Tuesday, August 25, 2026
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‘मोरपंख’: जीवन के आस पास की कहानियाँ

समीक्ष्य कृति – मोरपंख,  लेखक – प्रवीण ‘बनजारा’, मूल्य – 200/-, प्रकाशक – हिंदी साहित्य सदन, नई दिल्ली,समीक्षक – डॉ. शिवजी श्रीवास्तव 

कथाकार प्रवीण ‘बनजारा’ का नवीन कहानी संग्रह ‘मोरपंख’ सात ऐसी रोचक कहानियों का संग्रह है जो अलग अलग भाव-भूमि की घटनाओं पर बुनी गईं हैं। विषय और शिल्प दोनों दृष्टियों से कहानियाँ वैविध्य लिए हैं। यद्यपि कथाकार ने कहानियों के विषय अपने आस पास के परिवेश से ही चुने हैं किन्तु उनका वैशिष्टय यह है कि वे साधारण होकर भी असाधारण हैं। ये घटनाएँ प्रायः समाज में आसपास घटित होती रहती हैं इसीलिए इन कहानियों को पढ़ते समय पाठक इनसे एक जुड़ाव महसूस करता है। इन कहानियों में मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के समाज, परिवेश और मनोजगत को अत्यंत प्रभावी ढंग से चित्रित किया गया है।

संग्रह की प्रथम कहानी ‘मोरपंख’ ही अत्यंत मर्मस्पर्शी है। यह कहानी एकाकी जीवन जीने वाली विधवा स्त्री के मनोजगत को  बहुत ही सूक्ष्म और प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है। कहानी की नायिका ‘माताजी’ कृष्ण की आराधिका हैं, प्रति वर्ष जन्माष्टमी के अवसर पर वे अपने घर पर कृष्ण-लीला की झाँकी एवं नृत्य का आयोजन करती हैं। आयोजन की विशेष बात यह है कि इसमें सिर्फ बच्चियाँ ही भाग लेती हैं, किसी बालक को इसमें आने की इजाजत वे नहीं देतीं। इस वर्ष भी वे आयोजन की तैयारी में व्यस्त हैं। कार्यक्रम से एक दिन पूर्व एक बालक मुन्ना अपनी माँ के साथ आता है, उसके हाथ में एक मोरपंख है। वह स्वयं ये मोरपंख लगाकर कृष्ण बनना चाहता है पर माताजी उसे अनुमति नहीं देतीं। बालक उन्हें यह मोरपंख दे कर कहता है कि जो कृष्ण बने उसे ये मोरपंख लगा देना। वे बार-बार सोचती हैं कि ये मोरपंख किस बालिका के शीश पर लगाया जाए। किसे कृष्ण के स्वरूप में सजाया जाए। इसी द्वंद्व से कहानी प्रारम्भ होती है और फ्लैश बैंक में उनका अतीत सामने आ जाता है।

दरअसल माताजी का एक अतीत है, एक दुःख भरा अतीत, जब वे लाजो थीं। वे ब्याह कर अपने पति के साथ दिल्ली आई थीं। अपने परिश्रम और अध्यवसाय से पति-पत्नी मिलकर दिल्ली में अपना मकान बना लेते हैं, पर जीवन में एक अभाव रहता है। वे माँ नहीं बन पातीं। ये अभाव उन्हें कचोटता रहता है। अचानक एक दिन दुर्घटना में उनके पति हंस का निधन हो जाता है। शेष जीवन वह अकेले ही हंस की यादों के साथ उस घर में व्यतीत करती है। उसके बाद से  वे अपना मन कृष्ण भक्ति में रमा लेती हैं और यह आयोजन किया करती हैं जिसमें बालकों का आना निषिद्ध रहता है। अंततः एक नाटकीय घटनाक्रम में एक बच्चे मुन्ना के बाल हठ  से वे झुक जाती हैं और निर्णय करती हैं कि मुन्ना को ही  कृष्ण स्वरूप बनाएँगी। सारी कहानी लाजो के संघर्ष और भावनात्मक द्वंद्व की कहानी है। ऐसा प्रतीत होता है लाजो ने पति के जाने के बाद स्वयं को एकान्त के दायरों में कैद कर लिया है जिन में वह है और उसके पति की स्मृतियाँ हैं। पुरुष रूप में सिर्फ गोपाल ही उसके जीवन में हैं। अंततः यह दीवार टूटती है, और एक साकार बाल गोपाल का उसके आँगन में प्रवेश होता है। कहानी के अंत में पाठक एक करुणा मिश्रित आनन्द के भाव से भीग जाता है।

दूसरी कहानी ‘दो एकांत’ सर्वथा नवीन विषय की कहानी है। यह पशु प्रेम को नए दृष्टिकोण से सामने रखती है। वर्तमान समाज में प्रायः लोग कुत्ते पाल लेते हैं और उसे अपने परिवार के सदस्य के रूप में मानकर भरपूर स्नेह भी देते हैं। इस कहानी की नायिका संजना भी माँ न बन पाने की स्थिति में अपने अभाव की पूर्ति के लिए एक छोटे कुत्ते को पाल कर उसे ही अपना बेटा कहती है। वह उसे गुट्टू नाम देती है। पार्क में मिलने वाली एक बुजुर्ग महिला प्रमिला का मानना है कि इस प्रकार कुत्ते को बंधन में रखने से जानवर की स्वतंत्रता बाधित होती है, पर संजना इस बात से सहमत नहीं है। एक दिन संजना अपने पति के साथ घर के पास ही एक डिनर पर जाती है। वे लोग अपने साथ में  गुट्टू को भी ले जाते हैं। रात्रि में लौटते वक्त गली के कुत्ते गुट्टू पर टूट पड़ते हैं, बड़ी मुश्किल से गुट्टू को बचाया जाता है। वह बुरी तरह घायल हो जाता है, कई दिनों तक गुट्टू का इलाज होता है तब गुट्टू की हालत देखकर संजना को अनुभव होता है कि सच मे उसने गुट्टू की स्वतंत्रता बाधित की है। अंततः वह गुट्टू को एक ऐसी संस्था को दे देती है, जो कुत्तों को खुले स्थान पर पूरी स्वतंत्रता से रखते हैं। यह कहानी पशु प्रेमियों को चिंतन का नया आयाम देकर एक सर्वथा नवीन दृष्टि की कहानी बन जाती है।

कहानी ‘पहलवान की बकवास’ एक प्रयोगधर्मी कहानी कही जा सकती है। यह एक अर्द्ध विक्षिप्त से व्यक्ति के प्रलाप को डिकोड करके उनके अर्थ तलाश करते हुए उसके जीवन को समझने की कहानी है। यह भी अत्यंत रोचक ढंग से चलती है जिससे पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है।

संकलन की कहानी ‘प्रेमिका’ एक कस्बाई मानसिकता के युवक और महानगरीय स्वतंत्र विचारों वाली युवती की प्रेम कहानी है। लम्बी कहानी का रचना सत्य यह है कि एक छोटे कस्बे से नौकरी करने दिल्ली आया युवक रचित अनायास एक युवती की ओर आकृष्ट होता है, कैन या कंचन नाम की युवती भी उससे शीघ्र मित्रता कर लेती है। दोनों निकट आते हैं, रचित उससे प्रेम करने लगता है। धीरे-धीरे उसे ज्ञात होता है है कि कैन एकदम आधुनिक विचारों वाली युवती है। सिगरेट पीना, कई पुरुष मित्रों के साथ भ्रमण हेतु गोवा जाना जैसी बातें उसके लिए सामान्य हैं। फिर भी रचित के हृदय में उसके लिए  प्रेम है। रचित उससे तुरत विवाह करने के लिए आग्रह करता है जबकि कैन बंधन में न बंध कर स्वतंत्र होकर मित्रवत रहना चाहती है। बहुत आग्रह पर अंततः भावावेश में कैन रचित के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है, और विवाह हेतु तैयार हो जाती है। रचित अत्यंत उल्लासपूर्वक उसके द्वार पर बारात लेकर जाता है तो वह विवाह से इनकार करते हुए, स्वतंत्र जीवन यापन करने का निर्णय करती है। कहानी एक आधुनिका के मनोजगत के द्वंद्व को बहुत बारीकी से चित्रित करती है। विवाह उसके लिए बंधन है किन्तु मन में कहीं उसके प्रति एक आकर्षण भी है, पर अंततः वह उस आकर्षण से मुक्त हो जाती है। रचित मध्यवर्ग की आदर्शवादी परम्परा का युवक है जो परिवार की परम्परा से हट कर सोचना भी नहीं चाहता। कहानी कई प्रश्न उपस्थित करती है। कथाकार ने दोनों के मनोविज्ञान को बहुत तटस्थ भाव से चित्रित किया है। यह संग्रह की एक श्रेष्ठ कहानी है।

‘चैम्पियन’ बाल मनोविज्ञान की सशक्त कहानी है। कहानी में परिवेश के रूप में उस समय के कालखंड को चुना गया है जब जीवन पर तकनीक का दवाब नहीं था, मोबाइल नहीं आया था, बच्चे परम्परागत खेलों के माध्यम से मनोरंजन करते थे। एक बालक मिंटी सारे खेलों में दक्ष है पर मोहल्ले में नए आए पप्पू की तरह वह तार में फंसा कर पंखुड़ी उड़ाने की कला नहीं जानता। वह मन ही मन में पप्पू को अपना गुरु मान कर ये कला सीख कर चैम्पियन बनना चाहता है। पप्पू उसे मनोयोग से सिखाता  है पर वह उतना नहीं सीख पाता जितना पप्पू जानता है। उसे पप्पू से बालसुलभ स्वाभाविक ईर्ष्या होती है। अचानक एक दिन उसे पप्पू की मृत्यु का समाचार मिलता है। यह सुनकर उसका मन अवसाद से भरने लगता है, वह सोचता है कि उसके बुरा सोचने से ही पप्पू मर गया। अंततः उसकी दादी उसे अवसाद से बाहर निकालती हैं। पूरी कहानी बाल मनोविज्ञान और बच्चों के खेल कूद उल्लास आदि को बहुत सहज और प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है।

कहानी ‘भुतहा गाँव’ में उत्तराखण्ड के उजड़ते गाँव को आधार बनाया गया है। लोग नौकरी के लिए गाँव छोड़कर पलायन कर रहे हैं। कथा नायक रंजीत पांडेय भी अपना गाँव छोड़कर दिल्ली में आकर एक विद्यालय में अध्यापन करने लगता है। वह  क्रीड़ा-प्रभारी भी है। एक दिन अचानक एक मैच के दौरान खेल के मैदान में रंजीत गिर जाता है उसे हेयर लाइन फ्रेक्चर होता है, वह ठीक नहीं हो पाता अंततः वह इतना बीमार हो जाता है कि उसकी नौकरी भी छूट जाती है। ऐसी स्थिति में वह मेट्रो स्टेशन के नीचे भीख माँगने का कार्य करने लगता है। अत्यंत नाटकीय परिस्थितियों के बाद वह अपने गाँव लौट जाता है। विषय की दृष्टि से यह एक अविश्वसनीय कहानी लगती है। एक अध्यापक वह भी खिलाड़ी अपने जीवन से कभी इतनी हार नहीं मान सकता कि वह भिक्षा वृत्ति को चुने। कहानी का दूसरा कमजोर पक्ष यह है कि आधी कहानी भिखारियों की स्पर्धा में चलती है, भुतहा गाँव की पीड़ा कहीं नजर नहीं आती। कहानी भुतहा गाँव पर केंद्रित न होकर भिखारियों के जीवन पर केंद्रित हो जाती है। इस प्रकार कहानी अपने शीर्षक के साथ न्याय नहीं कर पाती। जहाँ तक पठनीयता का प्रश्न है उस पर यह कहानी खरी उतरती है। रोचकता सम्पूर्ण कहानी में विद्यमान है।

‘बिसेसर का संसार’ कहानी का फलक बहुत विस्तृत है। एक अनाथ बालक बिसेसर नानी के घर पलता है, वह छोटे भाई राघव को पुत्रवत स्नेह देकर अपने और उसके जीवन को सँवारता है, उद्यम से वह बड़ा व्यापारी बन जाता है, सारी सुख सुविधाएं उसके पास हो जाती हैं पर एक नाटकीय घटना क्रम में  व्यापार की रंजिश में उसकी हत्या के प्रयास में उसके प्रिय भाई राघव की हत्या हो जाती है। अंत तक आते-आते सब कुछ बड़ा नाटकीय हो जाता है। कहानी में घटना-बहुलता उसे उपन्यास की ओर ले जाती है। किशोर वय के बिसेसर का नीला से प्रेम उससे विवाह एक आदर्शवादी अति की ओर बढ़ता है वहीं राघव का शशि से विवाह, और शशि का सब व्यंग्य करना यथार्थ की अति का छोर है। सही अर्थों में यह उपन्यास का ही विषय है, जिसे कहानी में बाँधा गया है। पूरी कहानी अत्यंत शिथिल गति से उपन्यास के ढंग से ही विकसित होती है। एक कहानी के रूप में ये कमजोर कहानी है, लेखक को भविष्य में इसे उपन्यास का आधार बनाना चाहिए।

कलात्मक दृष्टि से संग्रह की कहानियाँ प्रभावित करती हैं। कहानियों की विशेषता है उनके कहने का ढंग। भाषा और शिल्प पर प्रवीण ‘बनजारा’ की गहरी पकड़ है। लम्बी से लम्बी कहानियों को वे रोचक ढंग से आगे बढ़ाते हैं, जिससे जिज्ञासा बनी रहती है। प्रत्येक कहानी लम्बी है पर पठनीय है, एक सहज प्रवाह में वह पाठक को अपने साथ बहाती चलती है। प्रत्येक कहानी का अंत पाठक की संवेदना को झकझोरता है। कहानियों में अनेक शैलियों का प्रयोग है पर फ्लैश बैक शिल्प कथाकार का प्रिय शिल्प है। इसका निर्वाह भी उन्होंने सफलता पूर्वक किया है। पात्रों के चरित्र और उनके मनोविज्ञान पर भी बनजारा जी की अच्छी पकड़ है।

कहानी के पात्र समाज में हमारे आस-पास से ही चुने गए पात्र हैं। पुस्तक के पिछले कवर पृष्ठ पर  लिखा भी है –‘ मोरपंख में आप पाएँगे अपने आसपास के जाने पहचाने चरित्र जिन्हें जीवन की आपाधापी में शायद आप देख कर अनदेखा कर देते हैं।’ पात्रों में विभिन्न वय के बालक, सपने बुनने वाली स्त्री, विधवा-स्त्री, निःसंतान स्त्री, प्रेम में डूबी आधुनिका, ईर्ष्यालु गृहिणी, आदर्शवादी प्रेम के युवक, भिखारी इत्यादि अनेक प्रकार के चरित्र जीवंत उपस्थिति दर्ज कराते हैं। प्रत्येक पात्र के मनोविज्ञान का चित्रण बड़ा स्वाभाविक है। वाहय परिवेश के चित्र भी प्रभावी हैं।

प्रवीण बनजारा जी की कहानियाँ जीवन के आस पास बिखरी घटनाओं की कहानियाँ हैं। किसी क्षण, किसी घटना को वे प्रभावी कहानी के रूप में चित्रित करने में सिद्धहस्त हैं।

आशा है भविष्य में उनकी लेखनी से और भी महत्वपूर्ण कहानियों का सृजन होगा।

      

 

 

 

 

 मोरपंख कृति के लेखक- प्रवीण ‘बनजारा’

 स

  • समीक्षक- डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
    प्रकाशित पुस्तकें, यक्ष प्रश्न (कहानी संग्रह), क्रांतिकारी भगवान दास माहौर (जीवनी), सृजन -दृष्टि (समकालीन साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन)
    श्री चित्रगुप्त महाविद्यालय हिन्दी विभागाध्यक्ष से सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन
    सम्पर्क – विक्रम 301,गृहप्रवेश, सेक्टर -77, नोएडा (उ.प्र.)-201301
    मोबाइल: 9557518552, ईमेल : [email protected]

 

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