कभी ये अंदर की बात जान ही नहीं पाते, बस “ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम” गाते रहते और मच्छरों को अपना लहू पिलाते रहते।

मगर ऐसा भी नहीं है कि मच्छर केवल ब्लड ग्रुप पहचानकर ही लहू पीते हैं। वैज्ञानिक शोध से पता चलता है कि कई अन्य कारण भी मौजूद हैं, जो किसी व्यक्ति को मच्छरों के लिए अधिक आकर्षक बना सकते हैं, जैसे- आपकी त्वचा में मौजूद सूक्ष्मजीव, आपकी साँस के साथ बाहर निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड, और आपके कपड़ों का रंग (लाल, नारंगी और काला जैसे रंग मच्छरों को अधिक आकर्षित करते हैं)। लेकिन अंततः मच्छरों की पसंद में अधिकांश भिन्नता दो कारकों पर निर्भर करती है- हमारे शरीर की प्राकृतिक गंध और आनुवांशिकी।

जिन लोगों के शरीर अधिक गर्म रहते हैं, मच्छर उनकी ओर अधिक आकर्षित होते हैं। त्वचा पर मौजूद कुछ विशेष बैक्टीरिया भी मच्छरों को आकर्षित करते हैं। लखनऊ के सिविल अस्पताल के वरिष्ठ जनरल फिज़िशियन डॉ. ए. के. श्रीवास्तव के अनुसार, ‘ओ’ पॉजिटिव ब्लड ग्रुप वाले लोगों में अधिक मेटाबॉलिज़्म और यूरिक एसिड होता है। मच्छर कार्बन डाइऑक्साइड की पहचान कर लेते हैं, जो लोग लंबी साँस लेते हैं और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करते हैं, उन्हें मच्छर अधिक काटते हैं। इसके अलावा मच्छर इंसान की खुशबू और बदबू भी पहचान सकते हैं। वे पसीने से निकलने वाले लैक्टिक एसिड और अमोनिया को भी पहचानते हैं। अगर उन्हें आपके पसीने की गंध पसंद आती है, तो वे आपको अधिक काट सकते हैं।

शराब का सेवन करने वाले साहित्यकारों के लिए कोई अच्छी ख़बर नहीं है, खासकर बीयर पीने वाले मित्रों के लिए। जी हाँ, यह सच है कि शराब, विशेषकर बीयर पीने से मच्छर अधिक आकर्षित होते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि बीयर पीने वालों को मच्छर काटने की संभावना अधिक होती है, क्योंकि शराब के सेवन से शरीर का तापमान बढ़ता है और शरीर की रासायनिक संरचना में परिवर्तन होता है। इससे पसीना और कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ जाता है, जो मच्छरों को आकर्षित करता है।

लेकिन इससे एक और सवाल खड़ा होता है- क्या नशे में धुत इंसानों का ख़ून चूसने वाले मच्छर खुद भी नशे में होते हैं? क्या मच्छर ऐसे लोगों का ख़ून चूसकर मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में गाने लगते हैं-
“मुझे दुनिया वालों, शराबी न समझो…” हज़ारों वर्षों से नशे में धुत इंसानों का ख़ून चूसने वाले मच्छरों की भारी संख्या के बावजूद, इस विषय पर अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है।

फ़िलाडेल्फ़िया स्थित पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय की कीट-विज्ञानी तान्या डैपकी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था, “मुझे लगता है कि इसका जवाब ‘नहीं’ है, क्योंकि रक्त में अल्कोहल का स्तर बहुत कम होता है।” लेकिन मच्छरों और अल्कोहल के बीच संबंध पर गहन वैज्ञानिक अध्ययन की तलाश करें, तो सीमित जानकारी ही मिलती है।

नीदरलैंड में किए गए एक प्रयोग से यह बात सामने आई कि नियमित रूप से बीयर पीने का एक अप्रत्याशित प्रभाव यह भी है कि आप मच्छरों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकते हैं। ‘डच’ शोधकर्ताओं ने 26 अगस्त, 2025 को ‘बायोआरएक्सिव’ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया कि यह मादक पेय हमारे रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ाता है। इसकी जाँच के लिए, नीदरलैंड के निजमेगन स्थित राडबाउड विश्वविद्यालय की शोध टीम मादा मच्छरों को देश में आयोजित होने वाले वार्षिक संगीत समारोह ‘लोलैंड्स’ में लेकर आई। उन्होंने कुलिसिडे परिवार से संबंधित ‘एनोफेलेस’ मच्छरों का उपयोग किया।

वर्ष 2023 में शोधकर्ताओं ने आपस में जुड़े शिपिंग कंटेनरों के अंदर एक अस्थायी प्रयोगशाला स्थापित की। वहाँ लगभग 500 लोगों ने अपनी स्वच्छता, आहार और व्यवहार से संबंधित प्रश्नावली भरकर इस अध्ययन में भाग लिया।

इसके बाद वैज्ञानिकों ने प्रत्येक प्रतिभागी की बाँह को मच्छरों से भरे पिंजरे में रखा। कैमरों की सहायता से उन्होंने देखा कि पिंजरे के पास रखे चीनी के डिब्बे की तुलना में त्वचा के पास कितने अधिक मच्छर बैठते हैं।

अध्ययन के परिणामों से पता चला कि जिन लोगों ने आयोजन से 12 घंटे पहले बीयर का सेवन किया था, उनमें मच्छरों के आकर्षित होने की संभावना उन लोगों की तुलना में 1.35 गुना (लगभग 35%) अधिक थी, जिन्होंने बीयर का सेवन नहीं किया था।

‘पुरवाई’ पत्रिका एक साहित्यिक पत्रिका है। हम ऐसा कोई दावा नहीं करते कि हम वैज्ञानिक हैं या हमें हर विषय की प्रामाणिक जानकारी है। हमारी टीम को जब भी कोई ऐसा विषय मिलता है, जो हमारे पाठकों के ज्ञान में वृद्धि कर सकता है, तो हम उस पर गंभीरता से काम करते हैं और अपने पाठकों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने का प्रयास करते हैं।

हमें पूरा विश्वास है कि इस संपादकीय के माध्यम से आप एक ऐसे विषय से परिचित हुए होंगे, जिस पर शायद आज तक आपका ध्यान नहीं गया था।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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19 टिप्पणी

  1. ये संपादकीय सभी को पसंद आयेगा।इसमें मच्छरों के ख़ून पीने का मुद्दा जो है।संपादकीय ब्लड ग्रुप विशेष की भी बात करता है,जो युवाओं को रोचक लग सकता है। आख़िर अनुसंधान का भी तो मामला है।
    दूसरा पहलू वारुणी यानी शराब और बियर पीने वालों का भी है। तीसरा एंगल विशुद्ध वैज्ञानिक है कि शारीरिक गंध और त्वचा पर बैक्टीरिया इत्यादि की मौजूदगी,कपड़ों का रंग तथा अन्य परिस्थितियां भी मच्छरों की पसंद और नापसंद को जाहिर करती है।
    इस संपादकीय का एक कॉमन थ्रेड है और वह है चुटिला और खिलंदड़ा अंदाज़।

  2. रोचक, आपने मच्छरों के आकर्षण के कई स्रोतों और कारणो को बताया।
    नारी हार्मोन ईस्ट्रोजेन मच्छरों को अधिक आकर्षित करते हैं – एक शोध में मैंने पढ़ा था। कुछ तैलीय गंध भी उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक बार मैंने खुद देखा था कि एक भीड़ वाली जगह में एक सज्जन बालों में कोई सुगंधित तेल लगाये थे। उनके सर के पास लगातार मच्छर मंडराते रहे।

  3. आज पता चला कि अखिर मेरा खून मच्छर क्यों अधिक चूसा करते हैं, धन्यवाद

  4. मच्छरों को अपने से दूर रखना हो तो
    बियर का सेवन न करें । बालों और शरीर पर सुगंधित पदार्थ न लगाएं।
    आज की सम्पादकीय का फ़लसफ़ा
    Dr Prabha mishra

  5. मच्छरो ने हमे दीवाना बना रक्खा है
    कछुआ* हर शख़्स ने कमरे में लगा रक्खा है…

    (*: कछुआ छाप अगर बत्ती)

    • पता चला कि कछुए की पीठ पर हो कर सवार / ओ मच्छर राजा हैं करने चले अब शिकार…

  6. मच्छरों पर इस आलेख को पढ़कर आनंद आ गया। मच्छरों के बहाने चुटीले व्यंग्य और कटाक्ष भी खूब रहे।

  7. मज़ेदार आलेख है आ0तेजेन्द्र जी। और आपने जो जानकारी दी है वो वैज्ञानिक शोधों पर भी निर्भर है। मैं भी आपकी जानकारी में अपना अनुभव जोड़ देती हूँ। मुझे मच्छर काफ़ी कम काटते थे (ब्लड ग्रुप AB +) मेरे पति को अधिक काटते हैं (0+) है। लेकिन उनसे विवाह के पश्चात मुझे पहले से अधिक काटने लगे हैं मुझे लगता है कि केमिस्ट्री बदल गई है। हाँ कपड़ों के रंग पर भी मच्छरों का मंडराने काफ़ी निर्भर करता है। और ये भी तो देखिए कि मादा मच्छर ख़ून चूसती है और नर मच्छर पौधों का रस ( (सात्विक भोजन ) तो चुनते तो हैं ही। तेल लगाने का असर तो है ही पर एल्कोहल का भी। एक और बात भी है कि छोटे जीवों में माइक्रो-इवोल्यूशन होता रहता है जल्दी-जल्दी और ये हमारे मॉस्कीटो -रिपैलेंट्स को बेअसर करते रहते हैं हमें और सशक्त बनाने पड़ते हैं। मच्छर की फ़िलासफ़ी तू डाल-डाल मैं पात-पात।

    • ज्योत्सना जी, आपने तो संपादकीय में बहुत सी जानकारी जोड़ दी है… हार्दिक धन्यवाद।

  8. जितेन्द्र भाई: आपके इस बार के सम्पादकीय को पढ़कर मुँह का ज़ायका कुछ ऐसा बदलता हुआ लगा जैसे कोई नई किसम की मिठाई, जो पहले कभी नहीं खाई थी, आज खाने को मिली है। अब सवाल उठता है मच्छरों के बारे में जो आपने बिलटिन लैबॉरेट्री की बात बताई है। उसे पढ़कर तो ऐसा लगता है कि शीघ्र ही इनकी श्रेणी में भी आर्टीफ़िशल इण्टेलोजैंस जल्दी आने वाली है। रही बात इनकी सिलैक्टिविटी की कि किसका ख़ून स्वादिष्ट है जिसे इन्होंने चूसना है। ज़ाहिर है कि अपने शिकार का ख़ून चूसने के बाद बतौर टिप के यह उसके शरीर में कुछ न कुछ अपनी निशानी भी छोड़ जाते होंगे। अब रिसर्च वालों को मच्छरों को बदनाम करने की बनाए यह पता लगाना है कि इनकी छोड़ी हुई निशानी के क्या क्या फ़ायदे हैं। हो सकता है कि ऐसे शोध से पता चल जाए कि फ़लाँ फ़लाँ श्रेणी के, नर या मादा, मच्छरों के काटने से इस इस बीमारी का इलाज हो सकता है। मुझे नेदरलैण्ड की राडबाउड विश्वविद्यालय की शोध टीम से भी शिकायत है कि वो वार्षिक संगीत समारोह में केवल मादा मच्छरों को ही क्यों ले गई।आख़िर पुरुष मच्छरों ने क्या गुनाह किया था कि उन्हें इस आनन्द से वंचित रक्खा गया।
    आजकल के माहॉल में हर चीज़ मुमकिन है। मैं तो यह कहूँगा कि अपने इस सम्पादकीय से आपने जो एक जागृती पैदा की है उस पर अगर शोध किया जाए तो क्या पता किन किन बीमारीयों से लोगों को फ़ायदा पहुँचेगा। मेरी ओर से आपको बहुत बहुत साधुवाद।

  9. वह अच्छी शोध पूर्ण सम्पादकीय। मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं कि मच्छर सभी को समान रूप से नहीं काटते हैं। मेरे परिवार में एक बेटी है, अब तो यहां नहीं है लेकिन बचपन से तब चारपाई में सोते थे। दो बहनें एक साथ सोती थीं और एक के ऊपर ढेरों मच्छर बैठे मिलते थे और तारीफ की बात उसको पता नहीं चलता था।
    शायद तब की प्रजाति और होती होगी, इतना प्रदूषण भी नहीं था, लेकिन परिवार के कुछ ही लोग ऐसे होते थे। वह ओ + थी। बाकी कारणों का अनुभव नहीं। लेकिन पुष्टि आज हुई कि क्यों?

  10. सादर नमस्कार सर….. रोचक लेख है सर…. शोधपूर्ण… बहुत कुछ सीखा भी….
    साधुवाद सर…

  11. इस बार का संपादकीय मच्छरों की जीवन शैली एवं उनके कार्य व्यवहार पर केंद्रित है। गहन अध्ययन एवं विभिन्न संदर्भों से उनकी रुचि आदि के बारे में सटीक जानकारी जुटाई गई है। चुटीले व्यंग्य का छौंक पाठक को गुदगुदाता है।
    मच्छर की पसंदीदा डिश ‘ओ’ ब्लड ग्रुप है। भाई गजब का सेंसर है उसके मस्तिष्क में। इसे ही देख लीजिए…अभी तक यही सुनते आए थे कि शराब और बीयर देवता और मनुष्यों का प्रिय पेय है। आज पता चला कि यह मच्छरों का भी प्रिय पेय है। बीयर पिया हुआ मनुष्य उन्हें काफी पसंद है। आगे और अनुसंधान हों तो इस बात पर आश्चर्य चकित नहीं होना चाहिए कि सृष्टि के सभी जीवधारियों का पसंदीदा पेय शराब ही है।
    मच्छर जायका बदलने के लिए पसीना, त्वचा में सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति, और मुख से उत्पन्न कार्बन-डाई-ऑक्साइड के सम्यक निरीक्षण के उपरांत वहां भी हाथ मार लेता हैं। इनका संसार और इनकी अपनी गतिविधियां रोचक है। नखरों को जोड़ दिया जाए तो ये मानव के काफी करीबी लगते हैं। हौसलों की बात करें तो ये कभी मरने से नहीं डरते हैं। गाजे-बाजे के साथ आक्रमण करते हैं।
    यह संपादकीय जितनी ज्ञानवर्धक है उससे ज्यादा मनोरंजक भी है। इस तरह की विविधता भरी संपादकीयों का हम सदैव इंतजार करते रहते हैं।

  12. आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
    आपने इस संपादकीय में ‘खून चूसने में भी नखरा’ जैसा अनूठा विषय चुनकर यह सिद्ध कर दिया है कि एक सजग साहित्यकार की दृष्टि उन सूक्ष्म पहलुओं तक भी पहुँचती है, जिन्हें हम अक्सर सामान्य मानकर छोड़ देते हैं। मच्छरों के चयन और उनके ‘नखरों’ को जिस चुटीले और खिलंदड़ अंदाज़ में आपने प्रस्तुत किया है, वह पाठक को शुरू से अंत तक बाँधे रखता है। विशेष रूप से मच्छरों के भीतर किसी ‘लैबोरेटरी’ या ‘ब्लड ग्रुप जाँच यंत्र’ होने की कल्पना आपके लेखन में एक बेहतरीन व्यंग्यात्मक रस घोलती है।
    आपने इस संपादकीय में केवल हास्य ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों का भी समावेश बहुत ही संतुलन के साथ किया है। ‘ओ’ ब्लड ग्रुप के प्रति मच्छरों का विशेष प्रेम, मेटाबॉलिज्म, यूरिक एसिड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसे कारकों पर जो प्रकाश आपने डाला है, वह मुझ जैसे अल्पज्ञ पाठक के सामान्य ज्ञान में वृद्धि करने वाला है। आपने विज्ञान को साहित्य के साथ जिस तरह पिरोया है, उससे यह संपादकीय न केवल पठनीय बन गया है, बल्कि एक सूचनात्मक दस्तावेज़ भी बन पड़ा है।
    शराब, विशेषकर बीयर के सेवन और मच्छरों के आकर्षण के बीच के संबंध को आपने नीदरलैंड के राडबाउड विश्वविद्यालय के नवीनतम शोध (2025) के माध्यम से जिस प्रकार पुष्ट किया है, वह आपकी समसामयिक वैज्ञानिक चेतना को दर्शाता है। ‘मुझे दुनिया वालों, शराबी न समझो’ जैसे फिल्मी संदर्भों का उपयोग कर आपने विषय की गंभीरता को मनोरंजन के साथ जोड़ दिया है। यह देखना दिलचस्प है कि कैसे एक छोटा सा कीट भी अपनी पसंद-नापसंद में इतना ‘सलेक्टिव’ हो सकता है।
    आपका यह संपादकीय आपकी प्रखर मेधा और जटिल वैज्ञानिक जानकारियों को सरल, सहज और रोचक भाषा में जनमानस तक पहुँचाने की अद्भुत कला का प्रमाण है। ‘पुरवाई’ के पाठकों के लिए यह सामग्री निश्चित रूप से नई और विस्मयकारी होगी। आपने जिस कुशलता से एक ‘स्याह’ विषय को अपनी लेखनी की चमक से उजला बनाया है, वह लंबे समय तक याद रखा जाएगा। आपकी यह प्रस्तुति साहित्य और विज्ञान के बीच के उस सेतु की तरह है, जो ज्ञान को बोझिल नहीं होने देती।

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