Wednesday, October 7, 2026
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बिन जाति कैसा सरनेम…

भारत एक मामले में विशिष्ट देश है कि यहाँ सरनेम (यानी कि कुलनाम) सुनते ही हमें व्यक्ति की जाति मालूम हो जाती है। मिश्रा, शुक्ला, दुबे, पांडेय जैसे बहुत से नाम हैं, जिनके सुनते ही पता चल जाता है कि हम किसी ब्राह्मण जाति के व्यक्ति की बात कर रहे हैं। खन्ना, कपूर, सोढ़ी, बेदी, चोपड़ा सुनते ही अहसास हो जाता है कि बंदा खत्री (क्षत्रिय) है। माथुर, भटनागर झट से बता जाते हैं कि हम कायस्थ हैं। ठीक वैसे ही राजपूत, ठाकुर, जाट, वैश्य और दलित सरनेम अपनी-अपनी पहचान हमें साफ़ बता जाते हैं।

सोचने की बात यह है कि अंग्रेज़ों में तो भारत की तरह जाति-प्रथा है नहीं। तो यहाँ फिर सरनेम कैसे बनाए गए और प्रश्न तो यह भी उठता है कि सरनेम बनाने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी। “नाम में क्या रखा है?… बहुत कुछ, अगर इंसान की समझ उसे खोज सके।” जिस किसी ने भी यह मशहूर बात कही है, वह निस्संदेह सही था, क्योंकि अकेले इंग्लैंड में ही लगभग 45,000 अलग-अलग सरनेम हैं और हर एक के पीछे अपना एक इतिहास है।

ब्रिटेन पर नॉर्मन कब्ज़े (Norman Conquest) से पहले लोगों के पास ख़ानदानी उपनाम नहीं होते थे। उन्हें सिर्फ़ उनके निजी नाम से जाना जाता था।

जब समुदाय छोटे थे, तो हर व्यक्ति को एक ही नाम से पहचाना जा सकता था… लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, लोगों को और बेहतर पहचान करने की ज़रूरत महसूस होने लगी, जिससे ‘जॉन द बुचर’ (कसाई जॉन), ‘विलियम द शॉर्ट’ (नाटे विलियम), ‘हेनरी फ़्रॉम सटन’ (सटन के हेनरी), ‘मैरी ऑफ़ द वुड’ (जंगल की मैरी) और ‘रॉजर सन ऑफ़ रिचर्ड’ (रिचर्ड के बेटे रॉजर) जैसे नाम सामने आए। समय के साथ कई नाम बदल गए और आज यदि उनका असली मतलब समझने का प्रयास किया जाए तो आसानी से समझ नहीं आता।

1066 के बाद नॉर्मन बैरनों (Barons) ने इंग्लैंड में सरनेम (उपनाम) का चलन शुरू किया और धीरे-धीरे यह प्रथा फैल गई। शुरू में पहचान बताने वाले नामों को लोग अपनी मर्ज़ी से बदल या छोड़ देते थे… लेकिन समय के साथ ये नाम पक्के हो गए और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने लगे। इस तरह पेशे, उपनाम (निकनेम), मूल स्थान और पिता के नाम पक्के सरनेम बन गए, जैसे- फ़्लेचर और स्मिथ, रेडहेड और स्विफ़्ट, ग्रीन और पिकरिंग, विल्किंस और जॉनसन। 1400 तक ज़्यादातर अंग्रेज़ परिवारों और ‘लो-लैंड स्कॉटलैंड’ के परिवारों ने ख़ानदानी सरनेम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था।

शुरू-शुरू में उपनाम लोगों की पहचान बताने के लिए बनाए गए थे। ये उपनाम व्यक्ति का पेशा या उसका दर्जा दर्शा सकते थे, उसके रहने की जानकारी दे सकते थे या फिर व्यक्ति की विशेषताओं को रेखांकित करने का कोई तरीका हो सकते थे।

1381 तक इंग्लैंड में ज़्यादातर परिवारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले उपनाम अपना लिए थे। यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि मूल रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी न चलने वाले कई एंग्लो-सैक्सन उपनाम भी इस नए सिस्टम के तहत आगे की पीढ़ियों तक पहुँच गए। इसका एक प्रचलित उदाहरण है उपनाम ‘स्मिथ’।

1483 में राजा एडवर्ड पंचम ने इंग्लैंड के सभी नागरिकों के लिए उपनाम रखने पर दबाव बनाया, ताकि वे अपनी पहचान बेहतर ढंग से लोगों तक पहुँचा सकें। वैसे इंग्लैंड में साधारणतः सात तरह के उपनाम या सरनेम देखे जा सकते हैं।

पैट्रोनॉमिक सरनेम वे पारिवारिक नाम होते हैं, जो किसी पुरुष के पहले नाम से बने होते हैं। अक्सर (मगर हमेशा नहीं) इनके नाम के आख़िर में ‘सन’ लगा होता है, जिससे इन्हें पहचानना आसान हो जाता है। इस तरह के नाम के उदाहरण के लिए आप देख सकते हैं- ‘रिचर्डसन’, यानी रिचर्ड का बेटा, या फिर ‘डेविडसन’- डेविड का बेटा।

1550 के दशक के वेल्स में पुराने तरह के नाम का इस्तेमाल देखा जा सकता है, जैसे कि ‘ग्रिफ़िथ्स’। इसका इस्तेमाल ग्रिफ़िथ या ग्रुफ़िड के बेटे या वंशज के लिए किया जाता था।

दूसरी ओर आते हैं मैट्रोनॉमिक नाम, यानी माँ की ओर से वंशज नाम। क्योंकि इंग्लैंड में पिता के वंश के आधार पर नाम रखने की परंपरा है, इसलिए माँ के वंशज वाले नाम कम ही देखने को मिलते हैं। मैरियट (मैरी से) या मैडिसन (मॉड से) जैसे नाम मातृ-नाम कहलाते हैं।

इसके बाद आते हैं पेशे से जुड़े सरनेम। ये उपनाम लोगों की पहचान उनके काम के आधार पर करते थे। ये पारिवारिक इतिहास पर शोध करने वालों के लिए ख़ास तौर पर दिलचस्प होते हैं, क्योंकि इनसे यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि हमारे पूर्वज अपनी आजीविका कैसे चलाते थे।

पेशे से जुड़े आम उपनामों में कार्पेंटर, नाइट, टेलर, मिलर और फ़िशर जैसे सरनेम शामिल हैं। इन नामों से यह पहचान करने में आसानी होती है कि आपके पुरखे क्या काम करते थे। ऐतिहासिक संदर्भ को याद रखना आवश्यक है। दो-तीन सदियाँ पहले के लोग आज जैसी नौकरियाँ नहीं किया करते थे। उनके बहुत से काम अलग तरह के होते थे। यदि हम उदाहरण देना चाहें तो एक नाम याद आता है- ‘कार्टराइट’… आजकल इस तरह के पेशे में लोग नहीं दिखाई देंगे, मगर मध्यकाल में गाड़ी या ठेला बनाने वाले को इसी नाम से जाना जाता था।

एक दिलचस्प बात यह है कि कुछ सरनेम अंग्रेज़ों के पूर्वजों के बारे में बताई गई बातों से बने हैं। ये एक तरह से निकनेम या उपनाम की तरह काम करते हैं। ‘व्हाइट’, ‘ब्लैक’, ‘ग्रे’ और ‘स्विफ़्ट’ जैसे विशेषण वाले सरनेम शायद उनके पूर्वजों के रंग-रूप या व्यक्तित्व की व्याख्या करते हैं।

अंग्रेज़ों के शुरुआती पूर्वज भी अपनी और दूसरों की पहचान के लिए जगहों के नामों का इस्तेमाल करते थे। यही वजह है कि आज भी बहुत से लोगों के सरनेम ब्रिटेन के कस्बों, काउंटियों या दूसरे इलाकों के नामों से मिलते-जुलते हैं। जगहों के नाम पर आधारित उपनामों के कुछ उदाहरण हो सकते हैं, जैसे-‘हैम्पशायर’, ‘बर्टन’ या फिर ‘सटन’।

स्थान विशेष के नाम की तरह प्राकृतिक जगहों की विशेषताओं का इस्तेमाल भी सरनेम के तौर पर किया जाता रहा है। इस तरह के सरनेम काफ़ी प्रचलित हैं। इनमें ऐसे नाम भी शामिल हैं, जिनके बारे में शायद किसी को मालूम ही न हो कि इनका संबंध भूगोल से हो सकता है।

जिन परिवारों के इतिहास में मूर, हिल, स्टोन या वुड जैसे शब्द आते हैं, तो हो सकता है कि उनके पूर्वज प्राकृतिक परिवेश से आए हों। ऐसे लोगों के शुरुआती रिश्तेदार शायद जंगलों के पास या किसी ख़ास पहाड़ी के नज़दीक रहते रहे हों।

यदि किसी के पूर्वज ज़मीनों के मालिक थे, तो यह भी उनके सरनेम से जाना जा सकता है। ज़मीन के मालिकों का अपनी प्रॉपर्टी या जागीर के नाम पर अपना नाम रखना आम बात थी। इंग्लैंड का शाही परिवार ‘एस्टेट सरनेम’ (जागीर या संपत्ति के नाम पर आधारित उपनाम) का एक बढ़िया उदाहरण है।

1917 में किंग जॉर्ज पंचम ने शाही घराने का नाम ‘सैक्स-कोबर्ग-गोथा’ से बदलकर ‘विंडसर’ कर दिया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अपने परिवार का नाम मशहूर ‘विंडसर कैसल’ के नाम पर रखा।

अंग्रेज़ों में एक रिवाज़ यह भी रहा है कि यदि आपके पूर्वजों ने किसी और की ज़मीन पर काम किया था, तो उनके सरनेम में यह बात भी झलक सकती है। उदाहरण के लिए, आयरिश सरनेम ‘किलपैट्रिक’ का अर्थ होगा कि ‘पैट्रिक का अनुयायी’।

‘पुरवाई’ के पाठक समझ रहे होंगे कि हमने अंग्रेज़ों के सरनेम रखने के इतिहास को खंगालने का पूरा प्रयास किया है। हम उपनामों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँट सकते हैं। फिर भी वे एक तरह से रहस्य ही बने हुए हैं। क्योंकि ये एक लंबे काल में विकसित हुए हैं, इसलिए यह पता लगा पाना आसान नहीं होता कि आख़िर इनकी शुरुआत कहाँ से हुई। कई आम उपनामों के कई संभावित मूल-स्रोत हो सकते हैं। मगर एक बात तय है कि आप इस संपादकीय को पढ़ने के बाद किसी भी अंग्रेज़ का सरनेम सुनेंगे, तो कुछ अंदाज़ा तो लगा पाएँगे कि बंदे का इतिहास क्या है!

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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36 टिप्पणी

  1. कुल का नाम, व्यक्ति का जाति परिचय और देश दुनिया की बातें रोचक और नई है। लेखक महोदय आपको सलाम है।

  2. आपकी संपादकीय हमेशा विशेष रूप से चर्चा का विषय बनी रहती है ।
    इस अंक में आपने अंग्रेजों के सरनेम की बात कही है। जिसे हमने कभी सोचा भी नहीं था कि इस सोचना चाहिए।
    हमारे लिए यह बिल्कुल नई बात है और हमें जो जानकारी आपने दी है । सच में उसमें से कोई जानकारी हम लोगों को नहीं थी । इसलिए हम हार्दिक रूप से आपके आभारी हैं।

    • प्रिय भाई दयानंद तिवारी जी, आपने लिखा है कि – इस अंक में आपने अंग्रेजों के सरनेम की बात कही है। जिसे हमने कभी सोचा भी नहीं था कि इस सोचना चाहिए। हमारे लिए यह बिल्कुल नई बात है और हमें जो जानकारी आपने दी है । सच में उसमें से कोई जानकारी हम लोगों को नहीं थी। – हमारे लिये यह बहुत संतोष की बात है कि हम आपका परिचय इस विषय से करवाने में सफल रहे। हार्दिक धन्यवाद।

  3. बिन जाति कैसा सरनेम… यह संपादकीय एक तरह से मानव की पहचान का रास्ता खोज लाती है।
    संसार की हर चीज की पहचान के लिए मनुष्य ने उनका नामकरण कर दिया है। यदि नामकरण न किया गया होता तो हम इस संसार को व्यक्त ही नहीं कर सकते थे।
    भला जब वस्तु, जीव-जंतुओं का नामकरण हो गया है तो मनुष्य अपना नामकरण क्यों नहीं करता? उसने अपना नामकरण किया। क्षेत्र विशेष के लिए शब्दों की भी एक सीमा है। एक नाम के कई कई नाम से लोग हो गए होंगे तो पहचान का संकट सामने आ गया होगा। इसलिए लोगों ने कुल, स्थान, कर्म आदि कार्य व्यापार के आधार पर सरनेम लगा लिए। गोत्र के आधार पर भी सरनेम दिखाई देते हैं। अधिकतर गोत्र- पशु, पक्षी तथा स्थानों के नाम से निसृत हुए हैं।
    चूंकि संपादकीय ब्रिटेन निवासियों के सरनेम पर केंद्रित है। हम जैसे लोगों ने इनके सरनेम इतिहास में पढ़े हैं या फिर क्रिकेट टीमों के खिलाड़ियों के सरनेम से उन्हें जानते हैं। इन सरनेमों को पढ़कर सोचते थे कि ये इस जाति के हैं, वे उस जाति के हैं । लेकिन संपादकीय में पहले ही बता दिया गया है कि अंग्रेजों की जाति नहीं होती है।
    अब तो इस विषय को संपादकीय के चश्मे से ही देखना था, सो उसी चश्मे से देखकर अपनी बात कह रहा हूं। इंग्लैंड देखा नहीं है। इस बारे में पढ़ा भी नहीं है। संपादकीय लेख में इतने सरनेम दिए गए हैं कि बार-बार संपादकीय को पढ़ना पड़ रहा है कि कौन सरनेम कर्म का है, कौन कुल का है, कौन स्थान का और कौन..किसका है!
    प्रत्येक सरनेम की इतनी गहन पड़ताल की गई है कि हर सरनेम माथे की बिंदी की तरह चमक छोड़ता चलता है। और काफी हद तक फलां ..फलां सरनेम वाले व्यक्ति की एक पहचान निश्चित होती जाती है।
    हम भारतीयों को अनजान व्यक्ति की पहचान (जाति) जानने की इतनी तीव्र इच्छा जागती है कि जब तक उसकी जाति न जान लें तब तक आत्मा बेचैनी का अनुभव करती ही रहती है। बस अंतर इतना है कि साधारण लोग सीधे पूछ बैठते हैं कि भाई आप किस बिरादरी के हो? जबकि जीनियस लोग घुमाकर या अंदाज लगाकर उसकी तह तक पहुंच जाते हैं।
    या फिर साहित्यिक रूप में गवेषणा के साथ उसे लेखन में उतार दिया जाता है।

    • भाई लखन लाल पाल जी आपने तो संपादकीय को पूरी तरह खंगाल लिया। इस बेहतरीन टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  4. पोस्ट होने पर मैटर गलत प्रिंट हुआ पुनः सुधार किया

    असाध्य कार्य है इतनी ऐतिहासिक जानकारी एकत्रित करना, साधुवाद आ. संपादक महोदय जी को।

    भारत में भी सरनेम के पीछे कोई न कोई इतिहास दिखाई दिया है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है। शास्त्रों में कहा गया है कि जब काल की शुरुआत हुई तब लोगों को अलग-अलग समूहों में विभाजित किया गया, सभी को अपनी योग्यता के आधार पर कार्यों का विभाजन कर दिया गया तब कोई जाति भेद नहीं किया गया था उस समय। आगे चलकर काम के आधार पर ही लोगों ने अपने-अपने समूह के नाम रखे लिए, जो जातियां कहलाने लगीं ।एक जाति के कई कई सरनेम बन गए जो लोगों ने अपने विचारों की समानता के आधार पर बनाए।, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं,

    अब तो हाल यह है कि कुछ वर्ग के लोग तो अपने मन से नया सरनेम बनाने लगे है जिन्हें पहचाना नहीं जा सकता कि वह किस वर्ग से आ रहे हैं
    इंग्लैंड में भी हर सरनेम के पीछे कोई ना कोई कारण जुडा़ होगा।

    • मीना जी, आपकी टिप्पणी यहां तो बिल्कुल ठीक दिखाई दे रही है। लगता है कि आपके फ़ोन में कुछ गड़बड़ी है। फ़ोन की सेटिंग्स चेक करिये या फिर लैपटॉप पर पढ़िये।

  5. नाम में क्या रखा है?’ यह कथन वैसे तो शेक्सपियर के नाटक ‘रोमियो एंड जूलियट’ से लिया गया है, जिसका अर्थ था कि किसी व्यक्ति या वस्तु का असली गुण उसके नाम से नहीं बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप से होता है। परंतु आपके इस संपादकीय को पढ़कर लगता है कि नाम ही नहीं उपनाम में ही बहुत कुछ रखा है l पश्चिमी समाज और उसकी जड़ों की तलाश करती है यह आलेख l बहुत कुछ नया जानने-समझने का अवसर मिला इस संपादकीय से sir. वास्तव में हम कितना कम जानते हैं l आपको साधुवाद sir

  6. वाह वाह जितेन्द्र भाई: बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी। क्योंकि इन नामों से तो रोज़ का वास्ता पड़ता है, इसलिये इस सम्पादकीय को अब मैं ने अपने रैफ़्रैंस में रख लिया है। वैसे तो आपने यह बात स्पष्ट करदी है कि यह इँगलैण्ड के नाम हैं लेकिन ऐसी ही जानकारी यदि स्कॉटिश, आइरिश या वैल्श नामों के इतिहास पर की जाए तो और भी बहुत सी नई जानकारी मिलेगी। स्मिथों में ब्लैकस्मिथ, गोल्डस्मिथ, वाइटस्मिथ, सिल्वरस्मिथ और गोल्डस्मिथ की भिन्न श्रेणियाँ हैं। इन सब को केवल स्मिथ नाम अपनाना स्मार्ट मूव है। यही अप्रोच और नामों पर भी लागू होती है।
    ऐसी ही प्रथा को मैं ने पंजाब में भी देखा है। चण्डीगढ़ हॉस्टल में हमारे कई मित्र थे जिनका आख़िरी नाम उनके गांव का होता था जैसे ढ़िल्लों, निगाह, बादल, गुआरानी/ग्रेवाल, तलवण्डी इत्यादि। पँजाब के इलावा शी प्रथा महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश में भी है।
    सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद।

    • विजय भाई, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स में भी यही पद्धति अपनाई गई थी। यही लोग अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया गये।

  7. बिन जाति कैसा सरनेम…’ शीर्षक अपने भीतर भारतीय समाज की एक गहरी विडंबना और असहज कर देने वाला प्रश्न समेटे हुए है। जाति की पहचान से मुक्त होने की आकांक्षा और सामाजिक व्यवहार में उसकी निरंतर उपस्थिति के बीच का द्वंद्व इस विषय को प्रासंगिक बनाता है। सरनेम, जो सामान्यतः व्यक्ति की पहचान का हिस्सा माना जाता है, जब जातिगत पहचान का माध्यम बन जाता है, तब समानता और सामाजिक न्याय के दावे सवालों के घेरे में आ जाते हैं।
    यह विषय केवल नाम बदलने या छिपाने का प्रश्न नहीं, बल्कि मानसिकता, सामाजिक संरचना और अवसरों की असमानता से जुड़ा प्रश्न है। लेख की संभावित शक्ति इसी बात में है कि वह पाठक को अपनी सामाजिक धारणाओं पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करता है। जाति-विहीन समाज की कल्पना तभी सार्थक होगी, जब पहचान से आगे बढ़कर मनुष्य को मनुष्य के रूप में स्वीकार किया जाए।

    डा विजय दीक्षित

  8. ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए बधाई।
    यह संपादकीय नए प्रश्न खड़े करता है कि हिन्दू शास्त्रों में राम, रावण , कंस से ले कर सामान्य आदमी तक किसी का सरनेम नहीं मिलता तो हिंदुओं में सरनेम आया कहां से?

    ठीक है कृष्ण को देवकीनंदन अलग से कहा जाता है, सरनेम के रूप में नहीं। गूगल बताता है, सन 800 -1200 में जोशी ( ज्योतिषी) जैसे व्यवसाय के रूप में सरनेम लगे। फिर राजघरानों में शुरू हुए और अंत में ब्रिटिश शासन में जनगणना के समय इत्यादि दबाव पूर्वक भी सरनेम बनने लगे। नाम के स्रोत वही जो आपने ब्रिटिश सरनेम के लिए बताए हैं। पर आश्चर्य है, शास्त्र लिखने के काल तक सरनेम नहीं के बराबर थे फिर भी यही देश जाति प्रथा में फंस गया।

  9. बहुत सुंदर और रोचक जानकारी। सचमुच नाम और उपनाम केवल किसी व्यक्ति की पहचान भर नहीं हैं, उनके पीछे समाज, भूगोल, पेशे और इतिहास की अनेक परतें छिपी रहती हैं।

    इसे पढ़ते हुए मेरे मन में भारतीय उपनामों को लेकर भी एक जिज्ञासा पैदा हुई। हमारे यहाँ प्राचीन काल से वर्ण, जाति, गोत्र और कुल की व्यवस्थाएँ तो रही हैं, लेकिन क्या आज की तरह पिता से पुत्र को मिलने वाला स्थायी surname भी उतना ही पुराना है ,यह अलग शोध का विषय है। वर्ण और जाति को सीधे आधुनिक उपनाम-व्यवस्था का पर्याय मान लेना शायद उचित नहीं होगा। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में व्यक्ति की पहचान कभी गोत्र से, कभी गाँव से, कभी वंश या कुल से, कभी पिता के नाम से और कभी पेशे अथवा पदवी से होती रही। बाद के समय में इनमें से अनेक पहचानें स्थायी उपनाम बन गईं। औपनिवेशिक काल की जनगणनाओं ने जातीय पहचानों को दर्ज और वर्गीकृत करने की प्रक्रिया को और अधिक औपचारिक बनाया।

    हमारे यहाँ भी अंग्रेज़ी उपनामों की तरह पेशा उपनाम बन जाने के अनेक दिलचस्प उदाहरण मिलते हैं। हलवाई, हकीम, मुनीम, ठेकेदार जैसे शब्द मूलतः काम या पद बताते हैं; कई जगह यही पारिवारिक पहचान भी बन गए। पुराने ग्रामीण समाज में लुहार, कुम्हार, दर्जी, धोबी, नाई और जुलाहा जैसी पहचानें भी पेशे से इतनी गहरे जुड़ी थीं कि अनेक क्षेत्रों में वे सामाजिक अथवा सामुदायिक नाम के रूप में स्थिर हो गईं।

    इसी तरह स्थान भी नाम में बस गया। महाराष्ट्र और कोंकण में ‘-कर’ वाले अनेक नाम मूल स्थान की ओर संकेत करते हैं। भारत के दूसरे हिस्सों में भी नगर अथवा गाँव से जुड़ी पहचानें मिलती हैं। कई बार हम जिसे आज केवल surname समझते हैं, उसके पीछे किसी पुरखे का गाँव, रियासत, पद या पेशा छिपा हुआ होता है।

    इस संदर्भ में पारसी समुदाय तो विशेष रूप से रोचक है। उनके अनेक उपनाम मानो पुरखों का छोटा-सा विजिटिंग कार्ड हैं। बाटलीवाला बोतल बनाने या बेचने वाले पेशे से जुड़ा नाम है; कपाड़िया कपड़े के व्यवसाय की ओर इशारा करता है; Contractor, Vakil, Canteenwala जैसे नाम भी पेशागत पहचान को सुरक्षित रखते हैं। वहीं Bharucha, Bulsara, Ahmedabadwala, Barodawala जैसे नाम स्थान की स्मृति सँजोए हुए हैं। पारसी उपनामों में पेशा और स्थान दोनों का यह मेल बहुत स्पष्ट दिखाई देता है।

    संभवतः उपनामों को केवल जाति की मुहर मानना उनकी कहानी को बहुत छोटा कर देना होगा। भारतीय उपनाम कहीं जाति और कुल बताते हैं, कहीं गोत्र, कहीं पुरखों का गाँव, कहीं कोई राजकीय पदवी और कहीं वह काम जिससे किसी परिवार की कई पीढ़ियों की रोटी जुड़ी रही।

    इस दृष्टि से अंग्रेज़ी surnames पर आपका यह आलेख केवल इंग्लैंड के नामों का इतिहास नहीं बताता, बल्कि हमें अपने ही नाम के पीछे झाँकने को प्रेरित करता है।बहुत ज्ञानवर्धक और जिज्ञासा जगाने वाला आलेख।

    • मुकेश भाई, आपने संपादकीय के साथ भारतीय परिवेश को जोड़ते हुए एक महत्वपूर्ण एवं विस्तृत टिप्पणी लिखी है। सभी पाठकों को यह टिप्पणी अवश्य पढ़नी चाहिए।

  10. सादर नमस्कार सर…
    अत्यंत रोचक एवं विशेष जानकारी दी है आपने…. वास्तव में आपका यह श्रम सार्थक हुआ है..। भारत में जाति के अनुसार जो भेदभाव हुआ है…यह नहीं होता तो विकास की गति और तेज होती….
    आप तो यहाँ भी हैं और वहाँ भी…

    साधुवाद

  11. कभी विश्व पर राज करने वाली अंग्रेज कौम की सूक्ष्म पड़ताल करता हुआ यह संपादकीय ,हमें ब्रिटिश संस्कृति के अहम पहलू से परिचित करता है,,,व्यक्ति विशेष ,कर्म विशेष और स्थान विशेष से निःसरत होते नाम ,स्थान, काम वंशावली हमें आश्चर्य के सायं साथ यह भी बता रही है कि जाति का इस से कोई लेना देना नहीं है।
    अप्रत्यक्ष रूप से मानवता को पुष्ट करती हुई ,,कुछ ,,,कर्म वर्ण सी व्यवस्था भारत की भी रही थी।संपादकीय की मानें तो इंसान और इंसानियत ही मूल और उद्देश्य है।
    इस लिए सरनेम में क्या रक्खा है!
    हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो।

    • भाई सूर्यकांत जी आपने हमेशा की तरह एक सारगर्भित टिप्पणी लिखी है… हमारे लिये उत्साहवर्धक है। हार्दिक धन्यवाद।

  12. असाध्य कार्य है इतनी ऐतिहासिक जानकारी का संकलन करना। आ.संपादक महोदय को साधुवाद।

    भारत में भी सरनेम के पीछे कोई न कोई इतिहास सामने आया है एक बार रखा गया सरनेम पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जब काल की शुरुआत हुई तब लोगों को उनकी योग्यता के अनुसार अलग-अलग कार्यों के आधार पर अलग-अलग समूह में विभाजित किया गया था उस समय कोई जाति भेद नहीं था धीरे-धीरे वही किसी जाति विशेष के रूप में परिणित हो गया,
    फिर उन समूहों में जन्म लेने वाले पीढ़ी दर पीढीं उसी जाति के कहलानै लगे।
    धीरे-धीरे अलग-अलग विचारधारा के अनुसार एक हीजाति में कई उपजातियां बन गई उन में भी अलग-अलग सरनेम हो गए किसी ने गोत्र के आधार पर सरनैम रख लिया किसी ने और किसी कारण से, जैसे समाज में अच्छा काम करने वाले को वीर की उपाधि दे दी तो वह वीर नाम से जाना जाने लगता है ऐसे परिवार देखे हैं मैं समाज में वह अपने नाम के आगे ‘वीर’ लगाते हैं

    किंतु अब तो किसी की जाति पता करना भी मुश्किल है
    अब तो यह है कि कुछ वर्ग के लोग तो अपने मन से नया सरनेम बना लेते हैं और बहुत से लोग अपनी जाति छुपाने के लिए भी सरनेम लगा लेते हैं जिससे पता ही नहीं चलता कौन किस वर्ग से किस जाति से है

    इंग्लैंड में भी हर सरनेम के पीछे कोई न कोई कारण रहा होगा।वहां क्रिश्चियन धर्म चलता है उस हिसाब से जाति तो क्रिश्चियन ही हुई किंतु दूसरे देशों के लोग भी बहुत बसे हैं वह अपने देश से जो सरनेम लेकर आए हैं वही रखते होंगे, नहीं पता वहां पीढयों से एक सा सरनेम चलाते हैं या बदल लेते हैं
    आ. संपादक महोदय का धन्यवाद जो एक नई जानकारी के साथ संपादकीय पढ़ने का अवसर दिया

  13. *आपका नाम आपकी पहचान *
    आदरणीय प्रिय तेजेन्द्र सर जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे तेजेंद्र कवि साहित्यकार संपादक।
    संसार में जितने भी प्राणी है चाहे वह नभचर हो जलचर हो या
    थलचर हो, आज की तिथि में सब की अलग-अलग पहचान है मानव जो की सर्वश्रेष्ठ है जाहिर है कि वह अपनी पहचान में पीछे क्यों रहेगा, उसे तो पहचान में भी पहचान चाहिए
    जन्मजात पहचान तो है ही उसके बाद व्यक्तिगत पहचान देशिय पहचान वैश्विक पहचान ,उसकी पहचान रूपी महत्वाकांक्षाओं का अंत नहीं,
    आपने जो विदेश के लोगों की पहचान को याद रखने का तरीका अपने संपादकीय में दर्शाया है वह निसंदेह बेहद प्रशंसनीय है काफी लोग अभी तक इससे अनभिज्ञ रहे होंगे
    लेकिन विदेशी लोगों की पहचान और भारतीय पहचान में
    एक बहुत विशेष अंतर है, विदेश में पहचान उनके कार्य से उनके पिता के नाम से जहां वह रहते हैं पर्वत नदी वन क्षेत्र के हिसाब से सरनेम की पहचान परिलक्षित होती है वही भारत में सीधे-सीधे चार वर्ण चार जाति में सिमट जाती है , और भी यह की भारत में सरनेम की पहचान तथाकथित रूप से आदमी की सर्वश्रेष्ठता की पहचान बनी हुई है
    जैसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र इसमें क्रमशः ऊपर से नीचे क्रम से आदमी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ,
    जबकि आज के समय में नहीं ब्राह्मण ब्राह्मण का कार्य नहीं कर रहे हैं ना ही क्षत्रिय वैश्य शूद्र पूरी तरह अपने अपने जातिगत कार्य नही कर रहे हैं
    फिर भी जन्मगत पहचान ही असली पहचान बन चुकी है
    इस मामले में मुझे विदेश की मानवीय पहचान श्रेष्ठ लगी
    हालांकि हर मानव अपनी पहचान चाहता है और जरूरी भी है पहचान के लिए महत्वाकांक्षाएं काम करती हैं मानव को ऐसे कार्यों के लिए प्रेरित करती हैं कि उसका अलग से नाम हो पहचान हो, मानव के कार्य ही उसकी असली पहचान बने उसका नाम बने सरनेम बने मेरी तो यही आकांक्षा हैं
    परंतु आपके द्वारा आज एक सर्वथा अलहदा विषय पर आपकी संपादकीय ने सभी का दिल जीत लिया
    आपका नाम ही आपकी पहचान है ।

    • कुन्ती जी, आपने लिखा है कि – आपने जो विदेश के लोगों की पहचान को याद रखने का तरीका अपने संपादकीय में दर्शाया है वह निसंदेह बेहद प्रशंसनीय है काफी लोग अभी तक इससे अनभिज्ञ रहे होंगे। आपके द्वारा आज एक सर्वथा अलहदा विषय पर आपकी संपादकीय ने सभी का दिल जीत लिया। – इस उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  14. ‘बिन जाति कैसा सरनेम…’ : नाम के बहाने पहचान का समाजशास्त्र

    संपादक महोदय का संपादकीय ‘बिन जाति कैसा सरनेम…’ पढ़ना एक रोचक बौद्धिक यात्रा से गुजरने जैसा है। सरनेम जैसे सामान्य विषय को लेखक ने इतिहास, भाषा, संस्कृति और सामाजिक मानसिकता से जोड़कर जिस तरह प्रस्तुत किया है, वह पाठक को सहज ही आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।
    ब्रिटिश सरनेमों की उत्पत्ति पर विचार करते हुए यह तथ्य सामने आता है कि नाम केवल जाति या वंश का परिचायक नहीं होते। वे कभी पेशे से जुड़े होते हैं, कभी स्थान से, कभी किसी पूर्वज के नाम से और कभी किसी शारीरिक विशेषता या सामाजिक संदर्भ से। प्रत्येक नाम अपने भीतर इतिहास की कोई भूली-बिसरी कहानी संजोए रहता है।इसी तरह नीदरलैंड या यूँ कहें सारे यूरोपीय देशों की कहानी है।
    संपादकीय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि यह हमें भारतीय समाज की उस मानसिकता पर विचार करने को विवश करता है, जहाँ किसी व्यक्ति का परिचय जानने से पहले उसकी जाति जानने की उत्सुकता दिखाई देती है। हम अक्सर पूछते हैं“आप कौन हैं?” लेकिन उसके पीछे छिपा प्रश्न कई बार होता है, “आप किस जाति के हैं?”
    यहीं से नाम और पहचान के बीच का अंतर स्पष्ट होता है। नाम व्यक्ति की पहचान का एक हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व नहीं।
    किसी सरनेम से किसी के पूर्वजों, भूगोल या पारिवारिक इतिहास का संकेत मिल सकता है, पर उससे उसके विचारों, प्रतिभा, संवेदनशीलता, कर्मठता या मानवीय मूल्यों का आकलन नहीं किया जा सकता। मनुष्य को उसके नाम से आगे जाकर पढ़ना और समझना ही वास्तविक सामाजिक दृष्टि है।
    तेजेन्द्र शर्मा जी की लेखकीय विशेषता यह है कि वे गंभीर विषय को बोझिल नहीं बनने देते। रोचक उदाहरणों और सहज भाषा के माध्यम से वे पाठक को नामों की दुनिया में ले जाते हैं और फिर उसी बहाने हमारी सामाजिक धारणाओं के सामने एक आईना रख देते हैं।
    यह संपादकीय हमें याद दिलाता है कि सरनेम अतीत की सूचना दे सकता है, लेकिन मनुष्य का मूल्य निर्धारित नहीं कर सकता। नाम इतिहास का संकेत हो सकता है, किंतु व्यक्ति की असली पहचान उसके कर्म, विचार और संवेदना से निर्मित होती है।
    एक विचारोत्तेजक, जानकारीपूर्ण और सामाजिक चेतना जगाने वाले संपादकीय के लिए संपादक महोदय को हार्दिक बधाई एवं साधुवाद।
    नामों के पीछे छिपे इतिहास को पढ़ना ज्ञान है,लेकिन नाम से परे मनुष्य को पहचानना विवेक है।
    पुरवाई के इस अंक के लिए एक सार्थक और विचारोत्तेजक संपादकीय के लिए संपादक महोदय को बहुत-बहुत साधुवाद । शायद इसे पढ़कर कोई एक इंसान को इंसान की तरह देख सके ।
    डॉ.ऋतु शर्मा ननंन पाँडे “ नीदरलैंड “
    अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी संगठन नीदरलैंड “

    • ऋतु जी, अब तो आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है। संपादकीय की परतों को आप जिस तरह उकेरती हैं… अद्भुत है। आपने लिखा है कि – यह संपादकीय हमें याद दिलाता है कि सरनेम अतीत की सूचना दे सकता है, लेकिन मनुष्य का मूल्य निर्धारित नहीं कर सकता। नाम इतिहास का संकेत हो सकता है, किंतु व्यक्ति की असली पहचान उसके कर्म, विचार और संवेदना से निर्मित होती है। एक विचारोत्तेजक, जानकारीपूर्ण और सामाजिक चेतना जगाने वाले संपादकीय के लिए संपादक महोदय को हार्दिक बधाई एवं साधुवाद। – आपकी यह टिप्पणी हमारे लिये किसी पुरस्कार से कम नहीं।

  15. “पुरवाई “ की साहित्यिक पहचान को बरकारार रखते हुए संपादकीय की विषयवस्तु में प्रति सप्ताह वैविध्यपूर्ण राष्ट्रीय – अंतरराष्ट्रीय विचारों को समय और श्रम के वृत्त में समाहित करना श्री तेजेंद्र शर्मा जी की ख़ूबी है ।अभी का अंक इसी तारतम्य में “ बिन जाति कैसा सरनेम “ के चिंतन पर केंद्रित है ।
    शुरुआत में भारत की जाति व्यवस्था की बात करते हुए सम्पादकीय के प्रवाह को मोड़ कर ब्रिटेन में जाति प्रथा नहीं रहने के बावजूद ‘सरनेम’ के प्रचलन की जरूरत पर युक्ति संगत प्रकाश डालते हुए 1066 के बाद नॉर्मन बैरनों (Barons) द्वारा नेइंग्लैंड में सरनेम (उपनाम) के चलन की अच्छी जानकारी दी गई है। इंग्लैंड में पैंतालीस हजार सरनेम हैं जो भारत की तरह जातियूचक न हो कर कर्म बोधक अधिक हैं । 1483 में राजा एडवर्ड पंचम ने इंग्लैंड के सभी नागरिकों के लिए उपनाम रखने पर दबाव इसलिए डाला कि जनसंख्या बढ़ने से उनकी पहचान सुनिश्चित हो सके। लोगों के पेशे और कार्य क्षेत्र तय हो सके। प्राकृतिक परिवेश, भौगोलिक स्थिति भी इसका आधार रही है । सम्पादकीय में इसका विस्तृत विवरण काल क्रम के विकास के साथ दिया गया है ।
    भारत की प्राचीन परंपरा में कर्म आधारित जाति – व्यवस्था थी जिसमें धीरे-धीरे विकृति आती गई । आज की स्थिति में यह सबसे बड़ी समस्या बन गई है । इंग्लैंड की बात पढ़ते हुए चिंतन में भारत आ ही जाता है। इसके
    कई ऐतिहासिक संदर्भ भी हैं। बधाई ।
    इस अंक में डॉ. शैलजा सक्सेना की सभी कविताएँ भावपूर्ण हैं । “पेड़ ये जिजीविषा”, “इंद्रधनुष” विशेष रूप से प्रभावी कविताएँ हैं । रेखा भाटिया, नीलिमा करैया,प्रदीप गुप्ता , रूक्मणी राय की कविताएँ अलग अनुभूति से युक्त हैं । पठनीय हैं । समादृत कहानियाँ और पुस्तक समीक्षा से पुरवाई की साहित्यिक महत्ता रेखांकित होती है ।
    शुभकामनाएँ ।
    —-
    मीनकेतन प्रधान

    • भाई मीनकेतन जी, आपने पत्रिका पर सार्थक टिप्पणी लिखी है। आप निरंतर हमारा उत्साह बढ़ाते हैं। हार्दिक आभार।

  16. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    इस बार के संपादकीय के शीर्षक ने अधिक चौंकाया। संपादकीय प्रारंभ में ही प्रश्न करता है कि जब अंग्रेज़ों में भारत जैसी जाति-व्यवस्था नहीं थी, तो वहाँ सरनेम कैसे बने और उनकी आवश्यकता क्यों पड़ी?
    यह प्रश्नात्मकता पाठक की जिज्ञासा बढ़ाती है और उसे आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है।

    नाम या उपनाम केवल किसी व्यक्ति की पहचान नहीं होता, बल्कि उसके भीतर इतिहास, संस्कृति, सामाजिक संरचना और पारिवारिक स्मृतियों की अनेक परतें छिपी होती हैं। किसी व्यक्ति का नाम सुनते ही उसके परिवार, क्षेत्र, समुदाय अथवा सामाजिक पृष्ठभूमि के विषय में हमारी धारणाएँ बनने लगती हैं। भारतीय समाज में तो उपनाम या कुलनाम जैसे रघुवंशी,चंद्रवंशी, सूर्यवंशी;जातिगत पहचान से गहराई से जुड़ा रहा। संपादकीय को पढ़कर जाना कि ब्रिटेन में भारत से विपरीत उपनामों के विकास की प्रक्रिया मुख्यतः पेशे, स्थान, पारिवारिक संबंधों और व्यक्ति की विशेषताओं से जुड़ी रही है।
    आपका संपादकीय ‘बिन जाति कैसा सरनेम…’ इसी अंतर को केंद्र में रखकर लिखा गया है। लेखक ने ब्रिटिश सरनेम के इतिहास की पड़ताल करते हुए यह समझाने का प्रयास किया है कि उपनामों का जन्म किन सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों में हुआ तथा समय के साथ वे किस प्रकार पारिवारिक पहचान का स्थायी हिस्सा बन गए।
    यह संपादकीय केवल अंग्रेज़ी उपनामों की जानकारी देने वाला आलेख नहीं है, बल्कि नाम, पहचान और सामाजिक संरचना के संबंध पर विचार करने का अवसर भी प्रदान करता है।

    संपादकीय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसका विषय-चयन है। सामान्यतः हम अपने नाम और उपनाम का उपयोग तो करते हैं, लेकिन यह नहीं सोच पाते हैं कि किसी उपनाम की जरूरत क्योंकर रही और प्रक्रिया क्या है? और उसके पीछे कौन-सा इतिहास छिपा है।

    प्रारंभ में आपने भारतीय समाज के उपनामों का ज़िक्र किया कि भारत में मिश्रा, शुक्ला, दुबे, पांडेय, खन्ना, कपूर, माथुर और भटनागर जैसे उपनाम सुनकर लोग प्रायः संबंधित व्यक्ति की जातिगत पृष्ठभूमि का अनुमान लगा लेते हैं।
    इसके बाद बाद ब्रिटेन की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करते हैं और प्रश्न उठाते हैं कि वहाँ भारतीय समाज जैसी जाति-व्यवस्था न होने पर भी इतने अधिक उपनाम क्यों हैं और वे बने कैसे?

    यहीं से संपादकीय का मूल विषय विकसित होता है। संभवतः आपका उद्देश्य यह बताना है कि उपनाम केवल जाति या सामाजिक वर्ग के संकेतक नहीं होते; वे इतिहास, पेशे, भौगोलिक परिवेश और पारिवारिक संबंधों के दस्तावेज़ भी हो सकते हैं।
    विषय की यह दृष्टि पाठकों को उपनामों को नए ढंग से देखने के लिए प्रेरित करती है।

    संपादकीय में आपने ब्रिटिश उपनामों के विकास को ऐतिहासिक क्रम में समझाने का प्रयास किया है कि ब्रिटेन में नॉर्मन विजय से पहले लोगों को प्रायः उनके निजी नामों से ही पहचाना जाता था। जब आबादी बढ़ी और एक ही नाम वाले लोगों की संख्या अधिक होने लगी, तब पहचान को स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त नामों का प्रयोग शुरू हुआ।

    ‘जॉन द बुचर’ — कसाई जॉन।
    ‘विलियम द शॉर्ट’ — नाटे विलियम।
    ‘हेनरी फ्रॉम सटन’ — सटन का हेनरी।
    ‘रॉजर सन ऑफ़ रिचर्ड’ — रिचर्ड का पुत्र रॉजर।

    उपरोक्त संपादकीय में उद्धृत इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि उपनामों की प्रारंभिक आवश्यकता सामाजिक पहचान को सरल बनाने से जुड़ी थी। किसी व्यक्ति का पेशा, उसका निवास-स्थान, उसकी शारीरिक विशेषता अथवा उसके पिता का नाम उसकी पहचान का आधार बन सकता था।
    समय के साथ ये अस्थायी पहचान- सूचक नाम स्थायी पारिवारिक उपनामों में बदलने लगे।

    इस प्रकार संपादकीय से स्पष्ट हुआ कि नामों का विकास किसी एक घटना का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे ऐतिहासिक और सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया था।

    हालाँकि, इतिहास संबंधी ऐसे विवरणों में अलग-अलग क्षेत्रों और कालखंडों की परिस्थितियों का अंतर भी महत्वपूर्ण होता है। उपनामों का विकास पूरे ब्रिटेन में एक समान गति से नहीं हुआ। इस दृष्टि से संपादकीय का विषय आगे और विस्तृत ऐतिहासिक अध्ययन की संभावनाएँ भी खोलता है।

    संपादकीय की एक प्रमुख विशेषता यह भी है कि आपने ब्रिटिश उपनामों को उनके संभावित उद्गम के आधार पर अलग-अलग वर्गों में समझाया है। जिनकी कुल संख्या संपादकीय के अनुसार लगभग 45000 है। इससे पाठकों को विषय को व्यवस्थित ढंग से समझने में सहायता मिलती है।
    (पेट्रोनॉमिक)पिता के नाम से बने उपनामों के बारे बताते हैं कि कुछ उपनाम पिता के नाम से बने हैं। ऐसे नामों में प्रायः ‘सन’ शब्द जुड़ा रहता है जैसे
    रिचर्डसन — रिचर्ड का पुत्र।
    डेविडसन — डेविड का पुत्र।
    ग्रिफ़िथ्स — ग्रिफ़िथ या ग्रुफ़िड के वंशज

    इन उदाहरणों से यह समझ आता है कि परिवार की पहचान पिता या पुरुष पूर्वज के नाम से आगे बढ़ाने की परंपरा ब्रिटिश समाज में भी रही है।

    यहाँ संपादकीय अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रश्न भी उपस्थित करता है कि नामों में पारिवारिक वंश और उत्तराधिकार की धारणाएँ किस प्रकार संरक्षित रहती हैं।

    माँ के नाम से बने उपनाम मैरियट और मैडिसन जैसे श्रेणी में आते हैं।इससे पता चलता है कि उपनामों की परंपरा केवल पुरुष-वंश तक सीमित नहीं थी।
    यहाँ पाठक सोचने पर मजबूर होता हैसोचने कि इतिहास में स्त्रियों की पहचान और वंश-परंपरा किस प्रकार दर्ज होती रही होगी।
    यह विशेष है कि अनेक उपनाम व्यक्ति के पेशे से भी बने। जैसे –
    स्मिथ — धातु का काम करने वाला कारीगर।
    कार्पेंटर — बढ़ई।

    यहाँ एक बात हम व्यक्तिगत रूप से कहना चाहेंगे
    कि टेलर,मिलर,
    फिशर,नाइट जैसे कुछ सरनेम हमें चकित करते रहे। हम सोचते थे यह भी क्या सरनेम हुआ!
    आज इस जिज्ञासा का निदान हुआ।

    इससे पता चलता है कि उपनामों में किसी समाज की आर्थिक और व्यावसायिक संरचना भी सुरक्षित रह सकती है।
    यद्यपि पुराने समय के अनेक पेशे आज सामान्य जीवन में दिखाई नहीं देते, लेकिन उनके नाम पारिवारिक उपनामों के रूप में जीवित हैं।

    इस प्रकार उपनाम इतिहास के उन व्यवसायों की स्मृति को भी सँजोए रहते हैं, जो समय के साथ बदल गए या समाप्त हो गए।

    कुछ उपनाम व्यक्ति के रंग-रूप, व्यक्तित्व या किसी विशेष गुण से बने होंगे।
    ‘व्हाइट’, ‘ब्लैक’, ‘ग्रे’ और ‘स्विफ़्ट’ जैसे नामों से यह संकेत मिलता है कि किसी व्यक्ति की पहचान उसके रूप, व्यवहार अथवा किसी विशेषता के आधार पर भी की जाती थी। इस प्रकार उपनाम केवल वंश या पेशे की सूचना नहीं देते, बल्कि सामाजिक स्मृति में सुरक्षित व्यक्तिगत विशेषताओं का भी प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।

    संपादकीय के अनुसार किसी व्यक्ति के निवास-स्थान, गाँव, कस्बे या क्षेत्र के नाम से भी उपनाम बने।
    ‘हैम्पशायर’, ‘बर्टन’ और ‘सटन’ जैसे उदाहरण प्राकृतिक परिवेश पर आधारित हैं ।इसी प्रकार ‘मूर’, ‘हिल’, ‘स्टोन’ और ‘वुड’ से अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी परिवार के पूर्वज पहाड़ी, जंगल, पत्थरीले क्षेत्र या किसी विशेष भौगोलिक स्थान के निकट रहते रहे होंगे।नाम यहाँ केवल व्यक्ति की पहचान नहीं, बल्कि उसके भौगोलिक अतीत की स्मृति बन जाता है।

    ब्रिटिश राज परिवार इस बात का गवाह है की संपत्ति, जागीर और पद से भी उपनाम परिवर्तित होते हैं।

    जिस तरह ब्रिटेन में वर्ग, क्षेत्र, वंश और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े नाम रहे हैं, भारत में भी कुछ ऐसे उपनाम हैं जो पेशे, स्थान या व्यक्तिगत नामों से बने हैं।
    इस तरह संपादकीय- तुलना पाठक को विचार करने का अवसर देती है, लेकिन विषय की व्यापकता को समझने के लिए दोनों समाजों की आंतरिक विविधताओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

    संपादकीय के अंत में जब आप ‘पुरवाई’ के पाठकों को संबोधित करते हुए कहते हैं कि आपने अंग्रेज़ों के सरनेम के इतिहास को समझने का पूरा प्रयास किया है।
    यह संबोधन पाठकों को निकटता का एहसास देता है।

    इस बेहद अछूते विषय पर संपादकीय के एक रोचक आरंभ और प्रभावी समापन के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।

    पुरवाई का तहेदिल से शुक्रिया।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपको संपादकीय का विषय अछूता लगा और पसंद आया। आपने विस्तार से संपादकीय का विष्लेषण किया है। आपका हार्दिक आभार।

  17. आपके संपादकीय से हमेशा कोई नई जानकारी प्राप्त होती है। ‘बिन जाति कैसा सरनेम’ पढ़ कर आश्चर्य हुआ कि इंग्लैंड में 45 000 अलग-अलग सरनेम हैं और सभी के आधार भिन्न हैं। यह सभी अलग-अलग कारणों से अस्तित्व में आए हैं जबकि हमारे यहां सभी सरनेम जाति के सूचक होते हैं। वे स्थानवाची भले ही हों।गढ़वाल में बहुत से सरनेम गांव के आधार पर बने हैं जैसे नौटी के नौटियाल, सकलाना के सकलानी इत्यादि किंतु ये सभी जाति के ही बोधक होते हैं। गढ़वाल में अधिकतर स्वर्ण जातियां हैं। अतः पूरा-पूरा गांव सवर्णों का‌होता है। सरनेम से इनका मूल स्थान ज्ञात होता है। किसी न किसी कारण से प्रतिक्रिया देने में हमेशा देर कर देती हूं किंतु पढ़ तो तभी लेती हूं।
    आगामी संपादकीय की प्रतीक्षा है।

    • विद्या जी, आपकी टिप्पणी की हमेशा प्रतीक्षा रहती है। आपका पुरवाई के संपादकीय के साथ जुड़ाव हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

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