Sunday, April 19, 2026
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संपादकीय – इस बार ‘ग्रे तलाक़’ यानि कि (Grey Divorce)

ग्रे डिवोर्सका एक पहलू और भी हैखुले आम तलाक ना लेना और एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहना। कुछ पतिपत्नी ऐसी सोच भी रखते हैं कि भला इस उम्र में अब क्या तलाक़ के पचड़े में पड़नाजब इतनी गुज़ार दी है तो बाक़ी भी गुज़र ही जाएगी। वेजैसा चलता है वैसा चलने देते हैं। एक दूसरे से कोई उम्मीद नहीं रखते इसलिये किसी प्रकार की शिकायत नहीं रहती। तुम अपनी ज़िंदगी जियो और मैं अपनीबिल क्लिंटन और हिलेरी क्लिंटन इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ऐसे बहुत से जोड़े भारत में भी मौजूद हैं जो एक ही छत के नीचे अजनबी बन कर जीवन गुज़ार रहे हैं। 

मित्रो पिछली बार जब मैं शयनकक्ष तलाक़ (स्लीप डिवोर्स) के बारे में जानकारियां हासिल कर रहा था, मुझे एक अलग किस्म के तलाक़ की जानकारी भी हासिल हो गई। मुझे लगा कि दोनों हालांकि कहलाते तो तलाक़ ही हैं, मगर दोनों की स्थितियां बिल्कुल अलग हैं। इसलिये यह आवश्यक हो गया था कि मैं इस विषय पर पिछले संपादकीय को आगे बढ़ाते हुए एक स्वतंत्र संपादकीय ही लिखूं।
मैं जब इस विषय पर अपने दिमाग़ के कोनों को कुरेद रहा था तो ख़बर मिली कि भारतीय सिनेमा के बड़े संगीतकार ए. आर. रहमान (ऑस्कर अवार्ड विनर) और उनकी पत्नी सायरा बानू ने 29 वर्ष साथ रहने के बाद एक दूसरे से अलग होने का निर्णय ले लिया। दोनों की दो बेटियां – खतीजा औ रहीमा – हैं और एक बेटा है अमीन। ए. आर. रहमान के अनुसार सायरा से उसका विवाह उसकी माँ ने करवाया था यानी कि यह लव-मैरिज नहीं थी। मगर लगभग तीन दशकों के बाद ‘इमोशनल  स्ट्रेन’ के कारण यह शादी टूट रही है। 
सुनने में यह भी आ रहा है कि ए. आर. रहमान और सायरा बानू तलाक के बावजूद शायद एक बार फिर इकट्ठे हो जाएं। बच्चों के सिलसिले में सायरा की वकील वंदना शाह ने कहा कि बच्चे अब वयस्क हैं और वे स्वयं ही तय करेंगे कि उन्हें किस के साथ रहना है।  उन्होंने आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि दोनों के बीच सुलह मुमकिन नहीं है, “मैंने यह नहीं कहा कि सुलह संभव नहीं है। मैं एक आशावादी हूं और हमेशा प्यार और रोमांस के बारे में बात करती हूं। दोनों का ज्वाइंट स्टेटमेंट बिल्कुल साफ़ है। यह दर्द और अलगाव की बात करता है। दोनों लंबे वक्त शादी के रिश्ते में थे और इस निर्णय पर पहुंचने में बहुत विचार किया गया है, लेकिन मैंने कहीं भी नहीं कहा कि सुलह संभव नहीं है।”
इन्हीं दिनों कुछ और ख़बरें मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री से ही छन कर आ रही थीं कि अभिषेक बच्च्न और एश्वर्या राय के बीच भी संबंध कुछ ठीक नहीं चल रहे। हालांकि उनकी शादी के केवल 17 साल ही हुए हैं मगर सोशल मीडिया पर अफ़वाह यही है कि आजकल अभिषेक बच्चन निमृत कौर में कुछ अधिक रुचि ले रहे हैं, शायद इसीलिये उनके और एश्वर्या राय के बीच दूरियां अधिक बढ़ रही हैं। ऐसे बहुत से रिश्ते हमारे आसपास भी दिखाई देते रहते हैं जब पति-पत्नी के बीच तनाव इस कदर बढ़ जाता है कि उनके लिये रिश्ता बनाए रखना संभव नहीं रह जाता। 
रिश्तों में ‘इमोशनल स्ट्रेन’ कैसे बढ़ता है, इसे हर पति-पत्नी या जोड़े के लिये समझना आवश्यक है। जब आपस में बातचीत का सिलसिला हिचकोले खाने लगे; विश्वास की कमी होने लगे; और शक करने के अवसर बढ़ने लगें तो दूरियां बढ़ने लगती हैं और उससे जो तनाव पैदा होता है वही बनता है इमोशनल स्ट्रेन का मुख्य कारण।  
एक दूसरे से ज़रूरत से अधिक उम्मीदें लगाना और फिर उनका पूरा ना हो पाना भी तनाव पैदा करता है। इन्सानी रिश्ता कोई सीधी रेखा नहीं है। इसमें तरह-तरह के मोड़ आते हैं। पति-पत्नी को इन सब हालात से निपटने की कला आनी चाहिये। समायोजन और सामंजस्य दो ऐसे शब्द हैं जो पति-पत्नी के रिश्ते को पटरी पर बिठाए रखते हैं। 
‘ग्रे डिवोर्स’ आमतौर पर उस उम्र में होता है जब बालों में सफ़ेदी आनी शुरू होती है – यानी कि पचास की उम्र के आसपास। जिसे भारत में सफ़ेद बाल होना कहते हैं, पश्चिमी देशों में उसे ‘ग्रे हेयर’ कहा जाता है। इसलिये ही ‘ग्रे डिवोर्स’ जैसी परिभाषा गढ़ी गई। यह समझना आसान नहीं होता कि बीस-पच्चीस साल के विवाहित जीवन के बाद एकाएक तलाक लेने की नौबत क्यों आ जाती है।
मुंबई के हिन्दी सिनेमा में ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जिनमें ‘ग्रे डिवोर्स’ जैसी स्थिति बनी है। अरबाज खान और मलाइका अरोड़ा के तलाक को भी ‘ग्रे डिवोर्स’ कहा जाता है, क्योंकि दोनों की शादी 19 साल के बाद टूटी थी। इसके अलावा कमल हसन और सारिका; किरण राव और आमिर खान; फ़रहान अख़्तर और अधुना अख़्तर, अर्जुन रामपाल और मेहर जेसिया की शादी को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है। आमिर का तलाक 15 साल, फरहान का तलाक 16 साल और अर्जुन रामपाल का तलाक 21 साल बाद हुआ था। ‘ग्रे डिवोर्स’ के मामले पश्चिमी देश के लोगों के बीच आम बात बनते जा रहे हैं। भारत में भी पिछले 5 सालों में 50 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में तलाक के मामले दोगुने हो गए हैं।
दरअसल 16 जुलाई को लेखिका हीना खंडेलवाल ने ‘ टूटते रिश्ते, तलाक और ग्रे डिवोर्स’ के बारे में एक पोस्ट शेयर की थी, जिसे पर अभिषेक बच्चन ने भी लाइक का बटन दबाया था। तभी से इस तलाक के बारे में चर्चा गर्म हो गई। वैसे भी इन दिनों अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के रिश्ते सोशल मीडिया में चर्चा का विषय बने हुए है। इसलिये ज़ाहिर है कि ‘ग्रे डिवोर्स’ सुर्खियों में आना ही था। इतने साल एक साथ बिताने के बाद अलग हो जाने के कारणों को समझना आवश्यक है। 
‘ग्रे डिवोर्स’ एक हैरान करने वाला कारण है कि अब लोग लंबे समय तक जीवित रह रहे हैं… इसलिए पति-पत्नी के रिश्तों के बीच कुछ नयापन नहीं बचता और दोनों नए तरीकों से व्यक्तिगत संतुष्टि की तलाश करते हैं। बच्चे बड़े हो जाते हैं और अपना-अपना घोंसला अलग जगहों पर बनाते हैं। कुछ लोगों के बच्चे दूसरे शहरों में जा बसते हैं तो कुछ लोगों के बच्चे विदेश चले जाते हैं। एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि आज नारी आर्थिक रूप से सशक्त हो चुकी है और अपने जीवन-यापन के लिये पुरुष पर आश्रित नहीं है। एक नीरस रिश्ते को ढोने के मुक़ाबले वह एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहती है जहां उसे कुछ कर गुज़रने की भावना महसूस हो सके। 
एक बात यह भी है कि समाज में अब तलाक़ शब्द को स्वीकार्यता मिलती जा रही है। पहले इसे एक सामाजिक कलंक की तरह देखा जाता था। जबकि आज टीवी सीरियलों और विदेशी प्रभाव के कारण यह मान लिया गया है कि तलाक़ भी एक सहज प्रक्रिया है। बिल गेट्स और लिंडा गेट्स यदि अलग हो सकते हैं तो फिर भला हम क्यों नहीं। 

‘ग्रे डिवोर्स’ इतना आसान भी नहीं होता है। दरअसल पति-पत्नी एक लंबा समय जब साथ रहते हैं तो साझे बैंक अकाउंट, कुछ जायदाद वगैरह, शेयर मार्केट में निवेश करते हैं। अलग होते समय जायदाद और पैसे का बंटवारा आसान नहीं होता है। इसमें बहुत सी जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। 
ठीक इसी तरह स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के साथ भी निपटना होता है। स्वास्थ्य बीमा अलग-अलग करना होता है। देखने में ये सब सतही लग सकता है, मगर ऐसा होता नहीं है। रोज़मर्रा के कितने पहलू हैं जिन पर हम ध्यान भी नहीं देते। मगर जब रिश्ता तोड़ने का वक्त आता है तो वही मुद्दे अहम हो जाते हैं। 
तलाक से सामाजिक दायरे में बदलाव आ सकता है। दोस्त और परिवार नये-नये अलग हुए पति-पत्नी में से किसी एक का पक्ष लेना शुरू कर सकते हैं। पति-पत्नी स्वयं और दोस्त भी अजीब महसूस कर सकते हैं। परिणामस्वरूप, दोनों एकल अकेलापन महसूस करना शुरू कर सकता है और उन्हें एक नया सामाजिक नेटवर्क बनाने की ज़रूरत पड़ सकती है।
फिर अलग घर में अकेले रहना और अपने तमाम काम अकेले करना इतना आसान नहीं होता है। आर्थिक पहलू भी संभालना होता है। बुढ़ापे में अकेले ज़िन्दगी जीना आसान नहीं होता है। सच तो यह है कि ग्रे तलाक का बढ़ना भारत में बदलते सामाजिक परिदृश्य को दर्शाता है। चूंकि सामाजिक मानदंड लगातार विकसित होते जा रहे हैं और व्यक्ति व्यक्तिगत खुशी को अधिक प्राथमिकता देते हैं, हम ग्रे तलाक के मामलों में और वृद्धि की उम्मीद कर सकते हैं। न्यायिक प्रणाली को इन मामलों से उत्पन्न विशिष्ट चुनौतियों के समाधान के लिए अनुकूल रहना चाहिए।
मगर ‘ग्रे डिवोर्स’ का एक पहलू और भी है… खुले आम तलाक ना लेना और एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहना। कुछ पति-पत्नी ऐसी सोच भी रखते हैं कि भला इस उम्र में अब क्या तलाक़ के पचड़े में पड़ना… जब इतनी गुज़ार दी है तो बाक़ी भी गुज़र ही जाएगी। वे… जैसा चलता है वैसा चलने देते हैं। एक दूसरे से कोई उम्मीद नहीं रखते इस लिये किसी प्रकार की शिकायत नहीं। तुम अपनी ज़िंदगी जियो और मैं अपनी… बिल क्लिंटन और हिलेरी क्लिंटन इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। ऐसे बहुत से जोड़े भारत में भी मौजूद हैं जो एक ही छत के नीचे अजनबी बन कर जीवन गुज़ार रहे हैं।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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76 टिप्पणी

  1. ग्रे डाइवोर्स एक अजीब ओ गरीब पर सत्य।ऐसे में इस अहम या शुद्ध हिंदी में कहें तो यह बॉलीवुड में पिछले काफी समय से ज्वलंत विषय रहा है।संपादकीय में उदाहरण से पाठकों को बताना कि ग्रे डाइवोर्स क्या है,कहां से आया,क्यों आया और भारत जैसे देश में क्या कर रहा है और क्या यह एक व्यवहारिक सोच का by प्रोडक्ट है?!
    इन सभी मुद्दों को केंद्र में रख कर लिखा गया है यह स्वतंत्र संपादकीय।आजकल राजनीति,धर्म,युद्ध,ट्रेड वार,से इतर अब लगता है मीडिया के पास कुछ बचा ही नहीं है।यह सत्य है और इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं।
    ऐसे में इस महत्वपूर्ण विषय पर पूरी गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ साथ अनुसंधानित कर सार्थक संपादकीय लिखना एक संवेदनशील और अनुभव साहित्यकार के बुते का ही है।
    अतः अब की बार बधाई संपादक महोदय को विशेष रूप से।
    सादर

    • भाई सूर्य कांत जी, आने संपादकीय को गहराई से समझते हुए बहुआयामी टिप्पणी की है। हार्दिक धन्यवाद।

  2. आपसी समझ और आगे की जिंदगी को अपने तई जीने के लिए सोच-समझकर लिया गया कदम। कटुता में जीवनभर जीने से बेहतर है अपनी खुशी से जीवन में आगे बढ़ा जाए। आम आदमी से लेकर नामचीन लोग सभी इस कदम को स्वीकार लें तो संबंधों को ढोना नहीं पड़ेगा। सामयिक मुद्दा। बधाई एवं मंगलकामनाएँ।

  3. इस तरह का डिवोर्स अधिकतर हाई प्रोफाइल लोगों या उनकी सोसायटी में होता है। मध्य वर्ग के लोग ना तो इस पर चर्चा करते हैं ना ही अपनी उलझन को सुलझाते हैं। या फिर निम्न वर्ग में ऐसा होता है। फ़िलहाल भारत में उम्र दराज़ लोग अपने साथी के साथ ही जीवन गुज़ार देते हैं। आपका सम्पादकीय मंथन निसंदेह कुछ प्रश्न उठाता है।

    • अनीता जी मध्यवर्गीय लोग चर्चा नहीं करते मगर एक छत के नीचे अजनबी की तरह रहे जाते हैं।

  4. आप उन घुटते रिश्तों को शब्दों का जामा पहना रहे हैँ जिसका विस्तार तो है किन्तु उसको परिभाषित करने के लिए शब्द नहीं । धन्यवाद

  5. इतने सालों तक एक ही छत के नीचे रहने के बाद अलग हो जाना बहुत मारक होता है। इसमें से किसी एक को मानसिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है। आज के समय में पति-पत्नी दोनों ही अपने पैरों पर खड़े होते हैं। इसलिए अनबन हो जाने पर दोनों के इगो टकराते हैं। कोई पीछे नहीं हटना चाहता है। बस यहीं से दूरियां शुरू हो जाती हैं। इन दूरियों के दिनों में कोई हमदर्द उन्हें सांत्वना देते-देते कब हमराही बन जाए पता ही नहीं चलता है। ऐसे में तलाक होना निश्चित है। तलाक के अन्य कारण भी हो सकते हैं। जैसे –
    1- पति का अन्य संस्था में काम करना और पत्नी का अन्य संस्था में। अगर दांपत्य जीवन में थोड़ी सी भी कड़वाहट आ गई और वे शारीरिक रिश्तों को इग्नोर करने लगे तो फिर उनका झुकाव दूसरी तरफ चला जाता है।इन्हीं संस्थाओं में कोई पहले मित्र बनता है फिर प्रेमी या प्रेमिका ।
    2- देखा गया है कि कम उम्र की महिलाएं अधिक उम्र के पुरुषों की तरफ इतनी अधिक आकर्षित होती हैं कि पुरुष जब तक सोचता है तब तक उसका अपने ऊपर कोई नियंत्रण नहीं रह पाता है। इसके विपरीत पुरुष महिला को अपने धन वैभव से अपनी तरफ खींचता है।
    3- ग्रे डिवोर्स में वे दंपत्ति आते हैं जिन्हें समाज में दिखाना है कि हम अलग नहीं है क्योंकि उनका कानूनी रूप से तलाक नहीं हुआ है। और मजबूरी में एक छत के नीचे तो नहीं पर अलग-अलग कमरों में जरूर रहते हैं। ये समाज और परिवार से डरने वाले लोग होते हैं।
    इसी को तेजेन्द्र सर ने संपादकीय का विषय बनाया है। इसमें दो में से एक के विवाहेत्तर संबंध जरूर होते हैं। एक मौज काटता है और दूसरा घुटता रहता है और घुटता हुआ अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बनाए रखने की भरसक कोशिश करता है पर समाज से छिपा नहीं रहता है। सेलिब्रिटी सोसायटी की बातें जल्दी लीक हो जाती है बनिस्बत अन्य लोगों के।
    5- सामान्य लोगों में एक दो केस मैंने देखे हैं। मेरे आस-पास के एक गांव के आदमी अपनी पत्नी को जुए में रखकर हार गया । जिसने जीता था वह भला मानुष था। उसने अपनी पत्नी बच्चों के साथ कुछ मुहल्ले की महिलाओं को बुलाकर सारी बात बता दी थी कि मैंने इसे जुआ में जीता है। आप लोग इसके साथ रहिएगा। सुबह इसको लौटा देंगे। जीता हुआ आदमी खलिहान में लेटने चला गया। सुबह उसने ससम्मान उसे लौटा दिया। इसके बाद वह महिला जब तक जीवित रही, पति से कभी बात नहीं की। लेकिन शहरी क्षेत्रों में यहां तक की कस्बाई क्षेत्रों में काफी लोग मिल जाएंगे। इनमें से कुछ फिर से पति-पत्नी की तरह रहने लगे हैं और कुछ अलग हो गए हैं। इनके नाजायज संबंध सुने हैं (जरूरी नहीं है हों भी) पर इन्होंने दूसरी शादियां नहीं की है।
    संपादक जी ने आज के जीवनचर्या की हकीकत बन चुके मुद्दे को उठाकर नया काम किया है। इस पर बात होनी चाहिए।

    • भाई लखनलाल पाल जी, आपने विस्तार से समस्या को एनेलाइज़ किया है। आप हमेशा पुरवाई के संपादकीय को गहराई से पढ़ते हैं और गंभीर टिप्पणी लिखते हैं।

  6. देव आनंद और कल्पना कार्तिक भारत में ग्रे डिवोर्स का बहुत पुराना उदाहरण रहा। एक छत के नीचे अजनबियों की तरह बरसों रहे।
    इस विषय पर बात होनी चाहिए। ये संपादकीय एक अच्छी पहल और शुरुआत साबित होगा।
    साधुवाद

  7. बहुत बढ़िया संपादकीय,,,,,
    भारत में इस तरह का डिवोर्स या तो उच्च वर्ग या निम्न वर्ग में ही देखने को मिलता है। मध्यम वर्ग तो अपनी अलग तरह की परेशानियों में जीवनभर उलझा रहता है। वे आज भी नैतिक सीमाओं में रहने का पूरा प्रयास करते हैं और जीवन मूल्यों में विश्वास रखते हैं।
    डर है कि इस बीमारी का वायरस अब हर जगह न फैले।

  8. सुन्दर संपादकीय।
    तलाक एक खौफनाक शब्द है। कुछ अपवादों को छोड़कर यह कभी कोई बेहतर रास्ता नहीं है। संपादकीय में तलाक के जिन प्रकारणों का उल्लेख आया है, वे सब के सब खाये -पिये तो हैं ही साथ अपने रिश्ते से अघाये लोग हैं। नये रस और स्वाद की लिप्सा में वे इस रास्ते पर बढ़ रहे हैं।

  9. अति सुन्दर विषय, अति सुन्दर सम्पादकीय
    दुनियाँ भर में विधि विधान, कायदे कानून, रीति रिवाज, परम्पराओं को एक आदर्श सुसंस्कृत जीवन के लिए निरूपित किए जाते हैं! किन्तु मानव जाति का खुराफ़ाती दिमाग़ अपने निजी स्वार्थ के लिए नए तौर तरीक़े गढ़ते रहते हैं! ये ग्रेडाइवोर्स भी हाइ प्रोफाइल लोगों की प्रथा है! जिस के उपयोग से साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे!

    • कैलाश भाई, उच्च वर्ग के लोग चर्चा में आ जाते हैं। संपादकीय की हाईलाइट की गई टिप्पणी में मध्यवर्गीय लाखों जोड़े जी रहे होंगे!

  10. आ0 तेजेन्द्र जी ! सुन्दर सम्पादकीय। इस तरह के तलाक का एक कारण जीवन में एकरसता भी होता है। लखनपुर जी ने सत्य ही कहा कि अब बदलते परिवेश में जब महिलाएँ
    अपने पैरों पर खड़ी हो गई हैं पति पत्नी के बीच अहम भी आ जाता है। एक बात और है अक्सर पत्नी तो पति की सफलताओं को अपना समझती हैं जबकि पति अपनी पत्नी की सफलता से ख़ुद को हीन समझने लगते हैं और उससे विमुख हो जाते है या प्रताड़ित करने लगते है।
    पर ग्रे डायवोर्स एक तरह का समझौता है ,एक तो साथ रहने की आदत पड़ जाती है और दूसरे सब वही कारण जो आपने गिनाए।
    अगर आप अभी युवा हैं तो तलाक आपको एक नई शुरुआत दे सकता है परन्तु यदि आयु के तीसरे दौर में हैं तो एक तरह से ठीक ही है। अलग भी हैं और साथ भी ,की झंझटों से बच जाते हैं।

    • ज्योत्सना जी आपने समस्या की तरफ़ प्रेक्टिकल अप्रोच दिखाई है। बढ़िया है। धन्यवाद आपका।

  11. शायर मीर तक़ी मीर के शब्दों में कहे

    इब्तिद]-ए-इश्क़ है रोता है क्या
    आगे-आगे देखिए होता है क्या।

    सार्थक संपादकीय हेतु हार्दिक शुभकामनाएं!

  12. संपादकीय के साथ सभी टिप्पणियां भी पढ़ीं। कैलाश मुंशी ने कहा कि ये हाई प्रोफ़ाइल लोगों की प्रथा है। मैं नहीं जानती कि, भारत के कितने प्रतिशत लोग शादी करने से पहले, विवाहित जोड़ों को देख कर यह अनुमान लगाते हैं कि, कितने प्रतिशत जोड़े सुखी हैं। भारतीय शादियां (हम 50+ पीढ़ी में) ऐसे होती हैं जैसे इसके बिना स्वर्ग प्राप्ति नहीं होगी।

    वो युगल जिसमें पत्नी जीवन भर पति की मार, गाली और उपेक्षा सह कर रही, वो भी अपने बच्चों की शादी हुलक कर करवाती हैं। वो पिता जिन्होंने पत्नी को नौकरानी और यौन पूर्ति के साधन से अधिक कुछ नहीं समझा, वो भी अपने बच्चों पर सुखी वैवाहिक जीवन(?) जीने के लिए शादी कर लेने पर दबाव डालते हैं।
    जो ख़ुद असफल हैं वो दूसरों को सफलता के नियम सिखाते हैं… विडंबना है।
    यदि लोग सत्य बोलें और कोई सर्वे किया जाए तो 50+ आयुवर्ग के 95%युगल असंतुष्ट और मजबूरी में साथ रहने वाले मिलेंगे।
    जिन्दगी साथ-साथ झेलते हैं। कुछ लोग बुढ़ापे की मजबूरियां समझ कर समझौता कर लेते हैं। लेकिन 75%ऐसे होते हैं जो मृत्युपर्यन्त एक म्यान में दो तलवारों की तरह ही रहते हैं।
    पति-पत्नी का सम्बन्ध ही मात्र सम्बन्ध है जो प्राकृतिक और जन्मजात नहीं है।एक अप्राकृतिक सम्बन्ध कैसे अच्छा रह सकता है? जबकि मां-बाप और सन्तान, भाई-बहिन, भाई-भाई जैसे रक्त के प्राकृतिक सम्बन्ध विकृत होते हैं??????

    महाभारत, रामायण हमारे सामने है, पिता अपने पुत्र को वन भेज देते हैं। भरत अपनी मां को क्या कुछ नहीं कहते। भाई-भाई के बीच युद्ध होता है।दुर्योधन और धृतराष्ट्र की बातें,भीष्म पितामह का दुःख।

    ययाति का अपने पुत्र से यौवन मांगना, शुन: शेप के पिता द्वारा पुत्र को नर मेघ यज्ञ के लिए बेंच देना। यम-यमी की कथा…नैसर्गिक संबंधों की कटुता दिखाते हैं।

    गौतम का अहिल्या को पत्थर बनाना(विवाह के कितने साल हुए थे निश्चित ज्ञात नहीं), राम का सीता परित्याग, उसके अनुसार शादी के 12 साल बाद राम को वनवास मिला था।14 साल वन में(12+14= 26) [जो भी जानकारी उपलब्ध है]। वापस आने के बाद भी कुछ साल हुए होंगे … यानी ये भारत में ग्रे डाइवर्स के ऐतिहासिक उदाहरण हैं। इसके आगे कहने को शायद ही कुछ है।
    कुछ विवाह निभ जाते हैं यही बहुत है, अन्यथा सब समझौता है, हर घर में खाइयां हैं। बाहर से देखने पर सब ठीक लगता है, नज़दीक से देखो तो हर दिल घायल दिखता है…
    पुरुष के लिए sex, महिला के लिए आर्थिक निर्भरता। जिस दिन, दोनों का निराकरण मिल गया, विवाह की संस्था समाप्त…
    एक विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए हार्दिक आभार।

    • आदरणीय शैली जी, आपकी टिप्पणी एकदम अद्भुत है और दिल से निकली है। इसे केवल संपादकीय पर टिप्पणी मानना अन्याय होगा। हार्दिक धन्यवाद।

  13. शादीशुदा ज़िन्दगी भी एक अजूबा है। बिल्कुल ताश के पत्तों से खेलने की तरह। यह खेल शादी होते ही शुरू हो जाता है। शुरू शुरू में एक दूसरे को समज्ञने में थोड़ा वक्त तो लगता है और आपसी प्यार भी बढ़ने लगता है। इसी खेल के दौराण ताश की सरें भी बननी शुरू हो जाती हैं। मेरा मतलब है कि परिवार में बढौत्री होने लगती है। नये महमानों के आने पर आपसी प्यार भी बट जाता है। समय के साथ साथ इन नये पँछियों के जब पर निकल आते हैं और वो घर छोड़ कर चले जाते हैं तो मियाँ बीवी फिर उस मुकाम पर पहुँच जाते हैं जो ठीक शादी के बाद का था। यानि अब दोनों फिर अकेले हो जाते हैं और आपसी प्यार को फिर से उसी लैवल पर लाने का प्रयास फिर शुरू हो जाता है।
    यही वो दौर होता है जहाँ से ग्रे डाइवोर्स की शूरूआत शुरू हो जाती है। कभी कभी हालात ऐसे बन जाते हैं कि न ही साथ रहने को तबियत करती है और न ही छोड़ने की हिम्मत होती है। ऐसे माहॉल में अगर देखा जाए तो ग्रे डाइवोर्स ही प्रैक्टिकल रहता है। ग्रे डाइवोर्स के भी कुछ नियम होते हैं। एक ही छत के नीचे अलग अलग रहना, अपना भोजन ख़ुद बनाना और दो चूल्हे सुलगाना के लिए काफ़ी अण्ड्रस्टैण्डिँग की ज़रूरत चाहिए। माना कि इतनी उमर साथ रहने के बाद अब क्या एक दूसरे को छोड़ेंगे की सोच को लेकर यह फ़ैसला लिया गया है फिर भी एक दूसरे के लिए जो फ़ीलिंग होती हैं उनका कुछ अंश तो सदा रहता है और एक दूसरे के बीमार पड़ने पर चाय या दवा दारू तो एक दूसरे को दे सकते हैं।
    जितेन्द्र भाई; अपने सम्पादकीय में आपने बहुत सी मिसालें दी हैं। ग्रे डाइवोर्स की भी अलग अलग क्लासें होती हैं। ग्रे डाइवोर्स का स्टैप लेना बहुत से हालात पर निर्भर है। माना कि यह एक सौल्युशण है लेकिन यही केवल एक ही सौल्युशण नहीं है। बहुत बहुत साधुवाद।

    • भाई विजय जी, आप कनाडा में रहते हैं और पश्चिमी सभ्यता से परिचित हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि आप Grey Divorce के तमाम पहलुओं से परिचित होंगे। इसलिए आपकी टिप्पणी बहुत विशेष है।

  14. गांधी जी ने भी तलाक का फार्म भरकर तब फाड़ दिया था जब कस्तूरबा जी ने घर के काम गिनवाने शुरू किये थे….जैसे-कल से आपको ये सब करना होगा ,अलमारी की एक जाली टूटी है वहां दफ्ती लगा देना वरना बिल्ली दूध पी लेगी…पानी सुबह भर लेना ,दिन में एक ही बार आता है…इत्यादि।।सारी बातें सुनने के बाद बोले,इतनी लंबी लिस्ट से बेहतर है तलाक का विचार ही रद्द कर दूं और हुआ भी यही!!
    आपकी संपादकीय सच में एकदम तर्कसंगत और समयाचीन होती है।तलाक शब्द से तो वाकिफ थी पर यकीन मानिए “ग्रे तलाक”मेरे लिए एकदम तरोताजा शब्द है। हम सब पाठकों के ज्ञान में वृद्घि करने हेतु आपका धन्यवाद।

  15. सविता जी, यह गांधी जी वाली घटना तो अधिकांश मित्र भूल चुके होंगे। सबको याद दिलाने के लिए हार्दिक आभार।

    आप पुरवाई के संपादकीय को रेगुलरली पढ़ती हैं और प्रतिक्रिया भी भेजती हैं; इसके लिए विशेष धन्यवाद।

  16. ‘पुरवाई’ के संपादक तेजेंद्र शर्मा ने इस बार भी अपने संपादकीय में नया विषय उठाया है। उन्होंने ग्रे तलाक को लेकर अपने संपादकीय में लिखा है की 50 की उम्र के आसपास के लोगों द्वारा अपने जीवन साथी से रुचि नहीं लेने, आपसी तालमेल के अभाव के कारण इस तरह की समस्याएँ पैदा हो रहीं हैं। उन्होंने कुछ बड़ी हस्तियां और सेलिब्रिटीज के उदाहरण देकर इस विषय को बड़ा पुख्ता भी किया है।
    मेरी जानकारी में तो ग्रे तलाक की समस्या विदेशों ही नहीं भारतीय समाज में भी वर्षों पहले पनप चुकी है। महानगरों से चलकर कस्बों और गाँवों में तक पसर गई है। मैं आपको दो दशक पहले ग्रे तलाक का एक उदाहरण देता हूँ। उत्तर प्रदेश का बड़ा ही नामचीन एक कस्बा है जालौन। जालौन का एक मोहल्ला है हरीपुरा। मैं इस मोहल्ले में अपने दूर के रिश्तेदार के यहाँ दो साल किराएदार की हैसियत से रहा। मकान मालिक पति-पत्नी दोनों अपने अलग अलग कमरों में रहते थे। उनका खानापीना भी अलग बनता था। मैं दोनों की चाय पीता था। अंकल, आंटी की स्वछंदता से परेशान थे, तो आण्टी, अंकल की बनियागीरी से चिढतीं थी। दोनों के स्वभाव भी विपरीत थे। उनके बेटे, बहुएं, नाती-पोते सब कुछ थे, जो बाहर रहते थे। अंकल व आण्टी एक ही घर में एक दूसरे से अजनबी की तरह रहते थे।
    ग्रे तलाक जैसी समस्या अब गाँवों में भी मौजूद है। गाँव की जड़ों से जुड़ा होने के कारण गाँव के भीतर के सच को बखूबी जानता हूँ। गाँवों में भी ऐसे इक्का दुक्का संयुक्त परिवार जो अब टूट गए हैं। उनके बच्चे पढ़ लिखकर शहर चले गये हैं। घर में केवल माँ-बाप रहते हैं लेकिन दोनों के साझा चूल्हे नहीं हैं। हैं भी तो आपसी बोल-चाल बंद है। बरसों से दोनों अलग- थलग हैं। अलग-अलग रोटियाँ खाते-पकाते हैं। रोटियाँ ही क्यों अपनी जिस्मानी ज़रूरतें भी अलग-अलग पूरा करते हैं…
    वास्तव में आपसी तालमेल, एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान, अनकही बातें को सुन लेना और कहीं बातों पर टिका रहना यह कुछ ऐसे संवेदनात्मक मुद्दे हैं जिनके दरकने- टूटने से ग्रे तलाक जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रहीं हैं।
    आदरणीय तेजेंद्र शर्मा को ग्रे तलाक जैसे मुद्दे पर तथ्यात्मक
    संपादकीय लिखने के लिए हार्दिक बधाई।

    डॉ० रामशंकर भारती
    झाँसी- उत्तर प्रदेश

    • भाई रामशंकर भारती जी, आपने पूरे विस्तार से संपादकीय से जुड़े अपने निजी अनुभव साझा किए हैं। इससे पुरवाई के पाठकों को एक नई दृष्टि मिलेगी। हार्दिक आभार।

  17. बहुत हीं शोधपूर्ण संपादकीय। आपकी विशेषता यही है कि आप किसी भी विषय को उसके सभी पहलुओं का ध्यान रखते हुए उसे पूर्णता प्रदान करते हैं। तलाक वैसे भारतीय परंपरा नहीं है। भारत में शादी को सात जन्मों का बंधन माना जाता है। और प्रत्येक गिनती वर्तमान जन्म से हीं शुरु होती है। हाँ यहाँ त्याग की परंपरा अवश्य रही है। मगर वह भी बौद्धिक त्याग, यानि कम से कम एक संतान प्राप्ति के बाद ताकि पुरुष को अपने पितृ ऋण से मुक्ति तथा पीड़िता पत्नी को आगे चलकर एक सहारा मिल सके। ऐसे त्याग को कभी संबंध विच्छेद नहीं माना गया।
    भगवान राम भगवान बुद्ध, यहाँ तक कि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री ने अपनी अपनी पत्नियों को त्यागा, मगर उनकी पत्नियाँ आज भी उन्हीं की कही व मानी जाती है। इसलिए कि पौराणिक हिन्दू मान्यता के अनुसार आगे के छः जन्म अभी शेष है। भारत में तलाक प्रथा संभवतः अंग्रेजी काल में शुरु हुई होगी जब लोग अंग्रेजी में शिक्षित होने लगे। उससे पहले तो अरबी फारसी सिर्फ मुंशी स्तर तक हीं पढ़ते थे। ज्यादा पढ़ने की जरुरत हीं नहीं थी। और उससे भी पहले भारत में जीते जी तलाक भला कौन सोंच सकता था? जिस समाज में सती प्रथा थी। मरने के बाद भी युवा पत्नियाँ पति की चिता पर बैठ जाती थी। आज भी यदि कुछ ज्यादा पढे लिखे सभ्य भारतीयों को छोड़ दें तो ज्यादातर सामान्य भारतीय लाख झगड़े मनमुटाव लात मुक्के गाली गलौज झोंटा लसार के बाद भी संत कबीर की उक्ति “सोना सज्जन साधूजन टूटे जुड़े सौ बार” को चरितार्थ करते हुए फिर उसी पहले वाले प्रेम भाव से हीं मिलकर रहने लगते हैं। भारत एवं भारतीयों की मूल समस्या वस्तुतः कुछ अलग है।
    भारत में बड़ी समस्या यह है कि यहाँ कोई भी कानून सख्ती से लागू नहीं किया जाता जिसका परिणाम बाद में लोगों व यहाँ तक कि कभी-कभी सरकार तक को भी भुगतना पड़ता है। यहाँ शादी की कानूनी उम्र तो तय है मगर पारंपरिक शादी की मान्यता आज भी जारी है। हलाँकि 2006 में सरकार ने कानूनी पंजीकरण अनिवार्य कर दिया मगर कानूनी पंजीकरण की अनिवार्यता सख्ती से लागू न होने के कारण आज भी आधे से अधिक शादियाँ पारंपरिक तरीके से कम उम्र में हो रही है। ऐसे में यदि किसी को शादी का पंजीकरण अथवा विवाह प्रमाण पत्र की जरूरत पड़ जाए तो रजिस्ट्रार साफ साफ मना कर देता है। यह कुछ ऐसी स्थिति है कि घर बनाना शुरु करो तो कोई रोक टोक पूछताछ नहीं। और घर जब बनकर तैयार हो जाए तो डंडा लिये आधे दर्जन सरकारी सिपाही व उतने हीं कानून विशेषज्ञों की टोली जाँच करने पहुँच जाए और पाएँ कि इस घर को बनाने में सरकारी नियमों की अवहेलना हुई है। पता नहीं अब जिनकी शादी के बीस वर्ष से उपर हो गये हैं तथा वे दोनों कब के बालिग उम्र पार कर चुके हैं उनकी शादी का प्रमाण पत्र भी क्यों नहीं बन पा रहा है। सुझाव देने वाले कानूनी जानकर लोग भी दुल्हा दुलहन को बालिग होने तक की उम्र तक आगे बढ़ाकर शादी पंजीकरण का गलत सलाह देते हैं। यानि शादी यदि 16 वर्ष में हो गई थी दो-ढाई साल बाद की तिथि बताकर पंजीकरण करवा लो। एक तो यह अवैध एवं जानबूझकर सरकार को गलत जानकारी देने की सलाह है। दुसरे यदि किसी को बालिग उम्र से पहले बच्चे हो गये हों तो बच्चे के जन्म के बाद वह शादी पंजीकरण कैसे करवाए? इस तरह विवाह प्रमाण पत्र की समस्या से लाखों लोग जूझ रहे हैं। यदि संभव हो तो कृपया इस विषय पर भी एक सुझाव पूर्ण संपादकीय आलेख दिजिए।
    सादर धन्यवाद

    • भाई राजनन्दन सिंह जी, प्रयास करता हूं कि जिस विषय पर भी लिखूं, पहले पूरी जानकारी हासिल कर लूं ताकि तथ्यात्मक ग़लतियां ना हों। आपकी सार्थक टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

  18. आदरणीय अग्रज तेजेन्द्र शर्मा जी ने पुरवाई का इस सप्ताह का संपादकीय एक नए विषय पर लिखा है जो समाज की वास्तविकता को दिखाने में सफल है क्योंकि बीस पच्चीस साल तक विवाह नाम की संस्था में शामिल रहने के बाद पचास साल की उम्र में एक बार यह अहसास होता ही है कि जीवन साथी से क्या अपेक्षित था और क्या मिला। पश्चिम इसे भले ही ग्रे डाइवोर्स का नाम दे, भारत में तो बिना नाम के यह समाज में अक्सर देखने को मिल जाता है क्योंकि लाख तथाकथित मॉडर्न हो जाने के बावजूद हमारी जड़ें हमें परिवार से बांधकर रखती हैं और बच्चों के साथ मिलकर बने परिवार को तोड़ने की बात भारतीय महिला पुरुष स्वप्न में भी नहीं सोचते तो ऐसा ही चलता रहता है। विदेश में जो ग्रे डाइवोर्स है, वह एक प्रकार से भारतीय समाज की ही अनुकृति है, जिसमें येन केन प्रकारेण परिवार से जुड़े रहने की भावना है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि तलाक इसका विकल्प इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि इससे अनेक आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विद्रूपताएं पैदा हो जाती हैं, जिनका विस्तृत उल्लेख संपादक महोदय ने किया है। एक विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी बधाई के पात्र हैं।

    • पुनीत भाई जब आप जैसा गंभीर चिंतक किसी रचना की तारीफ़ करता है तो अतिरिक्त प्रसन्नता तो होती ही है। आपने सार्थक कोण प्रस्तुत किये हैं। हार्दिक आभार।

  19. इस विषय पर कहानी या उपन्यास लिखा जा सकता है. अब तलाक भी एक फैशन हो गया है. अरे 15 साल बाद पड़ोसी ने तलाक ले लिया मुझे भी तलाक ले लेना चाहिए. वरना मेरी समाज में क्या इज्जत रह जाएगी. मेरे कई सारे मित्र तलाक ले लिए हैं. तुम्हारी सहेलियों ने भी ले लिया है. वह भी तो अब अच्छी जिंदगी जी रही है. ऐसा करते हम दोनों भी तलाक ले लेते हैं. एक नई जिंदगी शुरू करते हैं. बाद में मन किया तो फिर शादी कर लेंगे.

  20. आदरणीय यह बहुत संवेदनशील और विचारणीय विषय है। आपने सच कहां आज दुनिया के हर हिस्से में,गांव में शहर में, भारत हो या लंदन अमीर हो या गरीब ग्रे तलाक़ के उदाहरण मिल जाएंगे। आज वेचारीक विस्तारवाद की हाय हाय हो रही है।स्त्री हो या पुरुष स्वतंत्र नहीं स्वछंदता चाहने लगे हैं। यही एक बड़ा कारण है। जो हमारे सामाजिक जीवन के साथ साथ मानव के स्वास्थ विकास के लिए भी खतरा है।
    आपका नये नये विषय पर संपादकीय बहुत ही लाभदायक रूचिकर एवं जानकारी का भंडार है।
    आदरणीय को बहुत बहुत बधाई।इसी तरह अच्छे और नये विषय लाते रहे इन्हीं शुभकामनाएं के साथ प्रणाम

    • मंजू जी आपने स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच का अंतर ख़ूबसूरत ढंग से समझाया है। हार्दिक धन्यवाद।

  21. जहाँ आपस में न बन रही हो, वहाँ किसी भी उम्र में डिवोर्स लेना गलत नहीं हैं । डिवोर्स के प्रति सामाजिक स्वीकार्यता भी बढ़ी है l हालाँकि साथ जितना लंबा हो जाता है, रिश्ता तोड़ना उतना ही कष्टप्रद और मुश्किल । सामाजिक और आर्थिक ही नहीं भावनात्मक अलगाव भी बहुत मुश्किल होता है । साथी एक आदत बन चुका होता है ।
    एक ही घर में अजनबियों की तरह रहने का विकल्प नया इस संदर्भ में है कि पहले इसे बहुत कम उदाहरण मिलते थे । अब ऐसे मामले बढ़ रहे हैं । पर लंबे समय तक ऐसा चलने के कुछ ही कारण हो सकते हैं – सामाजिक भय, एक के आर्थिक रूप से बहुत कमजोर होना या सबसे अहम भावनात्मक डोर तोड़े से भी ना टूटना । तीसरे मामले में वे अक्सर फिर से साथ हो जाते हैं । बाकी दो मामलों में या तो निराशा और उम्मीद की जुगलबंदी के साथ एक-दूसरे के साथ बने रहते हैं । जो भी हो ये बड़ा कष्टप्रद होता है । हाई प्रोफ़ाइल वालों के लिए मुक्त होना या नया साथी ढूँढना भले ही आसान हो पर आम भारतीय के लिए अभी भी सहज नहीं है l

    जैसा की आपने संपादकीय में स्पष्ट किया है कि अब उम्र बड़ी होने लगी है तो नए विकल्पों को आजमाया जाना स्वाभाविक है । आने वाले समय में रिश्तों में बहुत बदलाव देखने को मिलेगा । आपने लगातार दो संपादकीय लिखकर इस विषय के प्रति जागरूकता बधाई है l आभार

    • प्रिय वंदना, आपने संपादकीय के साथ कई नये आयाम जोड़ दिये हैं। इससे संपादकीय को समझने में सहायता मिलेगी। हार्दिक धन्यवाद।

  22. स्लीप डिवोर्स और ग्रे डिवोर्स- आपके दोनों संपादकीय पढ़े। बहुत सूक्ष्मता से आपने इनके बारे में विस्तार से बता कर इनके प्लस माइनस पहलुओं पर दृष्टि डाली है और दृश्य भी दिखाया है। ऐसे कारण व ऐसी परिस्थितियां हमारे भारतीय समाज में हमेशा से विद्यमान रही हैं लेकिन डिवोर्स शब्द कभी किसी के जेहन में नहीं आया। पहले कभी एक से अधिक शादियों में पहली पत्नी के लिए, घर में रहते हुए भी हर तरह का डिवोर्स जैसा ही हो जाता था। ऐसी बहुत सी बातें, ढेर सारे बच्चे व बड़े परिवारों में, अभी पिछली पीढ़ी तक भी छुप जातीं थी। विदेश व फिल्मी जीवन की परिपाटी दूर के ढोल लगते थे। यह सब उनके जीवन में होता है, आम जीवन में नहीं, ऐसी सोच के साथ, विशेष कर स्त्री पूरा जीवन, वैवाहिक रिश्तों को भी खून के रिश्तों की तरह आवश्यक समझ जस का तस बिना सोचे समझे निभा ले जाती थी। फिर चाहे वह नौकरी ही क्यों न कर रही हो।
    लेकिन पिछले 15-20 सालों में शनै शनै स्त्री की सोच के साथ सामाजिक सोच में बदलाव आया और स्त्री का अपने लिए सोचने ने कई नये भावों, सोचों व नये शब्दों को जन्म दिया या कहना चाहिए उनके प्रति सोच में सामाजिक अनुकूलता बढ़ाई।
    दोनों ही संपादकीय मंथन करने के लिए बहुत कुछ दे जाते हैं।
    स्लीप डिवोर्स के बहुत से उदाहरण मेरे जानने में भी हैं और ग्रे डिवोर्स- जिसमें रह तो एक ही घर में रहे हैं पर आपस में सरोकार न जैसा ही है, यह भी देखने को मिल जाता है।

    • प्रिय सुधा, आपने अपने अनुभवों को जोड़ कर संपादकीय को परखा है – महत्वपूर्ण है। आपने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं। हार्दिक धन्यवाद।

  23. सादर नमस्कार सर …. रिश्तों में अनबन होना स्वभाविक है। और जब तिक्तता बढ़ जाए और रिश्ते सुलझे नहीं तो अलग हो जाना भी तय है। वैसे संसार में आते अकेले हैं… संसार से जाते भी अकेले। जो रिश्ते बनते हैं धरा पृष्ठ पर ही बनते हैं। आपसी समझदारी की बात करें तो..अगर कोई एक पक्ष समझदारी दिखा रहा और दूसरा नहीं… तो…यही एक समाधान रह जाता है। हम अपने सामाजिक मूल्य को तो धीरे धीरे खो रहे हैं… इसलिए आगे कोई आशा भी नहीं कि यह विवाह जैसे अनुष्ठान का क्या मूल्य रह जाएगा।
    बहुत सुलझे हुए विचार दिया है आपने सर …. साधुवाद

    • अनिमा जी, आप एक संवेदनशील कवयित्री हैं। आपकी टिप्पणी हमारे लिए विशेष महत्व रखती है। हार्दिक धन्यवाद।

  24. नमस्कार सर आज बहुत समय बाद आपका आर्टिकल पढ़ा और मैं मजबूर हो गई कि मैं अपनी थीसिस का एक अंश फिर से लिखूं पहले भी आपको एक आर्टिकल था ‘पति-पत्नी और वो’ने बहुत सहयोग किया मेरी थीसिस का एक टॉपिक ‘समकालीन समय में स्त्री पुरुष के संबंधों में आए बदलाव का आंकलन’ आज मैं अपने थीसिस को फाइनल टच देने जा रही थी किंतु आपका आर्टिकल पढ़ कर स्वयं को रोक नहीं पाई
    साधुवाद सर

  25. Emotional strain बहुत बड़ा कारण बनता है अलगाव का।‌जीवन का लंबा समय साथ गुज़ारने के बाद घुटन कुछ ज़्यादा ही होती होगी तभी रास्ते अलग होने लगते हैं। आपका संपादकीय पढ़ते हुए उस स्थिति को visualise करने की कोशिश कर रहे थे …सच में ,बोलना जितना सरल है, execution कहीं अधिक कष्टदाई होता है। छोटी छोटी चीज़ें जो साथ रहते दिखाई भी नहीं देती होंगी, बॅंटवारे के लिए सामने आ जाती हैं।
    लेकिन , दुश्मन की तरह रहने से अच्छा है कि अजनबियों की तरह रहें_ शांति से ।
    सामयिक संपादकीय!

    • प्रिय रचना, जब युवा पीढ़ी को पुरवाई संपादकीय अपने साथ जोड़ पाता है तो अतिरिक्त प्रसन्नता होती है। इस सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार।

  26. Same sex marriages also end up in divorce.(11% male/17%females) If you can afford a two bedroom house, then have a room each-and do not enter the other partner room. Meet only as you meet for business or social purpose-treating sex as business too! Avoid fore/after play!

  27. स्लीप डाइवोर्स, ग्रे डाइवोर्स और अभी और भी डाइवोर्स सामने आएंगे। ये वह है, जो हमारी प्रगतिशीलता को दर्शाने के लिए पर्याप्त नहीं है। हम प्रगति कर रहे हैं, जिसमें संस्कार, संस्थाओं के लिए अब धीरे-धीरे कोई भी जगह नहीं रह गयी है। ऐसा नहीं है, पहले भी ऐसे रिश्ते होते थे, जिनमें दंपत्ति सम्बन्धों के बिना भी एक छत के नीचे रहते थे। एक दो नहीं बल्कि दो दंपत्ति मैंने अपने जीवन में देखे थे।

    मि.गुप्ता की शादी उनके पिता ने अपने मित्र की बेटी से की थी और शायद आज से 75 वर्ष पहले इस विषय में कोई आपत्तिजनक बात नहीं थी। उनकी जोड़ी भी किसी हद तक विपरीत ही थी। फिर भी तीन बेटे होने तक, जो कि शायद विवाह के १२ वर्ष के बाद हुए थे, साथ थे और सामान्य जीवन था. फिर अचानक क्या हुआ? उनका एक दूसरे के सामने आना बंद हो गया, बात करना भी। जरूरत के लिए पैसे वह अलमारी से निकाल कर ले लेती और घर चलाती रहीं। जीवन ऐसे ही चला। एक चला गया लेकिन वह उनके पास नहीं आयीं। एक घर में रहीं, बहू और बेटे सब साथ ही रहे शायद इस लिए चलता रहा होगा।

    मि. शर्मा के जीवन में सिर्फ बेटियाँ थी और एक दिन कसम दी कि आज के बाद मुझसे बात नहीं करना। पति का आदेश सिर माथे रखा। वे खुद परास्नातक थी, जब तक बेटियाँ रहीं एक पुल था, लेकिन बेटियों की शादी के बाद सिर्फ दो लोग घर में रहे, लेकिन संवाद कभी नहीं हुआ। गृहस्थी के लिए सामान की लिस्ट टेबल पर रख देतीं और खाना बना कर डाइनिंग टेबल पर लगा देती। बाकी बेटियाँ आकर माँ की जरूरतों के लिए सब कुछ कर जातीं। इसे कौन सा डाइवोर्स कहेंगे? लेकिन ये भी एक अलगाव था, जो एक छत के नीचे रहते हुए कभी एक न थे।

    आपसी सहमति से लेकर या फिर ग्रे डाइवोर्स उसका मुखरित रूप है क्योंकि अब डाइवोर्सी होना कोई अपवाद नहीं रह गया है और न ही समाज में इसको हेय दृष्टि से देखा जाता है। फिर भी एक बात सोचने के काबिल है कि क्या इतने दिन के साथ जीवन बिताने के बाद भी उनके बीच कोई भी सम्वेदनात्मक रिश्ता कायम नहीं हुआ और जब तक चाहा वहीं आदतें और व्यवहार अच्छी लगती रहीं, एकदम से असहनीय क्यों होने लगी हैं? अगर कहें कि आजकल बच्चे भी इसको सहज ले रहे हैं। ये हो सकता है, लेकिन इसको सिर्फ स्वार्थ ही कहेंगे कि अपने लिए अलग सुख की खोज में वर्षों के सम्बन्ध को ख़त्म कर दिया जाय।

    • रेखा जी आपने गुप्ता और शर्मा परिवार के उदाहरण से संपादकीय को समझने में उल्लेखनीय योगदान दिया है। हार्दिक धन्यवाद।

  28. तेजेन्द्र जी! आपके संपादकीय में विषय की नवीनता, विषय को देखने ,विश्लेषित करने और बँधे-बँधाए फ्रेम को तोड़कर अभिव्यक्त करने की शैली आपको भीड़ से अलग प्रतिष्ठित करती है। ‘ग्रे तलाक’ के संपादकीय हेतु हार्दिक बधाई!

    • आरती, तुम्हारी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। प्रयास रहेगा कि भविष्य में भी तुम सबकी अपेक्षाओं पर खरा उतर सकूं।

  29. आदरणीय तेजेन्द्र जी!
    इस बार भी डिवोर्स निरंतर रहा। तुलनात्मकता में पहले वाला इससे बेहतर लगा। वैसे तो अगर कोई ठोस कारण है,पति-पत्नी में बन नहीं रही, या पति,-पत्नी को सता रहा है ,तो फिर तलाक लेना ही बेहतर है। यहाँ हम पूरी तरह सहमत हैं।
    एक लंबी अवधि तक साथ रहने के बाद अलग होने के पीछे कोई गंभीर ठोस कारण ही होता होगा। अभिषेक ऐश्वर्या को लेकर हमें उन दोनों से अधिक अमिताभ बच्चन के लिए दुख हुआ। हम तो शादी के वक्त ही संदिग्ध थे कि यह शादी कितने समय टिकेगी। 17 साल बड़ी बात हो गई। फिर मध्यम वर्गीय लोगों में एक बात चलती है -बड़े लोगों की बड़ी बातें। इसमें भी कोई दो मत नहीं की जया भादुड़ी का स्वभाव भी थोड़ा तेज है। उनकी बातें वो जानें! और फिल्मी दुनिया के हाल सामान्य दुनिया से अलग है, पर समस्या यह है कि उनके ही क्रियाकलाप सामान्य जनता को प्रभावित करते हैं।
    आजकल के बच्चे समय से भी आगे चल रहे हैं। इसलिए उन पर इन सब चीजों का प्रभाव भी बहुत पड़ता है।
    ग्रे डीवोर्स के आपके हैरान करने वाले कारण ने हमें भी हैरान किया। पति-पत्नी के रिश्ते में और किस नयेपन की और अपेक्षाएँ हैं यह हम नहीं समझ पाए। रिश्तों को कपड़ों की तरह तो बार-बार नहीं बदला जा सकता और न ही बार- बार नया लाया जा सकता। बाकी जो कारण आपने बताए हैं वह भी काबिले गौर हैं, उनसे इनकार नहीं किया जा सकता। डीवोर्स कोई सा भी हो साथ रहने के बाद अलग होने के मध्य जटिलताएँ तो होना ही हैं।आज के नैटवर्किंग दौर में और ज्यादा उलझने हैं।सारे साझा सुख, साझा दुख बनकर छिटकते हैं।
    पर फिर भी हमें ग्रे डीवोर्स की तलाक न लेकर साथ रहने वाली बात पसंद आई। इसमें दोबारा साथ रहने की संभावनाएँ बनी रहती हैं। सुख में भले ही ना हो लेकिन दुख में साथ खड़े रहने का आश्वासन उम्मीद में तो रहता है। आपने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए जितने भी कारण बताये वे भी सही हैं। फिर भी सबकी अपनी-अपनी सोच,जरूरतें और स्थितियाँ होती हैं, जिसका दर्द होता है वही उसको महसूस कर पाता है।
    आपके माध्यम से दुनिया को नए सिरे से जान रहे हैं। और वर्तमान के परिवर्तनों से भी रूबरू हो रहे हैं। फिर भी हमें संवेदनाओं के पतन और रिश्तों की टूटती डोरों से तकलीफ होती है। फिर वह चाहे किसी का भी क्यों न हो। ऐसा लग रहा है जैसे प्रेम की अहमियत घटती जा रही है। प्रेम बाजारू वस्तु बनता जा रहा है।आगे-आगे देखिये होता है क्या!
    एक बार फिर आपको संपादकीय के लिए बहुत-बहुत बधाइयाँ। पुरवाई का तहेदिल से आभार!

    • आदरणीय नीलिमा जी, क्षमा चाहता हूं कि इस बार संपादकीय आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया। भविष्य में और मेहनत की जाएगी।

  30. मेरे विचार से sleep divorce के पश्चात् अब grey divorce रिश्तों में आती संवेदनहीनता, बदलती परिस्थितियों में बदलती मानसिकता के by product हैं। सच तो यह है कि इंसान आज इतना आत्मकेंद्रित होता जा रहा है कि उसमें हम की जगह मैं का तत्व अधिक प्रभावशाली हो गया है। वह शायद यह नहीं जानता कि मनुष्य भले आज अकेला रह ले लेकिन एक समय ऐसा आता है ज़ब सारा रुपया पैसा धरा रह जाता है, व्यक्ति की आँखें अपनों को खोजती हैं। ज़ब कोई रिश्ता ही नहीं रहेगा तो अपना कोई कहाँ रहेगा?
    आज लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि हमें किसी की आवश्यकता नहीं हैं। सीनियर सिटीजन के लिए रिटायरमेंट होम में फ्लैट लेकर रह लेंगे लेकिन मैं कई ऐसे लोगों को जानती हूँ जिन्हें अंतिम समय में बच्चों के पास आना पड़ा, उनकी सहायता लेनी पड़ी।

    भूत और भविष्य के दायरे से मुक्त वर्तमान में जीने वाले यही सोचते हैं कि उन्हें कभी किसी की आवश्यकता नहीं पड़ेगी लेकिन वे भूल जाते हैं कि भले ही इंसान अकेला आता है, अकेला ही जाता है किन्तु परिपूर्ण जीवन का एहसास रिश्तों के बीच रहते हुए ही मिलता है। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की कविता ‘मनुष्यता’ की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रेरक है जितनी कल थी…

    यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे
    वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

    • सुधा जी आपकी साहित्यिक टिप्पणी संपादकीय के साथ पूरा न्याय करती है। हार्दिक धन्यवाद।

  31. हमेशा ही कुछ नया रहता है संपादकीय में। मुझे ऐसा लगता है कि ग्रे डिवोर्स सेलिब्रिटी के तो सामने आ जाते हैं लेकिन अधिकतर घरों में ऐसा ही है।
    एक ही छत के नीचे रहते हुए एक दूसरे से दूर अपनी-अपनी जिंदगी जीते हुए।
    जब पुरुष ही दूर हटेगा तो स्त्री कब तक समर्पित रहेगी।
    या तो विमुख हो जाएगी या फिर अपने सुख कहीं और ढूंढ लेगी।

    • प्रमिला आपको संपादकीयों में नवीनता मिलती है, जानकर अच्छा लगा। आप सही निष्कर्ष पर पहुंची हैं।

  32. आपने फिर एक बार संवेदनशील सामाजिक मुद्दे को उठाया है| यह सच है कि भारतीय समाज बदलाव के उस दौर से गुजर रहा है, जहाँ पुराने मूल्य, धारणाएँ तेजी से धवस्त हो रही हैं और नए चलन को जल्दी और व्यापक स्वीकार्यता मिल रही है| आज से शायद एक दशक पहले तक कम से कम भारत में ‘ग्रे डिवोर्स’ की जगह लोग उस व्यवस्था में विश्वास करते थे, जहाँ ‘निभा लिया जाना’ सही माना जाता था| आज सिर्फ सेलेब्रेटी ही नहीं आमजन, खासकर महिलाएँ अपनी भावनाओं को लेकर मुखर हो रहीं हैं| हालांकि कुछ मामलों में मामूली या गैर वाजिब कारणों से विवाह-विच्छेद भी देखे जा रहे हैं| आपने क़ानूनी और सामाजिक प्रभावों पर भी बात की| फिर एक बार समाज की नब्ज टटोलने के लिए आपको साधुवाद|

    • शैली जी, आपने बहुत सरल शब्दों में बहुत सार्थक बात कही है। आपको संपादकीय पसंद आया इसके लिये आपको हार्दिक धन्यवाद।

  33. सादर अभिवादन सर
    समसामयिक विषय पर विश्लेषणात्मक संपादकीय है सर। मुझे लगता है संभवतः मध्यम वर्ग के लोग अभी इस तरह की सोच से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए हैं । उनमें अभी तक रिश्ता निबाहने वाली मानसिकता रहती है। रिश्ता तोडना बहुत आसान है मगर यदि फिर ऐसा लगे कि नहीं ये सोच ठीक नहीं थी तो फिर साथ आने की गुंजाइश कुछ कम ही रहती है या फिर धागे में लगी गांठ जैसी होती है जिसे पहले की तरह मजबूत जोङा नहीं जा सकता । इससे तो यह बेहतर उपाय है कि किसी से कोई अपेक्षा रखे बिना एक छत के नीचे रह लेना चाहिए

    • वही हो रहा है रेणुका – एक छत के नीचे अजनबी! यह भी ग्रे डिवोर्स की ही एक स्थिति है।

  34. आदरणीय संपादक जी
    नमस्कार
    मानव मन निरंतर परिवर्तनशील है उसकी इच्छाएं ,अनिच्छाएं ,चुनाव , अपेक्षाएं दिन प्रतिदिन बदलती रहती हैं ।कुछ लोगों के मकान बनते हैं और टूटते रहते हैं, डिजाइन पसंद नहीं आया!!
    वस्तुएं खरीदी जाती हैं और सालों अलमारी में बंद पड़े रहती हैं, क्योंकि पसंद नहीं आई।ठीक ऐसी ही स्थिति
    विवाह के साथ है ।जो लोग सहज भाव
    से इसे एक सामाजिक समझौता और उत्तरदायित्व समझ कर आजीवन उसका
    पालन करते हैं वह सुखी और संतुष्ट
    रहते हैं ।जो एक छत के नीचे रहकर
    अलग होने की घोषणा करते फिरते हैं
    वह संभवत अपनी पहचान बनाने के
    लिए ऐसा करते हैं। जीवन क्या मात्र अपने सुख और अपनी इच्छाओं के लिए जीने का नाम है ?क्या हमारे उत्तरदायित्वों का महत्व जीवन में नहीं है?

    मनुष्य की भावनाओं की तरह ही समाज भी सतत परिवर्तनशील है जैसे एक काल में विवाह जैसी सामाजिक प्रथा विकसित हुई वैसे ही अब इस समाज में तलाक, लाइव इन ए रिलेशनशिप,अकेले रहना या कम्युनिटी में बच्चे पाले जाने का रिवाज आएगा ।उसके लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। समाज की परिवर्तनशीलता को रेखांकित करता एक रोचक संपादकीय!! बधाइयां

    • सरोजिनी जी, आपने पूरे मनोयोग से ना केवल संपादकीय पढ़ा है बल्कि उस पर सार्थक एवं गंभीर टिप्पणी भी लिखी है। हार्दिक आभार।

  35. Please accept my congratulations, Tejendra ji,for getting this large number of and the variegated responses on these two Editorials of yours( on Sleep Divorce and Grey Divorce ).
    Each response has rightly appreciated your research and discourses on these topical subjects of our times.
    Warm regards
    Deepak Sharma

    • Deepak ji, my earnest endeavor is to do full justice to every subject I pick up for the editorial. Such lovely responses from my readers do encourage me to do better each time. Your support is special for us!

  36. हालांकि भारत में इसका प्रवेश हो चुका है, ‘ग्रे डिवोर्स’ शब्द मेरे लिए तो बुल्कुल नया है। आपने सही कहा है कि ग्रे तलाक का बढ़ना भारत में बदलते सामाजिक परिदृश्य को दर्शाता है। न्यायिक प्रणाली को भी इसके लिए अनुकूल रहना चाहिए क्योंकि बुल्कुल तलाक होने से इस तरह का विचार काफी बेहतर लगता है। आपसी झगड़े और सामजिक तनाव से तो बचे रहेंगे। पति-पत्नी में समायोजन और सामंजस्य को बनाए रखना जरूरी है। इस प्रकार की तलाक में एक दूसरे से कोई उम्मीद नहीं रखते इस लिये कोई शिकायत नहीं रहती। एक ही छत के निचे पडोसी की भांति रहने से कई समस्याओं जैसे आर्थिक, स्वास्थ्य, सामाजिक समयाओं से भी एक दूसरे की सहायता कर सकते हैं एक दूसरे से कोई उम्मीद नहीं रखते इस लिये किसी प्रकार की शिकायत नहीं। इससे दोनों के बीच सुलह की भी संभावना रहती है। ‘ग्रे डिवोर्स’ ‘स्लीप डिवोर्स’ की अंतिम कड़ी लगाती है। सामाजिक मुद्दे पर एक और नए संपादकीय के लिए हार्दिक बधाई।

  37. नमस्कार तेजेन्द्र जी
    संवेदनशील शाश्वत मुद्दों पर विचारणीय संपादकीय के लिए आपको बहुत साधुवाद
    हमारे चारों ओर कितनी घटनाएं होती रहती हैं। हम उनको नाम नहीं दे पाते।
    तलाक से संबंधित दोनों संपादकीय पढ़ने के बाद मन शब्दों में उलझ गया। अचानक दिल्ली से किसी मित्र का फ़ोन आया और बात ताज़ा तरीन होने के कारण मैंने उनसे ज़िक्र किया। उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने उन्हें दोनों संपादकीय भेज दिए क्योंकि मेरे समझाने से बेहतर था कि वे स्वयं इन विषयों को समझें।
    नवीन शब्दों से अवगत कराने के लिए आपका आभार। घटनाएं होती हैं किंतु इनको मुखरित करने की खूबसूरत विधा का प्रयोग आपके श्रेष्ठ लेकिन का प्रतीक है।

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