Tuesday, November 3, 2026
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बाल साहित्यकार डॉ. शकुंतला कालरा से डॉ. फ़ीरोज़ खान की बातचीत  

‘‘बालसाहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि बालमन में जीवन-मूल्यों का बीजारोपण करने का एक सशक्त माध्यम है। बच्चों को उपदेश की घुट्टी पिलाने के बजाय, उनकी कल्पना, जिज्ञासा और वैज्ञानिक सोच को सकारात्मक दिशा देना ही सच्चा बाल-लेखन है। वयस्क दृष्टिकोण को पीछे छोड़कर बच्चों के मानसिक धरातल पर उतरना और उनकी सहज व बालोचित भाषा में रचना करना सार्थक बालसाहित्य की पहली शर्त है। ऐसा आदर्श बालसाहित्य बच्चे को न केवल एक संवेदनशील पाठक बनाता है, बल्कि उसे चरित्रवान, दायित्ववान और सच्चा इंसान गढ़ने में भी अहम भूमिका निभाता है।’’

आपकी साहित्यिक यात्रा में बालसाहित्य का प्रवेश किस रूप में हुआ? क्या यह एक सचेत रचनात्मक निर्णय था अथवा जीवनानुभवों ने आपको धीरे-धीरे बालसाहित्य की ओर प्रेरित किया?

मेरी साहित्यिक यात्रा में बालसाहित्य का प्रवेश एक इत्तफाक है, जैसा कि फ़िल्मों में दिखाया जाता है अनायास और नितांत अप्रत्याशित। यह सोच-विचार कर लिया गया निर्णय नहीं था और न ही मेरे विगत् जीवनानुभवों से प्रेरित था। हाँ! बाद में मेरे जीवनानुव इससे जरूर जुड़ गए। आगे चलकर यही मेरे बालसाहित्य के नींव के पत्थर बने। कभी सोचा नहीं था कि यह मेरी मंज़िल का प्रवेशद्वार है। सन् 1997 में डी. लिट् करते समय दिल्ली विश्वविद्यालय की लायब्रेरी के रिसर्च-फ्लोर में मेरी मुलाकात प्रतिष्ठित बाल-साहित्यकार डा. रत्नलाल शर्मा जी से हुई। उन दिनों मैं अपने शोध-कार्य के लिए वहाँ बैठती थी। वे ‘नंदन’ पत्रिका के लिए एक पौराणिक कहानी लिख रहे थे। रत्नलाल शर्मा जी ने नंदन के संपादक जयप्रकाश भारती जी से मेरा परिचय कराया। भारती जी ने मुझसे कहा कि मैं रामकथा के किसी अश्र्रुत प्रसंग पर बाल-कहानी लिखूँ। ‘पुल टूट गया’ मैंने कहानी लिखी जो जयप्रकाश भारती जी को बहुत पसंद आई और वह नंदन में 1997 के प्राचीन कथा-विशेषांक में छपी। यहीं से मेरी बालसाहित्य की शुरुआत हुई।

उसी महीने ही ‘बालवाणी’ में आधुनिक भावबोध की बाल-मनोविज्ञान पर आधारित कहानी ‘विश्वास’ प्रकाशित हुई। फिर बालवाणी और नंदन दोनों पत्रिकाओं में मैं निरंतर छपने लगी। इसके बाद शीघ्र ही डा. राष्ट्रबंधु, डा. श्रीप्रसाद, शकुंतला सिरोठिया, डा. श्यामलाकांत वर्मा, डा. नागेश पांडेय ‘संजय’ और डा. बालशौरि रेड्डी जैसे महानुभावों से अलग-अलग साहित्यिक-गोष्ठियों में मेरा मिलना हुआ। आगे चलकर नंदन कार्यालय में ही मेरी मुलाकात बालसाहित्य सृजन, आलोचना और इतिहास की त्रिवेणी प्रकाश मनु, देवेन्द्र कुमार, क्षमा शर्मा से हुई। परिचय का यह दायरा विस्तृत होता गया। डा. उषा यादव, योगेन्द्र कुमार लल्ला, बालस्वरूप राही, दिविक रमेश, हूंदराज बलवाणी, विकास दवे, भैरूंलाल गर्ग सरीके प्रतिष्ठित बाल-साहित्यकारों के बालसाहित्य को पढ़कर उसमें न केवल मेरी रुचि जागृत हुई, वरन् बालसाहित्य से मेरा गहरा जुड़ाव हो गया। बालसाहित्य में आने का मेरा पूरा श्रेय डा. रत्नलाल शर्मा जी को जाता है।  केवल बालसाहित्य-सृजन ही नहीं वरन् आलोचना के क्षेत्र में भी वही मुझे लेकर आए।

आपकी दृष्टि में ‘बालसाहित्य’ की मूल संकल्पना क्या है?

बालसाहित्य यानी बच्चों के लिए लिखा गया वह साहित्य, जो बालमन और बाल परिवेश से जुड़ा हो। बालमनोविज्ञान को प्रतिबिंबित करने वाला हो। उसकी पहली अनिवार्य शर्त है कि वह बच्चों का मनोरंजन करने वाला हो। उसे आनंद प्रदान करे। उसकी भाषा-संपदा और ज्ञान-संपदा दोनों का वर्धन भी करे। बालसाहित्य वह है जिसकी रचना बालकों के लिए हो। इसकी भाषा भी बालोपयोगी, सरल अभिधात्मक अर्थ देने वाली हो। दुरूह न हो। वह द्वयार्थी न हो। बच्चे जिसे आसानी से समझ सकें। वह बालक बनकर लिखा जाए विद्वान बनकर नहीं। उन्हें किसी शब्दकोश देखने की आवश्यकता न पड़े। जहाँ तक विषय की बात है, विषय वही होना चाहिए जो बच्चों की ग्राह्य-क्षमता के भीतर हो। ध्यातव्य यह है कि किस उम्र के बालकों के लिए आप साहित्य लिख रहे हैं? शिशु, बाल और किशोर इन तीनों अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए विषय और भाषा का चयन करना चाहिए। बस यही कुछ मूल बातें है। कहना चाहूँगी कि वही बालसाहित्य सार्थक व श्रेष्ठ है जो उन्हें सच्चा सामाजिक बनाए। शिल्प या प्रयोग के बल पर कोई साहित्य श्रेष्ठ नहीं हो सकता।

क्या किसी रचना का केवल बच्चों के लिए लिखा जाना उसे बालसाहित्य बना देता है, अथवा उसके लिए विशिष्ट संवेदना और सौंदर्यबोध भी आवश्यक है?

किसी रचना का केवल बच्चों के लिए लिखा जाना उसे बालसाहित्य नहीं बना देता। उसकी पहली अनिवार्य शर्त है विशिष्ट संवेदना और सौंदर्यबोध। उसमें बच्चों का नटखट संसार हो। उनका भाव-जगत् हो। उनमें लुभावनापन हो, रसीलापन ऐसा हो कि बालकों के साथ बड़े भी आनंद-विभोर हो उठें। मनोविज्ञान का स्पर्श हो। बच्चों में उल्लास का भाव पैदा कर दे। कल्पना की उड़ान हो। सरसता सहृदयता हो। वह बच्चों का मनोरंजन करने वाला हो। उसे आनंद प्रदान करे। साथ ही उनका सही मार्गदर्शन और उनके व्यक्तित्व का चहुँमुखी विकास करने वाला हो। बालसाहित्य रोचक एवं प्रेरक होना चाहिये। रुचियों में परिष्कार लाये और बच्चों में अच्छे संस्कार भरे। साहित्य वही सुन्दर व हितकारी है जिसे पढ़कर बालमन संस्कारित हो। बच्चे देश की भावी पीढ़ी हैं, बालसाहित्य ऐसा हो जो उनके लिए सुदृढ़ धरातल का निर्माण कर सके। वे जागरूक बने। अंधविश्वासी नहीं। उनमें वैज्ञानिक सोच जाग्रत हो। बच्चा जिज्ञासु और ज्ञान-पिपासु होता है। बालसाहित्य ऐसा हो जो बच्चों की जिज्ञासाएं शांत करे। बालसाहित्य बच्चों के मनोभावों, उसकी प्रकृति का प्रतिबिंब होना चाहिए। कविता हो या कहानी उनमें वे अपने मन की प्रतिछवि पाकर पूर्णरूपेण तृप्त हो जाते हैं। सोहनलाल द्विवेदी का भी यही मानना है कि ‘जो बालकों की बात को बालकों की भाषा में लिख दें, वही सफल बालसाहित्य लेखन है। विषय के समान उसकी भाषा भी चाहे वह किसी विधा में हो बालोचित सरल और स्पष्ट होनी चाहिए, बच्चे जिसे आसानी से समझ सकें। उन्हें किसी शब्दकोश देखने की आवश्यकता न पड़े। ध्यातव्य यह है कि किस उम्र के बालकों कि लिए आप साहित्य लिख रहे हैं? शिशु, बाल और किशोर इन तीनों अवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए भाषा का चयन करना चाहिए। बस यही कुछ मूल बातें है।

बालसाहित्य में ‘बालक’ आपके लिए केवल पाठक है या वह एक स्वतंत्र चेतना, व्यक्तित्व और विचार-सत्ता भी है?

बालसाहित्य में ‘बालक’ हमारे लिए केवल एक पाठक मात्र नहीं है, जिसका मनोरंजन करना और उसे आनंद प्रदान करना मात्र ही बाल साहित्यकार का उद्देश्य है। वह एक स्वतंत्र चेतना, व्यक्तित्व और विचार-सत्ता भी है। उसके विचार ज़रूरी नहीं कि लेखक के विचारों के साथ मिले। उसकी अपनी सोच है। आज का बालक अत्यंत मेधावी है। तर्कशील है। उसकी सोच वैज्ञानिक है। वह बिना प्रमाण के आपकी किसी भी बात या फैसले को स्वीकार नहीं करेगा।

एक वयस्क लेखक के लिए बाल-मन की दुनिया में प्रवेश करना कितना कठिन है? क्या बाल साहित्यकार को अपने भीतर के वयस्क को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ना पड़ता है?

बालसाहित्य-सृजन के समय  बाल साहित्यकार को अपने भीतर के वयस्क को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ना होगा। वयस्क मानसिकता का साहित्यकार बच्चों के मानसिक धरातल पर नहीं उतर सकता। बालक और वयस्क की सोच, उसकी कल्पना, उसकी रुचियाँ एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। बच्चों में नई-नई वस्तुओं को देखने, पूछने और समझने की सदैव इच्छा रहती है। जबकि बड़ों के स्वभाव में चंचलता, नटखटपन नहीं होगा। बालसाहित्य के लिए महादेवी वर्मा जी की स्पष्ट सोच है कि- “बालसाहित्य का सृजन तभी सार्थक है जब रचनाकार अपने व्यस्त हृदय में बचपन की स्मृतियों को संजोए।” राष्ट्रकवि सोहनलाल द्विवेदी के अनुसार- “सफल बालसाहित्य वही है जिसे बच्चे सरलता से अपना सकें और भाव ऐसे हों, जो बच्चे के मन को भाएँ। इसके लिए ज़रूरी है बाल साहित्यकार बच्चों की भाषा और भावना को ध्यान में रखकर बालसाहित्य रचे।”

बल-मनोविज्ञान और साहित्यिक सृजन के बीच आप किस प्रकार का संबंध देखते हैं? क्या बाल मनोविज्ञान का अध्ययन बाल साहित्यकार के लिए अनिवार्य है या संवेदनशील अनुभव ही पर्याप्त आधार बन सकता है?

बालसाहित्य-लेखन के लिए केवल संवेदनशील अनुभव ही पर्याप्त आधार हो सकता है। यह भी सच है कि बाल मनोविज्ञान और साहित्यिक सृजन के बीच गहरा और नज़दीकी संबंध है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उत्तम बालसाहित्य बाल-मनोविज्ञान को प्रतिबिंबित करने वाला होता है। अतः बाल साहित्यकार को बाल-मनोविज्ञान का पारखी होना चाहिए। बालसाहित्य के लेखक को बालक के स्वभाव का विधिवत् अध्ययन अवश्य होना चाहिए। तभी वह बच्चों के मानसिक धरातल पर पहुँचकर लिख सकता है। यह कार्य बहुत कठिन भी नहीं है। आयु के हर पड़ाव में हम सबके हृदय के किसी कोने में एक बच्चा आज भी विद्यमान है। उस समय यदि हम उसके व्यक्तित्व से तादात्म्य स्थापित कर लें और उसके मौन की, उसके स्पर्श की भाषा को समझ लें, उसकी कल्पना में विचरण कर लें, तो कोई भी बाल साहित्यकार अति उत्तम बालसाहित्य की रचना कर सकता है। बालक वही साहित्य पसंद करता है, जिसमें उसकी प्रतिछवि हो। उसका मनोजगत् हो। उसके प्रश्नों के उत्तर, उसकी जिज्ञासाओं के समाधान, उसकी उलझनों के सुझाव हों। यानी बालक क्या चाहता है, उसके मनोविज्ञान को समझें।

दखिए, बालक, बाल मनोविज्ञान और बालसाहित्य तीनों एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं। इस संबंध में मैं कहना चाहूँगी कि बालसाहित्य जिनके लिए लिख रहे हैं, पहले उन्हें पढ़ना बहुत ज़रूरी है। उनके मनोविज्ञान को पढ़े बिना, समझे बिना बालसाहित्य लिखा भी नहीं जा सकता। बच्चे क्या चाहते हैं? क्या उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं? अगर बाल साहित्यकार यह समझ लें और बालसाहित्य लिखते समय इस बात को केंद्र में रखें, तो निश्चित रूप से वे सार्थक एवं बालोपयोगी बालसाहित्य लिख पाएँगे। बालक की जिन्हें चिंता है, उनकी समस्याओं, उलझनों से जो सरोकार रखते हैं, वही अच्छे बाल साहित्यकार हो सकते हैं।

अच्छा बाल साहित्यकार बच्चों की वर्तमान आवश्यकताओं और समय के अनुरूप ऐसा साहित्य तैयार करना है, जो उन्हें सही दिशा दे सके। उन्हें संस्कारित कर सके। उनमें वैज्ञानिक चेतना का विकास भी करे और मानवीय संवेदनाएँ भी जगा सके, ताकि उनके चरित्र को मानवीय रिश्तों की खुशबू और बंधुत्व की भावना महका सके। केवल ऐसी रचना करने वाले बाल-मनोविज्ञान के पारखी साहित्यकार ही बालसाहित्य-लेखन के सच्चे अधिकारी हैं।

बालसाहित्य में कल्पना की भूमिका को आप किस रूप में देखते हैं? क्या कल्पना बच्चे को यथार्थ से दूर ले जाती है या वह यथार्थ को समझने और उससे जूझने की नई दृष्टि प्रदान करती है?

यह एक अच्छी परिचर्चा का विषय है। इस संबंध में कुछ विद्वानों का मत है कि कोरा काल्पनिक साहित्य बच्चों को कल्पनालोक का यात्री मात्र बनाता है, जबकि इस संबंध में मेरी राय इससे नितांत भिन्न है। बालसाहित्य का उद्देश्य मनोरंजक और मूल्यपरक होना तो है ही, किंतु साथ ही उसका मुख्य लक्ष्य बच्चों की कल्पना को उद्बुद्ध करना भी है। उसके विचारों की उड़ान को उठाना है। बाल साहित्यकार से यह अपेक्षा की जाती है कि बच्चों को ऐसा साहित्य दिया जाए जो उसे कल्पना का उन्मुक्त आकाश दे सके। यदि कल्पना ही न होगी तो बच्चा कैसे सपने बुनेगा। कल्पना से वह चाँद पर पहुँचने के सपने का साकार कर पाया। मंगल ग्रह तक उतरने की कल्पना करता। चन्द्रग्रह पर उतरना, मंगल पर उतरना उसी कल्पना का परिणाम है। मैं यह मानती हूँ कि कल्पना बालजीवन के लिए अनुपम वरदान है। यही कल्पनाशक्ति ही उसकी सृजनात्मक प्रतिभा को प्रस्फुटित कर उसे पल्लवित, पुष्पित और फलित करती है। कल्पना के बिना जीवन का आनंद ही नहीं है। बच्चा सपनों की दुनिया में विचरण कर प्रसन्न होता है। अतः बाल-साहित्यकार को चाहिए कि वह उसकी कल्पना-शक्ति को पंख दे। बच्चा कल्पना से ही सपने बुनेगा और सपनों से ही इस तरह के आविष्कार करेगा। हमारा विज्ञान इस बात का साक्षी है। इसी कल्पना के द्वारा ही समुद्रतल के रहस्य को हमारे वैज्ञानिक जान पाए। रॉकेट में ग्रह यात्रा की। साहित्यकार की लेखनी में कल्पना और सपनों की वह ताकत है, जो प्रकृति के गोपनीय रत्न-भंडार खोल सकती है।

कल्पना बच्चे को यथार्थ से दूर नहीं ले जाती वरन् वह यथार्थ को समझने और उससे जूझने की नई दृष्टि प्रदान करती है। यथार्थ की पथरीली ज़मीन पर बच्चा जब पैर रखता है तो वह डरता नहीं। साहस जुटा लेता है। दुर्गम से दुर्गम रास्तों में वह अपनी दिशा तलाश लेता है।

बालसाहित्य लंबे समय तक नैतिक शिक्षा और उपदेश से जुड़ा रहा है। आपके विचार में ‘उपदेशात्मकता’ और ‘मूल्यबोध’ के बीच क्या अंतर है? क्या आज का बालसाहित्य उपदेश से मुक्त होकर मूल्यबोध पैदा कर सकता है?

स्वतंत्रता पूर्व जो साहित्य लिखा गया उसमें देशभक्ति और उपदेशात्मकता का स्वर प्रमुख था। बच्चों के व्यक्तित्व और चरित्र-निर्माण की रचनाऐं लिखी जा रही थीं चाहे कविता, कहानी, नाटक या जीवनियाँ हों। इस समय जो बड़ी-बड़ी प्रतिभाएँ प्रौढ़-साहित्य लेखन में थीं, वे उसके साथ बालसाहित्य-लेखन में उतरीं उनमें श्रीधर पाठक, हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारीसिंह दिनकर, सुभद्राकुमारी चैहान, ठाकुर श्रीनाथसिंह, रामनरेश त्रिपाठी आदि थे। इसी के साथ सोहनलाल द्विवेदी, स्वर्ण सहोदर, विद्याभूषण विभु आदि ने कविता विधा के द्वारा देश-प्रेम, एकता और स्वाभिमान की भावना का प्रत्यक्ष उपदेश दिया जो युग की आवश्यकता थी। ‘सरस्वती पत्रिका’ के माध्यम से बालसाहित्य को भी स्थान मिला। देश परतंत्र था। स्वाभिमान की भावनाऐं जाग्रत करने, राष्ट्रप्रेम और देश के प्रति दायित्वबोध कराती, परिस्थिति के अनुसार मार्ग-दर्शन कराती, उत्साह और जोश का संचरण कराती सुंदर कविताऐं लिखीं, जिसमें देशभक्ति और उपदेशात्मकता का स्वर प्रमुख था।

आपके प्रश्न का अगला हिस्सा है, ‘उपदेशात्मकता’ और ‘मूल्यबोध’ के बीच क्या अंतर है? बच्चों के जीवन पर स्थायी प्रभाव स्थापित करने के लिए साहित्य में सामाजिक मूल्यों एवं नैतिकता का समन्वय आवश्यक है। यह ठीक है कि बालसाहित्य बच्चों के थके-हारे मन के लिए मनोरंजन का साधन बनता है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु रह जाए। उसका उद्देश्य बालक के व्यक्तित्व-चरित्र का निर्माण करना भी है। उसे विवेकपूर्ण जीवन-दृष्टि देना भी है। उसे एक सहृदय, संवेदनशील, मानवीय गरिमा से पूर्ण इंसान बनाना भी है। ‘हितेन साहित्य’ अर्थात् साहित्य वही है, जो हित की भावना से युक्त हो। हित का नैतिकता से गहरा संबंध है और हित साहित्य का मूल बिंदु है। जो साहित्य समाज में न्याय, सत्य, धर्म की प्रतिष्ठा स्थापित कर सकता है। यदि इन्हीं मूल्यों को हम बच्चों को आदेश के रूप देते है कि न्याय के मार्ग पर चलो, सदा सत्य का पालन करो, धर्म का आचरण करो तो यह प्रत्यक्ष उपदेश होगा। प्रत्यक्ष उपदेश बच्चे कभी पसंद नहीं करते। भारत में प्राचीन काल में पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाओं में बालसाहित्य को एक थेरिपी की तरह इस्तेमाल किया गया है। आज भी यही परंपरा चली आ रही है। उसे कुछ साहित्यकारों ने आचार-संहिता का रूप मान लिया है। बालसाहित्य को बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के साधन के रूप में माना जाने लगा। बालसाहित्य का उद्देश्य हमने विधि-निषेध मान लिया है। बच्चों को उपदेश की घुट्टी घर में माता-पिता द्वारा, स्कूल में शिक्षकों द्वारा तो पिलाई जाती ही है और फिर यदि साहित्य भी उपदेशपरक हो, तो बच्चे उसे नकार देते हैं। उपदेश उनमें उकताहट पैदा करता है। इस विषय में बाल साहित्यकार एवं बालसाहित्य के शोधकत्र्ता श्री मस्तराम कपूर ‘उर्मिल’ जी लिखते हैं-“प्रत्यक्ष शिक्षा अथवा उपदेश न केवल साहित्य के व्यापक मानदंडों के अनुसार दोष है, बल्कि इसमें बालकों का अपमान भी निहित है।” बाल-समाज को नीति के मार्ग पर चलने की सम्मति यदि किसी कथा-कहानी द्वारा पात्रों के उदात्त चरित्र के माध्यम से प्रदान की जाती है अथवा कहानी का अंत न्याय, सत्य, धर्म, ईमानदारी की जीत के रूप में दिखाया जाता है, तो यह मूल्यबोध हुआ।

आपने आगे पूछा है कि क्या आज का बालसाहित्य उपदेश से मुक्त होकर मूल्यबोध पैदा कर सकता है?  वह कर सकता ही नहीं कर रहा है। समस्याओं का समाधान कर उसे सद्मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा दे सकता है। सच्चे अर्थो में ऐसा साहित्य ही मूल्यपरक साहित्य कहलाता है, जिसके माध्यम से जीवन-मूल्य सहज ही बालमन में रोपित हो जाते हैं। कालांतर में पल्लवित-पुष्पित होते हैं।

वैसे भी आज बच्चे हमसे ज़्यादा समझदार हो गए हैं। वैश्विक युग में हमारे बच्चे को संचार-प्रौद्योगिकी के साधन इंटरनेट, टी.वी., मोबाइल आदि माध्यमों ने वक्त और उम्र से पहले ही वे जानकारियाँ दे दी हैं, जिनसे इस उम्र तक बड़े अनभिज्ञ रहते रहे हैं। ऐसे में, बच्चों को उपदेश देना हास्यास्पद लगता है। उपदेश का जमाना आज नहीं रहा। बच्चे आज आपकी आज्ञा को, आपके उपदेश को शिरोधार्य नहीं करेंगे। बच्चे स्वयं से सीखना ज़्यादा पसंद करते हैं। मैं समझती हूँ, सीधा उपदेश न पाठ्य-पुस्तकों में होना चाहिए और न बालसाहित्य में। देखा गया है कि बालसाहित्य और पाठ्य-पुस्तक दोनों में नीति-कथन बहुत अधिक होते हैं। इस विषय में प्रतिष्ठित बाल साहित्यकार योगेन्द्र कुमार लल्ला जी का मानना है कि- “बच्चे आपसे उपदेश सुनना नहीं चाहते। उन्हें आपका प्यार चाहिए, विचार नहीं। उन्हें चाहिए सरल और मनोरंजक साहित्य। अब यह आपकी कुशलता है कि आप मनोरंजन के साथ किस तरह उन्हें सद्गुणों की ओर उन्मुख करते हैं। उन्हें शहद में दवा मिलाकर पिलाइए। उन्हें खेल-खेल में शिक्षा दीजिए। सबसे पहले साहित्य के प्रति उनकी रुचि जाग्रत होनी चाहिए, अन्यथा हमारा रचना-कर्म निष्फल ही रहेगा।” मेरा मानना भी यही है कि हम उपदेश वाली भाषा, विधि-निषेध की भाषा से परहेज करें और बच्चों की समझ पर अधिक विश्वास करें।

क्या बाल-उपन्यास के लिए कोई अलग शिल्पगत कसौटी होनी चाहिए?

साहित्य जगत् में उपन्यास विधा का अर्थ हुआ जो विधा मानव जीवन के समीप हो अर्थात् जिसमें मानव जीवन का करीब से वर्णन किया गया हो। जो मानव जीवन से करीब से जुड़ा हो। बाल-उपन्यास का अर्थ हुआ वह विधा जो बच्चों के आसपास हो। बालजीवन से जुड़ी हो उसके समीप हो। जिसमें बालकों के संसार का करीब से चित्रण हो। बाल उपन्यास का संबंध बालजीवन से है। उनके जीवन की व्याख्या है। अपने समय के भावबोध अपने समय की चिंताओं की अभिव्यक्ति है। बालकों का अपनी विशिष्ट जीवन होता है। उनका अपना परिवेश होता है। उपन्यास को सामान्य तौर पर यथार्थवादी विधा के रूप में देखा जाता है। उपन्यास और कहानी दोनों ऐसी विधाएँ है जिनका जीवन से निकटतम संबंध है।

वह यथार्थ जिससे बच्चों को एक संदेश मिले कि असल ज़िन्दगी के यथार्थ से आपको कैसे जूझकर राह बनानी है। उसमें उपन्यासकार का एक संदेश कहानी की घटनाओं के परिणाम पात्रों के चारित्रिक विकास से यह दिखाना है कि यह परिस्थितियाँ आपको गिराने के लिए नहीं, ज़िन्दगी की वास्तविकता को समझने के लिए आई है। जैसे एक अनूठा पत्थर को शिल्पकार के हथौड़ों की चोट जब पड़ती है तो वह सुंदर मूर्ति का आकार लेकर सम्मान पाता है। वैसे ही विषम परिस्थितियों से जूझकर/सीखकर आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। हथोड़े की मार उसे कमज़ोर करने के लिए नहीं वरन् उसके व्यक्तित्व को निखारने/तराशने के लिए पड़ती है। वही उसे खास बनाती है। कहना चाहूँगी कि बच्चों के उपन्यास का यथार्थ केन्द्रित कथानक बच्चों को तोड़ने के लिए नहीं होना चाहिए। शिल्प भी बिल्कुल अलग होता है। तत्त्व तो वही होंगे। संवाद छोटे-छोटे होने चाहिए। लम्बे-लम्बे भाषण जैसे नहीं । पात्रों के चरित्र भी बच्चों को एक संदेश देने वाले हों। अनुकरणीय हों। बच्चों के लिए उनके शब्दकोश के अनुसार हो। अन्यथा दुरूह भाषा-शैली उनके रस में बाधा डालती हैं। उसमें अप्रचलित शब्द न हों। क्लिष्ट शब्द न हों। वाक्य छोटे-छोटे हों। कुछ विद्वान उपन्यास तत्त्व के विवेचन में रस को भी एक तत्त्व मानते हैं।

बालसाहित्य की भाषा को प्रायः ‘सरल भाषा’ कहा जाता है। क्या सरलता का अर्थ भाषा की साहित्यिकता को कम कर देना है? आपके अनुसार बालसाहित्य की भाषा में सरलता, सौंदर्य और कलात्मकता का संतुलन कैसे संभव है?

यह सही है कि बालसाहित्य की भाषा को प्रायः ‘सरल भाषा’ कहा जाता है। सरलता का अर्थ भाषा की साहित्यिकता को कम कर देना कदापि नहीं है। सरलता का अर्थ है बालोचित सारल्य यानी वह स्पष्ट होनी चाहिए, बच्चे जिसे आसानी से समझ सकें। भाषा क्लिष्ट न हो। ऐसी दुरूह न हो कि उन्हें शब्दकोश देखना पड़े। सरलता का अपना सौंदर्य है। उसमें कृत्रिमता नहीं होती। वह सहज होती है। उसमें एक रवानगी होती है। जो उसे कलात्मकता प्रदान करती है। भाषा विषय को गौरवान्वित करती है। उसे प्राणवान बनाती है। कृत्रिम भाषा विषय को भी निर्जीव बना देती है।

इस तरह भाषा की सरलता बालसाहित्य का बेसिक गुण है, जो उसे सुन्दरता प्रदान करता है और सरलता तथा सुन्दरता उसे कलात्मक बनाती है। भाषा में वह शक्ति है, जो विषय को आत्मसात् कर सबके लिए प्रेषणीय बनाती है। सुग्राह्य बनाती है। यही सुग्राह्यता उसे सौंदर्य और कलात्मकता प्रदान करती है। ध्यातव्य यह है कि किस उम्र के बालकों कि लिए आप साहित्य लिख रहे हैं? कैशौर्य, बालपन और शैशव बालजीवन की इन तीनों अवस्थाओं के अनुरूप सरल, सरलतर, सरलतम भाषा का चयन करना चाहिए। क्योंकि आयु के अनुरूप ही बच्चे का भाषिक ज्ञान बढ़ता है। उसकी शब्द-संपदा बनती है।

बाल-उपन्यास के संदर्भ में कथानक, चरित्र, संवाद, वातावरण और भाषा इनमें से आप किसे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं?

जैसा कि आप मान रहे हैं कि उपन्यास के यह प्रमुख तत्त्व हैं- कथानक, चरित्र, संवाद, वातावरण और भाषा आदि। देखिए उपन्यास का एक सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व उद्देश्य भी है जो मेरी समझ में सबसे महत्त्वपूर्ण है। प्रत्येक कृतिकार का कृति के लेखन के पीछे कोई-न-कोई प्रयोजन होता है। कोई भी कृति निष्प्रयोजन नहीं होती। आपने जिन तत्त्वों की बात की है। यह सभी तत्त्व एक-दूसरे से संपृक्त हैं जैसे कथानक के साथ देशकाल और वातावरण आएगा ही। इसी तरह भाषा शैली के साथ संवाद तत्त्व भी जुड़ा है। हम देखते हैं कि हर उपन्यासकार अपनी कृति के उद्देश्य के सापेक्ष में अपनी आवश्यकता के अनुरूप अलग-अलग तत्त्व पर बल देता है। किसी भी कृति के लेखन का उद्देश्य ही उसे प्राणवान बनाता है। कृति के आरंभ से लेकर अंत तक कोई-न-कोई संदेश कथानक के ताने-बाने में गूँथा रहता है जिसे लेखक का दृष्टिकोण कहा जाएगा। हर लेखक के पास उसका एक विज़न होता है जिसे आप उसके विचार कह सकते हैं जिसे वह पाठकों तक संप्रेषित करना चाहता है। प्रेमचंद की दृष्टि में उपन्यास का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व चरित्र है जिसके विकास पर वह बल देते हैं। उनका मानना था-“कि मानव चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्य को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।”  मैं सोद्देश्य साहित्य की पक्षधर रही हूँ विशेषकर बालसाहित्य की। चाहे वह किसी भी विधा में हो। मनोरंजन भी एक उद्देश्य है। बालसाहित्य के सामाजिक सरोकार हमें कई रूपों में दिखाई देते हैं। उसे नीति, उपदेश से संयुक्त करके नैतिक मूल्यों के साथ प्रस्तुत करना इसका एक चरण है। ज्ञान या प्रोद्योगिकी से संयुक्त ज्ञान इसका दूसरा चरण है। इस तरह से साहित्य और बाल-समाज का अंतः संबंध है। बाल साहित्यकार समाज में जो घटित हो रहा है और जो घटित नहीं होना चाहिए उसका मार्गदर्शक बनकर नहीं रहता बल्कि समय के जागरुक साक्षी की तरह साहित्य की उपयोगिता वाली भूमिका के प्रति प्रयत्नशील रहता है।

 आपके बालसाहित्य में बाल-पात्र किस प्रकार निर्मित होते हैं? क्या वे आपके प्रत्यक्ष अनुभवों से आते हैं, आसपास के बच्चों से, स्मृतियों से या आपकी कल्पना से?

मेरे बालसाहित्य में बाल-पात्रों का अनेक प्रकार से निर्माण हुआ है। सबसे अधिक वे मेरे प्रत्यक्ष अनुभवों से आते हैं। अपनी कई रचनाओं की बाल-पात्र मैं स्वयं हूँ। अपनी कई कहानियों की, अपने बाल उपन्यास- ‘मिठ्ठी की चिठ्ठी चंदा के नाम’ की प्रमुख पात्र ‘मिठ्ठी’ भी मैं ही हूँ। आत्मकथा ‘मेरा बचपन: उड़ान की चाह में’ भी केंद्रीय पात्र की भूमिका में भी मैं हूँ। कई रचनाओं की बाल-पात्र आसपास के परिवेश के बच्चे भी हैं जिनसे मेरी मुलाकात किसी भी दिन, किसी भी मोड़ पर अचानक हो जाती है। वे मेरे हाथ में बड़े आग्रह से कलम थमा देते हैं और खुद पर्दे के पीछे से देखते हैं कि मैंने कागज़ पर उनकी ज़िन्दगी को किस रंग से रंगा है? कुछ बाल पात्र स्मृतियों में वर्षों से सुप्त पड़े हुए हैं। उनकी किताब के कुछ पन्नों को जब खोलती हूँ तो उस गुजरे वक़्त की अनेक स्मृतियां मानस-पटल पर समय-समय पर उभर आती हैं। उनसे जुड़ी यादों का कौन-सा पन्ना खुल जाता है, जिसे पढ़कर पाठकों को सुनाने लगती हूँ। इसी तरह कुछ मेरे बाल-पात्र मेरी कल्पना से भी उद्भूत हैं। यों समझ लीजिए मेरा बाल- पात्र संसार भानुमति का पिटारा है।

बचपन की कई अवचेतन में पड़ी स्मृतियाँ उभर आती हैं। वे स्मृतियाँ जो कभी धुँधली नहीं हुईं। किसी भी प्रकार से पात्रों का निर्माण किया हो। उसमें कल्पना का अंश तो होगा ही। आदर्शोन्मुख यथार्थ लाने के लिए कल्पना लेती हूँ। वह पात्रों/घटनाओं के अच्छे फल के रूप में दिखता है।

आज का बच्चा उस बच्चे से बहुत अलग है जो दो-तीन दशक पहले था। मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया, गेमिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने उसकी दुनिया बदल दी है। क्या इस बदलती बाल-दुनिया ने बालसाहित्य के कथ्य और शिल्प को भी बदल दिया है?

पहला यह कि आज का बच्चा और किशोर पूरी तरह से संचार-प्रोद्योगिक जनित साधनों की गिरफ़्त में आ चुका है। इन साधनों से प्राप्त बच्चों की स्थिति, दुर्गति, उपयोगिता और अनुपयोगिता, हितकर और अनहितकर रूप इन संसाधनों ने बच्चों को असीम ज्ञान और देश-दुनिया की दुर्लभ जानकारियों मुहैया कराई हैं। बच्चों में नई-नई वस्तुओं को देखने, पूछने और समझने की सदैव इच्छा रहती है। आज इसके लिए उन्हें अभिभावकों अथवा शिक्षकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि स्वाध्ययन का सुख उन्हें मिल रहा है। परिणामतः आज बच्चे अधिक समझदार और जानकारियों से भरपूर हैं। कुछ बच्चे डर से बड़ों से पूछने से संकोच करते हैं। अपनी जिज्ञासाओं को दबा-कुचला रखने के कारण भीतर-ही-भीतर कुंठा का शिकार हो जाते हैं। उनका विकास रुक जाता है। अब उनके सपने व्याकुल होकर दम नहीं तोड़ते। इस दृष्टि से संचार-प्रोद्योगिकी के संसाधन हितकर हैं। इस उजले पक्ष के साथ सिक्के का दूसरा पहलू भी है जो अत्यंत ही घातक है। इनके दुष्प्रभाव से बच्चों को अलग कर पाना असंभव है। उनका चरित्र, आचरण, स्वभाव, व्यवहार, कार्य-शैली आदि सब आकाश से हो रहे सांस्कृतिक आक्रमण के प्रभाव से प्रदूषित हो रहा है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जैसे-जैसे प्रोद्योगिकी का विकास हो रहा है हम अपने में सिमटते जा रहे हैं।

प्रोद्योगिक क्रांति के इस दौर में व्यक्ति जहां दूरस्थ से तो रिश्ता बनाने में सफल हुआ है, वहाँ निकटस्थ संबंधियों एवं आत्मीयों से दूर होता जा रहा है। उसके पास समय ही नहीं कि वह उनके पास जाए, दो मीठे बोल बोलकर उनका हाल-चाल जान सके। फेसबुक, ट्वीटर, ‘इस्टाग्राम’ आदि इन तमाम माध्यमों से जहाँ पूरा विश्व सिमटकर उसकी मुट्ठी में आ गया है, वहाँ मुट्ठी में जो था वह उसकी हथेलियों से रेत की भांति सरकता गया है। वह अंतरिक्ष तक पहुँच गया है- ग्रहों की गतिविधियों को समझ चुका है। सौरमंडल के रहस्यों को भी भेदने के प्रयास में निरंतर रत है किंतु अपनों के मन में झाँकने, उसे पढ़ने को न तो उसे चाह है और न उसके पास समय ही है। धरती से आकाश तक, देश से विदेश तक की कितनी ही दूरियाँ वह तय कर ले पर रिश्तों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। संवेदनाएं कपूर की भाँति उड़ती जा रही हैं। संवेदनाशून्य रह स्वयं भी एक मशीन बन गया है। विज्ञान और प्रोद्योगिकी का विकास जितनी तेज़ी से हुआ है उतनी ही तेज़ी से संवेदना के स्तर में गिरावट आई है। अपने पूरे दम-खम के साथ ब्रह्मांड तक तो पहुँच बनाने में सफल हो गया पर आत्मीयों के हृदय तक नहीं पहुँचने की स्वसुख, यश और धन-लिप्सा की गिरफ़्त में फंसा मानव आज दूरगामी नतीजे के बारे में सोच ही नहीं पा रहा। उसके पास यश और धन तो रहेगा पर रिश्ते नहीं बचेंगे। वह अकेला होगा।

बालसाहित्य में परिवार और विद्यालय की भूमिका लगातार बदल रही है। आपकी दृष्टि में आज के बालसाहित्य में माता-पिता, शिक्षक और संस्थागत व्यवस्था का चित्रण किस प्रकार होना चाहिए?

बच्चे मानवता की दिव्यतम निधि हैं। इनके लालन-पालन में स्नेह एवं मार्ग-दर्शन में विवेकपूर्ण दृष्टि तथा दूरदर्शिता की आवश्यकता रहती है। बच्चों के व्यक्तित्व-निर्माण में माता-पिता के त्याग धैर्य, साहस, परिश्रम आदि वे सूत्र हैं जिनके द्वारा उनमें आत्मविश्वास भरा जा सकता है। बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण की पहली कार्यशाला उसका परिवार है। बच्चों को बाल्यकाल से ही सामान्य सुरक्षा एवं प्रोत्साहन देना चाहिए। संतोषजनक पारिवारिक जीवन व्यक्तित्व के उचित विकास के लिए आवश्यक है। घर ही ऐसा स्थान है जहाँ बच्चे को निपुणता प्राप्त होती है। माता-पिता बच्चों के व्यक्तित्व और चरित्र दोनों को प्रभावित करने में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। माता-पिता उसके लिए सुरक्षा और स्नेह का स्रोत है। उनके परस्पर मधुर संबंध बच्चे के चहुँमुखी विकास में सहायक होते हैं। बच्चों को सच्चे ईमानदार और उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठावान नागरिक बनाना अभिभावकों का परम ध्येय होना चाहिए।

इसके बाद व्यक्तित्व निर्माण का वास्तविक और सही कार्य तो शिक्षक ही कर सकते हैं। शिक्षकों पर एक राष्ट्रीय दायित्व है जिन्हें उन्हें पूरा करना है। गुरु-शिष्य के पारस्परिक भावात्मक लगाव की लुप्त होती परम्परा को पुनः स्थापित करना है। किसी भी विद्यालय का मनोवैज्ञानिक परिवेश बालक की शिक्षा के प्रति रुचि का निर्धारण करने में सहायक होता है। शिक्षालयों का अच्छा वातावरण विद्यार्थी को अच्छा मनोबल एवं मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करता है। शिक्षा का अर्थ यांत्रिक तौर पर अध्यापक द्वारा छात्रों को ज्ञान दिया जाना नहीं है। यह तो सर्वप्रथम मानवीय संबंध है। शिक्षक का व्यवहार बालकों के प्रति उदार, विनम्र अपनत्व से पूर्ण एवं स्नेहिल होना चाहिए, जिससे वह अपनी कठिनाइयों, समस्याओं को उनके सामने रख सके। गुरु-शिष्य का यह रागात्मक संबंध विद्यार्थी के व्यक्तित्व पर सापेक्षिक प्रभाव डालता है। अध्यापक के द्वारा समय और ध्यान पाने वाला छात्र सकारात्मक गुणों से युक्त होता है।

घर और पड़ोस के उपरांत बच्चे के व्यक्तित्व विकास के निर्धारकों में शिक्षालय की सर्वप्रमुख भूमिका है। माता-पिता के उपरांत शिक्षक का ही बच्चे के व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ता है। यदि प्रारम्भिक विद्यालयी अनुभव सुखद हैं तो बच्चे में सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। जहाँ अध्यापक विद्यालय के परिवेश को सहज बनाने का प्रयत्न करते हैं जिससे उनका शैक्षणिक व सामाजिक समायोजन अच्छा होता है।

सामाजिक विषमता, गरीबी, श्रम, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और वंचना जैसे प्रश्नों को बालसाहित्य में शामिल करने की क्या सीमाएँ और संभावनाएँ हैं? क्या बच्चों को कठिन सामाजिक यथार्थ से परिचित कराना आवश्यक है?

आपने यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न पूछा है। साहित्य समाज का दर्पण है। साहित्य के माध्यम से हम अपने समाज की जो छवि प्रस्तुत करेंगे, स्वाभाविक है कि वह हमारे देश की छवि कहलाएगी। कुछ साहित्यकार अपने देश की छवि को धूमिल करना नहीं चाहते इसीलिए वे सामाजिक विषमता, ग़रीबी, श्रम, जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता और वंचना जैसे नकारात्मक सोच के प्रश्नों को बालसाहित्य में शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं। दूसरी ओर वे साहित्यकार हैं जो समाज का यथार्थ चित्र जस-का-तस प्रस्तुत करने को अपना कर्तव्य-कर्म मानते हैं। जैसे प्रेमचंद के उपन्यासों में किसान वर्ग का यथार्थ चित्रण है। जातिगत भेदभाव और लैंगिक असमानता पर केन्द्रित यदि कोई कहानी या उपन्यास बच्चे पढ़ते हैं तो उन पर इसका स्वस्थ प्रभाव नहीं पड़ता। उनके मन में कई ग्रंथियां बन जाती हैं। मेरा अपना सोचना ये है कि यह विषय लिए जाएं लेकिन इन्हें इस ढंग से प्रस्तुत किया जाए कि बच्चा इनसे लड़ना सीख जाए और उसे जाति या लिंग को अपनी कमजोरी न बनने दें वरन् उसे अपनी ताकत बना लें।

बालिका-केंद्रित बालसाहित्य के बारे में आपका क्या विचार है? क्या हिंदी बालसाहित्य ने बालिका को केवल ‘संवेदनशील पात्र’ के रूप में प्रस्तुत किया है या उसे स्वतंत्र निर्णय लेने वाली व्यक्तित्व-सत्ता के रूप में भी पर्याप्त स्थान दिया है?

बालिका-केंद्रित बालसाहित्य में बालिका को केवल ‘संवेदनशील पात्र’ के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया वरन् उसे बालिका सशक्तीकरण के रूप में भी प्रस्तुत किया है। कन्या को दुर्गा के रूप में पूजा जाता है जो शक्ति रूपा है। यह ठीक है कि पहले हमारे यहाँ पुत्री को वह स्थान नहीं मिला था जो पुत्र को दिया जाता है किंतु आज यह स्थिति बदल चुकी है। वह भी स्वतंत्र निर्णय लेने वाली व्यक्तित्व-सत्ता के रूप में सामने आ रही है। वह अपने जीवन के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय स्वयं लेने में स्वतंत्र है। वह स्वतंत्र रूप से अपना कैरियर चुनती है। वह अपना वर का चुनाव कर सकती है। पर अपवाद आज भी है। गाँवों में हमारी बालिका या नारी की स्थिति में बहुत सुधार नहीं आया है लेकिन पहले की अपेक्षा स्थिति बदली ज़रूर है।

बालक-बालिका दोनों के प्रति आज भी समान भाव समाज में बनाए रखना एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। हमारे यहाँ नारी को कोमलता का प्रतीक माना गया है जो दया, माया, प्रेम, करुणा, ममता आदि कोमल भावों की स्वामिनी है। वैदिक एवं उत्तर वैदिक काल से ही प्रकृति स्वरूपा नारी को परमेश्वर की शक्तियों के रूप में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त रहा है। वह सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के रूप में पूजी जाती रही हैं, केवल ‘संवेदनशील पात्र’ के रूप में उसकी पहचान को सीमित करके नहीं रखा गया है। युग के साथ समाज की सोच में भी बदलाव आया है।

बालसाहित्य में लोककथा, मिथक, लोकभाषा और लोक संस्कृति के प्रयोग की संभावनाओं को आप किस दृष्टि से देखते हैं?

बालसाहित्य में लोककथा, मिथक, लोकभाषा और लोक संस्कृति के प्रयोग की संभावनाएँ तो हमेशा रहेंगी। क्योंकि हमारे बालसाहित्य की नींव में हमारा लोकसाहित्य ही है। कालांतर में ये रचनाएँ एक मुख से दूसरे मुख तक आते-आते कई रूप बदल लेती हैं। एक मुख से दूसरे-तीसरे मुख तक आते-आते कई पीढ़ियों की यात्रा तय करती हुई, यत्किंचित परिवर्तित होती जाती है। तो उसमें भाव भी बदल सकते हैं और पृष्ठभूमि भी। लोककथाएँ मौखिक परंपरा द्वारा संरक्षित होती है। एक मुख से दूसरे मुख तक आते-आते लौकिक साहित्य का पाठ सुनिश्चित नहीं होता। स्थान, समय के अनुसार, उच्चारण भिन्न हो जाता है। इनके कई-कई पाठान्तर मिलते हैं। लोककथाएँ भी हमारे सांस्कृतिक परिदृश्य, सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक मान्यताएँ, संबंधों को दिग्दर्शित करने वाले दर्पण हैं। विश्व का कोई ऐसा भाग नहीं, जहाँ लोककथाएँ किसी-न-किसी रूप में विद्यमान न हों। मानवीय सभ्यता का अभिव्यक्त रूप हैं। ये लोक कथाएँ। श्रुति परंपरा में चली आ रही इन लोक कथाओं में लोकमानस अपनी संपूर्णता में देखा जा सकता है।

लोकसाहित्य अपने लोकसंस्कृति और लोकजीवन को बेलाग-लपेट सीधे-सीधे व्यक्त करता है। लोकबोली या लोकभाषा में सरसता और मिठास होती है। लोकगीत मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी यात्रा करते हैं। लोक की बहुत बड़ी विरासत हमारे पास सुरक्षित है जो हमारी संस्कृति को समृद्ध करती है। प्रत्येक अंचल की अपनी-अपनी मान्यताएँ, अपनी-अपनी विशेषताऐं होती हैं। इन्हीं मान्यताओं-विशेषताओं का समाहार संस्कृति का कलेवर है। किसी भी देश के धार्मिक-सांस्कृतिक-चिंतन और जीवन-दृष्टि को जानने-समझने के लिए लोककथाएँ सशक्त माध्यम है, जो उसे अपनी जड़ों तक ले जाता है।

लोककथाएँ हमेशा लोक बोली में रची जाती हैं। हर अंचल की बोली अपनी होती है। यही कारण है कि इन पर उप-भाषा की छाप प्रत्यक्ष होती है। लोक-बोली में सरसता और मिठास होती है। जिससे ये लोककथाएँ लोगों को शीघ्र ही कंठस्थ हो जाती हैं। अनेक बाल साहित्यकारों ने मौखिक परंपरा में श्रुति रूप में चली आ रही लोक कथाओं को किस्सागोई के साथ प्रस्तुत कर उन्हें इतना दिलचस्प बना दिया है कि बच्चे उन्हें बड़े चाव से पढ़ते हैं। इन लेखकों ने देश-विदेश की लोककथाओं का संचयन कर सरल भाषा और रोचक अंदाज़ में उस धरती की खुशबू वहाँ की लोक-संस्कृति, लोक-परिवेश और लोकजीवन के संस्पर्श के साथ इस ढंग से पुनर्कथन किया है कि बच्चे उन्हें बड़ी रुचि के साथ पढ़ते हैं। ये लोककथाएँ बच्चों का मनोरंजन तो करती ही हैं, उनका ज्ञानवर्धन भी करती हैं।

इस तरह लोककथाओं में लोकभाषा, लोक संस्कृति प्रतिबिम्बित होती है जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है। हमें हमारे अतीत से परिचित कराती हैं।

क्या आधुनिक बालसाहित्य अपनी जड़ों से दूर होता जा रहा है?

इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि बदलते परिवेश में सबकुछ बदल रहा है। परिवेश बदल रहा है, केवल उस परिवेश से प्रभावित बच्चे ही नहीं बदल रहे हैं, उनके माता-पिता की सोच भी 21वीं सदी की सोच बन चुकी है जो अपनी प्राचीन संस्कृति, प्राचीन मूल्यों से जुड़े रहने को दकियानूसी सोच का नाम देते हैं। जबकि हर अतीत वर्तमान के लिए प्रेरणास्रोत होता है। अतीत की गौरवशाली परंपरा हमें भी गौरवान्वित महसूस कराती है। अपनी अतीत की गलतियों से हम सबक भी लेते हैं। इसीलिए जड़ों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। वर्तमान को सुंदर बनाने में हमारे अतीत का भी कहीं-न-कहीं बहुत योगदान होता है। जैसा हमारा वर्तमान होगा वैसा ही हमारा भविष्य होगा।

पर्यावरण संकट आज पूरी मानवता की चुनौती है। आपके विचार में बालसाहित्य पर्यावरणीय चेतना पैदा करने में किस प्रकार प्रभावी भूमिका निभा सकता है और इस विषय को उपदेशात्मक होने से कैसे बचाया जा सकता है?

जी, बिल्कुल ठीक कहा आपने। पर्यावरण संकट आज वैश्विक स्तर पर पूरी मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हम सब जलवायु-परिवर्तन के परिणाम भोग रहे हैं। ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं। ग्लोबलवार्मिग बढ़ती जा रही है। हमे अपनी हरी-भरी धरती को बचाना होगा ताकि पर्यावरण-संरक्षित रहे। हमारे बाल साहित्यकार पर्यावरणीय चेतना पैदा करने में अत्यंत प्रभावी एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। उन्होंने पर्यावरण और प्रकृति को अपने काव्य का विषय बनाया है। उनकी बाल-कविताओं में पर्यावरण के नष्ट होने की चिंता है तो दूसरी ओर उसके संरक्षण के लिए बच्चों को सचेत करने का पुनीत दायित्व-बोध भी है। नष्ट होते पर्यावरण को बचाने के लिए जहाँ पूरा विश्व चिंतित है, वहाँ हमारे बाल-साहित्यकार भी जागरूक हैं। उन्होंने बच्चों को अपनी कविताओं के माध्यम से पर्यावरण के खतरों से आगाह कराया है और बताया है कि कैसे हम हमारी आने वाली पीढ़ी के भविष्य को असुरक्षित बना रहे हैं। ओजोन की परत में छेद हो गया है। वायु प्रदूषित हो चुकी है। नदियाँ सूख रही हैं। कहीं सीख के माध्यम से, कहीं उपदेश, तो कहीं परोक्ष संदेश के माध्यम से विनष्ट होते पर्यावरण की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है और हमें हमारे दायित्वों का भी स्मरण कराया है। यथासंभव उपदेशात्मक होने से बचाया है। पर्यावरण की कविताओं में ऐसा लुभावनापन ऐसा रसीलापन है कि बालकों के साथ बड़े भी आनंद-विभोर हो उठते है। ये कविताएँ बच्चों में उल्लास और मौज-मस्ती का भाव पैदा करती हैं।

बालसाहित्य में हास्य, रोमांच, रहस्य, फैंटेसी और साहसिकता को अक्सर मनोरंजन के तत्त्वों के रूप में देखा जाता है। क्या इनके भीतर भी गंभीर साहित्यिक और वैचारिक संभावनाएँ मौजूद हैं?

 हास्य, रोमांच, रहस्य, फैंटेसी और साहसिकता को केन्द्र में रखकर अच्छा और उत्कृष्ट साहित्य भी लिखा जा रहा है। इनमें केवल मनोरंजन के तत्त्व हों ऐसा नहीं है। निःसंदेह इनके भीतर भी गंभीर साहित्यिक और वैचारिक संभावनाएँ मौजूद हैं। हास्यरस के अनेक किस्से बच्चों के लिए जहाँ उनका मनोरंजन का माध्यम बने हैं वहाँ बीरबल के किस्से, तेनालीराम के किस्से बच्चों में सूझबूझ और तर्क करने की शक्ति को बढ़ाते हैं। इस तरह से वे रचना को साहित्यिक सौंदर्य प्रदान करते हैं। इसी तरह रहस्य और रोमांच भी बच्चों में साहस, वीरता के भावों को भरते हैं। फैंटेसी बच्चों की कल्पनाशक्ति को उर्वर बनाती हैं। साहित्य का एक उद्देश्य बच्चों को ऐसे कल्पनालोक में भी ले जाना है जहां वह सपने बुन सके और ये सपने ही उसे उसकी मंज़िल की ओर ले जाते हैं।

हिंदी साहित्य में बालसाहित्य की रचनात्मक उपस्थिति के बावजूद उसकी आलोचना और मूल्यांकन अपेक्षाकृत कमज़ोर दिखाई देता है। आपको क्या लगता है कि बालसाहित्य को साहित्य की मुख्यधारा में अपेक्षित सम्मान क्यों नहीं मिला?

बालसाहित्य को प्रौढ़-साहित्य की तुलना में बहुत समय तक दोयम दर्जे का साहित्य समझा जाता रहा है। आजकल बालसाहित्य पर ध्यान दिया जाने लगा है। यह अत्यंत गौरव की बात है। कुछ दशक पूर्व तक यह जागरूकता नहीं थी। इस दिशा में अब लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ है और उसके विकास के लिए प्रयत्न भी किए जा रहे हैं। मैं कहूँगी कि आज भी उसे वह स्थान नहीं मिला। उसका सबसे बड़ा कारण है-समीक्षा का अभाव। बालसाहित्य को बचकाना साहित्य भी कहा जाता रहा है। बच्चों के लिए लिखने वाले को भी बड़ी हेय दृष्टि से देखा जाता था। इसके लिए मैं कहूँगी कि आलोचकों का न होना भी एक महत्त्वपूर्ण कारण रहा है। क्योंकि बड़ों की आलोचना में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेंद्र, डॉ. नामवर सिंह, डॉ. रामविलास शर्मा जैसे बड़े आलोचक रहे हैं, परंतु बालसाहित्य में दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका, क्योंकि बालसाहित्य को दोयम दर्जे का साहित्य समझा जाता रहा है। इसीलिए उसकी आलोचना के क्षेत्र की तरफ आने की किसी ने नहीं दिखाई और जब आलोचना नहीं आई तो बालसाहित्य पर ध्यान भी नहीं दिया गया। समीक्षा-क्षेत्र में कोई आना ही नहीं चाहता। सब अपने-अपने सृजन-कर्म में रत हैं। उन्हें लगता है, उनका सृजन ही उन्हें कालजयी बनाएगा। तुलसी, सूर, मीरा, कबीर सभी अपनी कालजयी रचनाओं के लिए अमर हो गए। दूसरी बात यह है कि आलोचना करना सबके लिए संभव भी नहीं। आलोचक के विशेष गुण होते हैं, आलोचना भी एक कला है। उसके लिए आलोचकीय दृष्टि चाहिए। बिना आलोचनात्मक दृष्टि के हम किसी भी कृति और कृतिकार की खूबियों और कमज़ोरियों को नहीं समझ सकते। आलोचना एक ऐसी विधा है, जिसके लिए अध्ययन के साथ-साथ चिंतन-मनन की आवश्यकता होती है। आलोचक को साहित्य का अच्छा ज्ञाता होना चाहिए। अच्छी आलोचना कृति के अंतरंग तक पहुँचकर उसका मूल्यांकन करती है और आसपास लिखी जा रही दूसरी कृतियों के साथ तुलना कर उसकी खूबियाँ या कमियाँ रेखांकित करती है। एक अच्छा समीक्षक अपने समय के साहित्य का नियमित पाठक हो, साहित्य-सिद्धांतों में निष्णात हो तभी वह रचना के अन्तःस्तल तक पहुँच पाता है और उसकी आत्मा को उद्भासित करने में समर्थ हो पाता है। कृति के आंतरिक सौंदर्य को देख पाता है उसके वास्तविक मर्म को समझ पाता है, समझा पाता है और पाठकों से उसकी सही पहचान करवा पाता है। इतनी सारी खूबियाँ जिसमें हों, क़ायदे से उसी को समीक्षा के क्षेत्र में आना चाहिए।

आलोचना के क्षेत्र में कुछ लोग इसलिए भी नहीं आना चाहते कि क्योंकि किसी को खुश या नाखुश किया जाए। कभी-कभी आलोचक पर रचनाकार का या किसी गुट का इतना दबाव होता है कि किसी भी रचना को श्रेष्ठ रचना सिद्ध कर देता है और पाठक उसी को श्रेष्ठ मान लेता है। वह पुरस्कार-चयन कर्ताओं की दृष्टि में भी श्रेष्ठ मान ली जाती है। आपने समीक्षा में सुधार की बात पूछी। सब संभव है। आलोचना में राग-द्वेष कहीं नहीं होना चाहिए क्योंकि रचनाकार से व्यक्तिगत राग-द्वेष हुआ तो उसकी आलोचना उस अर्थ में करेगा। इसलिए आलोचक का कत्र्तव्य है वह राग-द्वेष को छोड़कर बिना किसी पूर्वाग्रह के आलोचक-धर्म को निभाएँ। इससे पाठक को आलोच्य कृति के बारे में सही जानकारी मिलती है। कृति उत्तम है मध्यम है या सामान्य उसे पढ़ने में सुविधा हो जाती है।

क्या बालसाहित्य के मूल्यांकन के लिए वही आलोचनात्मक प्रतिमान पर्याप्त हैं जो वयस्क साहित्य के लिए विकसित हुए हैं, अथवा बालसाहित्य की अपनी स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्रीय और आलोचनात्मक कसौटियाँ विकसित की जानी चाहिए?

देखिए, बालसाहित्य के मूल्यांकन के लिए विषय और शिल्प को ध्यान में रखते हुए कुछ आलोचनात्मक प्रतिमान समान हैं जो वयस्क साहित्य के लिए विकसित हुए हैं। लेकिन यह भी सच है कि बालसाहित्य की अपनी स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्रीय और आलोचनात्मक कसौटियाँ भी हैं। इसीलिए वयस्क साहित्य और बालसाहित्य की आलोचना करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना होगा जैसे-बालसाहित्य में हर विषय को आधार नहीं बनाया जा सकता जैसे राजनीति, हिंसा आदि। वहाँ विषय भी बालोपयोगी होंगे। वय के अनुसार उनकी बुद्धि, ग्राह्य क्षमता के अनुसार होंगे। जबकि प्रौढ़-साहित्य में ऐसी कोई शर्त नहीं है। वहाँ कोई भी विषय, किसी भी विधा में हो सकता है। इसी तरह पृष्ठ संख्या का भी ध्यान रखना पड़ता है। बालकहानी तीन-चार-पाँच पृष्ठ तक बच्चे सहजता से पढ़ लेते हैं। जबकि बड़ों की कहानी के पृष्ठों की संख्या अधिक हो सकती है। यहाँ तक की लम्बी कहानी बीस-पच्चीस पृष्ठों तक भी हो सकती है। वहाँ कथ्य के अनुसार कहानी आकार-ग्रहण करती है। यहाँ विशेष रूप से मैं उपन्यास की बात कहना चाहूँगी कि बालसाहित्य में उपन्यास का कलेवर अधिकतम सौ पृष्ठों की सीमा में ही ठीक रहता है। क्योंकि बच्चों में इतना लंबा पढ़ने का धीरज नहीं होता। इसी तरह भाषा के स्तर पर भी दोनों के प्रतिमान अलग-अलग हैं। भाषा की चर्चा हम पूर्व में बालसाहित्य की मूल संकल्पना के रूप में कर चुके हैं।

विश्वविद्यालयों में बालसाहित्य पर शोध तो हो रहा है, लेकिन क्या यह शोध वास्तव में नई आलोचनात्मक दृष्टियाँ विकसित कर रहा है? बालसाहित्य के शोध के क्षेत्र में आपको किन विषयों पर अभी गंभीर काम की आवश्यकता महसूस होती है?

विश्वविद्यालयों में बालसाहित्य पर शोध तो हो रहा है, लेकिन यह शोध वास्तव में नई आलोचनात्मक दृष्टियाँ विकसित नहीं कर पा रहा है। आज का शोधार्थी मात्र डिग्री प्राप्त करने के लिए शोध कर रहा है और डिग्री नौकरी प्राप्त करने के लिए। एक सच्चे शोधार्थी में जो शोध की ललक होती है, जो ज्ञान पिपासा होती है वह उनमें कहीं भी दिखाई नहीं देती। वे जीवित बाल-साहित्यकारों पर ही शोधकार्य करना चाहते हैं क्योंकि वे उनसे मिलकर उनसे सहज ही सामग्री प्राप्त कर लेते हैं और जिन पर शोध हो रहा है वे भी इसी बात से खुश हैं कि हम पर कितने शोध अब तक हो चुके हैं। जो हमारे बालसाहित्य के लिए मील के पत्थर है, बालसाहित्य के अनन्य साधक हैं वे उन पर शोध करना नहीं चाहते। मुझे बड़े दुःख के साथ यह कहना पड़ता है कि इस कार्य में उनके गाइड भी उनको सच्चे शोध के लिए प्रेरित नहीं करते। वे भी परीक्षक आदि से मिलकर उनके साक्षात्कार में मदद कर किसी तरह से उन्हें डिग्री प्राप्त कराने में सहयोग करते हैं।

आज बालसाहित्य के सामने एक ओर बाज़ार, प्रकाशन और पुरस्कारों की प्रतिस्पर्धा है और दूसरी ओर बच्चों की बदलती रुचियाँ। क्या आपको लगता है कि बाज़ार बालसाहित्य की रचनात्मक दिशा को प्रभावित कर रहा है?

आज बाज़ार हमारे पूरे जीवन में प्रवेश कर चुका है। आज बच्चे भी वही पढ़ाई करना चाह रहे है या वही कैरियर बनाना चाहते हैं जिनमें सबसे अधिक पैकेज मिलता है। वे विद्यार्थी नही रहे, मात्र शिक्षार्थी बनकर रह गए हैं। बाज़ार ही वह कारण है जिसके कारण वह अपने देश को छोड़कर विदेश में जाकर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं क्योंकि वहाँ उन्हें जो सुख-सुविधाओं के साथ पैसा मिलता है वह यहाँ उन्हें नहीं मिल सकता।

जहाँ तक प्रकाशन की बात है आज बालसाहित्य के पत्रिकाओं के बड़े-बड़े ग्रुप ने बाल-पत्रिकाएँ बंद कर दी हैं। ‘पराग’ बंद हो गई। ‘नंदन’ बंद हो गई। ‘बालहंस’ बंद हो गई। आज प्रकाशन पूँजीपतियों के हाथ में होने के कारण यह स्थिति आई है कि हमारी पत्रिकाएँ दीर्घजीवी नहीं हो सकीं। इधर जो अन्य प्रकाशक हैं वे भी प्रकाशन के लिए रचना और रचनाकार को महत्त्व नहीं दे रहे हैं। वह रचना की गुणवत्ता को नहीं आँक रहे वरन् लेखकों से पैसा लेकर उनकी पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं। इस तरह से अत्यंत सामान्य स्तर की और कभी-कभी तो निम्न स्तर की कृतियाँ भी पाठकों तक पहुँचती हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य है धन कमाना, न कि देश और समाज के प्रति किसी तरह का नैतिक दायित्व निभाना। प्रकाशकों से अपेक्षा की जाती है कि वह ऐसा साहित्य प्रकाशित करें कि जिससे हमारा समाज संवेदनशील बने। आज नई संतति मानवीय मूल्यों से कटती जा रही है। इस तरह विश्वभर में मीडिया के प्रभावों को लेकर चिंता गहराती जा रही है। आवश्यक है बच्चों को संस्कारों और संस्कृति की शिक्षा देना जो अच्छे बालसाहित्य से ही संभव है।

अब रही बात पुरस्कारों की। जैसे ही सामान्य कोटि की रचनाएँ जब पुस्तक रूप में आती हैं तो लेखक पुरस्कार की दौड़ में शामिल हो जाता है। इसके लिए वह कई हथकंडे अपनाता है। आलोचकों पर किसी राजनेता का, किसी संबंध का दबाव बनाकर आलोचना करवाता है और आलोचक अपने आलोचना-धर्म को भूलकर उस कृति को उच्च कोटि की कृति सिद्ध कर देते हैं। वही कृति आगे चलकर पुरस्कार की भी अधिकारिणी बन जाती है। आपने बिल्कुल ठीक कहा कि बालसाहित्य के सामने बाज़ार, प्रकाशन, पुरस्कार और बच्चों की बदलती रुचियाँ एक चुनौती के रूप में खड़े हैं जिनके कारण बालसाहित्य की रचनात्मकता प्रभावित हुई है।

अपने समकालीन बालसाहित्य को देखते हुए आपको उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे बड़ी कमी क्या दिखाई देती है? क्या आज का बाल साहित्य अपने समय के बच्चे की वास्तविक बेचैनी और आकांक्षाओं को पकड़ पा रहा है?

डा. जयप्रकाश भारती जी ने कहा था कि 21वीं सदी में बालसाहित्य स्वर्णयुग में प्रवेश करेगा। 21वीं सदी में बालसाहित्य की उत्तरोत्तर प्रगति यह बताती है कि स्वर्णयुग आ गया है। बालसाहित्य की समग्र विधाओं में उसका चहुमुखी विकास इसका प्रमाण है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, यात्रा-वृत्तांत, कामिक्स, पत्रकारिता आदि विधाएँ निरंतर प्रगति के पथ की ओर बढ़ रही हैं जिससे हमारा बालसाहित्य, साहित्य की मुख्यधारा के समक्ष खड़ा होने में पूर्ण समर्थ हो चुका है। बाल-कविता में विषय और शिल्प दोनों रूपों में नए प्रयोग हो रहे हैं। विषय-वस्तु में बदलाव आया है। ज्ञान-विज्ञान को स्थान मिलने लगा है। विज्ञान-परक साहित्य बच्चों में लोकप्रिय हो रहा है। पद्य की हर विधा भी लोरी, ग़ज़ल, गीत, शिशुगीत आदि विधाएँ न केवल पत्रिकाओं में स्थान पा रही है वरन् इनके स्वतंत्र संग्रह भी आ रहे हैं। कविता आरंभ से ही बच्चों की प्रिय विधा रही है। यह कल भी उनके लिए अत्यंत आनंददायिनी विधा थी, आज भी है और कल भी रहेगी। 21वीं सदी की बालकविता मनोरंजन के साथ-साथ सामयिक परिवेश से जुड़ी हुई हैं।

कहानी विधा में भी अभूतपूर्व विकास हुआ है। परीकथाएँ, पौराणिक कथाओं को नए परिपेक्ष्य में लिखा जा रहा है। इसे युग के अनुरूप प्रासंगिक रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है क्योंकि आज का बालक और उसका आई. क्यू. बहुत ही तीक्ष्ण है। वह किसी भी बात को कोरी कल्पना के आधार पर स्वीकार नहीं करता। उसे प्रमाण चाहिए। इसी तरह नाटक विधा में भी विकास हो रहा है। आजकल अभिनेय नाटक लिखे जा रहे हैं जिन्हें रंगमंचीय ज़रूरतों और साज-सज्जा के साथ लिखा जा रहा है। उपन्यास विधा का भी 21वीं सदी में अच्छा विकास हुआ है। इसका विषय-फलक भी अत्यंत व्यापक है। इतिहास, पुराण, समाज, विज्ञान, पर्यावरण, बाल-मनोविज्ञान कुछ भी हो सकता है। बच्चों की रुचि, उनके मनोविज्ञान उनकी समस्याओं एवं पर्यावरण सुरक्षा को लेकर अनेक अच्छे उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। बाल-जीवनी विधा में भी अनेक बाल-साहित्यकार आए हैं। वैज्ञानिक, धार्मिक, सामाजिक हर तरह के क्षेत्र के असामान्य महापुरुषों की जीवनियाँ लिखी जा रही हैं जिन्हें बच्चे ख़ूब पसंद करते हैं।

इन विधाओं के साथ बच्चों में एक विधा जो बहुत ही लोकप्रिय है वह है कामिक्स। इसे बाल-पत्रिकाओं में भी स्थान मिला है, साथ-ही-साथ स्वतंत्र रूप में कामिक्स लिखे जा रहे हैं। यह विधा बच्चों के लिए अत्यंत मनोरंजक विधा है। महापुरुषों पर केन्द्रित कामिक्स या महान हस्तियों, वैज्ञानिकों, क्रांतिकारियों की कथा से जुड़ी ये चित्रकथाएँ बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ बच्चों को कई जानकारियाँ प्रदान करती हैं जो उसके व्यक्तित्व से जुड़ी होती हैं। अनेक नई पत्रिकाएँ भी अस्तित्व में आई हैं। सृजन और आलोचना दोनों क्षेत्रों में हमारे बाल-साहित्यकार बालसाहित्य की हर विधा को निरंतर विकास-पथ की ओर ले जा रहे हैं। इसमें निरंतर शोधकार्य हो रहे हैं। यह सारा सर्वेक्षण हमें आश्वस्त करता है कि 21वीं सदी का बालसाहित्य प्रगति की राह की सतत् अग्रसर है।

हमारे बाल-साहित्यकार आज के बालक के बाल-मनोविज्ञान की बारीकियों को समझते हुए अच्छा बालसाहित्य लिख रहे हैं। कहानी, उपन्यास, नाटक तीनों प्रकार का कथात्मक साहित्य बाल हृदय की सूक्ष्म परतों को खोल रहा है। आज का बच्चा बहुत ही तनावग्रस्त है। उनकी बेचैनी तरह-तरह की तथा अलग-अलग कारणों से है। वह प्रतियोगिता की दौड़ में बेतहाशा भाग रहा है। असफल होने पर निराशा-हताशा का शिकार हो रहा है। इन सब परेशानियों की वज़ह से वह अवसाद में घिर रहा है।

बालसाहित्य के क्षेत्र में कौन से कार्य होने चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य है देश और विदेश की श्रेष्ठ एवं क्लासिकल पुस्तकों के अनुवाद होने चाहिए। भारतीय भाषाओं में बालसाहित्य के आदान-प्रदान की स्थिति विशेष उत्साहवर्धक नहीं है। साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट इस ओर सक्रिय हैं किंतु इस दिशा में स्वयं बहुभाषाविद् बाल-साहित्यकारों को आगे आना चाहिए। राष्ट्रीय पुरस्कार-प्राप्त कृतियों का अनुवाद राष्ट्रीय भाषाओं में होना चाहिए। सरकार को इन अनूदित पुस्तकों के प्रकाशन-हेतु पूरा अनुदान देना चाहिए। बालसाहित्य की पुस्तकें और नई-पुरानी सारी पत्रिकाएँ सुरक्षित रहें इसके लिए कोई केन्द्रीय विद्यालय या संग्रहालय होना चाहिए।

अंत में, यदि आपको आने वाली पीढ़ी के बाल-साहित्यकारों के लिए बालसाहित्य का एक रचनात्मक घोषणा-पत्र लिखना हो, तो उसमें आप किन मूल बातों को शामिल करेंगे? आप चाहते हैं कि भविष्य का बालसाहित्य बच्चे को केवल अच्छा पाठक ही नहीं, बल्कि अच्छा मनुष्य भी बनाए?

मैं भी आप ही की तरह बालसाहित्य की एक लेखिका हूँ। मैं घोषणा-पत्र क्या दे सकती हूँ। हर बाल-साहित्यकार को बालसाहित्य-लेखन की गहरी समझ भी है और वह बदलते परिवेश में बच्चों की बदलती रुचियों के अनुसार लिख भी रहा है।

बालसाहित्य का उद्देश्य मात्र मनोरंजन नहीं है। आदर्श बालसाहित्य मनोरंजक और मूल्यपरक दोनों होता है। बालसाहित्य का लक्ष्य बच्चों का व्यक्तित्व और चरित्र-निर्माण दोनों है। बालसाहित्य ऐसा हो जो बच्चों में एक क्रांति ला दे, जिसे पढ़कर वह केवल एक पाठक ही बने न रह जाएँ वरन् एक अच्छे इंसान भी बनें। हमारे कई महापुरुषों ने अपने आत्मकथ्य में यह स्वीकार किया है कि वे अमुख महापुरुष की रचना से प्रेरित हुए हैं और उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। तो अच्छा बालसाहित्य केवल एक अच्छा पाठक ही पैदा नहीं करता वरन् एक अच्छे इंसान को भी जन्म देता है और वह उसे सच्चा सामाजिक बनाता है।

इस संबंध में मैं कहना चाहूँगी कि बालक, बाल-मनोविज्ञान और बालसाहित्य तीनों एक-दूसरे से गहरे जुड़े हैं। बालसाहित्य जिनके लिए लिख रहे हैं, पहले उन्हें पढ़ना बहुत ज़रूरी है। उनके मनोविज्ञान को पढ़े बिना, समझे बिना बालसाहित्य लिखा भी नहीं जा सकता। बच्चे क्या चाहते हैं? क्या उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं? अगर बाल-साहित्यकार यह समझ लें और बालसाहित्य लिखते समय इस बात को केंद्र में रखें, तो निश्चित रूप से वे सार्थक एवं बालोपयोगी बालसाहित्य लिख पाएँगे। बालक की जिन्हें चिंता है, उनकी समस्याओं, उलझनों से जो सरोकार रखते हैं, वही अच्छे बाल-साहित्यकार हो सकते हैं। यह ठीक है कि बालसाहित्य बच्चों के थके-हारे मन के लिए मनोरंजन का साधन बनता है, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि साहित्य केवल मनोरंजन की वस्तु रह जाए। यदि ऐसा होता तो मदारी के तमाशे और साहित्य में अंतर क्या रह जाता।

साथ ही बाल-साहित्यकार को बच्चों की वर्तमान आवश्यकताओं और समय के अनुरूप ऐसा साहित्य तैयार करना चाहिए, जो उन्हें सही दिशा दे सके। उन्हें संस्कारित कर सके। उनमें वैज्ञानिक चेतना का विकास भी करे और मानवीय संवेदनाएँ भी जगा सके, ताकि उनके चरित्र को मानवीय रिश्तों की खुशबू और बंधुत्व की भावना महका सके। केवल ऐसी रचना करने वाले साहित्यकार ही बालसाहित्य-लेखन के सच्चे अधिकारी हैं।

डॉ. एम. फीरोज़ खान

जन्म-1976 में टाण्डा, अम्बेडकरनगर (उत्तर प्रदेश)। हिन्दी साहित्य के अध्येता, आलोचक, सम्पादक और शोधकर्मी, विशेष रूप से मुस्लिम विमर्श, आदिवासी विमर्श, दलित विमर्श, नारी विमर्श और थर्ड जेण्डर विमर्श जैसे समकालीन विषयों पर उल्लेखनीय कार्य। प्रमुख आलोचनात्मक कृतियों में मुस्लिम विमर्श साहित्य के आईने में तथा हिन्दी के मुस्लिम उपन्यासकार : एक अध्ययन। अनेक सम्पादित ग्रंथ प्रकाशित, जिनमें राही मासूम रज़ा, बदीउज़्ज़माँ, नफीस आफरीदी, इसराइल, असगर वजाहत, नासिरा शर्मा, मोहम्मद ताहिर, सैयद कासिम अली, सैयद अमीर अली मीर, अब्दुल बिस्मिल्लाह, आदिवासी विमर्श (उपन्यास और कहानी पर आलोचना, 8 पुस्तकें), थर्ड जेण्डर विमर्श (16 पुस्तकें), प्रवासी साहित्य (8 पुस्तकें), दिव्यांग, तवायफ (कहानी संग्रह) और सर सैयद अहमद ख़ान आदि कृतियाँ उल्लेखनीय हैं।

डा. शकुंतला कालरा
जन्म- अविभाजित भारत के  बक्खर में 2 मार्च 1946, शिक्षा- एम.ए., एम.लिट्., पी-एच.डी., डी.लिट्. (लखनऊ विश्वविद्यालय), ज्योतिष प्रवीण, ज्योतिष विशारद्, ज्योतिष शोधकार्य (आई.सी.एस.), पंजाबी भाषा में डिप्लोमा (दिल्ली विश्वविद्यालय), पत्रकारिता में डिप्लोमा (कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय)
सम्प्रतिः मैत्रेयी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से ऐसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत होकर अब स्वतंत्र लेखन।
सम्पर्क-डा. शकुंतला कालरा,  एन. डी. – 57, पीतमपुरा, दिल्ली-110034
ईमेल आईडी: – [email protected]
मो. 8287479455 लैंड लाइनः- 011-41677475

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4 टिप्पणी

  1. शकुंतला कालरा से फिरोज जी का साक्षात्कार, बहुत अच्छा तथा ज्ञानवर्धक है l बाल मनोविज्ञान एवं साहित्य पर शोध करने वालों के लिए उपयोगी है l
    हार्दिक बधाई
    Dr.Maya Dubey
    Bhopal

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