पतझड़ तुम इतने मनमोहक?
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चटक चमकीले रंगों से सजा,
पतझड़ का यह मौसम,
दे जाता संदेसे कितने,
लगता सुहाना,कितना ओसम।
गिरना और बिखरना,
जीवन का है अंतिम दौर,
मर्मर धीमे अलाप के सूर में,
सुनता इसका मद्धम शोर।
लेते विदा डाल से पत्ते,
छूट जाती जीवन की डोर,
करके श्रृंगारित वसुधा को,
कर जाते मन को सराबोर।
पर्ण विहीन वृक्षों को ढकती
फिर श्वेत बर्फ़ की चादर,
करती विदा,नवपल्लवन के लिए,
देखो,सृष्टि देती कितना है आदर !
डॉ. सुमन शर्मा, कनाडा

प्रकृति के सच को दर्शाती सुंदर कविता।