Saturday, June 20, 2026
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यूनियन जैक के बुरे दिन…

एक ज़माना था जब कहा जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूरज नहीं ढलता। कहीं ढलता है तो कहीं उगता है। पूरी दुनिया की पहचान था यूनियन जैक (ब्रिटेन का राष्ट्रीय ध्वज)। इस ध्वज में शामिल हैं सेंट जॉर्ज क्रॉस (इंग्लैंड का ध्वज), सेंट एंड्रूज़ क्रॉस (स्कॉटलैंड) और सेंट पैट्रिक्स क्रॉस (आयरलैंड)। वर्ष 1606 से लेकर 1801 तक इस ध्वज को ‘ग्रैंड यूनियन फ्लैग, किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन’ कहा जाता था, मगर 1801 में इसका नाम बदलकर ‘यूनियन जैक ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड’ कर दिया गया।

सवाल उठ सकता है कि जब यूनियन जैक में इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के ध्वज शामिल हैं, तो फिर वेल्स का झंडा इसमें क्यों दिखाई नहीं देता। इसका कारण यह है कि जब 1606 में पहला यूनियन फ्लैग बनाया गया था, तब तक वेल्स की रियासत इंग्लैंड के साथ एकीकृत हो चुकी थी और एक अलग रियासत नहीं रह गई थी। यूनियन फ्लैग मूल रूप से एक शाही ध्वज था।

‘पुरवाई’ के पाठक अवश्य यह सवाल पूछेंगे कि हमारे संपादक आज बैठे-बिठाए ब्रिटेन के ध्वज के बारे में क्यों बातें कर रहे हैं। अचानक ऐसा क्या हो गया है कि ‘पुरवाई’ पत्रिका को हमें यूनियन जैक का इतिहास बताने की आवश्यकता पड़ गई है।

कारण है, हमारे प्रिय पाठको! … जिस तरह द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात ब्रिटेन विश्व-पटल पर सिकुड़ते-सिकुड़ते एक टापू के समान रह गया, ठीक वैसे ही आज इंग्लैंड के एक छोटे से राज्य में यूनियन जैक और सेंट जॉर्ज क्रॉस के विरुद्ध आवाज़ें उठनी शुरू हो चुकी हैं। सचमुच विश्वास नहीं होता कि किसी देश में उसके अपने राष्ट्रीय ध्वज को “समाज में भय और विभाजन” का अहसास पैदा करने वाला प्रतीक घोषित कर दिया जाए।

भारत में यह समस्या राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर तो पैदा हुई है, मगर भारतीय तिरंगे को एक बार राष्ट्रीय ध्वज घोषित किए जाने के बाद उसके विरुद्ध कोई व्यापक दुष्प्रचार नहीं किया गया।

पूरी दुनिया में ऑक्सफ़र्ड का नाम वहाँ के विश्वविद्यालय के कारण जाना जाता है। इस विश्वविद्यालय में प्रवेश पाना कोई आसान काम नहीं है। ऑक्सफ़र्ड यूनियन में विश्व भर के बड़े नेता वाद-विवाद (डिबेट) के लिए एकत्रित होते हैं और अपनी-अपनी बात खुले मंच पर साझा करते हैं। कभी-कभी ये डिबेट-सेशन भी विवाद के घेरे में आ जाते हैं।

आज का यह संपादकीय लिखने के पीछे भी यही ऑक्सफ़र्ड काउंटी है। ‘काउंटी’ का अर्थ प्रदेश से है। ऑक्सफ़र्ड काउंटी काउंसिल ने एक ऐसा विचित्र निर्णय लिया है, जिसे समझ पाना किसी भी सामान्य ब्रिटिश नागरिक के लिए कठिन होगा। सबसे पहले यह बता दें कि ऑक्सफ़र्ड काउंटी काउंसिल में इस समय नेता के पद पर लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के टिम बेयर्डर आसीन हैं।

ऑक्सफ़र्ड काउंसिल को यूनियन जैक और इंग्लैंड के ध्वज सेंट जॉर्ज क्रॉस के सार्वजनिक प्रदर्शन पर आपत्ति है। दरअसल ऑक्सफ़र्डशायर में ‘रेज़ द कलर्स’ नामक एक दल ने आंदोलन खड़ा कर दिया है, जिसका उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर ये झंडे फहराकर एकता और देशभक्ति को बढ़ावा देना है।

काउंटी भर में अनधिकृत रूप से झंडे लगाने के कारण इस समूह को ऑक्सफ़र्डशायर काउंटी काउंसिल की ओर से कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। काउंसिल का कहना है कि इन झंडों के प्रदर्शन से सामुदायिक सुरक्षा और सामाजिक विभाजन को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। इस आंदोलन को धुर दक्षिणपंथी विचारधाराओं से जोड़ा गया है और इसने एक नए विवाद को जन्म दिया है। कुछ समूह इसे डराने-धमकाने की कार्रवाई बताकर इसका विरोध कर रहे हैं। चुनौतियों के बावजूद यह आंदोलन लगातार बढ़ रहा है और इसका लक्ष्य ब्रिटेन को एकता के प्रतीकों से भर देना है।

याद रहे कि इन दिनों ब्रिटेन की पुलिस पर निरंतर आरोप लगाए जा रहे हैं कि पुलिस यहाँ के गोरे समाज के विरुद्ध कार्रवाई करती दिखाई देती है और उनकी सहानुभूति ब्रिटेन के प्रवासियों के प्रति कहीं अधिक गहरी महसूस की जा सकती है। ब्रिटेन की सरकार ‘राजनीतिक रूप से सही’ दिखने के चक्कर में घोर आपत्तिजनक व्यवहार करने लगी है। सच तो यह है कि जहाँ कहीं भी लोकतंत्र होता है, वहाँ वोट बैंक का बहुत चक्कर रहता है। चुनाव में जीतने के लिए राजनीतिक दल और नेता किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। सत्ता का मोह ऐसा बुरा होता है कि कीर स्टार्मर इतने दबाव के बावजूद कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

मामला कुछ यूँ है कि ऑक्सफ़र्डशायर काउंटी काउंसिल ने हाई कोर्ट में आवेदन किया है, ताकि ‘रेज़ द कलर्स’ समूह के समर्थकों द्वारा चलाए जा रहे झंडे फहराने के अभियान को समाप्त किया जा सके। इस समूह ने पिछले एक वर्ष में पूरे काउंटी की सड़कों पर यूनियन जैक और सेंट जॉर्ज क्रॉस के झंडे लगाए हैं। मगर काउंटी काउंसिल ने समय बहुत ग़लत चुना है। इस समय विश्व कप फ़ुटबॉल चल रहा है और इंग्लैंड ने अपना पहला मैच क्रोएशिया के विरुद्ध 4–2 से जीता है। ऐसे समय में ब्रिटेन देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत है। टिम बेयर्डर और उनके साथियों ने यह सोचा भी नहीं होगा कि ऐसे वक्त में हाई कोर्ट जाना उन्हें कितना महँगा पड़ सकता है।

बुधवार को काउंसिल ने कहा, “ऑक्सफ़र्डशायर में एडरबरी से लेकर वॉलिंगफ़ोर्ड तक के निवासियों ने इस गतिविधि से जुड़े सुरक्षा जोखिमों, धमकियों और मानसिक पीड़ा के बारे में काउंसिल से शिकायत की है। ‘रेज़ द कलर्स’ द्वारा किए जा रहे इस प्रकार के व्यवहार की व्यापकता और निरंतरता ने सुरक्षा जोखिम पैदा किए हैं, समुदायों को मानसिक पीड़ा पहुँचाई है तथा परिषद के कर्मचारियों और निवासियों के विरुद्ध दुर्व्यवहार और धमकियों को बढ़ावा दिया है।”

यदि काउंसिल हाई कोर्ट में दायर अपनी अपील जीत जाती है, तो ऑक्सफ़र्डशायर में कोई भी व्यक्ति यदि राजमार्गों या लैंप पोस्टों पर यूनियन जैक जैसे झंडे फहराता है, तो उसे दो वर्ष तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।

कंज़र्वेटिव पार्टी के काउंसलर लियाम वॉकर के अनुसार, “विश्व कप शुरू हो चुका है और देश भर के समुदाय अपनी राष्ट्रीय टीमों का समर्थन करने के लिए एकजुट हो रहे हैं। ऐसे में अनेक निवासी यह प्रश्न उठाएँगे कि क्या अदालतों के माध्यम से मामले को आगे बढ़ाने का यह सही समय है। ऐसे निर्णय लेते समय हमेशा यह ध्यान रखना चाहिए कि परिस्थितियाँ कैसी हैं। अंततः काउंसिल के प्रत्येक कार्य के लिए धन करदाताओं द्वारा ही उपलब्ध कराया जाता है।”

वहीं काउंटी काउंसिल के नेता टिम बेयर्डर ने अपने निर्णय को सही बताते हुए कहा कि झंडे फहराना कोई राष्ट्रीय गर्व का विषय नहीं है। झंडे फहराना एक ग़ैर-कानूनी कार्य है, जिसके कारण समाज में विभाजन पैदा हो रहा है।

टिम ने ज़ोर देकर कहा कि ऑक्सफ़र्डशायर के निवासियों ने झंडा फहराने को लेकर “असुरक्षा, धमकी और परेशानी” की शिकायत भी की थी। अपनी बात जारी रखते हुए टिम ने कहा, “हमें ऑक्सफ़र्डशायर के विविध समुदायों और हमारे ‘काउंसिल ऑफ़ सैंक्चुअरी’ के दर्जे पर गर्व है। हम काउंटी हॉल में गर्व से यूनियन फ्लैग और सेंट जॉर्ज का झंडा फहराते हैं तथा निवासियों के अपनी निजी संपत्ति पर झंडे प्रदर्शित करने के अधिकार का पूर्ण समर्थन करते हैं।”

उच्च न्यायालय ने कार्यवाही प्रारंभ कर दी है और मंगलवार (23 जून) को रॉयल कोर्ट्स ऑफ़ जस्टिस में सुनवाई होनी है। यदि यह आदेश स्वीकृत हो जाता है, तो यह राजमार्गों पर अथवा उनके आस-पास किसी भी अनधिकृत निर्माण को प्रतिबंधित कर देगा तथा परिषद को आदेश के उल्लंघन की स्थिति में प्रवर्तनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार प्रदान करेगा।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर वैसे भी इन दिनों काफ़ी दबाव में हैं। उनकी कुर्सी के प्रबल दावेदार एंडी बर्नहैम संसद का उपचुनाव भारी बहुमत से जीत गए हैं। उन्होंने इस चुनाव को लड़ने के लिए मैनचेस्टर के मेयर पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। यह चुनाव एंडी बर्नहैम ने मुख्यतः कीर स्टार्मर को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनौती देने के उद्देश्य से लड़ा था। ऐसे समय में ऑक्सफ़र्डशायर काउंसिल का यह निर्णय कहीं वर्तमान प्रधानमंत्री की कुर्सी के लिए घातक सिद्ध न हो जाए।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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5 टिप्पणी

  1. शानदार लिखा। पहली बार पता लगा कि यूनियन जैक में कुल तीन जैक हैं। अभिनंदन।
    Divide and rule की पालिसी पर भारत में राज कर गए डलहौजी और लायड अब देखते हैं कि इस डिवीजन से किस रूल से बच पाते हैं।

  2. आदरणीय सर,
    सादर प्रणाम।
    आपका संपादकीय ‘यूनियन जैक के बुरे दिन….’ पढ़ा। बदलते वैश्विक परिदृश्य और राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के बीच सदियों पुराने राष्ट्रों की अस्मिता किस अनजाने संकट की ओर बढ़ रही है, इस पर आपका यह लेखन एक ऐसा गहरा और अचंभित कर देने वाला विमर्श है, जो सीधे बौद्धिक चेतना पर दस्तक देता है। जिसे पूरी दुनिया कभी एक अपराजेय साम्राज्य के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में देखती रही, आज उसके अपने ही घर में उसके बुरे दिनों की इस खौफनाक और अनूठी हकीकत को आपने जिस आत्मीयता और प्रामाणिकता के साथ उघाड़ा है, उसने भीतर तक सोचने पर विवश कर दिया है।
    यूनियन जैक की जो ऐतिहासिक और संरचनात्मक पृष्ठभूमि आपने रची है, वह अपने आप में अद्भुत है। सेंट जॉर्ज, सेंट एंड्रूज़ और सेंट पैट्रिक्स क्रॉस के अंतर्संबंधों के बहाने ब्रिटेन के ध्वज का पूरा सफर आँखों के सामने जीवंत हो उठता है। वेल्स की रियासत के विलीन होने का ऐतिहासिक कारण बताना ‘पुरवाई’ के पाठकों के लिए अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं रोचक उपलब्धि है।
    ऑक्सफ़र्डशायर काउंटी काउंसिल का वह विचित्र और आत्मघाती निर्णय अत्यधिक चौंकाने वाला है, जिसने सुरक्षा और सामाजिक विभाजन के नाम पर अपने ही राष्ट्रीय ध्वज के सार्वजनिक प्रदर्शन पर आपत्ति जता दी है। जिसे दुनिया ज्ञान, संस्कृति और खुली बहस का सबसे बड़ा केंद्र समझती रही, उसी ऑक्सफ़र्ड की धरती से अपने ही प्रतीकों को ‘भय और विभाजन’ पैदा करने वाला घोषित करवा देना आज के दौर की सबसे कड़वी और अकल्पनीय हकीकत है। पूरे विमर्श में आपकी लेखनी का हुनर और सूक्ष्म राजनैतिक दृष्टि तब और गहरी हो जाती है, जब आप लोकतंत्र के भीतर छिपे ‘वोट बैंक’ के खेल और ‘राजनीतिक रूप से सही’ दिखने की विवशता पर तीखा प्रहार करते हैं। आपने बिल्कुल सटीक रेखांकित किया है कि जब देश फ़ुटबॉल विश्व कप के पहले मैच की जीत के साथ राष्ट्रीय गौरव और देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत है, ठीक उसी समय काउंसिल का हाई कोर्ट जाना कितना बड़ा अंतर्विरोध है! प्रवासियों की सहानुभूति बटोरने और सत्ता के मोह में प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर की डगमगाती कुर्सी तथा एंडी बर्नहैम द्वारा दी जा रही गंभीर चुनौती के समीकरणों को जोड़कर आपने इस विमर्श को जो पूर्णता प्रदान की है, वह लाजवाब है।
    साम्राज्यवादी अतीत के उस कभी न डूबने वाले सूरज के सामने आज के इस लोकतांत्रिक बिखराव और सुलगते राजनैतिक यथार्थ को इतने खरे, बेबाक और आत्मीय अंदाज़ में पिरोता संपादकीय हिंदी पत्रकारिता और वैश्विक समीक्षा की एक अनूठी उपलब्धि है।

  3. स्पष्ट और सूचनाओं से लैस करता हुआ खरा खरा संपादकीय। ग्रेट ब्रिटेन के झंडे का इतिहास सहज सरल रूप से बताया गया है।कभी दुनिया पर राज कर वाले देश में आंतरिक स्थिति अब कलह का रूप लेती जा रही है ।जिसके फलस्वरूप अभी विगत माह एक संपादकीय ब्रिटेन पुलिस की असंवेदनशील रवैये पर था।इसी क्रम में पत्रकारिता के तकाज़े को पूरा करता है ,यह संपादकीय।
    ऑक्सफोर्ड काउंटी के इतिहास को भी सार्थक रूप से खंगाल कर समीचीन मुद्दे से बड़ी ही कुशलता से प्रस्तुत कर दिया गया है।भारत के गीत वंदे मातरम को संदर्भित करते हुए ,बड़ी ही निडरता से ब्रिटेन के वर्तमान नेतृत्व को आईना दिखाया गया है!!! वहीं लोकतंत्र के अंधेरे और छिछले पक्ष को भी इंग्लिश प्रधान मंत्री को भी सीधे सीधे कटघरे में खड़ा कर दिया गया है।राष्ट्रीय झंडा सदैव ही राष्ट्र अस्मिता और प्रेम का प्रतीक होता है।भारत में क्या दुनिया के हर देश में लगभग यही स्थिति है?! तिस पर भी दुनिया को लूट कर अपने म्यूजियम पर गर्व करने वाले अंग्रेज समाज को व्यक्तिगत स्तर और सामाजिक स्तर पर अंतरावलोकन करना हो होगा वरना यही यूनियन जैक कहीं ताश का जैक न बन जाए।
    अंग्रेज देश को आज वही भुगतना पड़ रहा है जो उसने भारत और अन्य गुलाम देशों के साथ किया है जिसमें अरब देशों के बीच यहूदी बहुल राष्ट्र इजरायल झेल रहा है और समूचे विश्व के गरीब और मिडिल क्लास अपनी जेबें कटवा रहे हैं। उम्दा संपादकीय ,,, बधाई हो बधाई

  4. किसी देश का ध्वज संकट में पड़ जाए ये तो विकट स्थिति है ।
    नई जानकारी मिली
    झंडा ऊंचा रहे हमारा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा
    गीत सार्थक होने के दिन नज़र आ रहे हैं ।
    Dr Prabha mishra

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