वैवाहिक जीवन में सुख का सबसे सरल सूत्र मैं आपको बता देता हूँ,पत्नी के वॉलेट में पासवर्ड सहित एक प्लैटिनम क्रेडिट कार्ड रख दीजिए और घर में भरपूर आलमारियाँ बनवा दीजिए। या यूँ कहें कि घर नहीं, आलमारियों का ही घर बना दीजिए।
वे सभी दंपत्ति सचमुच सुखी हैं, जिन्होंने मकान बनवाते समय पत्नी की आलमारी-दृष्टि को गंभीरता से लिया। डिज़ाइन पत्नी की पसंद का, ऊँचाई छत तक, और संख्या इतनी कि गिनती भूल जाए। दिन में दस बार डिज़ाइन बदलवाने पर यदि आप परेशान हो रहे हैं, तो समझ लीजिए आप अभी गृहस्थी के प्रारंभिक चरण में हैं। मेरे यहाँ तो दो आर्किटेक्ट केवल इस प्रश्न पर बदले जा चुके हैं कि “बाथरूम में आलमारी कैसे निकालें?” एक ने तो यह भी कह दिया कि ड्रॉइंग रूम में एक ही आलमारी काफी होगी। उस दिन से वह आर्किटेक्ट हमारे जीवन से स्थायी रूप से निष्कासित है।
श्रीमती जी का मानना है कि छत तक बिना आलमारियों की दीवार वैसी ही अधूरी लगती है, जैसे बिना कढ़ाई की साड़ी। आलमारियाँ केवल फर्नीचर नहीं, एक दार्शनिक अवधारणा हैं,सर्वव्यापी। बेड के नीचे, सोफ़े के भीतर, ड्रेसिंग टेबल के पीछे,जहाँ हाथ डालो, आलमारी। लगता है आलमारी नहीं, ‘अलमाइटी’ है,हर जगह मौजूद, फिर भी हमेशा कम।
मेरी नज़र में घर आलमारियों से भरा है, लेकिन श्रीमती जी की दृष्टि में एक भी पर्याप्त नहीं। यह ठीक द्रष्टा और दर्श्य का वही दार्शनिक भेद है,जो दिखना है, वह देखने वाले पर निर्भर करता है। नतीजा यह है कि हमें दूसरी मंज़िल बनवानी पड़ रही है, केवल इसलिए कि पहली मंज़िल की सारी आलमारियाँ भर चुकी हैं। रात के अँधेरे में मैं अक्सर किसी न किसी आलमारी से टकराकर यह महसूस करता हूँ कि गृहस्थी भी एक तरह का योग है,संतुलन का अभ्यास।
जब बेडरूम बना था, तब चार आलमारियाँ दीवारों में फिट करवाई गई थीं। आश्वासन मिला था,“एक तुम्हारी, एक मेरी, और दो भावी बच्चों की।” पर भावी बच्चे तो बड़े हो गए, उनसे पहले ही उनकी हिस्सेदारी पर श्रीमती जी का अधिग्रहण हो चुका था।
एक आलमारी खोलिए, तो लगता है जैसे पूरा साड़ी-शोरूम खुल गया हो। शो-रूम का भ्रम बनाए रखने के लिए अंदर स्पॉट लाइट्स तक लग चुकी हैं। किटी पार्टी में सहेलियों को आलमारी दिखाना उनका प्रिय शगल है। समस्या तब होती है जब किसी समारोह में जाना हो। जैसे ही आलमारी खुलती है, दस-पंद्रह साड़ियाँ पैरों में गिर पड़ती हैं,मानो निवेदन कर रही हों, “इस बार मुझे पहन लो बहिन ।” कोई साड़ी दो साल से अलमारी में कैद होने की पीड़ा सुना रही होती है, तो किसी को पड़ोस की वीणा के कारण आजीवन कारावास की सज़ा मिल चुकी होती है,“सेम डिज़ाइन पहन ली थी।”
श्रीमती जी के मोबाइल में साड़ी-विक्रेताओं के इतने नंबर हैं, जितने मेरे फोन में रिश्तेदारों के नहीं। कॉल आते हैं,“नई साड़ी आई है, यूनिक है।” जवाब मिलता है,“पिछली बार धोखा दिया था। यूनिक का एक्स्ट्रा पैसा लिया था और वैसी समे सादी तुमने मेरी प्रतिद्वंदी वीणा को भी दे दी थी ।”
स्थिति यह है कि मेरी अपनी आलमारी में मुझे केवल एक शेल्फ़ नसीब है। बाकी में जूलरी और एक्सेसरीज़ विराजमान हैं। जब मैंने दोबारा किताबें पढ़नी शुरू कीं, तो सुझाव आया,“किताबों के लिए अलग आलमारी क्यों नहीं मंगवा लेते?”
मैं भावुक हो गया। आलमारी आई, किताबें सजीं। चार दिन बाद आलमारी खोली, तो देखा,किताबें साड़ियों में लिपटी बैठी हैं। घूँघट हटाकर किताबों को छुड़ाना पड़ा। ऐसा लगा मानो साहित्य का चीरहरण कर रहा हूँ। शिकायत पर प्रश्न आया,“तो साड़ियाँ कहाँ रखूँ?”
अब मैंने एक तरकीब निकाली है। अपने चेंबर में किताबों के लिए अलग आलमारी लगवाई है। पढ़ी हुई किताबें पोटली में बाँधकर ऊपर रख देता हूँ। जब तक चुनरियाँ वहाँ तक नहीं पहुँचतीं, खुद को सुरक्षित मानता हूँ।
नए मकान के गृहप्रवेश का निमंत्रण वास्तव में श्रीमती जी के लिए होता है,आलमारियों के भूत, भविष्य और वर्तमान पर चर्चा के लिए। वे अलमारी विशेषज्ञ हैं। जहाँ किसी का विचार भी नहीं पहुँचता, वहाँ भी आलमारी की संभावना खोज लेती हैं।
कभी-कभी मुझे लगता है कि आलमारियों के बीज आने चाहिए। दीवारों पर छिड़क दो, पानी दो, और आलमारियाँ उग आएँ। इंटीरियर का खर्च भी बचे।
हाल ही में मैं किंडल पर किताब पढ़ रहा था। श्रीमती जी ने गंभीर सुझाव दिया,“किताबें डिजिटल हो गईं, साड़ियाँ भी हो जानी चाहिए। डाउनलोड करो, पहन लो, फिर अपलोड कर दो। आलमारी की झंझट ही खत्म।”
विचार बुरा नहीं है। AI का ज़माना है,शायद कभी संभव हो जाए। तब तक हम आलमारियों के इस जंगल में रास्ता बनाकर चलने की कोशिश कर रहे हैं।

- डॉ मुकेश असीमित
