9 बजने वाले थे। 10 बजे निकलना था। मैंने तैयार होने के लिए अलमारी खोली। सभी कुछ वैसे ही रखा था।
तीन रंग की चूड़ियाँ, सफेद सलवार कुर्ता और तिरंगा दुपट्टा, तिरंगी बिंदी और शैव्या द्वारा विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए तिरंगे झुमके, जो मेरे कार्यक्रम की बात सुनते ही शैव्या ने पत्थर और कार्ड पेपर से खुद बना कर दिए थे ।
“यही पहनना… खूब जमेंगे तुम पर” उसका आग्रह मैं वैसे भी नहीं टाल सकती थी… खास तौर पर इस कार्यक्रम के लिए।
सच कहूँ तो मेरी डूबने को तैयार नौका को पतवार भी उसी ने दी थी। अभी भी सबकुछ सपने सा लगता है।
“आरती जी अभी तीन महीने हैं आपके पास, खूब जोशपूर्ण स्पीच तैयार करिएगा। आज कहाँ से कहाँ पहुँच गया है देश! विज्ञान में, विकास में, और विदेशों में भारत की छवि के रोज नए कीर्तिमान रचे जा रहे हैं। आखिर ये गर्व करने का दिन है” कार्यक्रम प्रबंधक आशीष जी ने जब मुझसे ये कहा था तब मेरे अंदर भी जोश भर गया था।
आशीष जी से मेरा कोई परिचय नहीं था। वे फेसबुक पर मेरी फ्रेंड लिस्ट में भी नहीं थे। कोविड के बाद से शुरू हुए तमाम ऑनलाइन कार्यक्रमों में मेरे वक्तव्य सुनकर उनके द्वारा मुझ पर भरोसा कर के मेरा चयन किया जाना मेरी ज़िम्मेदारी को बढ़ा रहा था।
मैंने भी बड़े मन से शुरू किया था लिखना। अपना वक्तव्य नारी केंद्रित रखने की सोची थी। वे भी आम जीवन से जुड़ी जमीनी कथाएँ। इस खास कार्यक्रम के लिए ना जाने कितनी किताबें पढ़ीं थीं। इंटरनेट पर कितने सर्च किए थे। आँख-कान की रडार से कितनी जिंदगियों से संपर्क साधा था।
आखिरकार मेरे लिए भी ये खास दिन था। स्वतंत्रता दिवस पर एक बड़े कार्यक्रम में, जहाँ प्रतिष्ठित गणमान्य श्रोता हों, और मंच पर मेरे अलावा देश के नामी-गिरमी वरिष्ठ साहित्यकार हों, मुझे बुलाया जाना मेरे लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था। इसीलिए मैं तैयारी में कोई कमी नहीं छोड़ना चाहती थी।
मेरा उल्लास दोहरा था, क्योंकि मुझे लग रहा था कि वक्तव्य तैयार करते-करते सशक्त नायिका पर मेरे कुछ नोट्स भी तैयार हो जाएंगे, जिस पर मेरा अगला उपन्यास आधारित था, जिसे मैं पिछले पाँच सालों से लिखने की कोशिश कर रही थी। जो बार-बार लिखते-लिखते छूट जाता था ।
अब जीतेगी मेरी नायिकाएँ और दुनिया की तमाम स्त्रियाँ।
प्रेरणा ने आशा की लौ को प्रदीप्त कर दिया। उद्धरण वक्तव्य में अपनी जगह बनाने लगे। जिनमें कुछ अतीत से निकले थे और कुछ भविष्य के गर्भ से जन्म लेने वाले थे।
मेरी अंगुलियाँ कीबोर्ड पर थिरक उठी थीं। एक प्रतिष्ठित कार्यक्रम में वक्तव्य देती नायिका और करतल ध्वनि से स्वागत करता पूरा ऑडिटोरियम।
पर वक्त की कहानी कुछ और थी।
कार्यक्रम से ठीक 15 दिन पहले आशीष जी का फिर फोन आया, “आरती जी, एक बड़ी खबर देनी है। मंत्री निपुन प्रदेशी जी की भी स्वीकृति मिल गई है। ये हमारे कार्यक्रम और संस्था के लिए बहुत बड़ी बात है।”
खुशी में मेरे होंठ आधे ही खुले थे कि…
“हाँ! अब थोड़ी फेर-बदल की गई है। अब निपुन जी का कद देखते हुए देखते हुए आपका समय 5-6 मिनट का कर दिया गया है। समय का ध्यान रखिएगा। क्योंकि उसके बाद लंच भी है। और हम चाहते हैं कि निपुन जी लंच करके ही जाएँ।”
“जी… ज़रूर,” कहते हुए मैंने फोन रख दिया।
पाँच वक्ता उसमें अकेली स्त्री मैं | उसको भी समय मात्र 5 मिनट| नाममात्र प्रतिनिधित्व।
20 मिनट के वक्तव्य को काट-छाँट कर 5 और 4 मिनट के दो ड्राफ्ट बनाने थे, ताकि अगर समय एक- दो मिनट और भी कम मिले तो भी अपनी बात प्रभावी ढंग से रख पाऊँ। पर मन था कि इस ऑपरेशन के लिए तैयार ही नहीं हो रहा था।
वहीं… एक और झटका मेरी प्रतीक्षा में था।
मात्र 15 दिन पहले सोशल मीडिया पर कार्यक्रम के कार्ड के शेयर किए जाते ही जैसे हंगामा हो गया। हर दूसरी पोस्ट पर मेरे नाम का चर्चा था।
“कार्यक्रम में इतने वरिष्ठों के बीच आरती का चयन कैसे हो गया?” आखिर एक चर्चित उपन्यास और तीन कविता संग्रह लिखने वाली आरती ने ऐसा क्या उखाड़ लिया है, जो उसका चयन किया गया है?”
“अगर युवा प्रतिनिधित्व भी है तो चवालीस साल की आरती आखिर युवा कैसे मान ली गई? क्या हो युवा की परिभाषा?”
दोस्तों और जानकारों की बधाइयों के बीच में उड़ते हुए ताने भी आए थे।
“आरती से ऐसी उम्मीद नहीं थी। हम तो उसे सीधा-सादा समझते थे।”
“अरे! आशीष जी के बारे में आप नहीं जानती। सुंदर महिला को उपकृत करने का कोई मौका छोड़ते नहीं हैं।“
“अब आशीष जी को भी क्या दोष दें, जब ये महिलाएँ नाम, सम्मान, और मंच के लिए…।“
उफ़! मेरी उम्र, मेरी योग्यता, और मेरे चरित्र पर भी सवाल दागे जा रहे थे? दबे छुपे ये खबरे मुझ तक भी आ गईं थीं कि ऐसा कहने वालों में मेरी साहित्यिक सखी रश्मिका भी थी, जिससे कहानियों पर लंबी चर्चा होती थीं । जिसके साथ ही मैं इक्का-दुक्का कार्यक्रमों में जाती थी। वह तो मुझे अच्छे से जानती थी… फिर?
मेरा मन हुआ कि जवाब में एक लंबी-चौड़ी पोस्ट लिखूँ? पर क्या फायदा? जब लोग अपने झूठ के आईने से ही दुनिया देख रहे हों? हमने योग्य से योग्य स्त्री की सफलता के पीछे एक लिजलिजा कारण खोज लिया है।
ना जाने क्यूँ कार्यक्रम को जैसे-तैसे निपटा कर लिखना छोड़ देने का ख्याल मेरे मन पर बार-बार हावी होने लगा? शायद थक गई थी, लॉबी, गुट, समूह, संप्रदाय झेलते-झेलते। क्या कहूँ इसे- संवेदनशील लोगों की असंवेदनशील अकुलाहटें। यहाँ तक भी कितनी मुश्किल से आईं थी। कितने ताने, कितने दंश, कितना विरोध… आसान तो नहीं रहा… क्यूँ लोग मेरे पीछे…?
एक कार्यक्रम के लिए इतना मूल्य? विचारों ने विचारों को झटका।
अपमान, निराशा, क्रोध को ज़ब्ज कर मैंने लैपटॉप खोला और पिछली कहानी को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
जहाँ नायिका ने किसी भी तरह के आरोपों के आगे झुकने से इंकार कर दिया था। भरी सभा में उसने एलान करते हुए था, “तुम्हारे कहने पर मैं अपना रास्ता नहीं बदलूँगी… जिनका शौक अंगुलियाँ उठाना है, उनकी अंगुलियाँ या तो वक्त के साथ अकड़ कर पत्थर हो जाएँगी या खुद ब खुद झुक जाएँगी।”
पर… मन अपने ही शब्दों से इतर अतीत की यात्रा पर निकल गया।
जिंदगी का कोई सुखद अध्याय कोई पिछला अध्याय भले ही ना खोलता हो, पर दुख में बड़ा एका होता है… हर बार पुराने दुख समेट लेता है।
कॉलेज के दिन रह-रह कर मन पर दस्तक दे रहे थे। जब वायवा बढ़िया होने की बात मैंने सहपाठी राजीव को बताई थी तो उसने होंठ तिरछे कर के कहा था, “तुम्हारा तो अच्छा होना ही था, बस एक बार मुस्कुरा देतीं.. नंबर तो यूँही दे देता। नंबरों का टोंटा तो हम लोगों का रहता है जी। ”
‘राजीव, तुम भी…” एक धक्का लगा था। घर आकर कितना रोई थी, पर पिताजी से अपना दुख नहीं बाँट सकती थी। वे मनु संहिता पर अटके थे… जहाँ स्त्री के लिए कोई वर्ण नहीं था। उसे तो पानी होना था, हर आकार, हर स्वरूप में ढलने के लिए।
माँ की आँखों का पानी प्रेरणा बनकर मेरी आँखों में उतरा था। माँ उमर भर नदी रहीं, पर मैंने उस नदी के पानी को अंजुली में भरकर सागर होने का संकल्प लिया था। पढ़ने का भूत सवार हो गया था। नंबरों से मेरी मार्कशीट्स भरने लगीं थी और ट्रॉफ़ीज़ से अलमारी। मैं कामयाब होकर ये कहानी बदलना चाहती थी।
अफसोस! पिताजी का सपना मेरे सपने के ऊपर हावी हो गया। एक ऐसा छाता बन कर सवार हो गया, जिसने मेरे सपनों की सारी धूप रोक ली।
पिताजी का सपना मेरी अच्छे घर में शादी थी। एक ऐसा कर्तव्य जिसे पूरा किए बिना उन्हें ईश्वर के दरबार में हाज़िरी नहीं मिलेगी। उनके हिसाब से नौकरी, नाम, पैसा से कहीं अधिक प्यार करने वाला साथी बहुत जरूरी होता है, जीवन के लिए। ये अलग बात है कि माँ को इनमें से कुछ नहीं मिला था। उससे भी अलग बात है कि उन्होंने कुछ कभी चाहा ही नहीं। उनकी चाहना के दाँत बचपन में ही तोड़ दिए गए थे। वे परिभाषाओं को ही ओढ़ती, बिछाती, तहाती धरती रहीं ताउम्र।
और मैं… मुझे?
सास और ददिया सास की ज़िम्मेदारी के बीच साल भीतर गोद में आई रूपाली… मेरी डिग्री कौन सी अलमारी में रखी है, ये भी याद नहीं रहा। रूपाली जब थोड़ी बड़ी हुई, तो शब्द किसी निर्झर की तरह फूटे थे, जो मुझे अपने प्रवाह में बहाए लिए जा रहे थे।
पर आज… आज इन आरोपों से उपजा दुख साकेत से भी नहीं बाँट सकती थी।
उनका एक ही तर्क होता, “लिखना छोड़ भी दो, यार!”
“मतलब?” मैं पलटकर पूछती।
“मेरे कहने का मतलब है कि, जब तुम्हें इतना परेशान देखता हूँ, तो लगता है कि कहाँ इन झंझटों में पड़ गईं हो। तुम तो वैसे ही घर की रानी हो… और मेरे दिल की भी।” साकेत अपनी उठी हुई त्यौरियों को मुस्कुराहट में बदल देते।
और मैं “त्रिया चरित्रम, पुरुष भाग्यम देवो न जानम” को “पुरुष चरित्रम, स्त्री भाग्यम देवो न जानम” के संदर्भों में समझने का प्रयास करती। शायद स्त्री लिखती तो यही लिखती।
साकेत के शब्दों की वर्क यूँही चढ़ती-हटती रहती। और मैं शब्दों से उनका मन टटोलती रहती-
“ये सब क्या है आरती! थक हार कर जब ऑफिस से घर आओ, तो घर कबाड़ खाने की तरह बिखरा मिलता है। जहाँ देखो, किताबें, लैपटॉप, नोटबुक, बिखरी पड़ी रहती हैं। घर को किताबघर बना रखा है।” उस रोज सुबह-सुबह टूर से लौटकर आए साकेत ने पलंग पर मेरी किताबों को देखकर चिल्लाते हुए कहा था।
“वो लिखते-लिखते… हटाती हूँ, बस दो मिनट” मैंने जल्दी-जल्दी पलंग पर बिखरी किताबें हटाते हुए कहा।
“कभी अम्मा के पास भी बैठ लिया करो, क्या हर समय किताबों में जूझती रहती हो।”
“बैठती तो हूँ साकेत, शाम का समय अम्मा और रूपाली को पार्क ले जाती हूँ, तब तो पूरा समय उन्हीं का होता है। फिर चलते-फिरते दिन में भी बातें हो ही जाती हैं।” मैंने अपना तर्क देने की कोशिश की थी।
“रहने दो, रहने दो, जब अपना बुढ़ापा आएगा, तब पता चलेगा कि अकेलापन क्या होता है। पूरे दिन भर में केवल एक घंटा है तुम्हारे पास… बस। और रूपाली की तो तुम बात ही ना करो। मैथ्स में बस 24 नंबर आए हैं, उसके 30 में। शर्मा जी की बेटी, तीस में तीस लाई है। मैंने तो कह दिया शर्मा जी से, आप भाग्यशाली हैं भाई साहब! भाभी जी बच्ची को पढ़ाने का पूरा ध्यान रखती है।”
मैं पलट कर कहना चाहती थी कि, ‘ऑफिस से आने के बाद तुम भी तो अम्मा के पास बैठ सकते हो ना साकेत, पर तुम तो घर आकर मोबाइल और टी. वी. में ही लगे रहते हो?” और रूपाली… क्या तुम्हें ये भी याद नहीं कि इस बार मैथ्स के पेपर के दिन रूपाली को तेज़ बुखार था, बच्ची ने फिर भी कितना अच्छा किया है। और हाँ! शर्मा जी की पत्नी बच्चों पर बहुत ध्यान देती हैं, तुम्हारी तारीफ़ सही है पर मैं भी शैव्या के पति के उसके हर कदम पर साथ खड़े होने से बहुत इंप्रेसड हूँ साकेत।”
पर नहीं कहा, पहले कई बार कह कर देख चुकी हूँ। ‘नक्कारखाने में तूती की आवाज़’ से बढ़कर कभी साबित नहीं हुआ है कुछ भी कहना।
शायद इसीलिए कहने से बेहतर मुझे गुस्से को ज़ब्ज कर किसी कहानी में लग जाना लगने लगा था। लिखना मेरा जूनन था, या खुद को खाली करने का जरिया, नहीं पता। पर शब्दों में मुझे माँ की गोद सा सुकून मिलता था।
उस दिन भी बुझे कदमों से साकेत को चाय का प्याला थमाकर मैं फिर लैपटॉप के पास लौट आई, लिखने की जगह पुरानी कहानियों के प्रूफ देखने लगी।
अचरज! मेरी नायिकाएँ जिरह उतारू रहती थीं… कैरियर बनाए बिना नहीं करूँगी शादी। आर्थिक स्वतंत्रता सबसे जरूरी है स्त्री के लिए। क्यों उसका काम पति की नज़र में सम्मानित नहीं है?…”
अपनी ही पुरानी कहानी पर नज़र चली गई नायिका की माँ दमाद से कह रहीं थीं, बिटिया को लिखना पसंद है लाला जी, तो काहे मुँह बिचकात हो, आपकी सेवा टहल में तो कोई कमी-बेसी नाहीं राखत है।”
“जी, माँ जी, आगे से ध्यान रखूँगा” सर झुका कर कहने वाले दामाद को बेटे के रूप में ढलते देख खुशी के आँसू छलक आए थे।
कहानी से निकली तो अम्मा की किसी से फोन पर बात करने की आवाज़ सुनाई दी।
“किसी का कुछ पता चलत है क्या?” “भाग में जो लिखा होत है झेलना ही पड़त है।” “यही तो…”
अम्मा की आवाज़ से लग रहा था कि फोन के दूसरे सिरे पर कोई शुभ समाचार नहीं है। मैं चुपचाप उनके पास खड़ी हो गई ।
“क्या हुआ?” अम्मा के फोन रखते ही मैंने पूछा ।
“अरे! आपन गाँव की चंदेश्वरी की बिटिया राजबाला नाहीं रही। ब्याह के बाद जाने कौन रोग पकड़ लिया, ना हँसती, ना ठीक से खाती। बीमारी बढ़ी तो घरै पठाए गए। कहाँ चंदरेश्वरी रोवत राहत थी कि, ह्मरे सामने बिटिया के हाथ पीले हो जाएँ। अब देखो, सामने बिटिया ही चली गई। अब तो, औलाद का दुख छाती पर ले के ही ऊपर जाना है।” बताते-बताते अम्मा ने अपने आँसू पोंछे। मैं कुछ देर उनके पास बैठी रही। पीठ पर हाथ फेरते हुए कुछ कहने का भी मन नहीं हुआ।
दुख थिराने में समय लगता है।
दोपहर हो रही थी। मैं अम्मा के लिए खाना लेने किचन में चली गई। खाना परोसने के लिए अलमारी से थाली निकाल रही थी कि पीछे से माँ की तेरहवीं में मिली ट्रे दिखाई दी।
पहले बहुत पीछे छुपाकर रखी थी। कभी दिख जाती तो हड़बड़ा कर पीछे कर देती। धीरे-धीरे देख कर अनदेखा करना सीख थी, पर आज जैसे पूरे अस्तित्व पर छा गई।
भाई-भाभियों ने दी थी माँ की तेरहवीं पर। ट्रे में रखकर दी थी, सुंदर लाल साड़ी, लाल बिंदी का पत्ता, चूड़ियाँ, बिछुए, और पायलें। माँ सुहागन जो गईं थी। सबको तसल्ली इसी बात की थी। ये अलग बात है कि उम्र मात्र 57 साल थी।
तेरहवीं का सामान देखकर भाई-भाइयों की आने-जाने वालों ने खूब तारीफ की थीं। दिल खोल कर दिया है ननदों को।
हाँ, दिया तो था, पर माँ… खुद कहाँ स्वतंत्र रहीं कुछ भी देने को।
छोटी बहन बिट्टू की शादी में माँ ने बचे हुए रसगुल्ले मेरे साथ बाँध दिए। रसगुल्ले जल्दी खराब नहीं होते और साकेत को बहुत पसंद भी थे।
दोनों भाभियों ने चक-चक शुरू कर दी थी, “सब लड़की के साथ बाँध दो। पोते-पंती तो कुछ हैं ही नहीं । यहाँ अभी इतने लोग आएंगे-जाएंगे। चार दिन नाश्ता-चाय बनाने का झंझट नहीं रहेगा।”
मैंने ही रसगुल्ले वापस करते हुए कहा था, “माँ, यही रहने दो। वैसे भी साकेत आजकल मीठा कम ही खा रहे हैं।”
माँ ने भी चुपचाप रख लिए। कितने विवादों को माँ की चुप्पी टालती रही थी। पिता और बेटे-बहुओं की सख्त निगरानी में रहीं थीं माँ… जिनके नाम पर मकान था, कागजों में भी और बाहर लगे संगमरमर के पट्टे पर भी… “सुमित्रा निवास”
जिंदगी भर सबकी इच्छा के आगे डर-डर कर चलने वाली माँ, जाते-जाते अपने जैसा धैर्य, सबको साध कर चलने की कला, और मेरी अंगुलियों में वहीं स्वाद खुलेआम दे गईं।
रूपाली अक्सर कहती है, “मम्मी, आप ने बिलकुल नानी जैसा बनाया है।”
मैं रूपाली का माथा चूमकर अधखुले होंठों से मुस्कुराती… पीड़ा और खुशी जब दोनों साथ हों तो होंठ अक्सर तय नहीं कर पाते हैं कि हँसना है या रोना है।
अम्मा को खाना देकर अपने कमरे में आ गई। कुछ किताबें उठा लीं, और पन्ने पलटने लगी, जहाँ पौराणिक कथाओं में समकालीन स्त्री का निर्माण हो रहा था। द्रौपदी, सीता, गांधारी, उत्तरा, सर्वमिष्ठा, माधवी, उर्मिला … इतिहास के गर्भ से निकलकर नव भविष्य का आहवाहन कर रहीं थी।
और इधर राजबाला किसी अज्ञात बीमारी से जूझती चुप-चाप चली गई। शीला भी तो ऐसी ही थी। अब कहाँ होगी? कैसी होगी?
अचानक पचमढ़ी में मिली शीला ने मन पर दस्तक दी।
उन दिनों रूपाली के इग्ज़ाम खत्म ही हुए थे। पिता-पुत्री ने पचमढ़ी घूमने का प्रोग्राम बना लिया। दरअसल साकेत के ऑफिस का 15 दिन का टूर था। रूपाली ने जिद की और हम सब साथ हो लिए। गर्मी की छुट्टियाँ भी थीं। ऑफिस की तरफ़ से टेम्प्रेरी फ्लैट वगैरह मिल गया था। सासू माँ साथ गईं थीं तो खाने पीने का चार्ज मैंने अपने ही हाथ में रखा था। एक तो इसके-उसके हाथ का खाना वे खाती नहीं थी, और बाज़ार का उन्हें सूट नहीं करता था। बस शीला आती थी सफाई-बर्तन करने।
पचमढ़ी के आस-पास के झरने, सुरम्य प्रकृति, खुली सड़कें मन पर भावों की दस्तक देती रही।
सृजन का सृजन से नाता जो ठहरा।
उस रोज़ मैं देर से सोकर उठी थी। ठंडी हवा ने मन को सहलाया और एक लंबी अमावस के बाद लेखनी ने अगड़ाई ली थी। घर में कोई नहीं था, सासु माँ और रूपाली पार्क गए थे और साकेत ऑफिस। शीला किचन में बर्तन साफ कर रही थी। माकूल समय पाकर मेरी कहानी की नायिका आगे बढ़ चली थी। पर बर्तनों की टनटनाहट मेरे सोचने में बाधा डाल रही थी।
तभी घंटी बजी। शीला की भाभी थी।
शीला के दरवाजा खोलते ही वहीं से ही जोर-जोर से बताने लगी, “देखो करछी से कैसे मारा है, तुम्हारे भैया ने।”
एक क्षण को शीला का चेहरा गुस्से से तमतमाया गया, फिर उसने अपने भाई के लिए गालियाँ निकालना शुरू किया, “साले सब दारू पी के पड़े रहते हैं, औरत पर ही सब मर्दानगी टूटती है। देखो कैसे मारा है।”
उसकी भाभी ने भी अनुसरण कर जी भर भला-बुरा कहा।
फिर दोनों हँस दीं।
मेरे कान मेरी आँखें बन गए।
उनका हँसना मेरी नायिका की तरह अपनी किसी उपलबद्धि पर होने वाली प्रसन्नता नहीं था, ना ही नायक के प्रति प्रेम का कोई सूचक, ना ही जीवन के प्रति अनुराग।
उसका हँसना चट्टान फाड़ पर निकले किसी नन्हें अंकुर की सी जिजीविषा थी।
जीवन के तमाम संघर्षों में उन्होंने हँसने की आदत डाल रखी है… जहाँ दिन के खाने के बाद रात के खाने का ठौर न हो, वहाँ रोना भी विलासिता है।
पता नहीं क्यों, मैं उठ खड़ी हुई और जाकर उन्हें टोंका, “क्यों पिटती हो तुम लोग, क्यों नहीं करती विद्रोह?”
जवाब में वे हँसी, “हम लोगों में तो ऐसा ही चलता है दीदी। सबके आदमी मारते हैं। मेरे घर से चार घर छोड़ कर रहती है सुनयना, पहला पति पीटता था। फिर उसने वो ले लिया… अरे वही, क्या कहते हैं आप लोग… हाँ! वही डिफोर्स। फिर दूसरी शादी कर ली, अब वो भी पीटता है। अब बताओ कितनी बार लेगी डिफोर्स? फिर सौ बातों की एक बात, जो प्यार करता है, मारने का हक भी तो उसी को है।”
उफ़! हम परिभाषाओं में जीने वाले लोग! प्यार की भी कैसी परिभाषा बना रखी है हमने…
दिल तो किया कि उसे गले से लगा लूँ पर खुद पर नियंत्रण रखते हुए मैंने उसका हाथ थाम लिया और उसे लिखी जा रही कहानी के बारे में बताने लगी। मैंने उसे बताया, “मेरी नायिका ने पिटने का विरोध किया है, वह बढ़ चुकी है आगे।”
वे फिर हँसी, “वो कर सकती है दीदी… क्योंकि आप उसके लौटने के दरवाजे खोल देती है। एक ठोस ज़मीन दिखती है उसे, पर हकीकत में… जो जहाँ जैसे फँस गया है उसे लौटने नहीं देते लोग… दूसरी बार तो बिलकुल भी नहीं। बल्कि पैरों के नीचे से जमीन और खसका देते हैं।”
बर्तन निपटा कर शीला और उसकी भाभी चली गई। मेरी कहानी की नायिका कीबोर्ड पर ठिठक कर खड़ी रह गई, ठगी सी। फिर पचमढ़ी में दोबारा कदम नहीं बढ़ाए उसने।
घर लौट कर मैंने कई विधाओं में…कितना कुछ लिखा पर कहानी की नायिका आगे नहीं बढ़ी तो नहीं बढ़ी।
वक्तव्य के साथ-साथ उसने भी रुके हुए कदम बढ़ाए थे पर फिर… और पिछले पंद्रह दिनों से तो जैसे सब कुछ थम गया था।
शायद शैव्या ने भी गौर किया था, इसीलिए मुझसे मिलने आई थी।
ठंडी पुडिंग खाते हुए, शैव्या ने ही झकझोरा था मुझे, “तेरे कहानियों का क्या हुआ?”
‘वहीं अटकी पड़ी हैं।’
“क्यों?”
“क्या कहूँ… हैं मुट्ठी भर सशक्त नायिकाएँ… पर कुछ नहीं बदलता जिंदगी में… असली जिंदगी में लगभग सभी कहानियाँ वैसी की वैसी ही तो हैं।”
कुछ देर हमारे बीच चुप्पी पसरी रही।
“और खुद मैं भी वैसी ही तो हूँ। डरती, घबराती, रुकती… सबकी अनुमति की प्रतीक्षा में कहीं ठिठकी सी खड़ी।” उदासी की एक रेखा मेरे चेहरे पर बनी, मिटी, फिर बनी।
“ऐसा क्यों कहती हो… कितनी जगह पढ़ा है, साहित्य समाज को समृद्ध करता है और समाज साहित्य को।”
“हूँ! पर, कितने ही उदाहरण देखे हैं, लगातार देख रहीं हूँ, किसका, किसका नाम लूँ… हँसकर पिटती शीला, चुपचाप मौत को गले लगाती राजबाला, और लगभग लिखना छोड़ने का मन बना चुकी मैं… आखिर क्या बदला है?” मैं देर तक अपने नाखून से ज़मीन कुरेदने की कोशिश करती रही।
शैव्या जानती है, जब मैं निराशा में जाने लगती हूँ तो यही करती हूँ। शायद इसीलिए वह उस दिन देर तक मेरे साथ बैठी रही। उसने ही बातों का रुख मोड़ा था। रूपाली और उसकी बेटी दिव्या की बातों के बीच कब उसने मेरे मन को सहला दिया, पता ही नहीं चला। उस दिन हमने बहुत सी बातें करीं।
शायद शैव्या का ही असर था कि मैंने अपने वक्तव्य को एडिट की कैंची से बार-बार गुजारना शुरू किया, जितना समय मिला है… उतने में ही जितना कुछ बोल सकती हूँ, बोलूँगी। पहला कदम भले ही छोटा हो… उसके बाद तो दूसरा ही पड़ता है। मैंने रस्सी का एक सिरा थाम लिया था।
पर रस्सी की धार दोनों तरफ़ से थी।
अंतिम दस दिन एक तरफ़ मैं थी, कुंभकार सी… दूसरी तरफ़ समय समय की बदलती परिस्तिथियों की माटी, जो मेरी चाक के काबू में नहीं थीं।
कार्यक्रम से मात्र कुछ दिन पहले काली सुबह ने दस्तक दी।
एक वीभत्स रेप केस के दर्द से देश दहल गया था ।
एक-एक डीटेल जैसे-जैसे निकल कर आ रहे थे, रूह तक कांप गई थी, और एक स्त्री, एक बेटी की माँ होने के नाते शब्द मौन हो गए थे। फिर वही सब… निराशा, हताशा, क्रोध!
“तुम्हारा कार्यक्रम कब है?” ऑफिस से आते ही साकेत ने पूछा ।
“15 अगस्त को ।”
“कैसे जाओगी, मुझे भी ऑफिस जाना है?”
“मैं कैब कर लूँगी ।”
“कैब… कैब भी कहाँ सेफ़ है? मैं चला जाता हूँ कैब से, तुम्हारे लिए जान-पहचान के ड्राइवर का इंतज़ाम करता हूँ।”
“थैंक यू,” मैंने धीरे से कहा।
“थैंक यू, वैंक यू कुछ नहीं… अब ये आर्यक्रम-कार्यक्रम में जाना बंद करो। बहुत हो गया घूमना-फिरना। अगर कुछ हो गया… जो होगा सो तो झेलना ही पड़ेगा, इज्ज़त पर और पलीता लग जाएगा।”
ट्रोल, तिकड़म, घूमना-फिरना, इज्ज़त… एक ही घटना से जुड़े सारे शब्द मेरे लिए थे। सारे के सारे दैत्याकार… एक ना एक द्वारा लील लिए जाना मेरी नियति।
फोन की घंटी बजी तो मेरी तंद्रा टूटी। मैं कबसे कबर्ड खोले खड़ी थी।
फोन पर साकेत थे।
“जल्दी तैयार हो जाना, रामलाल को भेजा है। वह तुम्हें ले जाएगा।”
मैंने कपड़े निकाले। तैयार होकर गाड़ी में बैठ गई।
मैं अपना वक्तव्य पढती जा रही थी। पर अंतर्मन में कुछ और ही शब्द चल रहे थे। कोलकाता रेप केस, दिल्ली रेप केस, बुलंद शहर रेप केस, और घर में…। मन हटाने की कोशिश की तो हाईस्कूल में टॉप करने वाली लड़की की सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, ओलंपिक में सोना जीतने से रह जाने वाली महान खिलाड़ी पर अपमान जनक पोस्ट, तो गर्भ में मार दी जाने वाली बच्चियाँ, पढ़ाई छुड़ा कर ब्याह दी गई लड़कियाँ…।
मैं वक्तव्य को बार-बार पढ़ रही थी… पर मेरे अंदर बहुत कुछ टूट रहा था और नए शब्दों में गढ़ रहा था। खुद से ही घबराकर मैंने फ़ाइल बंद कर दी और खिड़की से बाहर देखने लगी। पेड़ों को देखकर कुछ सुकून मिला ही था कि तभी ड्राइवर ने ब्रेक लगाया। गाड़ी समारोह स्थल पर आ चुकी थी।
वहाँ काफ़ी भीड़ थी। आमतौर पर साहित्यिक कार्यक्रमों में इतने लोग नहीं होते, पर एक तो यह प्रतिष्ठित कार्यक्रम था और दूसरे मंत्री जी की वजह से भी आने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही हो गई थी।
कुछ लोग हॉल में बैठ कर गप्प कर रहे थे और कुछ बाहर लॉबी में खड़े होकर। मैं भी जाकर एक तरफ़ बैठ गई। कुछ परिचित हाय-हैलो करके चले गए। आशीष जी काम में इतने व्यस्त थे कि उन्हें बैठने का समय ही नहीं मिल पा रहा था।
चाय पीते हुए लोग एक-दूसरे से बातें करने, फ़ोटो खींचने-खिंचाने में व्यस्त थे। हँसते-मुस्कराते चेहरों के बीच कुछ साहित्यिक चर्चाएँ हो रहीं थीं और कुछ खुस-पुस, गुपचुप बातें। लोग एक-दूसरे से फोन नंबर ले-दे रहे थे। एक पल को मुझे लगा कि हम मात्र एक-दूसरे के फोन की गैलरी में सेव कांटेक्ट नंबर हैं। सेव किए जाने से डिलीट किए जाने तक की इस जीवन यात्रा में उपयोगिता ही हमारी धड़कनें हैं। उपयोगिता खत्म और यात्रा खत्म।
तभी रश्मिका दिखी। तिरंगे रंग की साड़ी उस पर फब रही थी। मुझे बधाई देकर भीड़ में गुम हो गई। काफ़ी देर तक लोगों का मुआयना करने के बाद घड़ी पर नज़र डाली, तो दो बज रहे थे। ये तो कार्यक्रम समाप्त होने का समय था और अभी तक कार्यक्रम शुरू भी नहीं हुआ था।
मैं धीरे से उठकर आशीष जी के पास गई, “नमस्ते सर, कार्यक्रम कब शुरू होगा?”
“अरे आरती जी आप, नमस्कार, नमस्कार, मंत्री जी आते ही होंगे, बस तुरंत शुरू कर देंगे। आज उन्हें कई कार्यक्रम अटेंड करने थे। हमें इतना समय दे दिया यही बहुत है। आपने चाय-वाय पी? पीजिए, समोसा स्पेशल है आज का?”
“जी सर, पी ली” मेरे कहने से पहले ही वे आगे बढ़ गए थे।
मंत्री जी करीब तीन बजे आए, तब कार्यक्रम शुरू हुआ। ये अलग बात है कि जरा-जरा सी देर में जरूरी काम याद आने वाले लोगों को कोई जरूरी काम याद नहीं आया। हॉल अभी भी ठसा-ठस भरा था, बल्कि लोग पीछे सीढ़ियों पर भी खड़े थे।
वैसे मेरा मोबाइल साइलेंट था। स्टेज पर जाने से पहले चेक किया। 5 मिस्ड कॉल थे। दो रामपाल के और तीन साकेत के। साकेत के मेसेज भी थे।
“रामपाल जा रहा है, उसका टाइम हो गया है।”
“कब तक निपटेगा?”
“अपना तो मेमसाहब बन कर बैठी हो। मुझे ही ड्राइवरी करनी पड़ेगी।”
साकेत के गुस्से का ख्याल आते ही दिल घबरा गया। आज तो घर पहुँचने पर शामत आना तय है। जल्दी से मोबाइल स्विच ऑफ किया और स्टेज पर चढ़ गई।
कौन क्या बोल रहा है ये मुझे सुनाई नहीं दिया, सुनाई दिया तो इतना कि आशीष जी मेरे कान में कह रहे हैं कि, “मंत्री जी आप से पहले बोलेंगे क्योंकि उन्हें कहीं और जाना है।”
मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया।
तीनों वक्ताओं के बाद मंत्री जी ने माइक थाम लिया। उनके वक्तव्य में देश, दुनिया, साहित्य और महिलाओं के विकास के किस्से थे और हॉल में तालियाँ गूँज रही थीं। अंत में उन्होंने मुझे सुनने की गुज़ारिश करते हुए किसी और कार्यक्रम में जाने के लिए श्रोताओं से क्षमा माँगी।
मैं पोड़ियम के पास आ कर खड़ी हो गई।
मंत्री जी अपना सामान हाथ में लेकर उतरने लगे। उनके उतरते ही आशीष जी उनके पीछे लपके। भीड़ का एक बड़ा हिस्सा भी उनके पीछे लगभग दौड़ पड़ा। कॉन्टेक्ट की इस दुनिया में एक नई लेखिका को सुनने से कहीं अधिक जरूरी उनके लिए मंत्री जी से परिचय बढ़ाना था।
मैं पोडियम पर खड़ी हूँ।
हॉल खाली होता जा रहा है।
मंत्री जी के लिए लंच के डोंगे खुल चुके हैं। छोले, पुलाव, पनीर की खुशबू हॉल में भर रही है।
मैं जड़वत खड़ी हूँ।
“क्या बोलूँ… कौन सुनेगा? किसके लिए की थी इतनी मगज़मारी? किसके लिए पिए थे ट्रोलिंग के कडवे घूंट?” के खयाल मेरे ऊपर हावी हो रहे हैं?
मेरी आँखें डबडबा रहीं हैं। मेरे शब्द मौन हैं और मैं बस जाते हुए लोगों को देखती जा रही हूँ….
तभी अवचेतन से शैव्या झाँकती है, “पर तू ये भी तो सोच, जब हम पानी में पत्थर डालते हैं तब हमें ये कहाँ पता होता है कि भंवर कितनी दूर तक जाएगी… रिपल इफेक्ट याद है ना।”
और मैं निकलने को बेताब अपने आँसुओं को ज़ज़्ब करती हूँ और माइक को थामती हूँ।
“नमस्कार, जो लोग अभी भी यहाँ मुझे सुनने के लिए बैठे हैं, उनका तहे दिल से आभार व्यक्त करती हूँ। दरअसल महिलाओं को बोलने का बहुत कम अवसर मिलता है, और सुने जाने का उससे भी कम। ऐसे में जो सुनने को तैयार है, उनका आभार तो बनता ही है। जो बोलना चाहती थी, वे शब्द बेमानी लग रहे हैं। आज़ाद देश में महिलाएँ कहाँ हैं आज़ाद…।
अभी भी सारा संघर्ष उस आज़ादी को पाने का है। आज़ादी की ओर बढ़ी महिला की यात्रा गिराए जाने, उठने, लड़खड़ाने, संघर्ष के लहूलुहान पैरों से आगे बढ़ने की कहानी है… अनवरत चलती एक रिले रेस। उसी रिले रेस की एक मशाल लेखनी ने भी थामी है, जो कीबोर्ड पर एक सपना देखती है…” मेरा अनस्किपटेड वक्तव्य आगे बढ़ रहा है।
मंच पर बैठे दो वक्ताओं की गर्दनें मेरी ओर मुड़ गईं हैं। बाहर जाते कुछ लोग रुक गए हैं। हॉल का शोर थोड़ा सा कम हुआ है।
कीबोर्ड से उतर कर नायिका मेरे अंदर समाती जा रही है।
और बोलती जा रही है…
- वंदना बाजपेयी

एक सांस में पढ़ ली जाती हैं ऐसी कहानियाँ।
“जिंदगी का कोई सुखद अध्याय कोई पिछला अध्याय भले ही ना खोलता हो, पर दुख में बड़ा एका होता है… हर बार पुराने दुख समेट लेता है।” यही तो हमारे दुख की जड़ है जिसे आपने सही से पकड़ा है। अब हमें इसे कुरेदना चाहिए।
शुक्रिया शिवानी
लाजवाब. एक सांस में पढ़ ली.
सादर प्रणाम सहित आभार दी