Tuesday, August 25, 2026
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भाषायी नवजागरण की पहली कवयित्री हैं ललद्यद: अग्निशेखर   

कवि एवं लेखक अग्निशेखर से डॉ. अनिता शुक्ल का साक्षात्कार

कश्मीर में जन्मे अग्निशेखर समकालीन हिन्दी कविता के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके आठ कविता संग्रह प्रकाशित हैं- किसी भी समय (1992), मुझसे छीन ली गई मेरी नदी (1996), कालवृक्ष की छाया में (2002), जवाहर टनल (2009), मेरी प्रिय कविताएँ (2014), जलता हुआ पुल (2019), नीलगाथा (2021) तथा ‘मैं ललद्यद’ (2022)। इसके अतिरिक्त उनसठ समकालीन कश्मीरी कवियों की निर्वासन चेतना की कविताओं के अनुवाद की पुस्तक ‘हम जलावतन’ (2022), कहानी संकलन ‘दोजख’ (2010) और ‘मिथक नंदिकेश्वर’ (2004) सहित अनेक पुस्तक-पुस्तिकाएं आपने संपादित की हैं। ‘पहल’ तथा ‘प्रगतिशील वसुधा’ के कश्मीर अंकों का आपने अतिथि सम्पादन किया है। गुजराती, नेपाली, बाँग्ला, कन्नड, तेलुगु, ओडिया, आसामी, पंजाबी, अंग्रेजी, मराठी भाषाओं में आपकी कविताएँ अनूदित हैं।

अग्निशेखर को ‘हिंदीतर भाषी हिन्दी लेखक पुरस्कार’ (केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय), ‘गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार’, ‘सूत्र सम्मान’, जम्मू-कश्मीर साहित्य अकादमी का ‘सर्वश्रेष्ठ पुस्तक सम्मान’, ‘मीरा स्मृति सम्मान’, ‘आचार्य अभिनव गुप्त सम्मान’, ‘साहित्य शताब्दी सम्मान’ तथा ‘सौहार्द्र सम्मान’ से सम्मानित किया गया है।

मैंने अग्निशेखर के सद्य: प्रकाशित काव्य-संग्रह ‘मैं ललद्यद’ पर उनसे बात की। ललद्यद अर्थात ललेश्वरी केंद्रित यह काव्य उनके जीवन, समय, संघर्ष, उनके स्वप्न, उनकी वाँछा, अवदान और जनमानस पर उनके अमिट प्रभाव की बात करता है।

सबसे पहले आप हमारे पाठकों को यह बताइए कि ‘ललद्यद’ कौन हैं?

सबसे पहले तो मैं आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ कि आपने चौदहवीं शताब्दी की ललेश्वरी अर्थात ललद्यद पर प्रकाशित मेरी रचना ‘मैं ललद्यद’ को पढ़ा और सराहा।

संत कवयित्री ललद्यद कश्मीरी साहित्य की आदि कवयित्री हैं। वे भारतीय भाषायी नवजागरण की प्रणेता हैं तथा विद्रोही स्त्री स्वर के अलावा वे भक्तिकाल की कालजयी अधिष्ठात्री भी है। अपनी रचनाशीलता से, पारंपरिक शैव दर्शन की गहराइयों से, चिरंतन सत्य की खोज में अपने प्रामाणिक अनुभवों से, तत्कालीन समाज व्यवस्था की कुरीतियों, आडंबरों के प्रति मुखर, विरोधी तेवरों और विवेक-चेतना तथा तपश्चर्या से कश्मीर के लोकमानस में ललद्यद शताब्दियों से रच-बस गयी हैं। ललद्यद के ‘वाख’ साहित्य ने काल का अतिक्रमण किया है। वह हर बदलते युग में अपने सामर्थ्य और अपनी कविता से, नए अर्थ खोलती हैं और प्रासंगिक भी बनी रहती हैं। उनकी कविता में निहित शाश्वत विराटता और उसके साथ मनुष्य के अंतर्संबंधों के साथ ही अपने समय और समाज के प्रति जागरूकता और व्याकुलता की भी तीव्र अभिव्यक्ति है। ललद्यद का जीवन-संघर्ष, उनके ‘वाख’, मनुष्य की नियति, पीड़ा, गहन करुणा, उसके संघर्ष और विवेक, उसकी जिजीविषा और अन्याय के प्रति विरोध को मुखर करते हैं।

यह वास्तव में ललद्यद के युगांतरकारी संत कवयित्री होने का ही प्रमाण है कि आज सात सौ वर्षों के बाद भी वह ऐसी छतनार ‘बून्य’ (भवानी वृक्ष ,जिसे फारसी में  चिनार कहते हैं) की तरह हैं, जिसकी शीतल और घनी हरियर छाँव में बैठकर कश्मीर की जनता अपनी थकान उतारती है। आश्वस्त होती है। नयी आशाओं से ऊर्जस्वित और गौरवान्वित होती है।

कुल मिलाकर मान्यता यह है कि चौदहवीं शताब्दी के प्रथम चरण में ललेश्वरी अर्थात् ललद्यद का जन्म श्रीनगर के पास पांद्रेठन ( प्राचीन पुराणाधिष्ठान) में या उसके  समीप स्यमपुर  गाँव में एक भट्ट (ब्राह्मण) परिवार में हुआ था। “पारस : ललेश्वरी वाख संग्रह ‘ के लेखक पुष्क नाथ रैना के अनुसार श्रीनगर की ओर से आते हुए पांपोर से चार मील पहले प्लाईवुड बोर्ड कारखाने के पास छोटे से गाँव स्यमपुर में चार दीवारी से घिरी और घने पेड़ों के बीच की जगह ललेश्वरी का जन्मस्थान है। यहाँ लेखक संगतराशों की दुकान के ऊपर एक दुमंज़िला मकान में कई वर्ष रहा है और स्यमपुर के ग्रामवासी इस जगह को श्रद्धा से ललद्यद का जन्मस्थल मानते हैं ।

 कृपया हमें ललद्यद के आरंभिक जीवन के बारे में बताइए।

बाल्यकाल में ही उनमें गहन भक्तिभाव के लक्षण देखे गये। तत्कालीन सामाजिक प्रथा के चलते उनका विवाह  छोटी उम्र में ही गाँव से कुछ किलोमीटर दूर पांपोर में हुआ। ससुराल में पद्मावती नाम रखा गया।

जनश्रुतियों के अनुसार सास उसकी थाली में कम भात परोसती। उसके नीचे एक सिलबट्टा रखती ताकि भात कम न दिखें । लल उफ् तक न करती। खाना खाने के बाद सिलबट्टा धोकर रसोई में रखतीं । घर में उत्सव मनते,भोज आयोजित होते लेकिन लल के भाग्य में सिलबट्टा ही आता। कभी-कभार पनघट पर अपनी व्यथा-कथा वहाँ मिलने वाली स्त्रियों से बहनापे में साझा करती । इससे लोक में एक कहावत प्रचलित हुई -” होंड मॉरितन या कठ,ललि निलॅवठ च़लि नॅ ज़ांह”। वे चाहें भेडू मारें या बकरा मारें ,लल के भाग्य में तो सिलबट्टा ही लिखा है । ‘मैं ललद्यद’ में भी यह प्रसंग आया है- वे भेड़ू मारें या बकरा/ खिलाएं खाएं/ मेरे लेखे वही रहेगा सिलबटा/ थाली में भोजन के नीचे।

वह नदरू ( कमलनाल) के तंतु जितना महीन सूत कातती तो भी सास संतुष्ट न होती। उलाहने देती । बेटे के कान भरती । कदाचित् लल पिटती भी होंगी।

लल मन ही मन ईश्वर की शरण में रहने लगी। रोज़ सवेरे गाँव में नदी पार नट भैरव के मंदिर जातीं । वहाँ से लौटते सिर पर पानी का घड़ा ले आती। कहते हैं एक दिन निकम्मे और शंकालु पति ने रास्ते में उसके घड़े को डंडे से फोड़ दिया।

जनश्रुतियों के अनुसार सास और पति ने उसे यातनाएं दीं। बात बेबात पर प्रताड़ना, लांछन, दुत्कार से तंग आकर ललेश्वरी ने गृहस्थ जीवन को तिलांजलि दी और अपने जीवन लक्ष्य को पाने के लिए एक वैरागन की तरह  गाँव-गाँव, जंगल-जंगल घूमी।

 ‘ललवाख’ के विषय में भी हम जानना चाहेंगे।

ललद्यद के ‘वाख साहित्य’ ने काल का अतिक्रमण किया है। यह एक असाधारण घटना  है । इसीलिए वह हर बदलते युग में अपने सामर्थ्य और अपनी कविता से, जिसे हम वाख (संस्कृत वाक्) कहते हैं,  हमारे आगे नये अर्थ खोलती हैं और प्रासंगिक भी बनी रहती हैं।

आज भी कश्मीरी हिंदुओं या मुसलमानों के विवाह उत्सवों या अन्य अवसरों पर आयोजित संगीत समारोह में ललद्यद के वाख  मंगलाचरण की तरह गाए जाते हैं।

इतना ही नहीं, ललद्यद के वाखों में यह सृष्टि,यह जीवन,ये अस्तित्व सब उस विराट का ही विस्तार है,उसकी अभिव्यक्ति है। उसका प्राकट्य है जो किसी भी जातिभेद, वर्णभेद, लिंगभेद या स्थानभेद से ऊपर है।

 यह अखंड चेतना-प्रवाह ललद्यद की कश्मीर शैव-दृष्टि है जो उसे परंपरा में और गुरु सिद्ध श्रीकंठ अर्थात् स्यदमोल से मिली थी। गुरु सिद्ध श्रीकंठ शैवदर्शन के बुनियादी आचार्य वसुगुप्त की शिष्य परंपरा के एक सिद्ध साधक थे।

आपने कहा, ललद्यद शैव-योगिनी थीं। आपकी कविताओं में उनकी इस शैव-दृष्टि की अभिव्यक्ति किस प्रकार हुई है? 

ललद्यद पारंपरिक योगिनियों से अलग एक शैव योगिनी और कवयित्री थीं। पर घर हाँट तो करता रहा होगा। एक वाख में घर की स्मृति से दूरी बनाए दिखती हैं । कहती भी हैं –

‘युस हर हर त्राऑविथ गर गर करे
मरि सुय तै मारन तस।’

अर्थात् जो शिव को छोड़ घर गृहस्थी के मोहजाल में घर का जाप करता रहेगा, उसे ही मृत्यु का भय सताएगा। ललद्यद की कविता में घर एक रूपक में बदला। उसके यहाँ घर संसार- सागर पार का विराट घर बना, जहाँ वह पहुँचना चाह रही थी। एक वाख है –

आमि पनॅ सॅदरस नावि छस लमान
कति बोज़ि दय म्योन मेति दियि तार।
आम्यन टाक्यन प्वोन्य ज़न श्रमान
ज़ुव छुम ब्रमान गरॅ गछ़हा  ।।
अर्थात्
“मैं खींच रही कच्चे धागे से
समुद्र में नाव
काश,सुन लें देव मेरे
तारें मुझको भी उस पार
मैं छीज रही
मिट्टी के कच्चे सकोरों में
ज्यों पानी
मेरा जी मचल रहा है
कब घर लौटूं”

उसने तीर्थाटन किए। समय और समाज को निकट से देखा। लोगों को आश्चर्य हुआ होगा। दुख भी। वह लोकापवादों से घिरी। परवाह नहीं की। उसका विद्रोह, विद्वत्ता, वैराग्य, उसके ज्ञानात्मक संवेदन आदि से वे चमत्कृत भी हुए होंगे ।

बचपन से ही शैव दर्शन तथा अन्य विमर्शों पर चर्चाएँ सुनने से उनके पुष्ट आध्यात्मिक संस्कार बने जान पड़ते हैं । उनके वाखों में  सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के अलावा ऐसे संकेत हैं जिनसे उनके पढ़े लिखे होने का अनुमान होता है । जैसे एक जगह वे कहती हैं :

‘पढ़ी गीता और पढ़ रही हूँ …’

एक सर्वथा नयी और क्रांतिकारी सोच वाली संस्कृति के साथ पारंपरिक शारदा संस्कृति के वर्चस्व की टकराहट के हताश दिनों में ललद्यद ने एक आध्यात्मिक शक्ति, एक वत्सल माँ और एक जन कवयित्री  की तरह कश्मीर की उपत्यका में अपनी आवाज़ बुलंद की । एक आश्वासन की तरह। एक कौंध की तरह। एक समभाव की तरह।

ललद्यद ने अपने वाखों में भी शैव दर्शन के गूढ़ और दृष्टांतिक सिद्धांत मात्र नहीं बखाने। अपनी सृजनात्मक रचनाशीलता को गौण नहीं  होने दिया। उसकी कविता में जो बिंब विधान, रूपक, प्रतीक योजना या उपमान मिलते हैं, सब लोक-जीवन से लिए गये हैं । यहाँ तक कि उनके वाखों में शिव भी एक सजीव और सामान्य व्यक्ति के रूप में हमें मिलते हैं ।

वह जीवनानुभवों को, अपने बोध को शैव पृष्ठभूमि में स्वर देती हैं ।

आपने ललद्यद को भाषायी नवजागरण की पहली कवयित्री कहा है। ऐसा आप किस आधार पर कहते हैं?

एक बार दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले में जब प्रसंगवश डॉ. नामवर सिंह ने मेरे साथ ललद्यद पर बातचीत करते हुए मुझसे यह कहा था कि ललद्यद महान कवयित्री के अलावा  भारतीय भाषायी नवजागरण की प्रणेता हैं तो मैं दंग रह गया था।

यह संत कबीर से कोई तीन दशक पूर्व की घटना है । संस्कृत की जगह कश्मीरी भाषा में कविता कहना क्रांतिकारी बात थी। ऐसे कश्मीर में जहाँ ललद्यद की विरासत में संस्कृत की अविच्छिन्न परंपरा रही हो। समूचे भारतीय काव्यशास्त्र के आधार ग्रंथ जहाँ क्लासिकीय संस्कृत में लिखे गये हों। आचार्य वसुगुप्त के शिवसूत्रों से लेकर, आचार्य अभिनवगुप्त के विश्व प्रसिद्ध ‘तंत्रालोक’, आनंदवर्धन के ‘ध्वन्यालोक’ और कल्हण की राजतरंगिणी जैसे अनेक युग-प्रवर्तक ग्रंथ संस्कृत में रचे गये हों, वहाँ एक छोटे से गाँव की लड़की या पांपोर के साधारण से परिवार की बावरी अमर्यादित बहू मातृभाषा कश्मीरी में वाख कहकर संस्कृत की प्रतिष्ठा धूल धूसरित कर बैठे !

यह एक बड़ा कारण है कि इस विद्रोही आदि कवयित्री की तत्कालीन किसी ग्रंथकार ने नोटिस नहीं ली। यहाँ तक कि द्वितीय राजतरंगिणी के इतिहासकार पं जोनराज तक ने उसके नाम का सीधा उल्लेख तक न किया।

जो भी हो, ललद्यद ने चौदहवीं शताब्दी में कश्मीरी भाषा में वाख कहकर वर्तमान कश्मीरी साहित्य की बुनियाद रखी। वह कश्मीरी की आदि कवयित्री है । ‘कश्मीरी साहित्य का इतिहास’ (पृष्ठ 17) के विद्वान लेखक शशिशेखर तोष खानी के शब्दों में कहें तो  शितिकंठ के ‘महानय प्रकाश’ के बाद 14वीं शताब्दी की महान कवयित्री ललेश्वरी के ‘वाखों’ अर्थात् पदों में कश्मीरी काव्य की पहली धड़कन सुनाई पड़ती है।

देखा जाए तो ललद्यद ने कश्मीरी भाषा को साहित्यिक संस्कार दिया। और कश्मीरी साहित्य को ऐसी ऊँचाई दी जो आज सात शताब्दियों के बाद भी एक दुर्गम चुनौती की तरह है ।

उसके वाखों से सहज ही  सर्वव्यापी शैव सम्विति का प्रसार मातृभाषा कश्मीरी  में हुआ । उसकी बात सीधे जन-जन के हृदय को छू गयी।

आपका काव्य संग्रह ‘मैं ललद्यद’ अन्तत: अपने पाठकों को क्या संदेश देता है

यहाँ प्रसंगवश मुझे कश्मीरी साहित्य के वरिष्ठ  आलोचक मुहम्मद यूसुफ टेंग का ललद्यद के बारे में एक वक्तव्य याद आ रहा है । उनके शब्दों में, ” ललद्यद माउंट एवरेस्ट हैं । पिछले पाँच हज़ार साल में कश्मीर की संस्कृति और सभ्यता की एकमात्र प्रतिनिधि हैं ललद्यद। देखा जाए तो पूर्व में दो ही महान हस्तियाँ पैदा हुई हैं – रूमी और ललद्यद। रही बात नुंदऋषि की,वह तो ललद्यद का शिष्य था जो उसने अपनी कविता में माना भी है। इस तरह ललद्यद कश्मीर हैं और कश्मीर ललद्यद है।”

मेरे मन में विचार आया कि यदि टेंग साहब सच में ऐसा मानते हैं तो इन्होंने कश्मीर युनिवर्सिटी में शेख़ नुरुद्दीन वली उर्फ नुन्दॠषि की चेयर स्थापित करने से पहले ललद्यद चेयर स्थापित करवाने की बात क्यों नहीं रखी।

 इसके विपरीत जब यहाँ जम्मू में कुछ बरस पहले ‘नागराद अदबी संगम’ के तत्वावधान में निर्वासित कश्मीरी पंडित कवियों के सम्मान-समारोह के अवसर पर बोलते हुए आप ही ने यह कहा कि हमें  यहाँ जम्मू युनिवर्सिटी में ‘ललद्यद चेयर’ कायम करनी चाहिए तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ था। ललद्यद के साथ की गयी राजनीति का लंबा सिलसिला है ।

यहाँ फिर भी ‘ललद्यद को कश्मीर और कश्मीर को ललद्यद’ कहने के लिए मैं मुहम्मद यूसुफ टेंग का स्वागत  करता हूँ ।

ललद्यद के बारे में सोचने मात्र से हम उनके ऐसे विलग अनुभव-संसार में तथा उनके विषय में रचे बुने कथालोक में  पहुँच जाते हैं जहाँ उनका संघर्ष, सत्य, सौन्दर्य, कविता, स्वप्न और कश्मीरी शैव दर्शन की ऐसी सम्विति व्याप्त है कि आप अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते।

  • डॉ. अनीता शुक्ल, एसोसिएट प्रोफेसर
    कार्यालय का पता: हिन्दी विभाग, कला संकाय,  महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय बड़ौदा, वडोदरा-  390002, गुजरात, भारत।
    डाक पता: F-1-13, जलानंद टाउनशिप, गोरवा-रिफाइनरी मार्ग, पंचवटी, वडोदरा-390016, गुजरात, भारत।
    मोबाइल संख्या : 9428423594
    ईमेल: [email protected]
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