Wednesday, November 4, 2026
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लेखक गाँव अंतरराष्ट्रीय महोत्सव: वैश्विक संगम का मंच बना देहरादून

(लेखक गाँव अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव 25 से 29 अक्टूबर, 2026)

अंतर्राष्ट्रीय साहित्य, संस्कृति, कला और भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक संगम का मंच बना उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के थानो स्थित ‘लेखक गाँव’।

इस महोत्सव में 70 से अधिक देशों के साहित्यकारों, विद्वानों, शिक्षाविदों, कलाकारों, चिंतकों और संस्कृति-साधकों की भागीदारी ने इसे अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। 

भारत के प्रथम लेखक गाँव में आयोजित पाँच दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय समारोह में विभिन्न भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और सांस्कृतिक अनुभवों के आदान-प्रदान के साथ ही भारतीय अस्मिता तथा विश्वबंधुत्व की भावना को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया गया। 

महोत्सव के प्रथम दिवस के कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के कर-कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ। उद्घाटन सत्र ऋषिकेश स्थित प्रसिद्ध परमार्थ निकेतन आश्रम के वर्तमान अध्यक्ष और आध्यात्मिक प्रमुख परम पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज के पावन सनिध्य में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता मॉरीशस के पूर्व राष्ट्रपति पृथ्वीराज सिंह रूपन द्वारा किया गया। विशिष्ट अतिथि के रूप में सतपाल महाराज (उत्तराखण्ड के कैबिनेट मंत्री),  प्रदीप बत्रा (उत्तराखण्ड के कैबिनेट मंत्री), कुलाधिपति संतोष चौबे (रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल) एवं सुप्रसिद्ध लेखक एवं कथाकार तेजेन्द्र शर्मा, एम. बी. ई. (ब्रिटेन) की उपस्थिति ने कार्यक्रम का मान बढ़ाया। लेखक गाँव के संस्थापक और संरक्षक डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ और लेखक गाँव की निदेशक विदुषी निशंक की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को सुशोभित किया। 

हिमालय की पावन धरती पर आयोजित इस महोत्सव का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को अंतर्राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना और विभिन्न भाषाओं एवं संस्कृतियों के बीच संवाद, समन्वय तथा सहयोग को सुदृढ़ करना रहा। इस अवसर पर देश-विदेश से आए प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए साहित्य, संस्कृति और कला को किसी भी राष्ट्र की आत्मा तथा उसकी सभ्यतागत पहचान का संवाहक बताया गया। इस संदर्भ में लेखक गाँव को ऐसा रचनात्मक मंच बताया गया, जो भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ-साथ विभिन्न देशों के बीच संवाद और सद्भाव को बढ़ावा देने का सफल प्रयास कर रहा है। 

‘लेखक गाँव’ के संरक्षक, उत्तराखण्ड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं पूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने 70 से अधिक देशों की भागीदारी पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि- दुनिया के विभिन्न देशों से लोगों का लगातार यहाँ आने के लिए उत्सुक रहना आयोजन की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है। उन्होंने यह आशा व्यक्त की कि, गंगा की धरती से प्रवाहित हो रही संवेदना और सांस्कृतिक चेतना की यह धारा भविष्य में भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उनके अनुसार, लेखक गाँव द्वारा संपादित की जा रही गतिविधियाँ दुनिया को सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर पर जोड़ने का अथक प्रयास कर रही हैं। यह पहल भारतीय साहित्य, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि दिलाने का सशक्त माध्यम बन रही है। 

महोत्सव के द्वितीय दिवस के समारोहों में देश-विदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, विद्वानों, कलाकारों और संस्कृति-साधकों ने भाग लिया। पद्मश्री डॉ. यशोधर मठपाल (चित्रकार एवं पुरातत्वविद्), प्रो. सच्चिदानंद जोशी (सदस्य सचिव, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली), डॉ. भाग्येश झा (अध्यक्ष, गुजरात साहित्य अकादमी), तेजेन्द्र शर्मा (प्रवासी कथाकार), अनिल जोशी (पूर्व उपाध्यक्ष, केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण संस्थान), इंद्रजीत शर्मा, लेखिका मृदुला कीर्ति (ऑस्ट्रेलिया) प्रो. पुनीत बिसारिया (बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी, उत्तर प्रदेश), डॉ. वैभव गुप्त (राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त के पौत्र) तथा लेखक गाँव की निदेशक विदुषी निशंक सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। 

महोत्सव के तृतीय दिवस के समारोहों में प्रमुख समारोह अटल प्रेक्षागृह में आयोजित उद्घाटन समारोह रहा,  जिसमें योगऋषि बाबा रामदेव, सुप्रसिद्ध कवि पद्मश्री अशोक चक्रधर, प्रो. रमाकांत पांडे (कुलपति, उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार), तेजेन्द्र शर्मा, अनिल जोशी, सुशील कुमार शर्मा,  ऋषभदेव शर्मा, वर्नर वेसलर (स्वीडन), चार्ल्स थॉमस (ऑस्ट्रेलिया) द्वारा सर्वसम्मति से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने का प्रस्ताव पारित किया गया। 

हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव पर चर्चा की गयी। वक्ताओं ने बताया कि यह केवल भाषायी गौरव का विषय नहीं, बल्कि वैश्विक संस्थाओं में अधिकाधिक लोगों की आवाज़ को स्थान देने और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रयास है। हिंदी भारत के साथ-साथ मॉरीशस, फ़िजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो सहित अनेक देशों में प्रवासी समाज की संपर्क भाषा है। फ़िल्म, संगीत, मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने भी इसकी वैश्विक उपस्थिति को मजबूत किया है। 

संयुक्त राष्ट्र की ‘हिंदी@यूएन’ परियोजना के अंतर्गत हिंदी में समाचार, रेडियो कार्यक्रम और महासचिव के संदेश उपलब्ध होना इसकी अंतरराष्ट्रीय उपयोगिता को दर्शाता है। हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने के रास्ते में आने वाली प्रमुख बाधाओं में अनुवाद एवं निर्वचन का खर्च शामिल है, जिसे भारत सरकार और मित्र देश मिलकर दूर कर सकते हैं। 

हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिलने से भारत की अन्य भाषाओं की उपेक्षा नहीं होगी, बल्कि भारतीय भाषाओं की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बढ़ेगी। इससे हिंदी में वैज्ञानिक, तकनीकी और राजनयिक विमर्श को भी प्रोत्साहन मिलेगा। बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन और ग्लोबल साउथ के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में यह संयुक्त राष्ट्र की भाषा-व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा। 

महोत्सव के चतुर्थ दिवस के उद्घाटन सत्र में श्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत (पूर्व मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड एवं सांसद, हरिद्वार), प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी (कुलपति केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) की गरिमामयी उपस्थिति रही। लेखक गाँव के नालंदा पुस्तकालय में डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक‘ की अध्यक्षता में ‘नई शिक्षा नीति: संकल्प से सिद्धि तक‘ विषय पर उत्तराखण्ड के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति एवं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति द्वारा गहन विचार विमर्श किया गया। प्रतिपुष्टि के आधार पर नई शिक्षा नीति के पुनरावलोकन की बात भी कही गई। 

हिन्दी, गढ़वाली, कुमाऊँनी एवं जॉनसारी कवि सम्मेलन का नेतृत्व हिंदी और मैथिली भाषा के एक प्रसिद्ध गीतकार, कवि, निबंधकार और वक्ता डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने किया। 

महोत्सव के पंचम दिवस में मुख्य रूप से ‘योग, आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा: स्वस्थ जीवन की भारतीय दृष्टि’ विषय पर विचार विमर्श किया गया। इसके माध्यम से योग, आयुर्वेद एवं प्राकृतिक चिकित्सा को स्वस्थ जीवन का आधार माना गया। महोत्सव के समापन समारोह में अजय टम्टा (केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन राज्य मंत्री), पुष्कर सिंह धामी (मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड), माननीय प्रो. प्रकाश सिंह (कुलपति, हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय) की गरिमामायी उपस्थिति में महोत्सव का समापन समारोह सम्पन्न हुआ। 

प्रवासी साहित्यकार- महोत्सव में शामिल प्रसिद्ध प्रवासी कथाकार एवं पुरवाई पत्रिका के संपादक तेजेन्द्र शर्मा ने 25 से 27 अक्टूबर तक लेखक गाँव में अपनी सहभागिता के अनुभव साझा करते हुए बताया कि डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक, विदुषी निशंक और बेचैन कंडियाल के स्नेहपूर्ण आमंत्रण पर उन्हें इस आयोजन में भाग लेने का अवसर मिला। उन्होंने आयोजन के दौरान उत्तराखंड के राज्यपाल, मंत्रियों, कुलपतियों, स्वामी चिदानंद और बाबा रामदेव सहित वरिष्ठ साहित्यकारों के साथ मंच साझा करने का उल्लेख किया। साथ ही, युवा लेखकों, शोधार्थियों और प्रवासी लेखकों के साथ संवाद को भी महत्त्वपूर्ण अनुभव बताया। विभिन्न विषयों पर अपने विचार रखने के अवसर ने महोत्सव को साहित्यिक विमर्श और वैचारिक आदान-प्रदान का मंच बनाया। 

कथाकार  तेजेन्द्र शर्मा की टिप्पणी में आयोजन के सामाजिक और व्यक्तिगत अनुभवों की झलक भी दिखाई देती है। उन्होंने आयोजन से जुड़े लोगों के स्नेह और आतिथ्य का उल्लेख करते हुए अपनी सहभागिता को यादगार बताया। उनकी प्रतिक्रिया इस बात की ओर संकेत करती है कि ऐसे महोत्सव केवल औपचारिक मंचों और विशिष्ट अतिथियों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि रचनाकारों के बीच व्यक्तिगत संपर्क, संवाद और नए संबंधों के निर्माण का अवसर भी प्रदान करते हैं। 

सांस्कृतिक कार्यक्रम- महोत्सव के दौरान लेखक गाँव के अटल प्रेक्षागृह में 25 से 28 अक्टूबर तक संध्या को आयोजित किया जाने वाला सांस्कृतिक सत्र जोश, उत्साह, उमंग, प्रेरणा, समन्वय, प्रेम और स्नेह का प्रतीक प्रतीत हुआ। मुख्य एवं विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में संस्कृति विभाग (उत्तराखण्ड), स्पर्श हिमालय विश्वविद्यालय (देहरादून) और हिमालयीय आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज (देहरादून) के छात्र-छात्राओं की प्रस्तुति अद्भुत और उत्साहवर्धक थी। कार्यक्रम में देश की ही नही बल्कि विदेश की भी संस्कृति को शामिल किया गया। गायन, वादन, नृत्य, नाटक, योग इत्यादि सभी विधाओं का जोशपूर्ण प्रदर्शन छात्रों द्वारा किया गया। नाटक मंचन के माध्यम से युवाओं को दिशा देने का भी कार्य किया गया। पड़ोसी देश नेपाल की संस्कृति, बिहार राज्य की सुप्रसिद्ध प्रकृति पूजन का प्रतीक ‘छठ पर्व’ का भी अतिशय मनोरम नाटकीय मंचन किया गया। शिव शक्ति और नौ दुर्गा के सभी रूपों की प्रस्तुति अद्वितीय थी। सभी सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रेरणादायी और अविस्मरणीय थे। सुप्रसिध्द लोकगायिका पद्मश्री डॉ. माधुरी बर्थवाल एवं सुप्रसिद्ध चिकित्सक पद्मश्री डॉ. बी. के. एस. संजय जी की उपस्थिति ने कार्यक्रम को जीवंत बनाया। विश्व के तीस से अधिक देशों के छात्रों की सहभागिता कार्यक्रम में देखने को मिलीं। 

लेखक गाँव का बहुमुखी आयाम- लेखक गाँव अपने बहुमुखी आयाम को डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के संरक्षण और विदुषी निशंक के निर्देशन में तीव्र गति से पुष्पित और पल्लवित कर रहा है। किसी भी पक्ष को उपेक्षित रखकर विकसित नही हुआ जा सकता, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है- ‘लेखक गाँव’। यहाँ सभी मुद्दों पर विचार विमर्श किए जाते हैं। समारोह के प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय दिवस में विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय ज्वलंत मुद्दे जैसे- समाज या राष्ट्र निर्माण में नारी की भूमिका, युवा शक्ति, बाल सृजन उत्सव, पुस्तक मेला, समकालीन कला-चित्रकला, मीडिया और डिजिटल संस्कृति, समकालीन कथा साहित्य, साहित्य का डिजिटलीकरण, अनुवाद, 21वीं सदी में सिनेमा, साहित्य और पत्रकारिता का स्वरूप, हिन्दी कविता, विदेशों में हिन्दी एवं हिन्दी शिक्षण, जलवायु परिवर्तन और हिमालय, विकसित भारत: सांस्कृतिक पुनर्जागरण और आत्मनिर्भरता, भारतीय ज्ञान परंपरा: वेद, पुराण, उपनिषद और विश्व शांति, वैश्विक प्रवासी चेतना, साहित्य में राष्ट्रबोध, शोध एवं अनुसंधान, युवा लेखन,संस्कृत साहित्य, सरहद पार के स्वर, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: विकसित भारत की आधारशिला हिन्दी का वैश्विक स्वरूप एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा इत्यादि विषयों पर गहन विचार विमर्श किया गया। समारोह के चतुर्थ और पंचम दिवस के केंद्र में देवभूमि उत्तराखण्ड को रखा गया। 

लेखक गाँव को केवल एक परिसर के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं को समर्पित रचनात्मक संकल्प के रूप में विकसित करने की परिकल्पना प्रस्तुत की गई है। महोत्सव में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी ने इस विचार को विस्तार दिया कि साहित्य और कला भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर समाजों को जोड़ने की क्षमता रखते हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के अनुरूप यह आयोजन विविधता के बीच संवाद और साझा मानवीय मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास रहा। 

इस प्रकार, लेखक गाँव अंतरराष्ट्रीय महोत्सव-2026 ने भारतीय ज्ञान परंपरा, साहित्यिक सृजन और सांस्कृतिक संवाद को अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में प्रस्तुत करने का अवसर दिया। और यह देश और दुनिया के सृजनशील मनीषियों का रचनात्मक केंद्र बनता जा रहा है। 70 से अधिक देशों की भागीदारी ने आयोजन की व्यापकता को रेखांकित किया। अब इस पहल के सामने चुनौती यह है कि महोत्सव में बने साहित्यिक और सांस्कृतिक संपर्कों को निरंतर संवाद, अनुवाद, शोध तथा साझा रचनात्मक परियोजनाओं के माध्यम से आगे बढ़ाया जाए, ताकि लेखक गाँव भारतीय साहित्य और संस्कृति के वैश्विक प्रसार का एक प्रभावी केंद्र बन सके। भारतीय साहित्य और संस्कृति का मूल मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का प्रज्वलित उदाहरण लेखक गाँव है। लेखक गाँव साहित्यकारों को एक वैश्विक मंच प्रदान करता है जहां विचार, अनुभव और सृजन की दृष्टि का आदान प्रदान होता है। जलवायु परिवर्तन और कृत्रिम बुद्धिमता वर्तमान समय के दो ज्वलंत मुद्दे हैं। अतः युवा पीढ़ी को जागरूक बनाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि उनके अंदर गुलाम बनने या बनाने दोनों ही प्रवृत्तियाँ न हों। कृत्रिम बुद्धिमता कभी भी मानव बुद्धिमत्ता का स्थान नही ले सकती। अतः मानव द्वारा कृत्रिम बुद्धिमता का प्रयोग अपने कार्यों के सम्पादन में सहायता के लिए किया जाना चाहिए।  

डॉ. मुनमुन
सहायक प्राध्यापक
कालिंदी कॉलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय
ईमेल- [email protected]

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