Monday, June 15, 2026
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गजेंद्र रावत की कहानी-  कर्नल की बर्थ डे पार्टी

बाजार के किनारे की दुकान न जाने कैसे संभ्रांत और सफेद पोश शराबियों का अड्डा बन गई है। यहां दुकान के अलावा पीछे पूरा फ्लैट है। वहां खुलकर बैठने, खाने-पीने की सारी व्यवस्था है। लेकिन इस जगह के इस तरह आबाद होने के सबसे बड़ी वजह है कर्नल चोपड़ा के हाथों बना लज़ीज़ मीट ! और अक्सर हफ्ते में दो-तीन दिन इस अड्डे पर हँड़िया चढ़ी ही रहती है। अरे क्या शानदार बनता है, मीट हो या मुर्गा मज़ा आ जाता है बोटियाँ चबाने में,   हड्डियाँ चूसने में ! लोगबाग उंगलियां चाटते रह जाते हैं ! आम तौर पर भी यहाँ मीट बनता रहता है…और आज तो बहुत ही बड़ी बात है, कर्नल साहब की पिचत्तरवीं सालगिरह है। आज तो बनना ही है खूब स्वादिष्ट मीट, उनकी बर्थ डे पार्टी जो ठहरी ! क्या कांबिनेशन है बढ़िया रंगत का कोरमा और कर्नल के हाथों बने पटियाला पैग!

इस वक्त दुकान और पीछे जुड़े फ्लैट पर कर्नल चोपड़ा है और दुकान का लड़का छोटू कर्नल का हुक्म बजाने के लिए तैनात है।   कर्नल भी सारी उम्र फौज में रहा है उसे हुकुम चलाना आता है। यहाँ वह छोटू को कठपुतली की तरह नचा  रहा है।

हॉल के बीचों-बीच डेग चढ़ा हुआ है। कर्नल मीट भूनते हुए वहीं से चिल्लाया, ” ओ छोटू कहां मर गया है, पानी ले आ…”

छोटू दौड़ पड़ा फ्रिज की ओर…

” अबे देख मेरी सिगार कहां रखी है…”

छोटू साथ के कमरे की टेबिल की तरफ चला जाता है।

“ मेरा नजदीक का चश्मा उठा ला। ”

छोटू बैड रूम की तरफ भागा गया।

डेग से जानलेवा महक उठ रही है।

थोड़ी ही देर में छोटू भागदौड़ से तंग आकर चुपचाप पास ही खड़ा हो गया। है तो वो भी चालू रकम ! दलालों के बीच काम करते-करते उसने भी पूरी चालाकियां सीख ली हैं। वह कर्नल के और समीप आकर बड़े ही चापलूसी के अंदाज में बोला, ” आपने तो फौज में बहुत लड़ाइयां लड़ी होंगी ? “

” अबे लड़ी ही नहीं बल्कि जीती हैं। नाम से ही दुश्मन थर-थर कांपता था। ” कर्नल गर्व से सीना फुलाकर बोला। उसके हाथ अभी भी डेग में पलटा घुमा रहे हैं।

” वे आपकी मूंछें देखकर डर जाते होंगे !…लेकिन तब आप जवान रहे होंगे!”

” जवान तो मैं आज भी हूं।” पलटा छोड़ कर्नल ने आगे बढ़कर छोटू की गर्दन अपनी काख में दबा ली  और बोला, ” अब छुड़ा के दिखा !”

छोटू देर तक छटपटाता रहा, फिर धीरे से बोल पाया, ” छोड़ दो कर्नल साहब !”

कर्नल ने छोड़ दिया। इतने में ही छोटू बुरी तरह हांफ गया। वैसे भी वह सूखी-दुबली काया का  कम उम्र लड़का है। थोड़ी देर तक वह गर्दन को हाथ से मसलता रहा फिर बोला, ” मैं तो मानता हूँ, वो तो ये डीलर ही कहते हैं रहते हैं आपको बूढ़ा !”

” ये साले डीलर ! धंधेबाज ! सब के सब बूढ़े हैं, थके हुए  ! अब अरोड़ा को ले लो, पचास का होगा लेकिन लगता सत्तर का है। एक बार उसको कलाई से पकड़ लूं तो छुड़ा नहीं पाएगा !  दावे से कहता हूं। ”  कर्नल कुछ देर रुक गया और फिर बोलने लगा, “और वैसे भी दो पैग में ढेर होने वाले हैं ये सब ! एक जमाना था पूरी बोतल डकार जाया करता था मैं ! इनकी टक्कर की तो मैं अभी भी पी लेता हूं बल्कि फालतू ही पीता हूं इन सबसे, समझे !”

छोटू के तरकश में सवालों के तीर नहीं रहे। वह चुप हो गया और फिल्टर से पानी भरने लगा।

“हां, बोतलें फ्रिज में लगा दे…” कर्नल उसकी तरफ देखकर  सिगार का आखिरी कश खींचकर धुआं छोड़ते हुए बोला, ” यह भी हो गया, ये हरा धनिया बुरक के ढक्कन रख देना। मैं आठ बजे आऊंगा, समझे !”

कर्नल चला गया। आठ बज गए हैं, लोग बाग आने लगे हैं। छोटू ने हॉल में तीनों सोफों को गोलाई में जोड़ दिया है। डेग किचन में रख दिया है।

सबसे पहले पठानी सूट पहने रियल स्टेट का कारोबारी अरोड़ा पहुंचता है। हाथ में लिए कर्नल के बर्थ डे केक को सोफे से घिरी मेज़ पर रखकर एक धौल छोटू की पीठ पर जमाते हैं बोला, ” अभी कोई नहीं आया क्या ? कर्नल साहब…”

दर्द के मारे छोटू कंधे से सिकोड़ कर रह गया, एक हल्की-सी कराह उसके मुंह से निकली, “मर गया!”

” अबे कुछ नहीं होता, जवान लौंडा है तू! ” इतना कहते-कहते वह सोफे पर बैठ गया।

दूसरे नंबर पर सरकारी अधिकारी महापात्रा घुसा, बैठते ही बोला, ” वाह! क्या खुशबू है! और लोग नहीं आए ?  कर्नल  साहब!”

फिर कपड़े का व्यापारी, डॉक्टर और वकील प्रवेश करते हैं। वकील के कंधे पर काला कोट लटका हुआ है। घुसते ही तीनों कोरस में बोले, ” कर्नल साहब नहीं आए…”

कर्नल साहब हमेशा वक्त पर आते हैं। सभी आश्चर्यचकित है वे तो टाइम के पक्के हैं,  फिर?

आखिर में बैंक मैनेजर भीतर आया,  सोफे पर लगभग गिरते हुए बोला, “आज बहुत थक गया हूं। ” हॉल में चारों तरफ देखते हुए फिर बोला, ” कर्नल साहब…”

“थक गया  ! वो कैसे ? पैसे गिनते गिनते…”  चुटकी लेते हुए अरोड़ा बोला, ” हाँ भई बैठे-बैठे भी तो थक जाता है आदमी।”

” बैठे-बैठे पता कितना काम होता है। ” मैनेजर बोला।

” लेकिन काम तो पैसे गिनना है, बस। पता है अब तो नोट गिनने की मशीन आ गई है। मनेजर तू तो बेरोजगार हो गया समझ ले ! “

मैनेजर चुप हो गया।

”  काम तो कोर्ट में होता है, बहस होती है बड़ी-बड़ी किताबें पढ़ कर तैयारी से जाना होता है। जरा सी चूक हो गई तो किसी मासूम को सजा हो सकती है। ” वकील ने मध्यस्थता की।

”  वकालत में क्या मुश्किल है खून किया है तो तीन सौ दो धारा, इसमें करना क्या है , क्या पढ़ना है, सब रट्टा रटाया है। ये तो जज खुद ही देख सकता है, वकील की तो जरूरत ही नहीं है। सब बेकार की बातें  हैं ! ” मैनेजर गुस्से से बोला।

” यार, मैनेजर साहब ठीक कह रहे हैं। ” बड़ी देर से चुप डॉक्टर बोला, ” काम तो हमारा होता है, मरीजों की लाइन लगी रहती है…”

” सब पता है कोई गलती से तुम्हारे पास पहुंच जाए तुम छोड़ते नहीं हो। बीमारी तो अलग बात है, तुम तो पूरा खून ही चूस लेते हो। ” वकील बोला, ” देखा नहीं करोना के टाइम में साधारण से बुखार को  तुमने कहां तक पहुंचा दिया था। “

“ हम डॉक्टर थे तभी तुम बच पाये, नहीं तो सफ़ेद चादर में लपेट देते। पता है कितनी भयंकर थी महामारी ! ”

“ रहने दे, रहने दे मुझे भी बुखार हुआ मैं तो नहीं गया किसी डॉक्टर के पास। अपने आप ठीक हो गया। खामखा का हव्वा बना रखा था। ” वकील तरह-तरह के मुँह बना कर बोलता गया।

डॉक्टर कुछ न बोला। थोड़ी देर के लिए शांति हो गई। अचानक सरकारी अधिकारी बोला, ” यार यह बहस छोड़ो ! नौ बजने को आए कर्नल साहब नहीं आए ? “

सचमुच थका व्यापारी अभी तक चुप था लेकिन यहाँ वह भी बोला, “ हाँ यार कर्नल साहब को तो अब तक आ जाना चाहिये था !”

घड़ी देखकर सभी चिंतित हो गए। अरोड़ा भी हैरान है, अब तक आ जाना चाहिए था कर्नल को ! लेकिन सामने अलमारी में सजी दारू की बोतलें देख वह ज्यादा बेसब्र हुआ जा रहा है बोला, ” यार ऐसा करते हैं एक लवली-लवली लगा लेते हैं। सुरूर बन जायेगा ! “

सभी एक साथ बोले, ” नहीं यार कर्नल साहब का जन्मदिन है और हम सब उनकी कितनी इज्जत करते हैं, बिना उनके तो हो ही नहीं सकता। पहले केक कटेगा, सब ताली बजाएँगे। हैप्पी बर्थ डे कर्नल चौपड़ा ! फिर कर्नल ही तो साकी बनेंगे, वे ही पैग बनाएँगे। “

सभी के बीच से वकील बोलने लगा, “ यार मैं रोज़ इतने लोगों से मिलता हूँ लेकिन कर्नल साहब जैसी पर्सनलटी मैंने नहीं देखी ! मैं बड़े-बड़े हाई कोर्ट के जजों, वकीलों के साथ बैठा हूँ मगर कर्नल के बराबर कोई नहीं ! ”

डॉक्टर भी बड़ी ही चिंता लिए बोला, “ यार कुछ भी कह लो कर्नल ही इस अड्डे का हेड है। उसके बिना तो हम दारू को छू भी नहीं सकते ! ”

अरोड़ा को याद आया, हाँ यार केक भी तो कटेगा…कुछ देर रुक वह वहीं से चिल्लाने लगा, ” फिर ऐसा कर छोटू तू घर जा कर्नल साहब के, उनको ले के आ। ”

बिना किसी तर्क बहस के छोटू निकल पड़ा।

उनके बीच पुरानी बहस फिर शुरू हो गई। वे पहले की तरह एक दूसरे की टांग खींचने लगे।

आधे घंटे में छोटू लौटा। उसके मुंह पे बारह बजे हुए हैं।

” क्या बात है छोटू ? ” अरोड़ा करीब आकर उसके कंधे पर हाथ रखकर बोला।

छोटू उदास, खामोश-सा बना रहा फिर अचानक रोने लगा।

“हो क्या गया है बता क्यों नहीं रहा ? ”  अरोड़ा ने उसे अपने पास खींच लिया और प्यार से बोला, “तू रो क्यों रहा है?”

छोटू रोता रहा फिर अवरुद्ध स्वर में बोला, “कर्नल साहब मर गये!”

सभी खड़े हो गए हैरानी से उनकी आंखें खुली रह गई। एक कोरस में उनके मुंह से निकला, “हैं…”

” अबे क्या कह रहा है ! ” अरोड़ा चिल्लाया।

” मैं सही कह रहा हूं… वहां आंटी जी बता रही थी कि कर्नल साहब नहाए, तैयार हुए फिर आराम करने लेट गए ये कह कर कि आठ बजे उठा देना। ”  छोटू यकायक रुक गया और फिर ज़ोरों से  रोने लगा, रोते-रोते ही बोला, ” फिर वे उठे नहीं…खतम हो गये। “

सभी बैठ गए,  बरबस उनके हाथ माथे पर जा लगे। हॉल में एक अजीब सन्नाटा से छा गया।

” मेरा तो समझो बाप ही मर गया है ! ” अरोड़ा अपनी छाती पिटता हुआ बोला, “ मेरी तो वे वक्त बेवक्त मदद करते रहते थे। कई बार तो घंटे भर में दस लाख का इंतजाम कर दिया था उन्होंने। ”

हर तरफ चुप्पी फैल गई है। मातमी खामोशी छा गई हैं। अलग-अलग तरीके से उनके सब के भीतर एक विमर्श बलवती होने लगा है। सामने खुली अलमारी में रखी दारू की बोतलें और रसोई में मीट का भरा डेग की उपस्थित उन्हें सोचने पर मजबूर कर दे रही है। कर्नल के बनाए मीट की महक उन सब को बैचेन किये दे रही है। कौन पहले बेशर्मी से इस बर्फ की तरह ठोस होती स्थिति को तोड़ेगा !

सभी को अरोड़ा से बहुत उम्मीद है दारू के मामले में वो बहुत कच्चा है, उससे रहा नहीं जाएगा ! वही निकलेगा कोई तरीका!

” कर्नल साहब के घर चलना होगा ! ”अरोड़ा बोला, “ जाऊंगा तो जरूर!”

सभी ध्यान से उसे सुनाने लगे।

” …और मैं वहां सूफी  नहीं जा पाऊंगा, मेरे से सामना नहीं होगा उनके घर वालों का। ” अरोड़ा बोलते बोलते रुक गया, फिर बोलने लगा, ” मैं ऐसे में कर्नल साहब को नहीं देख सकूंगा !”

बीच में मौका देख वकील बोला, ” और गम गलत तो करना पड़ेगा ! “

थोड़ी देर अरोड़ा सोचता रहा फिर उसी गंभीरता से बोतल उठा ली, कुछ छींटें जमीन पर मारता हुआ अपना पैक बनाने लगा।

सभी बड़े ही एकाग्र होकर उसे यह सब करते देख रहे हैं। मौका देख मैनेजर बोला, ” यार मैं भी नहीं देख पाऊंगा कर्नल साहब को, बिना पिए ! थोड़ा नशे से हिम्मत बढ़ती है। “

एक-एक करके सभी मैदान में उतर गये, पैग बनने लगे। डेग से मीट प्लेटों में आ गया। अब वे  पिए जा रहे हैं, खाए जा रहे हैं। कोई कुछ नहीं बोल रहा। दौर पर दौर चल रहे हैं लेकिन वे और दिनों की तरह चीयर्स नहीं कर रहे।  अभी वे दुख भी व्यक्त नहीं कर रहे हैं। मगर वे भीतर से उदास और गमगीन हैं।

कोई तीन-चार घंटे खामोशी से यही सब चलता रहा। सब बोतलें खाली हो गई। डेग में कुछ न बचा। वे सब झूम रहे हैं, न उनसे खड़ा रहा जा रहा है न वे बैठ पा रहे हैं।

रात के ढाई बज गए हैं। अरोड़ा को ज्यादा ही चढ़ गई। वह इस वक्त लड़खड़ाते कदमों से बाहर सड़क पर निकल आया है। अब जोरों से चिल्ला रहा है, ” कर्नल मर गया,  मेरा बाप था वो ! मैं बहुत इज्जत करता था उसकी ! वो मर गया है अब मैं भी मर जाऊंगा। “

बाहर रात का सन्नाटा है, उसे कोई सुनने वाला नहीं है। उसे सड़क पर देखकर आवारा कुत्ते भौंकने लगे हैं। थोड़ी देर में अरोड़ा वहीं फुटपाथ से टकराकर गिर गया है और उठ नहीं पा रहा। बहुत देर तक कोशिश करता फिर हाथ-पाँव छोड़ वहीं लेट गया।

हॉल के भीतर सब धुत्त सोफे पर और यहां वहां पड़े हैं। सामने टेबल पर रखा कर्नल का बर्थ डे केक न जाने कैसे दब गया है। डिब्बा पिचक गया है और केक बड़े ही अजीब तरीके से चारों तरफ फैल गया है लेकिन उस ओर किसी का ध्यान नहीं है। इसी टेबल पर कोई पैर फैला कर आंखें बंद किए सोफ़े पर औंधा पड़ा है। सरकारी अधिकारी टेबल और सोफे के बीच की जगह पर गिर गया है, और वही ढेर-सा हो  गया है, बिलकुल भी हिल-डुल नहीं रहा है।

वकील का काला कोट नीचे गिर गया है और कई पद-चिन्ह उस पर छपे हुए हैं। वकील  वहीं फाइलों का तकिया बनाए पड़ा है। कुछ फाइलें खुल कर फर्श पर फ़ैल गई हैं। वह कभी-कभी बड़बड़ाने लगता है, “ ये मेरा क्लाइंट है मी लॉर्ड, इसकी जमानत होनी है…”

डॉक्टर हॉल से जुड़े वश-रूम गया तो वहीं फिसल गया। वहाँ से दोबारा खड़ा होना उसके लिये संभव नहीं हो पा रहा है। अपने भरी-भरकम शरीर की असमर्थता और वक़्त की नज़ाकत देखते हुए उसने वहीं दरवाजे पर लेटे-लेटे आँखें बंद कर ली हैं।

इस भयावह स्थिति देख छोटू न जाने कब मौका पाकर खिसक गया पता ही न चला।

बैंक मैनेजर के चेहरे पर पता नहीं कैसे केक पुत गया, शायद किसी ने मज़ाक किया हो या वह मुंह के बल केक पर गिर पड़ा हो ! केक की उसी सफेदी के बीच से वह अपनी छोटी-छोटी उल्लू जैसी आंखों से उन सब को ऐसी स्थिति में देख रहा है। सारा हॉल ऐसा लग रहा है मानो लड़ाई का मैदान हो और चारों तरफ लाशें बिछी हुई हो।

उनकी रात वहीं बीत गई।

उन सब की सुबह न जाने कैसे हुई होगी ! और कर्नल चोपड़ा…

गजेंद्र रावत
WP-33C, पीतम पुरा, दिल्ली-110034
9971017136
Email – [email protected]

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