1. कलयुग का कुरुक्षेत्र
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
कलयुग के इस कुरुक्षेत्र में,
पार्थ, तुम्हें ही लड़ना होगा।
सत्य, न्याय और धर्म की खातिर,
रण में आज उतरना होगा।
कलयुग के इस कुरुक्षेत्र में,
पार्थ, तुम्हें ही लड़ना होगा।
हर बार नहीं आएँगे माधव,
अपना स्वरूप दिखलाने को।
हर बार नहीं आएँगे माधव,
गीता का ज्ञान सुनाने को।
रख हाथ में गीता और धनुष को,
स्वयं सारथी बनना होगा।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥
कलयुग के इस कुरुक्षेत्र में,
पार्थ, तुम्हें ही लड़ना होगा।
सत्य, न्याय और धर्म की खातिर,
रण में आज उतरना होगा।
हर बार नहीं आएँगे माधव,
छल, बल, कौशल दिखलाने को।
हर बार नहीं आएँगे माधव,
हर एक उलझन सुलझाने को।
हे पार्थ, स्मरण माधव का
करते-करते बढ़ना होगा।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥
कलयुग के इस कुरुक्षेत्र में,
पार्थ, तुम्हें ही लड़ना होगा।
सत्य, न्याय और धर्म की खातिर,
रण में आज उतरना होगा।
हर बार नहीं आएँगे माधव,
धर्म-अधर्म बताने को।
हर बार नहीं आएँगे माधव,
रण में शंख बजाने को।
हे पार्थ, तुम्हें ही माधव बन,
राजधर्म तय करना होगा।
कलयुग के इस कुरुक्षेत्र में,
पार्थ, तुम्हें ही लड़ना होगा।
सत्य, न्याय और धर्म की खातिर,
रण में आज उतरना होगा।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
2. कर्मण्येवाधिकारस्ते: कलयुग में कवि और अर्जुन का संवाद
हों लक्ष्य बड़े, दूँ कठिन चुनौती।
नाज़ करूँ, असफलता पर।
नाज़ करूँ, असफलता पर।
स्वेच्छा से था, कर्ण, न रण में।
स्वेच्छा से थे, राम, न वन में।
क्या कर्ण किसी से हारा था?
क्या राम न सबको प्यारा था?
बाधाओं का फिर आना क्या,
असफलता से घबराना क्या।
जब राह में काँटे हों केवल,
फूलों की सेज सजाना क्या?
ये कुरुक्षेत्र का अंतिम रण,
तू नर है, तू ही नारायण।
जयकार करो, हुंकार भरो,
जय पुरुषोत्तम, जय पुरुषोत्तम।
जयकार करो, हुंकार भरो,
जय पुरुषोत्तम, जय पुरुषोत्तम।
- चंदन झा (गुरुग्राम)
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