Saturday, September 19, 2026
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बिन जाति कैसा सरनेम…

भारत एक मामले में विशिष्ट देश है कि यहाँ सरनेम (यानी कि कुलनाम) सुनते ही हमें व्यक्ति की जाति मालूम हो जाती है। मिश्रा, शुक्ला, दुबे, पांडेय जैसे बहुत से नाम हैं, जिनके सुनते ही पता चल जाता है कि हम किसी ब्राह्मण जाति के व्यक्ति की बात कर रहे हैं। खन्ना, कपूर, सोढ़ी, बेदी, चोपड़ा सुनते ही अहसास हो जाता है कि बंदा खत्री (क्षत्रिय) है। माथुर, भटनागर झट से बता जाते हैं कि हम कायस्थ हैं। ठीक वैसे ही राजपूत, ठाकुर, जाट, वैश्य और दलित सरनेम अपनी-अपनी पहचान हमें साफ़ बता जाते हैं।

सोचने की बात यह है कि अंग्रेज़ों में तो भारत की तरह जाति-प्रथा है नहीं। तो यहाँ फिर सरनेम कैसे बनाए गए और प्रश्न तो यह भी उठता है कि सरनेम बनाने की आवश्यकता क्यों आन पड़ी। “नाम में क्या रखा है?… बहुत कुछ, अगर इंसान की समझ उसे खोज सके।” जिस किसी ने भी यह मशहूर बात कही है, वह निस्संदेह सही था, क्योंकि अकेले इंग्लैंड में ही लगभग 45,000 अलग-अलग सरनेम हैं और हर एक के पीछे अपना एक इतिहास है।

ब्रिटेन पर नॉर्मन कब्ज़े (Norman Conquest) से पहले लोगों के पास ख़ानदानी उपनाम नहीं होते थे। उन्हें सिर्फ़ उनके निजी नाम से जाना जाता था।

जब समुदाय छोटे थे, तो हर व्यक्ति को एक ही नाम से पहचाना जा सकता था… लेकिन जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, लोगों को और बेहतर पहचान करने की ज़रूरत महसूस होने लगी, जिससे ‘जॉन द बुचर’ (कसाई जॉन), ‘विलियम द शॉर्ट’ (नाटे विलियम), ‘हेनरी फ़्रॉम सटन’ (सटन के हेनरी), ‘मैरी ऑफ़ द वुड’ (जंगल की मैरी) और ‘रॉजर सन ऑफ़ रिचर्ड’ (रिचर्ड के बेटे रॉजर) जैसे नाम सामने आए। समय के साथ कई नाम बदल गए और आज यदि उनका असली मतलब समझने का प्रयास किया जाए तो आसानी से समझ नहीं आता।

1066 के बाद नॉर्मन बैरनों (Barons) ने इंग्लैंड में सरनेम (उपनाम) का चलन शुरू किया और धीरे-धीरे यह प्रथा फैल गई। शुरू में पहचान बताने वाले नामों को लोग अपनी मर्ज़ी से बदल या छोड़ देते थे… लेकिन समय के साथ ये नाम पक्के हो गए और पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ने लगे। इस तरह पेशे, उपनाम (निकनेम), मूल स्थान और पिता के नाम पक्के सरनेम बन गए, जैसे- फ़्लेचर और स्मिथ, रेडहेड और स्विफ़्ट, ग्रीन और पिकरिंग, विल्किंस और जॉनसन। 1400 तक ज़्यादातर अंग्रेज़ परिवारों और ‘लो-लैंड स्कॉटलैंड’ के परिवारों ने ख़ानदानी सरनेम का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था।

शुरू-शुरू में उपनाम लोगों की पहचान बताने के लिए बनाए गए थे। ये उपनाम व्यक्ति का पेशा या उसका दर्जा दर्शा सकते थे, उसके रहने की जानकारी दे सकते थे या फिर व्यक्ति की विशेषताओं को रेखांकित करने का कोई तरीका हो सकते थे।

1381 तक इंग्लैंड में ज़्यादातर परिवारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले उपनाम अपना लिए थे। यहाँ ध्यान देने लायक बात यह है कि मूल रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी न चलने वाले कई एंग्लो-सैक्सन उपनाम भी इस नए सिस्टम के तहत आगे की पीढ़ियों तक पहुँच गए। इसका एक प्रचलित उदाहरण है उपनाम ‘स्मिथ’।

1483 में राजा एडवर्ड पंचम ने इंग्लैंड के सभी नागरिकों के लिए उपनाम रखने पर दबाव बनाया, ताकि वे अपनी पहचान बेहतर ढंग से लोगों तक पहुँचा सकें। वैसे इंग्लैंड में साधारणतः सात तरह के उपनाम या सरनेम देखे जा सकते हैं।

पैट्रोनॉमिक सरनेम वे पारिवारिक नाम होते हैं, जो किसी पुरुष के पहले नाम से बने होते हैं। अक्सर (मगर हमेशा नहीं) इनके नाम के आख़िर में ‘सन’ लगा होता है, जिससे इन्हें पहचानना आसान हो जाता है। इस तरह के नाम के उदाहरण के लिए आप देख सकते हैं- ‘रिचर्डसन’, यानी रिचर्ड का बेटा, या फिर ‘डेविडसन’- डेविड का बेटा।

1550 के दशक के वेल्स में पुराने तरह के नाम का इस्तेमाल देखा जा सकता है, जैसे कि ‘ग्रिफ़िथ्स’। इसका इस्तेमाल ग्रिफ़िथ या ग्रुफ़िड के बेटे या वंशज के लिए किया जाता था।

दूसरी ओर आते हैं मैट्रोनॉमिक नाम, यानी माँ की ओर से वंशज नाम। क्योंकि इंग्लैंड में पिता के वंश के आधार पर नाम रखने की परंपरा है, इसलिए माँ के वंशज वाले नाम कम ही देखने को मिलते हैं। मैरियट (मैरी से) या मैडिसन (मॉड से) जैसे नाम मातृ-नाम कहलाते हैं।

इसके बाद आते हैं पेशे से जुड़े सरनेम। ये उपनाम लोगों की पहचान उनके काम के आधार पर करते थे। ये पारिवारिक इतिहास पर शोध करने वालों के लिए ख़ास तौर पर दिलचस्प होते हैं, क्योंकि इनसे यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि हमारे पूर्वज अपनी आजीविका कैसे चलाते थे।

पेशे से जुड़े आम उपनामों में कार्पेंटर, नाइट, टेलर, मिलर और फ़िशर जैसे सरनेम शामिल हैं। इन नामों से यह पहचान करने में आसानी होती है कि आपके पुरखे क्या काम करते थे। ऐतिहासिक संदर्भ को याद रखना आवश्यक है। दो-तीन सदियाँ पहले के लोग आज जैसी नौकरियाँ नहीं किया करते थे। उनके बहुत से काम अलग तरह के होते थे। यदि हम उदाहरण देना चाहें तो एक नाम याद आता है- ‘कार्टराइट’… आजकल इस तरह के पेशे में लोग नहीं दिखाई देंगे, मगर मध्यकाल में गाड़ी या ठेला बनाने वाले को इसी नाम से जाना जाता था।

एक दिलचस्प बात यह है कि कुछ सरनेम अंग्रेज़ों के पूर्वजों के बारे में बताई गई बातों से बने हैं। ये एक तरह से निकनेम या उपनाम की तरह काम करते हैं। ‘व्हाइट’, ‘ब्लैक’, ‘ग्रे’ और ‘स्विफ़्ट’ जैसे विशेषण वाले सरनेम शायद उनके पूर्वजों के रंग-रूप या व्यक्तित्व की व्याख्या करते हैं।

अंग्रेज़ों के शुरुआती पूर्वज भी अपनी और दूसरों की पहचान के लिए जगहों के नामों का इस्तेमाल करते थे। यही वजह है कि आज भी बहुत से लोगों के सरनेम ब्रिटेन के कस्बों, काउंटियों या दूसरे इलाकों के नामों से मिलते-जुलते हैं। जगहों के नाम पर आधारित उपनामों के कुछ उदाहरण हो सकते हैं, जैसे-‘हैम्पशायर’, ‘बर्टन’ या फिर ‘सटन’।

स्थान विशेष के नाम की तरह प्राकृतिक जगहों की विशेषताओं का इस्तेमाल भी सरनेम के तौर पर किया जाता रहा है। इस तरह के सरनेम काफ़ी प्रचलित हैं। इनमें ऐसे नाम भी शामिल हैं, जिनके बारे में शायद किसी को मालूम ही न हो कि इनका संबंध भूगोल से हो सकता है।

जिन परिवारों के इतिहास में मूर, हिल, स्टोन या वुड जैसे शब्द आते हैं, तो हो सकता है कि उनके पूर्वज प्राकृतिक परिवेश से आए हों। ऐसे लोगों के शुरुआती रिश्तेदार शायद जंगलों के पास या किसी ख़ास पहाड़ी के नज़दीक रहते रहे हों।

यदि किसी के पूर्वज ज़मीनों के मालिक थे, तो यह भी उनके सरनेम से जाना जा सकता है। ज़मीन के मालिकों का अपनी प्रॉपर्टी या जागीर के नाम पर अपना नाम रखना आम बात थी। इंग्लैंड का शाही परिवार ‘एस्टेट सरनेम’ (जागीर या संपत्ति के नाम पर आधारित उपनाम) का एक बढ़िया उदाहरण है।

1917 में किंग जॉर्ज पंचम ने शाही घराने का नाम ‘सैक्स-कोबर्ग-गोथा’ से बदलकर ‘विंडसर’ कर दिया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने अपने परिवार का नाम मशहूर ‘विंडसर कैसल’ के नाम पर रखा।

अंग्रेज़ों में एक रिवाज़ यह भी रहा है कि यदि आपके पूर्वजों ने किसी और की ज़मीन पर काम किया था, तो उनके सरनेम में यह बात भी झलक सकती है। उदाहरण के लिए, आयरिश सरनेम ‘किलपैट्रिक’ का अर्थ होगा कि ‘पैट्रिक का अनुयायी’।

‘पुरवाई’ के पाठक समझ रहे होंगे कि हमने अंग्रेज़ों के सरनेम रखने के इतिहास को खंगालने का पूरा प्रयास किया है। हम उपनामों को अलग-अलग श्रेणियों में बाँट सकते हैं। फिर भी वे एक तरह से रहस्य ही बने हुए हैं। क्योंकि ये एक लंबे काल में विकसित हुए हैं, इसलिए यह पता लगा पाना आसान नहीं होता कि आख़िर इनकी शुरुआत कहाँ से हुई। कई आम उपनामों के कई संभावित मूल-स्रोत हो सकते हैं। मगर एक बात तय है कि आप इस संपादकीय को पढ़ने के बाद किसी भी अंग्रेज़ का सरनेम सुनेंगे, तो कुछ अंदाज़ा तो लगा पाएँगे कि बंदे का इतिहास क्या है!

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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