Tuesday, September 8, 2026
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आभासी रिश्ते, पास कोई नहीं

  •  नीलिमा शर्मा का लेख 

कभी कभी रात में फ़ोन को उल्टा रख देने के बाद भी उसकी रोशनी आँखों में बनी रहती है। संदेशों की आवाजाही थम जाती है, कमरा शांत हो जाता है, मगर दिन भर आए शब्द मन में चलते रहते हैं। किसी ने तस्वीर पर हृदय बनाया था, किसी ने शुभकामना दी थी, किसी ने बहुत दिनों बाद पुरानी तस्वीर खोजकर याद किया था। हम भी सबको उत्तर देते रहे और रात तक यह महसूस करते रहे कि आज तो कितने लोग हमारे साथ थे। फिर फ़ोन एक ओर रखकर जब कमरे में चारों तरफ देखते हैं तो पता चलता है कि उन चेहरों में से एक भी इस समय हमारे सामने नहीं है। कुर्सी खाली है, चाय ठंडी हो चुकी है और जिस आवाज की सचमुच जरूरत थी, वह हमारे पास कहीं नहीं है। तब मन में एक सवाल उठता है, क्या सचमुच हमारे बहुत सारे रिश्ते हैं या हमने  अपने फ़ोन  की कॉन्टेक्ट लिस्ट में बहुत सारे नाम जमा कर लिए हैं।

यह सवाल अब केवल मन की उदासी से उपजा सवाल नहीं रह गया है। दुनिया भर में अकेलेपन को लेकर सामने आ रहे आँकड़े चिंता पैदा करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2025 की सामाजिक जुड़ाव संबंधी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है। किशोरों और युवाओं में यह संख्या लगभग हर पाँच में से एक है। निम्न आय वाले देशों में स्थिति और गंभीर है, जहाँ लगभग हर चार में से एक व्यक्ति अकेलेपन का अनुभव करता है। रिपोर्ट के अनुसार अकेलापन केवल मन की स्थिति नहीं है, उसका संबंध शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से भी है और इसके प्रभावों से हर वर्ष लगभग 8 लाख 71 हजार मौतों का अनुमान लगाया गया है।

उधर हमारी आभासी दुनिया लगातार फैल रही है। भारत में वर्ष 2025 की शुरुआत तक लगभग 80 करोड़ 60 लाख लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे और करीब 49 करोड़ 10 लाख सामाजिक माध्यमों पर मौजूद थे। इन संख्याओं को अलग अलग व्यक्तियों की बिल्कुल सही संख्या नहीं माना जा सकता, क्योंकि एक व्यक्ति के कई खाते हो सकते हैं, फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि हमारी सामाजिक दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा अब पर्दे के भीतर बसता है।

हमारी पीढ़ी ने दोनों समय देखे हैं। कभी किसी का हाल जानने के लिए चिट्ठी लिखी जाती थी और उत्तर की प्रतीक्षा कई दिनों तक रहती थी। फिर मोबाइल फ़ोन आया। घर में उसकी घंटी बजती तो सबकी निगाह एक साथ उसकी ओर उठती। दूर बैठे किसी अपने की आवाज सुन लेना ही जैसे उससे मिल लेना था। फिर चल फ़ोन आया, इंटरनेट आया और उसके बाद सामाजिक माध्यम। दूरी घटती चली गई। अब कोई सात समंदर पार हो तो भी उसकी सुबह की तस्वीर हमारे सामने होती है। हमें पता रहता है कि वह कहाँ गया, क्या खाया, किसके साथ बैठा और किस दिन मुस्कराया। मगर यह जानना जरूरी नहीं कि रात को अकेले कमरे में बैठकर वह किस बात से परेशान था।किसी के शब्दों और तस्वीरों के माध्यम से हम किसी को जितना जान सकते हैं बस उतना ही जान पाते हैं जितना वह दिखाना बताना चाहता हैं I किसी की शारीरिक भाषा या चेहरे के उतरते बदलते भावों को देखकर उनके जीवन को देखना और उसके जीवन में होना, दोनों अलग बातें हैं।

अब  समाज का एक हिस्सा सामाजिक माध्यमों में चला गया है। पहले मोहल्ला था, अब  व्हाट्सएप्प / फेसबुक ग्रुप्स है। पहले  घर की बैठक में बातचीत होती थी, अब  बातचीत पर्दे पर  ज़ूम या गूगल मीट में होती है। पहले किसी की बेटी मायके आती थी तो पड़ोस की औरतों को पता होता था। अब व्हाट्सएप्प स्टेटस या फेसबुक/इंस्टाग्राम स्टोरी  देखकर पता चलता है कि वह आई हुई है। पहले किसी के घर बीमारी होती थी तो कोई कैसरोल में खिचड़ी लेकर पहुँच जाता था। अब संदेश आता है, अपना ध्यान रखना। पहले किसी के घर मृत्यु होती थी तो सब लोग पहुँचते थे। अब सूचना देखकर दो शब्द विनम्र श्रद्धांजलि या ॐ शान्ति लिख दिए जाते हैं।  वैसे अभी संवेदना समाप्त नहीं हुई है, लेकिन कई बार वह केवल शब्द बनकर रह जाती है।

फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि सामाजिक माध्यमों ने ही हमें  एकदम अकेला कर दिया है। इन माध्यमों ने दूर बैठे परिवारों को जोड़ा है, पुराने मित्रों को फिर मिलाया है और बहुत से ऐसे लोगों को अपने जैसे लोगों तक पहुँचाया है जिन्हें अपने आसपास वैसा साथ नहीं मिलता था। समस्या साधन में कम और उसके इस्तेमाल में अधिक है। जब आभासी उपस्थिति हमें वास्तविक साथ का विकल्प लगने लगे, तब परेशानी शुरू होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अकेलेपन के कई कारणों में जीवन में आने वाले बड़े बदलावों, कमजोर सामुदायिक संबंधों, अकेले रहने और डिजिटल माध्यमों के अत्यधिक या हानिकारक उपयोग को गिनाता है।

विश्व सुख रिपोर्ट में युवाओं के सामाजिक संबंधों को लेकर भी चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। वर्ष 2023 में दुनिया के लगभग 19 प्रतिशत युवा वयस्कों ने कहा कि उनके पास सामाजिक सहारे के लिए ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिस पर वे भरोसा कर सकें। यह अनुपात वर्ष 2006 की तुलना में 39 प्रतिशत अधिक था। अध्ययन में यह भी सामने आया कि हर वर्ष ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ रही है जिन्हें संकट के समय भरोसा करने वाला कोई अपना दिखाई नहीं देता। वैश्विक युवा आबादी के हिसाब से यह वृद्धि लगभग 17 लाख युवाओं प्रतिवर्ष के बराबर बैठती है।

हमारे भारत की तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। हमारे यहाँ परिवार और समुदाय की कई परतें अभी भी बची हुई हैं।  महानगरों को अगर न गिना जाए तो छोटे शहरों में त्योहारों पर घर भरते हैं, विवाह में दूर के रिश्तेदार पहुँचते हैं, बीमारी में अब भी कुछ ही चाहे कुछ  पड़ोसी हाल पूछते हैं और मृत्यु के समय कुछ लोग कंधा देने आते हैं। लेकिन इन परंपराओं का इतना बचे रहना अपने आप में पर्याप्त नहीं है।

समाज और रिश्ते भी घर की तरह होते हैं। उनमें रहना पड़ता है, उन्हें समय देना पड़ता है। कभी अपने फ़ोन की कॉन्टेक्ट लिस्ट  खोलकर देखिए। विद्यालय के दोस्त, कॉलेज के दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी, अलग अलग समूहों के साथी और वर्षों पहले मिले परिचित। फिर अपने आप से पूछिए, अगर आज रात मन या शरीर बहुत खराब हो जाए तो इनमें से कितने लोगों को बिना झिझक फोन किया जा सकता है। कितनों के घर जाकर कहा जा सकता है, मुझे थोड़ी देर तुम्हारे पास बैठना है। कितने लोग हमारे यह कहने पर कि मैं ठीक हूँ कहने पर भी हमारी आवाज सुनकर समझ पाएँगे कि हम ठीक नहीं हैं।

यहीं हमारे समय की असली कमी दिखाई देती है। हमने रिश्तों को बहुत सुविधाजनक बना लिया है। जन्मदिन है तो संदेश भेज दिया। नाराज हैं तो उत्तर देना बंद कर दिया। संबंध खत्म करना है तो ब्लॉक कर  दिया। किसी को याद करना है तो पुरानी तस्वीर पर हृदय बना दिया। किसी की उपलब्धि पर दो शब्द लिख दिए। किसी के दुःख में कह दिया, मजबूत रहो। हर भावना के लिए हमारे पास छोटे और तैयार वाक्य और इमोजी हैं, बस  हमारे पास समय  होकर भी नहीं हैई जबकि समय ही तो रिश्ते का सबसे सच्चा रूप है।

माँ दिन में तीसरी बार बार बच्चे को  फोन करती है तो उनको उसकी बेचैनी दिखाई नहीं देती, केवल उनकी  खाली बैठे होने की , बार बार कुछ न कुछ पूछने की आदत दिखाई देती है।  बुजुर्ग वही पुराना किस्सा फिर सुनाते हैं तो सबको को लगता है कि उन्हें याद नहीं कि यह बात पहले भी बता चुके हैं। सब यह भूल जाते हैं कि उन्हें कहानी नहीं, अपना कोई सुनने वाला चाहिए। पति या पत्नी शाम को पूछते हैं, दिन कैसा रहा, औरआजकल सब  आधा उत्तर देते हुए भी किसी दूसरे संसार में यानि सोशल मीडिया में अपने अकाउंट की खिड़की में देखते रहते हैं। घर में लोग होते हैं, मगर बातचीत धीरे धीरे कम होती जाती है। सबसे विचित्र अकेलापन वही है जिसमें आदमी अकेला होकर भी अकेला नहीं होता।

एक ही कमरे में चार लोग बैठे हैं। चारों अपनी अपनी दुनिया में हैं। माँ कुछ कहती है, बेटा आधा सुनता है। पत्नी कुछ पूछती है, पति देर से उत्तर देता है। बच्चा दादा की गोद में बैठा है, मगर उसका ध्यान सामने कार्टून देखने में है। दादा भी कान में हेडफोन लगाए कोई  पॉडकास्ट सुन रहे हैं I सब व्यस्त हैं, सबके पास कहने को कुछ है, फिर भी कोई किसी की पूरी बात नहीं सुन रहा। हमारे समय में देखना बहुत है, सुनना कम।

यह अकेलापन केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग 11.8 प्रतिशत बुजुर्ग भी अकेलेपन का अनुभव करते हैं। हमारे घरों में यह अकेलापन बहुत चुपचाप आता है। बच्चों के संदेश आते रहते हैं, त्योहारों पर बातचीत हो जाती है, परिवार के  ग्रुप में तस्वीर पर ढेरों हृदय मिल जाते हैं, फिर भी दोपहर के उस लंबे समय में जब घर शांत होता है, एक बूढ़ी माँ को किसी संदेश की नहीं, किसी के पास बैठने की  साथ चाय पीने की जरूरत होती है। उसे दवा की याद दिलाने वाले से अधिक अच्छा शायद वह लगेगा जो उसके साथ  धूप में बैठकर थोड़ी देर उसका बचपन सुन लिया जाए।

शायद हमें सामाजिक होने का अर्थ फिर से समझना होगा। सामाजिक माध्यम पर होना सामाजिक होना नहीं है। बहुत सारे फॉलोअर होना बहुत सारे रिश्तों का प्रमाण नहीं है। सामाजिक होना शायद यह है कि हमारी अनुपस्थिति किसी को दिखाई दे। हम दो दिन किसी  ग्रुप में न लिखें तो कोई पूछे, सब ठीक है। हम अस्पताल में हों तो कोई दवा और पौधा लेकर पहुँच जाए। हमारी माँ घर में अकेली हो तो पड़ोस का कोई दरवाजा खटखटाए। हमारे दुःख में कोई हमारी तस्वीर पर कुछ लिखने के बजाय हमारे पास बैठ जाए।

समाज वह जगह है जहाँ आपकी गैरमौजूदगी महसूस होती है। सामाजिक माध्यम वह जगह है जहाँ आपकी मौजूदगी दिखाई देती है। दोनों में अंतर बहुत बड़ा है। इसलिए सामाजिक माध्यम छोड़ने की जरूरत नहीं है। जरूरत है कि उसके बाहर का जीवन सूखने न दें। किसी पुराने मित्र के घर बिना किसी काम के चले जाएँ। माँ के साथ चाय पीते समय फ़ोन एक तरफ रख दें। पिता की पुरानी कहानी एक बार और सुन लें। पड़ोस में रहने वाली उस  आंटी जी का हाल पूछ लें जिससे वर्षों से केवल आते जाते मुस्करा रहे हैं। अपने बच्चे की बात पूरी सुनें। जीवनसाथी से केवल यह न पूछें कि आज क्या हुआ, कभी यह भी पूछें कि आज तुम्हारे मन में क्या था।

जीवन किसी फॉरवर्ड संदेश की तरह नहीं है जिसे पढ़कर आगे बढ़ गए। इसमें ठहरना पड़ता है। किसी की आँखों में देखना पड़ता है। किसी के दुख के पास बैठना पड़ता है। किसी की थकी हुई हथेली अपने हाथ में लेनी पड़ती है। किसी के घर की घंटी बजानी पड़ती है। हो सकता है आने वाले वर्षों में हमारे परिचितों की संख्या और बढ़े, तस्वीरों पर पसंद किए जाने के चिह्न और बढ़ें और कॉन्टैक्ट लिस्ट लंबी हो जाए। हमारी आभासी दुनिया और चमकदार हो जाए।हम आभासी दुनिया में बहुत प्रसिद्ध हो जाए,मगर डर यह है कि कहीं उस चमक में हम यह पहचानना न भूल जाएँ कि किसे हमारी तस्वीर पसंद है और किसे हमारी मौजूदगी।

क्योंकि बहुत देर रात जब फ़ोन की सारी रोशनियाँ बुझ जाएँगी, तब न कोई पसंद किया हुआ  इमोजी हमें पुकारेगा, न कोई ग्रुप हमारी चुप्पी सुन पाएगा। उस समय शायद हमें केवल एक आवाज चाहिए होगी, दरवाजे के बाहर से आती हुई, बिल्कुल साधारण, बिल्कुल अपनी…. “ जल्दी दरवाजा खोलो, मैं हूँ।”  “अरे आप” “मुझे पता था आप आओगे ही” और शायद उस क्षण हमें समझ आएगा कि रिश्तों की गिनती कभी कॉन्टैक्ट लिस्ट से नहीं होती थी। रिश्ते गिने नहीं जाते, निभाए जाते।

आज जरूरत आभासी दुनिया  के साथ साथ असली दुनिया में भी अपने फ़ॉलोअर्स बढ़ाने की है।

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8 टिप्पणी

  1. नीलिमा जी आपने एक संवेदनशील ज्वलंत समस्या का सटीक विश्लेषण किया है। सोशल मीडिया के कारण हम जितना पास आए हैं, उससे कहीं अधिक दूर हो गए हैं। अपनों से ही नहीं, अपने से भी। एक झूठे भ्रम के सहारे जी रहे हैं। हमारे इतने अपने हैं, सोच कर ख़ुश हो जाते हैं। कुछ दिन मीडिया से दूर रहें तो चार सौ में से चार ही पूछते हैं, आप ठीक थे? और तब अकेलापन और सालता है। यह सबके साथ है। सामाजिक व्यवस्था ठीक रहे इसके लिए सोचना बहुत ज़रूरी है। आपका आलेख ध्यान आकर्षित करता है। बहुत बढ़िया। बधाई आपको।

  2. आपका यह लेख हमारे समय की एक कड़वी सच्चाई को बहुत सहजता से सामने रखता है—कॉन्टैक्ट लिस्ट में नाम बढ़ने से रिश्ते नहीं बढ़ते। आभासी दुनिया हमें जोड़ती जरूर है, लेकिन असली अपनापन समय देने, साथ बैठने, सुनने और मुश्किल वक्त में दरवाज़े तक पहुँचने से बनता है। सच ही कहा है—रिश्ते गिने नहीं जाते, निभाए जाते हैं; हमें अपनी असली दुनिया में भी अपने फ़ॉलोअर्स बढ़ाने की जरूरत है।

  3. नीलिमा जी आपके महत्वपूर्ण विषय पर सार्थक आलेख लिखा है । सोशल मीडिया एडिक्टिव होता है ।रिश्तों परिवार, जरूरी काम और कई बार खुड़ के स्वास्थ्य की भी उपेक्षा कर व्यक्ति इसी में लगा रहता है । ये अकेलापन कम नहीं कर रहा है बल्कि बढ़ा रहा है । हम भीड़ में अकेले हैं ।

  4. स्त्रियाँ अपने सारे सुख अपना फर्ज समझकर बाँट बाँटकर खाली हो जाती हैं। जब उन्हें जरूरत होती है, कोई सराहे उन्हें। चार बातें कर उन्हें, उनका होना महसूस कराए, तब सब अपने अपने व्याकरण और भाषा में डूब चुके होते हैं।

    बहुत सुंदर और अनुभवपरक लिखा अपने। खूब खूब बधाई

  5. स्त्रियाँ अपने सारे सुख अपना फ़र्ज़ समझकर बाँट-बाँटकर ख़ाली हो जाती हैं। जब उन्हें ज़रूरत होती है कि कोई उन्हें सराहे, उनसे चार बातें करे, उन्हें उनके होने का एहसास कराए, तब तक सब अपने-अपने व्याकरण और भाषा में डूब चुके होते हैं।

    बहुत सुंदर और अनुभवपरक लिखा आपने। खूब-खूब बधाई!

  6. नीलिमा जी!

    आपका लेख,”आभासी रिश्ते, कोई पास नहीं” पढ़ा। वर्तमान की दृष्टि से लेख बहुत अधिक महत्वपूर्ण है।

    समकालीन जीवन की सबसे बड़ी या कहें सर्वाधिक प्रासंगिक विडंबना है यह। संचार के साधनों की यह आधुनिकता इंसान को रिश्तों और संवेदनाओं की गहराइयों से वास्तव में जिस तरह दूर ले जा रही है उसके परिणाम स्वरुप ही यह लेख लिखे जाने की जरूरत महसूस हुई। आभासी रिश्तों के विस्तार से स्वाभाविक रिश्ते धीरे-धीरे उपेक्षित होने लगे।
    संचार के साधन जितने अधिक आधुनिक होते गए ,वे अधिकाधिक सम्मोहित करते गये। वर्तमान में यह सम्मोहन वशीकरण की तरह काम कर रहा है। निश्चित रूप से यह चिंतनीय है।

    कांटेक्ट लिस्ट में बढ़ते नाम एक स्वप्निल सुख और सुकून की तरह हैं, एक मृग मरीचिका की तरह, जिसका पता किन्हीं दुष्परिणामों के बाद चलता है।

    युवाओं और किशोरों की मौत को लेकर आपके दिये आँकड़े वाकई चौंकाने वाले और गंभीर हैं।

    आपकी इस बात से हमारी भी सहमति है कि इस पीढ़ी ने जो देखा है और महसूस किया है वह परिवर्तन भविष्य के लिए स्वप्न की तरह होगा,लेकिन आपका यह लेख डिजिटल युग में संचार के बढ़ते साधनों का विरोध भी नहीं करता है। मनुष्य के वास्तविक साथ का,घटते रिश्तों, अकेलेपन, पारिवारिक संवाद और सामाजिक संवेदना को तकनीक-विरोधी दृष्टि से ही नहीं देखा है आपने,बल्कि आपने आभासी और वास्तविक दुनिया के बीच संतुलन की आवश्यकता महसूस करते हुए उस पर गंभीरता से विचार किया है।

    आपके लेख का शीर्षक *“आभासी रिश्ते, पास कोई नहीं”* शीर्षक ;लेख की पूरी संवेदना को बहुत प्रभावशाली ढंग से समेटता है।शीर्षक में ही विरोधाभास है। रिश्ते बहुत हैं –
    संपर्क-सूची लंबी है, सोशल मीडिया पर परिचितों की संख्या बड़ी है!
    कोई पास नहीं –
    लेकिन संकट की घड़ी में साथ दिखाई देने वाला कोई नहीं होता।

    लेख के अंत में—“रिश्ते गिने नहीं जाते, निभाए जाते हैं।” लेख के केंद्रीय भाव को तो सार्थक बनाता है। पर यह एक सूत्र वाक्य की तरह भी काबिले गौर है।

    प्रारंभ बहुत प्रभावशाली लगा-“रात में फोन उल्टा रख देने के बाद भी उसकी रोशनी आँखों में बनी रहना, संदेशों का आना, तस्वीरों पर हृदय बनना और फिर कमरे में चारों ओर देखने पर किसी का मौजूद न होना।”
    यह कथ्य यहाँ पर एक बड़ा प्रश्न,एक बड़ी चिंता खड़ी कर अकेलेपन में छोड़ देता है।
    लेख का यह आरंभ पाठक को अपने निजी अनुभवों से जोड़ता है।
    विशेष तौर पर “कुर्सी खाली है, चाय ठंडी हो चुकी है और जिस आवाज की सचमुच जरूरत थी, वह हमारे पास कहीं नहीं है।”

    ऐसे कथ्य लेख की भावात्मक दृष्य-नाट्य की तरह प्रभावशीलता को पुष्ट करते हैं।एक दृश्य मात्र से अकेलेपन का अनुभव करा देते हैं।

    आपका संतुलित दृष्टिकोण अकेलेपन का एकमात्र कारण मीडिया को ही नहीं मानता,बल्कि वह यह भी स्वीकार करता है कि डिजिटल माध्यमों ने दूर बैठे परिवारों को जोड़ने, पुराने मित्रों को मिलाने और समान रुचि वाले लोगों को एक-दूसरे तक पहुँचाने का काम भी किया है।

    *समस्या साधन से अधिक उसके इस्तेमाल में है।*

    आँकड़ों और अनुभव के सुंदर संयोजन यथा-
    “विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व सुख रिपोर्ट और भारत में इंटरनेट तथा सोशल मीडिया के उपयोग से जुड़े तथ्यपरक आँकड़ों का जिक्र लेख की सच्चाई की पुष्टि करता है।

    रोजमर्रा के जीवन में —”माँ का बार-बार फोन करना, बुजुर्ग का एक ही कहानी दोहराना, पति-पत्नी का आधा-अधूरा संवाद, बच्चे का दादा की गोद में होकर भी स्क्रीन में व्यस्त रहना…” भावुक कर गया।

    लेख का सबसे विचारोत्तेजक हिस्सा वह लगा जहाँ आप पूछती हैं कि-

    “क्या सोशल मीडिया पर मौजूद होना वास्तव में सामाजिक होना है?”

    “सामाजिक माध्यम पर होना सामाजिक होना नहीं है।”
    लेख का उपरोक्त☝️ कथ्य केंद्रीय वैचारिक पंक्तियों में से एक है!
    जिसके अनुसार सामाजिकता का प्रमाण फॉलोअर, लाइक या संपर्क-सूची नहीं है, बल्कि यह है कि हमारी अनुपस्थिति किसी को महसूस हो। वास्तव में समाज वह जगह है जहाँ उसे आपकी गैरमौजूदगी महसूस होती हो। “सामाजिक माध्यम वह जगह है जहाँ आपकी मौजूदगी दिखाई देती है।”

    यहाँ यह लेख सोशल मीडिया पर रिश्तों की वास्तविकता को मापने का सामाजिक माप बन जाता है।

    आपने बहुत बारीकी से दिखाया है कि कैसे हमारी संवेदनाएँ छोटे-छोटे तैयार वाक्यों और इमोजी में सिमट गई हैं।

    आपका ! जन्मदिन पर संदेश, उपलब्धि पर दो शब्द, दुःख में “मजबूत रहो”, तस्वीर पर हृदय इत्यादि उदाहरणों के बारे में कहना है कि इससे भावनाओं की अभिव्यक्ति आसान हुई है,लेकिन समय देना कठिन। निश्चित रूप से रिश्तों की वास्तविक पूँजी समय ही है।

    बुजुर्गों का अकेलापन लेखकीय दृष्टि से चिंतनीय है। जो सबसे अधिक मार्मिक लगा-“दोपहर के उस लंबे समय में जब घर शांत होता है, एक बूढी माँ को किसी संदेश का नहीं, किसी के पास बैठने की,किसी के साथ चाय पीने की जरूरत होती है।उसे दवा की याद दिलाने वाले से अधिक अच्छा शायद वह लगेगा कि उसके साथ धूप में बैठकर थोड़ी देर उसका बचपन सुन लिया जाए।”
    यहाँ “दवा” और “बचपन सुनना” दो अलग-अलग तरह की जरूरतों के प्रतीक हैं—एक शारीरिक देखभाल और दूसरी भावनात्मक उपस्थिति।

    चार लोगों के एक कमरे में बैठकर भी चार अलग-अलग दुनियाओं में मौजूद होने का दृश्य आज के परिवार की विडंबना को सामने रखती है।
    “घर में लोग होते हैं, मगर बातचीत धीरे-धीरे कम होती जाती है।”
    और फिर—
    “सब व्यस्त हैं, सबके पास कहने को कुछ है, फिर भी कोई किसी की पूरी बात नहीं सुन रहा।”
    यहाँ आपके कहने का अर्थ यह नहीं है कि “मोबाइल बुरा है” समस्या वास्तव में सुनने की क्षमता और समय देने की इच्छा की कमी की है।

    इस लेख का उद्देश्य सोशल मीडिया को छोड़ने का आग्रह नहीं करता बल्कि वास्तविक संदेश इससे कहीं अधिक संतुलित और मानवीय है कि
    *तकनीक का इस्तेमाल करें, लेकिन रिश्तों को तकनीक का विकल्प न बनने दें।*
    अगर फोन पर किसी की तस्वीर पसंद करते हैं तो उसके साथ उसके पास बैठना भी सीखें; शुभकामना संदेश भेजने के साथ समय भी दें; “कैसे हो?” पूछने के साथ उत्तर सुनने का धैर्य भी रखें।
    इसीलिए अंतिम पंक्ति
    *“आज जरूरत आभासी दुनिया के साथ-साथ असली दुनिया में भी अपने फ़ॉलोअर्स बढ़ाने की है।” महत्वपूर्ण है।*

    यहाँ “फॉलोअर्स” शब्द से अर्थ सोशल मीडिया से बाहर निकलकर वास्तविक जीवन में विश्वसनीय, आत्मीय और उपस्थित रिश्तों तक विस्तृत कर दिया गया है।
    लेख का मुख्य उद्देश्य तकनीक के दुरुपयोग से उत्पन्न दुष्प्रभावों से बचकर आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन की समस्या को सामने रखना है। *वास्तव में संपर्क और संबंध एक ही अर्थ नहीं हैं;उपस्थिति और सहभागिता भी एक नहीं हैं।*
    किसी भी लेख की सफलता इससे बड़ी क्या हो सकती है कि वह पाठक को केवल जानकारी न दे, बल्कि अपने जीवन की ओर देखने के लिए विवश कर दे।
    आभासी दुनिया हमें एक-दूसरे तक पहुँचा तो सकती है, लेकिन रिश्तों को जीवित रखने के लिये किसी को हमारे पास आकर बैठना जरूरी है।

    लेख के जो अंश कबीले गौर लगे-

    *जीवन किसी फॉरवर्ड संदेश की तरह नहीं है जिसे पढ़कर आगे बढ़ गए। इसमें ठहरना पड़ता है। किसी की आँखों में देखना पड़ता है। किसी के दुख के पास बैठना पड़ता है। किसी की थकी हुई हथेली अपने हाथ में लेनी पड़ती है। किसी के घर की घंटी बजानी पड़ती है।*

    जो सबसे अधिक मार्मिक लगा-

    *”माँ दिन में तीसरी बार बार बच्चे को फोन करती है तो उनको उसकी बेचैनी दिखाई नहीं देती, केवल उनकी खाली बैठे होने की , बार बार कुछ न कुछ पूछने की आदत दिखाई देती है।”*

    दुख होता है जब –
    *बुजुर्ग वही पुराना किस्सा फिर सुनाते हैं तो सबको को लगता है कि उन्हें याद नहीं कि यह बात पहले भी बता चुके हैं। सब यह भूल जाते हैं कि उन्हें कहानी नहीं, अपना कोई सुनने वाला चाहिये।*

    एक वृहद् उद्देश्य के तहत भावनात्मक धरातल पर संवेदनाओं से लिखा गया यह लेख कहीं प्रश्न पूछता है, कहीं समझाता है, कहीं आंकड़ों के माध्यम से, तथ्यात्मक विवरण के माध्यम से सचेत करता है,कहीं मौत के आंकड़ों से डराकर आने वाली पीढ़ी को विवेक का आईना दिखाकर गलत से सही पर लाने का प्रयास करता है ,कई पॉइंट बहुत मार्मिक हैं।
    नीलिमा जी! आपका पूरा लेख लघु कथा की सी विशेषताएँ रखता है।हर पैराग्राफ में ,हर वाक्य में ,कुछ भी ऐसा नहीं है जो अतिरिक्त हो। कई उद्धृत प्रसंगों में अभिव्यक्ति की तीव्रता अंदर तक मर्माहत करती है।
    अगर यह लेख किसी परीक्षा में लिखा गया होता तो हम दस में से ग्यारह नम्बर देते।
    बहुत बहुत बधाई आपको।
    आपकी कहानियों की तरह आपके लेख भी चमत्कृत कर रहे हैं।
    एक पाठक की हैसियत से यह लेख लेखन के क्षेत्र में आपकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
    भविष्य के लिये अशेष शुभकामनाएँ आपको।
    संपादक मंडल का तहेदिल से शुक्रिया इस लेख को पढ़वाने के लिये।

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