- नीलिमा शर्मा का लेख
कभी कभी रात में फ़ोन को उल्टा रख देने के बाद भी उसकी रोशनी आँखों में बनी रहती है। संदेशों की आवाजाही थम जाती है, कमरा शांत हो जाता है, मगर दिन भर आए शब्द मन में चलते रहते हैं। किसी ने तस्वीर पर हृदय बनाया था, किसी ने शुभकामना दी थी, किसी ने बहुत दिनों बाद पुरानी तस्वीर खोजकर याद किया था। हम भी सबको उत्तर देते रहे और रात तक यह महसूस करते रहे कि आज तो कितने लोग हमारे साथ थे। फिर फ़ोन एक ओर रखकर जब कमरे में चारों तरफ देखते हैं तो पता चलता है कि उन चेहरों में से एक भी इस समय हमारे सामने नहीं है। कुर्सी खाली है, चाय ठंडी हो चुकी है और जिस आवाज की सचमुच जरूरत थी, वह हमारे पास कहीं नहीं है। तब मन में एक सवाल उठता है, क्या सचमुच हमारे बहुत सारे रिश्ते हैं या हमने अपने फ़ोन की कॉन्टेक्ट लिस्ट में बहुत सारे नाम जमा कर लिए हैं।
यह सवाल अब केवल मन की उदासी से उपजा सवाल नहीं रह गया है। दुनिया भर में अकेलेपन को लेकर सामने आ रहे आँकड़े चिंता पैदा करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2025 की सामाजिक जुड़ाव संबंधी रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अकेलापन महसूस करता है। किशोरों और युवाओं में यह संख्या लगभग हर पाँच में से एक है। निम्न आय वाले देशों में स्थिति और गंभीर है, जहाँ लगभग हर चार में से एक व्यक्ति अकेलेपन का अनुभव करता है। रिपोर्ट के अनुसार अकेलापन केवल मन की स्थिति नहीं है, उसका संबंध शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से भी है और इसके प्रभावों से हर वर्ष लगभग 8 लाख 71 हजार मौतों का अनुमान लगाया गया है।
उधर हमारी आभासी दुनिया लगातार फैल रही है। भारत में वर्ष 2025 की शुरुआत तक लगभग 80 करोड़ 60 लाख लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे थे और करीब 49 करोड़ 10 लाख सामाजिक माध्यमों पर मौजूद थे। इन संख्याओं को अलग अलग व्यक्तियों की बिल्कुल सही संख्या नहीं माना जा सकता, क्योंकि एक व्यक्ति के कई खाते हो सकते हैं, फिर भी इतना तो स्पष्ट है कि हमारी सामाजिक दुनिया का बहुत बड़ा हिस्सा अब पर्दे के भीतर बसता है।
हमारी पीढ़ी ने दोनों समय देखे हैं। कभी किसी का हाल जानने के लिए चिट्ठी लिखी जाती थी और उत्तर की प्रतीक्षा कई दिनों तक रहती थी। फिर मोबाइल फ़ोन आया। घर में उसकी घंटी बजती तो सबकी निगाह एक साथ उसकी ओर उठती। दूर बैठे किसी अपने की आवाज सुन लेना ही जैसे उससे मिल लेना था। फिर चल फ़ोन आया, इंटरनेट आया और उसके बाद सामाजिक माध्यम। दूरी घटती चली गई। अब कोई सात समंदर पार हो तो भी उसकी सुबह की तस्वीर हमारे सामने होती है। हमें पता रहता है कि वह कहाँ गया, क्या खाया, किसके साथ बैठा और किस दिन मुस्कराया। मगर यह जानना जरूरी नहीं कि रात को अकेले कमरे में बैठकर वह किस बात से परेशान था।किसी के शब्दों और तस्वीरों के माध्यम से हम किसी को जितना जान सकते हैं बस उतना ही जान पाते हैं जितना वह दिखाना बताना चाहता हैं I किसी की शारीरिक भाषा या चेहरे के उतरते बदलते भावों को देखकर उनके जीवन को देखना और उसके जीवन में होना, दोनों अलग बातें हैं।
अब समाज का एक हिस्सा सामाजिक माध्यमों में चला गया है। पहले मोहल्ला था, अब व्हाट्सएप्प / फेसबुक ग्रुप्स है। पहले घर की बैठक में बातचीत होती थी, अब बातचीत पर्दे पर ज़ूम या गूगल मीट में होती है। पहले किसी की बेटी मायके आती थी तो पड़ोस की औरतों को पता होता था। अब व्हाट्सएप्प स्टेटस या फेसबुक/इंस्टाग्राम स्टोरी देखकर पता चलता है कि वह आई हुई है। पहले किसी के घर बीमारी होती थी तो कोई कैसरोल में खिचड़ी लेकर पहुँच जाता था। अब संदेश आता है, अपना ध्यान रखना। पहले किसी के घर मृत्यु होती थी तो सब लोग पहुँचते थे। अब सूचना देखकर दो शब्द विनम्र श्रद्धांजलि या ॐ शान्ति लिख दिए जाते हैं। वैसे अभी संवेदना समाप्त नहीं हुई है, लेकिन कई बार वह केवल शब्द बनकर रह जाती है।
फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि सामाजिक माध्यमों ने ही हमें एकदम अकेला कर दिया है। इन माध्यमों ने दूर बैठे परिवारों को जोड़ा है, पुराने मित्रों को फिर मिलाया है और बहुत से ऐसे लोगों को अपने जैसे लोगों तक पहुँचाया है जिन्हें अपने आसपास वैसा साथ नहीं मिलता था। समस्या साधन में कम और उसके इस्तेमाल में अधिक है। जब आभासी उपस्थिति हमें वास्तविक साथ का विकल्प लगने लगे, तब परेशानी शुरू होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अकेलेपन के कई कारणों में जीवन में आने वाले बड़े बदलावों, कमजोर सामुदायिक संबंधों, अकेले रहने और डिजिटल माध्यमों के अत्यधिक या हानिकारक उपयोग को गिनाता है।
विश्व सुख रिपोर्ट में युवाओं के सामाजिक संबंधों को लेकर भी चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। वर्ष 2023 में दुनिया के लगभग 19 प्रतिशत युवा वयस्कों ने कहा कि उनके पास सामाजिक सहारे के लिए ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिस पर वे भरोसा कर सकें। यह अनुपात वर्ष 2006 की तुलना में 39 प्रतिशत अधिक था। अध्ययन में यह भी सामने आया कि हर वर्ष ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ रही है जिन्हें संकट के समय भरोसा करने वाला कोई अपना दिखाई नहीं देता। वैश्विक युवा आबादी के हिसाब से यह वृद्धि लगभग 17 लाख युवाओं प्रतिवर्ष के बराबर बैठती है।
हमारे भारत की तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। हमारे यहाँ परिवार और समुदाय की कई परतें अभी भी बची हुई हैं। महानगरों को अगर न गिना जाए तो छोटे शहरों में त्योहारों पर घर भरते हैं, विवाह में दूर के रिश्तेदार पहुँचते हैं, बीमारी में अब भी कुछ ही चाहे कुछ पड़ोसी हाल पूछते हैं और मृत्यु के समय कुछ लोग कंधा देने आते हैं। लेकिन इन परंपराओं का इतना बचे रहना अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
समाज और रिश्ते भी घर की तरह होते हैं। उनमें रहना पड़ता है, उन्हें समय देना पड़ता है। कभी अपने फ़ोन की कॉन्टेक्ट लिस्ट खोलकर देखिए। विद्यालय के दोस्त, कॉलेज के दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी, अलग अलग समूहों के साथी और वर्षों पहले मिले परिचित। फिर अपने आप से पूछिए, अगर आज रात मन या शरीर बहुत खराब हो जाए तो इनमें से कितने लोगों को बिना झिझक फोन किया जा सकता है। कितनों के घर जाकर कहा जा सकता है, मुझे थोड़ी देर तुम्हारे पास बैठना है। कितने लोग हमारे यह कहने पर कि मैं ठीक हूँ कहने पर भी हमारी आवाज सुनकर समझ पाएँगे कि हम ठीक नहीं हैं।
यहीं हमारे समय की असली कमी दिखाई देती है। हमने रिश्तों को बहुत सुविधाजनक बना लिया है। जन्मदिन है तो संदेश भेज दिया। नाराज हैं तो उत्तर देना बंद कर दिया। संबंध खत्म करना है तो ब्लॉक कर दिया। किसी को याद करना है तो पुरानी तस्वीर पर हृदय बना दिया। किसी की उपलब्धि पर दो शब्द लिख दिए। किसी के दुःख में कह दिया, मजबूत रहो। हर भावना के लिए हमारे पास छोटे और तैयार वाक्य और इमोजी हैं, बस हमारे पास समय होकर भी नहीं हैई जबकि समय ही तो रिश्ते का सबसे सच्चा रूप है।
माँ दिन में तीसरी बार बार बच्चे को फोन करती है तो उनको उसकी बेचैनी दिखाई नहीं देती, केवल उनकी खाली बैठे होने की , बार बार कुछ न कुछ पूछने की आदत दिखाई देती है। बुजुर्ग वही पुराना किस्सा फिर सुनाते हैं तो सबको को लगता है कि उन्हें याद नहीं कि यह बात पहले भी बता चुके हैं। सब यह भूल जाते हैं कि उन्हें कहानी नहीं, अपना कोई सुनने वाला चाहिए। पति या पत्नी शाम को पूछते हैं, दिन कैसा रहा, औरआजकल सब आधा उत्तर देते हुए भी किसी दूसरे संसार में यानि सोशल मीडिया में अपने अकाउंट की खिड़की में देखते रहते हैं। घर में लोग होते हैं, मगर बातचीत धीरे धीरे कम होती जाती है। सबसे विचित्र अकेलापन वही है जिसमें आदमी अकेला होकर भी अकेला नहीं होता।
एक ही कमरे में चार लोग बैठे हैं। चारों अपनी अपनी दुनिया में हैं। माँ कुछ कहती है, बेटा आधा सुनता है। पत्नी कुछ पूछती है, पति देर से उत्तर देता है। बच्चा दादा की गोद में बैठा है, मगर उसका ध्यान सामने कार्टून देखने में है। दादा भी कान में हेडफोन लगाए कोई पॉडकास्ट सुन रहे हैं I सब व्यस्त हैं, सबके पास कहने को कुछ है, फिर भी कोई किसी की पूरी बात नहीं सुन रहा। हमारे समय में देखना बहुत है, सुनना कम।
यह अकेलापन केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग 11.8 प्रतिशत बुजुर्ग भी अकेलेपन का अनुभव करते हैं। हमारे घरों में यह अकेलापन बहुत चुपचाप आता है। बच्चों के संदेश आते रहते हैं, त्योहारों पर बातचीत हो जाती है, परिवार के ग्रुप में तस्वीर पर ढेरों हृदय मिल जाते हैं, फिर भी दोपहर के उस लंबे समय में जब घर शांत होता है, एक बूढ़ी माँ को किसी संदेश की नहीं, किसी के पास बैठने की साथ चाय पीने की जरूरत होती है। उसे दवा की याद दिलाने वाले से अधिक अच्छा शायद वह लगेगा जो उसके साथ धूप में बैठकर थोड़ी देर उसका बचपन सुन लिया जाए।
शायद हमें सामाजिक होने का अर्थ फिर से समझना होगा। सामाजिक माध्यम पर होना सामाजिक होना नहीं है। बहुत सारे फॉलोअर होना बहुत सारे रिश्तों का प्रमाण नहीं है। सामाजिक होना शायद यह है कि हमारी अनुपस्थिति किसी को दिखाई दे। हम दो दिन किसी ग्रुप में न लिखें तो कोई पूछे, सब ठीक है। हम अस्पताल में हों तो कोई दवा और पौधा लेकर पहुँच जाए। हमारी माँ घर में अकेली हो तो पड़ोस का कोई दरवाजा खटखटाए। हमारे दुःख में कोई हमारी तस्वीर पर कुछ लिखने के बजाय हमारे पास बैठ जाए।
समाज वह जगह है जहाँ आपकी गैरमौजूदगी महसूस होती है। सामाजिक माध्यम वह जगह है जहाँ आपकी मौजूदगी दिखाई देती है। दोनों में अंतर बहुत बड़ा है। इसलिए सामाजिक माध्यम छोड़ने की जरूरत नहीं है। जरूरत है कि उसके बाहर का जीवन सूखने न दें। किसी पुराने मित्र के घर बिना किसी काम के चले जाएँ। माँ के साथ चाय पीते समय फ़ोन एक तरफ रख दें। पिता की पुरानी कहानी एक बार और सुन लें। पड़ोस में रहने वाली उस आंटी जी का हाल पूछ लें जिससे वर्षों से केवल आते जाते मुस्करा रहे हैं। अपने बच्चे की बात पूरी सुनें। जीवनसाथी से केवल यह न पूछें कि आज क्या हुआ, कभी यह भी पूछें कि आज तुम्हारे मन में क्या था।
जीवन किसी फॉरवर्ड संदेश की तरह नहीं है जिसे पढ़कर आगे बढ़ गए। इसमें ठहरना पड़ता है। किसी की आँखों में देखना पड़ता है। किसी के दुख के पास बैठना पड़ता है। किसी की थकी हुई हथेली अपने हाथ में लेनी पड़ती है। किसी के घर की घंटी बजानी पड़ती है। हो सकता है आने वाले वर्षों में हमारे परिचितों की संख्या और बढ़े, तस्वीरों पर पसंद किए जाने के चिह्न और बढ़ें और कॉन्टैक्ट लिस्ट लंबी हो जाए। हमारी आभासी दुनिया और चमकदार हो जाए।हम आभासी दुनिया में बहुत प्रसिद्ध हो जाए,मगर डर यह है कि कहीं उस चमक में हम यह पहचानना न भूल जाएँ कि किसे हमारी तस्वीर पसंद है और किसे हमारी मौजूदगी।
क्योंकि बहुत देर रात जब फ़ोन की सारी रोशनियाँ बुझ जाएँगी, तब न कोई पसंद किया हुआ इमोजी हमें पुकारेगा, न कोई ग्रुप हमारी चुप्पी सुन पाएगा। उस समय शायद हमें केवल एक आवाज चाहिए होगी, दरवाजे के बाहर से आती हुई, बिल्कुल साधारण, बिल्कुल अपनी…. “ जल्दी दरवाजा खोलो, मैं हूँ।” “अरे आप” “मुझे पता था आप आओगे ही” और शायद उस क्षण हमें समझ आएगा कि रिश्तों की गिनती कभी कॉन्टैक्ट लिस्ट से नहीं होती थी। रिश्ते गिने नहीं जाते, निभाए जाते।
आज जरूरत आभासी दुनिया के साथ साथ असली दुनिया में भी अपने फ़ॉलोअर्स बढ़ाने की है।

नीलिमा जी आपने एक संवेदनशील ज्वलंत समस्या का सटीक विश्लेषण किया है। सोशल मीडिया के कारण हम जितना पास आए हैं, उससे कहीं अधिक दूर हो गए हैं। अपनों से ही नहीं, अपने से भी। एक झूठे भ्रम के सहारे जी रहे हैं। हमारे इतने अपने हैं, सोच कर ख़ुश हो जाते हैं। कुछ दिन मीडिया से दूर रहें तो चार सौ में से चार ही पूछते हैं, आप ठीक थे? और तब अकेलापन और सालता है। यह सबके साथ है। सामाजिक व्यवस्था ठीक रहे इसके लिए सोचना बहुत ज़रूरी है। आपका आलेख ध्यान आकर्षित करता है। बहुत बढ़िया। बधाई आपको।
नमस्ते दीदी
आपको मेरा लिखा पसंद आया, शुक्रिया
नीलिमा जी आपके महत्वपूर्ण विषय पर सार्थक आलेख लिखा है । सोशल मीडिया एडिक्टिव होता है ।रिश्तों परिवार, जरूरी काम और कई बार खुड़ के स्वास्थ्य की भी उपेक्षा कर व्यक्ति इसी में लगा रहता है । ये अकेलापन कम नहीं कर रहा है बल्कि बढ़ा रहा है । हम भीड़ में अकेले हैं ।
शुक्रिया वंदना जी