नयी सुबह (कहानी) – राजेश गुप्ता

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नयी सुबह (कहानी) - राजेश गुप्ता 3

  • राजेश गुप्ता

रात काफी हो चुकी थीI गली में घना अन्धेरा था किंतु उसे अपने घर के बरामदे में जल रहे बल्ब की रौशनी भलि-भांति दिख रही थी I उसको और कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था I वह उस रौशनी के सहारे घर के समक्ष आ खड़ा हुआ I रात के करीब दस बज चुके थे I शराब ने उसे पूरी तरह से टुन कर रखा था I इसी कारण उसे अपने-आपको संभालने  में मुश्किल पेश आ रही थी I लेकिन वह मानसिक तौर पर अपने-आप को ठीक समझ रहा थाI वह बार-बार अपनी बाईं जेब को टटोल कर देख लेता और फिर आगे चल पड़ताI कई बार वह ऐसी लापरवाही के वजह सेअपनी रकम गँवा आया था किंतु कभी उसने इस बात को अपने दिल पर नहीं लिया था I वह जानता था कि रुपया-पैसा तो हाथ की मैल है I ये तोआता-जाता ही अच्छा लगता है और वह सोचता कि उसने कौन सा  हींग का व्यापार किया है I एक साईन की कीमत ही तो है यह I अब तो उसके साईन की कीमत हजारों रुपय रूपए थी I कोई ज़माना था कि जब उसको एक कमीज़ भी बहुत मुश्किल से मिला करती लेकिन आजकल उसके ठIठ ही कुछ और थे I मालूम नहीं कब उसने बैल बजाईं और कब दरवाज़ा खुल गया और कब वह बैड पर जा लेटा I घर में सब सोये पड़े थे Iलेटे-लेटे उसे अपनी जेब का वज़न कुछ कम सा महसूस हुआ I उसने फिर से एक बार अपनी जेब टटोली और फिर वह  सन्तुष्ट हो गया I वह बेसुध ही बैड पर लेटा हुआ था I अचानक उसने करवट बदली , दीवार पर उसके सामने ही एक तस्वीर टंकी हुई थीं I दुंधलि सी लग रही अपनी माँ की तस्वीर को वह बहुत गौर से देख रहा था I उसको लगा कि यह उसकी निर्धन माँ की तस्वीर है I

पुत्र तुम तो बहुत अमीर हो गये हो अचानक उसकी माँ की आवाज़ उसके कानों में  गूंजने लगी I

हां माँ , तुम तो मेरी इस अमीरी का जरा  भी आनन्द नहीं ले सकी, मुझे इस बात का बहुत अफसोस है वह रुआंसी सी आवाज़ में बोलाI

नहीं बेटा,मुझे ऐसी अमीरी  नहीं चाहिए थी,जो तुम लिये फिर रहे हो,अच्छा हुआ जो मैं तुम्हारे अमीर होने से पहले ही इस संसार से रुख़्सत हो गई

लेकिन माँ हमने तो सारी उम्र ग़रीबी में ही निकाल दी किंतु अगर आज मेरे पास इतना पैसा आया है तो ———-

पुत्र मेहनत का पैसा ही अपना पैसा होता है, अपने हाथ से कमाया हुआ धन ही अपने हक का होता है,नाहक यानि दूसरे की मेहनत का पैसा जिसे हम गलत त्तरीके से हड़प लेते हैं तो समझो कि वह हमें दुख देने के लिये आया है”I

माँ क्या हक, नाहक लगा रखा है तुमने, पैसा तो पैसा ही होता है, क्या हक का और क्या नाहक का, जो पैसा अपनी जेब में आ गया समझो  अपना है उस पर अपना ही हक होता है

पुत्र तुम तो सब कुछ भूल गये हो लगता है,तुम को याद नहीं है कि मैने तुम्हें कैसे मेहनत के पैसे से पालपोस कर बड़ा किया थाI तुमको याद नहीं है, एक बार तुम एक दुकान से एक अमरूद चुरा लाये थे और मैं तुमें थप्पड मार-मार कर वह अमरूद तुमसे वहां रखवा कर आई थी, उसका मतलब क्या तुम समझे नहीं कि तुम कभी किसी की चीज़ पर नज़र ना रखो, किंतु तुम तो वो सीख भी भूल गये, मेरे बच्चे, मैं तेरी इस सोच से बहुत दुखी हूँ,मुझे तो यह समझ नहीं आ रहा है कि मुझ से कहां भूल हो गई,जो तुम्हारे भीतर इस तरह के दोष उत्पन हो गये,और तुम्हारी सोच में इतना बिगाड़ आ गया

माँ मैं तो —- माँ——

चुप करो तुम! रिश्वत और बेईमानी का पैसा तो कलंक के सामान होता है

किंतु माँ मैं कौन सा किसी से मंगता हूँ —– माँ—-?”

चुप कर,मेरे साथ बहस मत कर इतना सब कह माँ का जो अक्स उसे धुंधला-सा  दिख रहा था यकायक गायब सा हो गया,और उसके सामने माँ की वही तस्वीर आ गई. उसको लगा जैसे माँ फिर से उसी तस्वीर में जा बैठी होI तस्वीर उसे धुंधली सी दिख रही थी, लेकिन उसकी माँ की आँखे अभी भी उसे घूर रहीं थीI अंततः उसने हार कर माँ की तस्वीर से अपनी ऩजरे ही चुरा ली Iउसको अपनी माँ से बहुत डर लगता था ,जब वह जिंदा थी ,पर माँ तो अभी मरने के बाद भी बहुत कड़क थी,उसे लगने लगा  Iउसने अहिस्ता से अपनी जेब में हाथ डाला ,”ठीक हैचेहरे पर संतुष्टी के भाव ला कर कहा और एक पुरानी फिल्म का गाना गुणगुनाने लगा I

आहिस्ता से उसने अपनी जेब से पाँच सौ के नोटों की गड्डी निकालीI उसकी नज़र सीधे महात्मा गाँधी की शांत तस्वीर पर पड़ी जो नोट पर बनी हुई थी I उसने अपनी ही धुन में उसे नमस्कार किया I महात्मा जी उसे कुछ गुस्से में लगेI  उसने फिर महात्मा जी की तस्वीर की और देखा, वो वाकई ही गुस्से में थेI वह बहुत ही बेचारगी से महात्मा जी की तस्वीर से नजरें चुराने लगा किंतु वह महात्मा जी के गुस्से से बच न सका Iउसने देखा महात्मा जी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था  I उसे लगा जैसे महात्मा जी अभी उसके दोनों कान पकड़ लेगें I उसे अपनी माँ का चेहरा याद आ गया जो उसे अभी अभी गुस्सा हो कर हटी थी I

मैं आपका बहुत भगत हूँ जी उसने महात्मा गाँधी जी के गुस्से से बचने के लिए कहा I

मेरा भगत है याँ फिर नोटों का बंधु महात्मा जी ने उसे कहा I

महात्मा जी आपका

भगत बंधु, आदमी  बन, तुम्हारे जैसे नोटों के भगतों ने संपूर्ण देश का बेड़ा ग़र्क कर रखा है,आप लोग तो हमारे  सोने जैसे देश को बेच-बेच कर खा रहे हो, क्या होगा आने वाली नस्लों का ? क्या होगा यहाँ बसते ईमानदार लोगों का ?आप तो उन्हें  फिर से ग़ुलाम बना देंगें, शहीदों की शहद्त को क्यूँ मिट्‍टी में मिला रहे हो हैं आप लोग “Iवह भावविभोर हो कर महात्मा जी की ओर देखने लगा I

मैने तो थोड़ी सी रिश्वत ली थी महात्मा जी ,आपने तो मेरा हाल बुरा हाल कर दिया, लेकिन जो  बेईमान नेता देश को लुटेरों की तरह लूट रहे हैं उनका क्या, जो भोली भाली जनता की मेहनत की  कमाई को दोनों हाथों से लूट रहें हैं और अपने भरे हुए पेट में डाले जा रहे हैं ,उनको आप कुछ नहीं कहते होउसने मन ही मन महात्मा जी को कहा I

वो भगवान को भूल चुके हैं, सब को यह पता है कि साथ कुछ भी नहीं जाएगा , फिर भी वह लोग अंधे हो कर भोली भाली जनता का पैसा लूट रहे हैं, भगवान उनको सद्बुद्धि दे, नहीं तो परमात्मा स्वरुप जनता एक दिन उनको खुद ही सबक सीखा देगी ,आप लोग एक दूसरे की और देख -देख कर  बिगड़ रहे है ,सम्बलो सम्बलो सम्भालो अपने आपको नहीं तो यह देश फिर से ग़ुलाम हो जायेगा और तुम लोग फिर से अपने ही देश में गुलामों जैसा जीवन व्यतीत करने को मज़बूर हो जाओगे,आप के बच्चे आपको इस के लिये कभी माफ नहीं करेंगे,अपने आप को सुधार लो,सुधरने और अच्छेपन की शुरुआत अपने से करो,किसी दूसरे की और मत देखो ,क्या मालूम आप की और देख कर दूसरा भी सुधर जाए,हम अक्सर कहते हैं कि सिस्टम खराब है यह नहीं सुधर सकता लेकिन कभी हमने यह सोचा है कि हम भी तो इसी सिस्टम का ही हिस्सा हैं ,हम कितने बिगड़े हुए हैं और हमें कितने सुधरने की जरूरत है ,अगर हम सुधर जाएँ तो क्या सिस्टम में सुधार नहीं हो सकता ,जाओ और जाकर परिवर्तन की शुरुआत आपने आप से करो ”Iयह सब कह महात्मा गाँधी फिर से अपनी तस्वीर में जा वीरजे विराजे , उसने सकून की साँस ली ,किंतु उसे अभी भी डर लग रहा था कि कहीं फिर से महात्मा जी आकर उसे   डटने न लग जाएँ , उसे अभी कुछ कुछ होश आने लगा था , उसके ऊपर गाँधी जी की बातों का काफी असर होने लगा था ,अब उसको सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र आने लगा था,माँ की तस्वीर भी उसे अब साफ़ साफ़ नज़र आ रही थी ,उसने मन ही मन माँ और उसके बग़ल में लगी शहीद भगत सिंह की तस्वीर को नमन किया और उन से माफ़ी माँग बिना कुछ सोचे विचारे घर से निकल गया और सारे के सारे नोट अनाथालय के दान-पातर में डाल आयाI

अब तक मौसम साफ़ हो चुका था, सितारे अपने-अपने घरों को जा चुके थे I उसने फिर से उगते सूर्य की निर्मल किरणों के सिरों को खोजना शुरू कर दिया जिसे वह बचपन से खोजता आया था ,उसे लगा जैसे आज का सुर्य उसके लिये एक नई सुबह ले कर आया हैI

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