भारतवर्ष पुरातन काल से ही जीवन के हर क्षेत्र में बहुत अग्रणी रहा है । सहजता और सरलता के साथ कार्य करने की यहां प्राचीन संस्कृति रही है। उदारता एवं व्यापकता इसकी अन्यतम पहचान रही है। भारतवर्ष अपनी संस्कृति अर्थात अपने खान-पान रहन-सहन वेशभूषा आचार- विचार, ज्ञान- विज्ञान के लिए पुरातन काल से ही विश्व विख्यात रहा है ।संभवतः इसी कारण से भारतवर्ष को विश्व गुरु कहा जाता रहा है और विश्व भर से इसीलिए जिज्ञासु एवं  उत्सुक पर्यटक ज्ञान पिपासु बनकर भारत आए और भारतीय साहित्य और संस्कृति का अवगाहन कर अपनी भाषा में उसका अनुवाद कर आत्मसात करने का प्रयास करते रहे हैं।
भारत मूलतः ग्राम प्रधान राष्ट्र है इसकी लगभग 80% आबादी गांव में रहती है ।हर सामान्य ग्रामीण भारतीय की जीवन संस्कृति एवं जीवन शैली प्रायः एक जैसी ही रही है। हर भारतीय ग्रामीण प्रायः अपने जीवन को एक प्रयोगशाला की भांति जीता है ।प्राचीन काल से ही गांव के लोग जब शौच – कर्म के लिए प्रयोग में आने वाले पात्र लोटे को घर के अंदर नहीं बाहरी परिसर में ही रखा करते थे और शौच के लिए घर के परिसर का नहीं वरन खेत मैदान इत्यादि का उपयोग किया करते थे।
शौच -निवृत्ति के पश्चात कम से कम तीन बार राख, सफेद मिट्टी, मुल्तानी मिट्टी इत्यादि से काफी देर तक हाथ धोकर कीटाणु से मुक्त कर स्वच्छ किया करते थे और न केवल सोच कर हमसे निवृत्ति के उपरांत बल्कि कहीं भी बाहर से आने पर घर में प्रवेश से पूर्व लोगों को हाथ और पैर धोकर चरण -पादुका उतारकर द्वार पर ही रख देनी होती थी।
घर के भीतर प्रवेश करने के समय अनिवार्य जीवन शैली थी ताकि बाहर से आने वाले व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार की गंदगी, अस्वच्छता अथवा कीटाणु का घर में प्रवेश न होने पाए भारतीय परंपराओं में परिवारों में भोजन संरक्षण की जो पद्धतियां हैं ,वे भी बहुत उपयोगी एवं चिकित्सकीय प्रयोगों की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं ।
नींबू का अचार आंवले का मुरब्बा ,मिर्च का अचार ,इत्यादि नाना प्रकार के रोगों में साक्षात औषधि की भूमिका निभाने वाले भोज्य पदार्थ भारतीय जीवन पद्धति का अनिवार्य अंग है ।इन्हें मात्र स्वाद का परिपूरक मानना कदाचित उचित न  होगा। दैनंदिन जीवन में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न मसालों हल्दी, हींग ,नमक ,काली मिर्च, लॉन्ग,इलायची ,सरसों ,अजवाइन ,मेथी, जीरा, तेजपात, बड़ी इलायची ,गर्म मसाले इत्यादि ।एक -एक मसाला रोग नाशक, शक्ति वर्धक तथा रोग प्रतिरोधक क्षमता वाला है और हर भारतीय के भोजन में यह मसाले अनिवार्य रूप से शामिल होते हैं।
भारत के लोग सृष्टि के प्रारंभिक समय से ही प्रकृति पूजक रहे हैं ।संभवतः प्रकृति से प्राप्त होने वाले लाभों एवं जीवन उपयोगी सुविधाओं के कारण ही भारत में वनस्पतियों, पेड़ों ,वृक्षों की विभिन्न अवसरों पर ,पर्व त्योहारों पर ,यहां तक कि दैनिक जीवन में भी पूजा होती  रही है ।वस्तुतः इसकी पृष्ठभूमि में भी संभवतः इन वृक्षों और वनस्पतियों की उपयोगिता एवं चिकित्सकीय जीवनपरक गुणवत्ता ही निहित थी।
यथा पीपल का वृक्ष ऑक्सीजन का बहुत बड़ा स्रोत है और ऑक्सीजन को जीवन का पर्याय कहना जरा भी अनुचित न होगा। नीम के वृक्ष के कीटाणु नाशक गुण के कारण यह सर्वथा उपयोगी है साथ ही यह त्वचा रोगों के लिए रामबाण औषधि है। तुलसी रक्तशोधक तथा रोग प्रतिरोधक होने के कारण अतुलनीय है।
इसी प्रकार भारतीय जीवन पद्धति में सैकड़ों- हजारों वनस्पति वृक्ष जड़ी बूटियां दिव्य औषधीय गुणों की खान होने के कारण चिकित्सकीय प्रयोगशाला हैं और हमारे पूज्य ऋषि मुनियों ने तथा वनस्पति के इन्हीं जीवन -वर्धक एवं जीवन रक्षक गुणों के कारण इन्हें पूजनीय तथा वंदनीय स्वीकार किया होगा ।हरी -मिर्च, नींबू रोगों तथा कीटाणुओं से लड़ने ,उनसे रक्षा करने में  सहायक सिद्ध हो सकते हैं इसलिए उन्हें प्रतीकात्मक रूप में घर के द्वार पर टांग कर विपरीत परिस्थितियों से रोकथाम का मार्ग बनाने का प्रयास किया गया है ।
जब किसी भी गर्भवती स्त्री का प्रसव संपन्न होता है और वह संतान को जन्म देकर सुखद मातृत्व को प्राप्त करती है तो उसे तथा उसकी संतान को 40 दिन के एकांत वास में स्वास्थ्य व सुरक्षा के दृष्टिकोण से अलग रखा जाता है सामान्यतः बाहर के लोगों का उनके पास आना वर्जित होता है क्योंकि मां तथा शिशु को किसी भी प्रकार का बाह्य तत्व द्वारा संक्रमण न हो सके ।मां को अजवाइन तथा सोंठ का पानी उबालकर पिलाया जाता है ताकि उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि हो तथा उसे भोजन में सात्विकता एवं सादगी का ध्यान रखा जाता है जिससे उसका दूध पौष्टिक हो ,अधिक तेल मसालों से उसे तथा नवजात शिशु को कोई दिक्कत न हो।
नवजात शिशु की सरसों के तेल या देशी घी से मालिश की जाती है, उसका हाजमा सही रखने के लिए छोटी हरड़ घिसकर चटाई जाती है ,सर्दी से बचाने के लिए जायफल चटाया जाता है, पेट दर्द होने पर हींग घिसकर नाभि में लगाई जाती है इत्यादि इत्यादि। भोजन पकाने के लिए तिल का तेल, सरसों का तेल, मूंगफली का तेल और नारियल का तेल प्रयोग किया जाता है ।
इनके भी औषधीय गुणों के कारण इनका प्रयोग अतुलनीय है ।भारतीय परंपराओं के अनुसार हिंदुओं में  मृत्यु के उपरांत भी जिस प्रकार के संस्कारों का प्रावधान हैं उनके  अनुसार दाह संस्कार के बाद सीधे घर में प्रवेश वर्जित है ,नदी तालाब पर स्नान करके या हाथ मुंह धो कर, कुल्ला करके कपड़े बदल कर नीम या तुलसी के पत्ते खाकर या चबाकर घर के भीतर प्रवेश की सामाजिक व्यवस्था की गई है ,जो कि पूर्णत: व्यावहारिक, तार्किक  एवं वैज्ञानिक रीति है क्योंकि मृत व्यक्ति के शरीर से कुछ ऐसे द्रव्य निसृत होते हैं जो अन्य उपस्थित  लोगों के लिए संक्रमण का गंभीर कारण बन सकते हैं ।
इस प्रकार इन विभिन्न दृष्टांत ऊपर दृष्टिपात करते हुए आसानी से समझा जा सकता है कि भारतीय जीवन शैली एवं संस्कृति एक सहज चिकित्सकीय प्रयोगशाला है, जिसमें खानपान, रहन -सहन, वेशभूषा हर स्तर पर ऐसे विधान हैं जो स्वच्छता के साथ-साथ शरीर के स्वास्थ्य ,शारीरिक और मानसिक रोगों से रोकथाम, दीर्घायु शतायु जीवन के लक्ष्य को पाने के विभिन्न चिकित्सकीय प्रयोग हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा भी इसका एक महत्वपूर्ण साधन है। योग भी इस पद्धति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है ।हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसी योग के माध्यम से बड़ी-बड़ी हठ यौगिक क्रियाओं को सहजतः साध कर, कठिन तपस्या करके नाना प्रकार की अद्वितीय सिद्धियां प्राप्त की हैं। योग के विषय में तो कहा भी गया है:- योग: कर्मसु कौशलम् । 
योग के द्वारा अभ्यास करके न केवल शरीर वरन मन भी स्वस्थ एवं प्रसन्न रहता है ।रोगों पर विजय प्राप्त करने की कोशिश योग के माध्यम से सरलता से की जा सकती है और बिना किसी दुष्प्रभाव के जीवन को रोगमुक्त एवं सहज सुख का भागीदार बनाया जा सकता है।
भारत में पूजा पाठ में विशेषकर नवरात्रि में जिस प्रकार नित्य प्रति यज्ञ करने का विधान है और उसके अंतर्गत गोबर के उपले के साथ कपूर, लॉन्ग, गूगल, लोबान ,हवन सामग्री अर्पित करके अग्यारी की जाती है, वह भी वस्तुतः पर्यावरण शुद्धि का एक अति सकारात्मक सामाजिक कृत्य है ।प्राचीन काल से ही भारतीय परिवारों के रसोई घरों के भीतर चरण -पादुकाओं का प्रयोग वर्जित है जिन वस्तुओं में शौच गए हों। उनको धारण किए हुए कभी भी भोजन बनाना या ग्रहण करना तक वर्जित होता था क्योंकि उसमें किसी भी प्रकार की अस्वच्छता के कारण कीटाणु की उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता था इसलिए भोजन से पहले स्नान करना अनिवार्य माना जाता था।
किसी भी सार्वजनिक जगह पर जाने व उसे छूने के बाद बिना हाथ धोये या प्रक्षालित किए घर में प्रवेश करना एवं भोजन करना वर्जित था ।विदेशों की भांति हाथ मिलाने की ,आलंबन और चुंबन की परंपरा भारत में नहीं थी ।सामाजिक तथा शारीरिक दूरी के सिद्धांत के प्रति फलन के रूप में दूर से ही हाथ जोड़कर गरिमामय तरीके से अभिवादन करना भारतवर्ष की एक महान विरासत है जिसका परिपालन वैश्विक संक्रमण के इस दौर में समूचा विश्व कर रहा है।
वस्तुतः यही कहना समीचीन होगा कि भारतवर्ष अति समृद्ध तार्किक एवं वैज्ञानिक चिंतन धारा से समन्वित व्यापक एवं दूरदृष्टि वाला देश है ।पूरी दुनिया, समूचा विश्व कोरोना महामारी के व्याज से जीवन के इन मूलभूत सिद्धांतों को आज  सच्चे अर्थों में समझ पाया है और उनके अनुकरण की बिना किसी लाग लपेट के पैरवी कर रहा है ।ब्राज़ील के प्रधानमंत्री ने इसी संदर्भ में भारतीय श्रेष्ठता एवं उदारता के (कोरोना की रोकथाम के भेजी गई दवाई के संदर्भ में ) सम्मुख नतमस्तक हो यहां तक  कह दिया कि -“मोदी जी ने हमें हनुमान बनकर संजीवनी बूटी लाकर दी है।”इस कथन से विदेशी लोगों का भारतीय संस्कृति के प्रति अगाध विश्वास झलकता है।
उन सब का तो भारत वर्ष हजारों वर्षों से सहज रूप से दैनंदिन जीवन में परिपालन ही कर रहा है ।इसलिए आज कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या समूचे विश्व की तुलना में भारतवर्ष में काफी सीमित एवं अल्प है और अपनी इसी समृद्ध विरासत अर्थात वैज्ञानिक जीवन -शैली तथा व्यापक आदर्श संस्कृति अथवा कार्यशैली के कारण ही भारत पुरातन काल से ही विश्व गुरु कहलाता रहा है। जरूरत आज पुनः अपनी उस विराट संस्कृति की प्रासंगिकता को बनाए रखने की है और अपनी संस्कृति की उत्कृष्टता का मूल्य समझने एवं उसके वैश्विक प्रसार की है।
पाश्चात्य मूल्यों तथा पश्चिमी सभ्यता की अंधी होड़ करने के स्थान पर पूर्व के अरुणोदय के सहज एवं साहसिक स्वीकार की है क्योंकि सूर्योदय की अरुणिमा का लाभ लेकर नवजात शिशुओं के पीलिया रोग का निदान करके एक और प्राकृतिक सूर्य स्नान भारत की अनमोल परंपरा है सूर्य ऊर्जा प्राप्ति के लिए सूर्य नमस्कार का विधान विटामिन बी का स्वाभाविक अक्षय स्रोत है वास्तव में भारतवर्ष के लोगों के जीवन का एक -एक कार्य सिद्धांत और कार्य व्यवहार एक सहज समाधि है जिसके संदर्भ में कबीर दास ने लिखा है –
“साधो सहज समाधि भली”। चिकित्सा का सारस्वत अनुप्रयोग है सहज उपचार।मानव संरक्षण एवं स्वास्थ्य वर्धन का अनूठा प्रयोग भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति एवं भारतीय दैनंदिन जीवन की चिकित्सकीय प्रयोगशाला है ।भारत का एक-एक नागरिक हर भारतीय मानव साक्षात ऋषि धनवंतरी का अवतार है ।उसके घरेलू नुस्खे नानी- दादी और मां के नुस्खों के रूप में मानव चिकित्सकीय प्रयोगों का एक अजस्र स्रोत है,स्वयंसिद्ध प्रयोगशाला है।
आयुर्वेद को आयु का वेद स्वीकार किया गया है और इसे पंचम वेद के नाम से भी अभिहित किया जाता है ।इसके अंतर्गत स्वर्ण भस्म का तथा नाना प्रकार की देसी जड़ी बूटियों का प्राकृतिक उपयोग करके दैहिक ,मानसिक एवं अन्य असाध्य रोगों का निदान किया जाता है ।भारतवर्ष में प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा भी नाना प्रकार के रोगों का समाधान किया जाता है ।इस पद्धति का प्रयोग राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी किया है ।
अग्नि को भारतीय संस्कृति में बहुत पवित्र माना गया है। भारतवर्ष हिंदू धर्म अग्नि पूजा संस्कृति है जिसमें परिवेश एवं पर्यावरण को पवित्र एवं शुद्ध करने के लिए समस्त विकारों का नाश करने के लिए अग्नि का प्रयोग एवं उपयोग किया जाता है। प्रसूति के पश्चात जच्चा के पास एक तसले में अंगार रखे जाते हैं ताकि किसी प्रकार के कीटाणु मां और नवजात शिशु को संक्रमित न कर सकें।
 शाकाहार भारत का मूल पारंपरिक आहार है प्राय: उसके अनुकरण एवं पुष्टीकरण को ही वरीयता दी जाती है ।अनेक प्रकार के रोगों एवं बीमारियों से मुक्ति का मार्ग शुद्ध शाकाहार प्रशस्त करता है।
एलोवेरा, कच्ची हल्दी ,कढ़ीपत्ते, अजवाइन के पत्ते ,गिलोय, तुलसी इत्यादि का उपयोग भारतीय जीवन पद्धति का सहजअंग हैं। भोजन में अंकुरित दालों ,अंकुरित चने ,लोबिया इत्यादि का प्रयोग बहुत महत्वपूर्ण है। भोजन पकाने की  विविध विधियां वस्तुतः भोजन को कीटाणु मुक्त एवं संरक्षित करने का भारतीय वैज्ञानिक प्रयास हैं। बेसन, दूध, मुल्तानी मिट्टी इत्यादि के लेपन के द्वारा त्वचा संबंधी रोगों का निदान किया जाता है ।घर में धुँआर करना, धूप अगरबत्ती का धुआं करना ,दरवाजे पर नीम ,पीपल तथा तुलसी के पत्तों को टांगना वास्तव में विभिन्न महामारियों से बचाव एवं रोकथाम का ही सहज, उपयोगी  किन्तु बहुत बहुमूल्य प्रयास है।
प्याज, आंवला , लहसुन ,नारियल ,शहद, त्रिफला ,हरड़ ,शतावरी तथा अश्वगंधा जैसे लाभकारी तत्वों  का दैनंदिन उपयोग या सेवन भारतीय  ” औषधीय संस्कृति” का सहज भारतीय स्वीकरण है भारतीय साहित्य एवं वैदिक एवं पौराणिक रचनाओं में वैश्विक महामारी  से संपूर्ण विश्व की रक्षा हेतु विभिन्न श्लोक  एवं ऋचाएं उपलब्ध हैं ।  यथा :- “ओम  जयंती  मंगला काली  भद्रकाली  कपालिनी , दुर्गा  क्षमा  शिवा धात्री  स्वाहा स्वधा नमोस्तुते “। तथा “सर्वे भवंतु सुखिनः , सर्वे संतु निरामय:,सर्वे भद्राणि पश्यंतु , मा कश्चित् दुख भाग भवेत्  ” एवं  “ओमविश्वानिदेवसवितर ……..।”भारत के आरोग्य की मूल आधार सनातनी चिकित्सकीय पद्धति को कोटि-कोटि नमन ।आयुष्मान सेतु ऐप इसी भारतीयता की सहज निर्देशिका है। उसे भी अनेकश: साधुवाद। जय भारत ,जय भारती, जय भारतीय पुरातन ,शाश्वत एवं वैज्ञानिक चिकित्साधर्मी  सहज संस्कृति।

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