Tuesday, August 25, 2026
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ज्योत्स्ना कपिल की कहानी-कितने सलीब

दर्पण में स्वयं का रूप देखकर धानी फूली न समाई। आज वह खुद को अपनी नहीं बल्कि सुमेर की नज़रों से देख रही थी। साँवली सलोनी तो थी ही, उसपर नवयौवन की लुनाई ने चेहरे का आकर्षण और बढ़ा दिया था। लगन का उछाह, उम्र की नमकीनियत, उमंगों का सैलाब, सब कुछ उसे प्रफुल्लित कर रहे थे। हृदय के स्पंदन की गति भी बढ़ गई थी। सखियाँ चुहल करते हुए उसे सुहाग सेज तक लाईं, तो वहाँ शफ़्फ़ाक सफ़ेद चादर बिछी देखकर, उसका दिल धक से रह गया और  मन आशंका से कम्पित हो उठा। अब जाकर उसे याद आया कि आज न सिर्फ उसकी सुहागरात है, बल्कि उसकी कौमार्य परीक्षा का दिन भी है। जिससे हर साँसी लड़की को अपनी सुहागरात पर गुजरना पड़ता है। यदि आज उसने अपने कौमार्य को साबित कर दिया, तो उसका जीवन बिना किसी कठिनाई के चल पड़ेगा, वरना तो ज़िन्दगी मौत से बदतर हो जाएगी। उसकी आँखों के समक्ष उनके समाज की कितनी ही लड़कियों की दुर्दशा के चित्र घूम गए। जिन्हें घोर सामाजिक प्रताड़ना एवं अपमान की ज्वाला से गुजरना पड़ा था। कितनी ही लड़कियों ने तो वह जिल्लत बर्दाश्त न कर पाने की वज़ह से फाँसी लगाकर, जल समाधि लेकर अथवा अपने जीवन को अग्नि में हवाले कर लिया था। इसलिए…कि वे अपनी पवित्रता साबित करने में नाकाम रही थीं। उसका चेहरा यूँ फक्क पड़ता देखकर सखियाँ हँसने लगीं

“ रात री बात सोचके डर लागे काई ? या रात हर छोरी रे जीवन में बहुत अनमोल होवे “ सखियों ने कटाक्ष करते हुए ठिठोली की। उनकी इस ठिठोली के उत्तर में वह बस मुस्कुराकर रह गई।

वे सब उसे छोड़कर चली गईं तो वह अपने कमरे में चारों ओर निगाह दौड़ाने लगी। वह एक छोटा सा कमरा था, जहाँ ज़रूरत भर का सामान था। उसके पलंग के अतिरिक्त वहाँ एक ओर छोटा सा स्टूल रखा था जिसपर पानी का एक जग और गिलास रखा था। एक ओर कई सारे पैकेट का ढेर लगा था। सामने की दीवार में शीशा लगा था। दीवारों पर किये गए ताजे चूने की महक अब भी बाकी थी। वह मन की आशंका और घबराहट पर काबू पाकर, अधैर्य से सुमेर की प्रतीक्षा की घड़ियाँ गिनने लगी। सुमेर मजबूत काठी का साधारण दिखने वाला युवक था। जो धानी को पहली बार देखते ही उसपर लट्टू हो गया था। उसके ही आग्रह से आज का यह दिन आया था। धानी को भी सुमेर ठीक ही लगा था। उसकी कल्पनाओं के नायक के रूप में, सुमेर ने ही रंग भरे थे। अब उन रंगों में डूब जाने का समय आ गया था। वह कल्पनाओं की दुनिया में कुलांचें भर ही रही थी कि नई आशंका से उसका मन कांप उठा। ठीक उसी समय सुमेर के परिवार की दो महिलाएं कुकड़ी ( सूत के धागे का गुच्छा ) लेकर कमरे में चली आयीं और उसे पलंग में एक ओर रख दिया। उन्हें देखकर धानी की घबराहट और भी ज्यादा बढ़ गई। कौमार्य परीक्षा में सफल होने के पश्चात, प्रमाण के रूप में,सफ़ेद चादर उसके मायके भेज दी जाएगी और यह कुकड़ी ससुराल पक्ष द्वारा रखी जाएगी। उन महिलाओं ने  धानी को सारी चूड़ियाँ उतार देने को कहा। एक महिला उसके जूड़े में लगी हेयर पिन और काँटे भी हटाने लगी।

“ जदी आज मैं म्हारी पवित्रता कोनी सिद्ध कर पाई तो !” सहसा उसके मन में यह प्रश्न उभरा।

“ कोनी, म्हारे साथ एस्या कोनी होयेला, म्हारे जीवन में सुमेर के अलावा कोई कोनी आयो “ उसने स्वयं को सांत्वना दी। यह विचार उसकी घबराहट को कुछ कम कर गया। उधर वे महिलाएं कक्ष में चारों ओर सतर्क दृष्टि से देखने व पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद वहाँ से चली गईं। तभी सुमेर आ गया। उसके चेहरे पर मीठी सी मुस्कान थी।

“ तू कुण सी चिंता में पड़ी है ढाणी ? आज तो उमंगा री रात है। “ कहते हुए सुमेर ने उसे बांहों में भर लिया। उसके सीने से लगकर धानी के दिल को थोड़ा सुकून महसूस हुआ।

“ आज तू घंणी सुहांवणी लाग री है। जब थाने पेली बार हाट में देख्यो हो, जदी थारो दीवानों हो ग्यो मैं “ वह कहता जा रहा था ओर धानी सुमेर की मीठी बातों और स्पर्श के जादू में खोकर सारी चिंताएं और स्वयं को भूल गई।

भावनाओं का ज्वार थमा, तो धानी सुमेर के आगोश में बेसुध सी पड़ी थी। जबकि पलंग पर दृष्टि दौड़ाते सुमेर के मस्तक पर चिंता की रेखाएं खिंच गई थीं। हताश होकर उसने एक बार पलंग को, तो एक बार धानी को देखा।

“ धानी “ उसने धीमे से पुकारा।

“ हूँ “ वह अब भी नशे की अवस्था में थी।

“ थारो कभी किसी से… मारो मतलब कोई दोस्त.. पड़ोसी … चचेरा, ममेरा भाई….मतलब कोई रिस्ता… “ उसने बात अधूरी छोड़ दी।

उसकी बात सुनकर धानी को आघात सा लगा। वह अपनी बेसुधी छोड़कर एकदम से उठ बैठी।

“ अबार काई बोल्यो तू ( अभी क्या कहा तुमने ) ?” अपने कानों पर अविश्वास सा करते हुए उसने सुमेर पर दृष्टि गड़ा दी। सुमेर के माथे पर चिंता की लकीरें देखकर, वह भी पलंग की चादर को देखने लगी। बात समझ में आते ही उसका चेहरा फ़क़ पड़ गया। उसे महसूस हुआ मानो उसकी सारी शक्ति किसी ने खींच ली हो।

“ मैं साँची बोल री हूँ म्हारो कीके भी साथ कोई रिस्तो कोनी “ वह सुमेर के आगे गिड़गिड़ाने लगी।

“ सुमेर, थारो माल कियान को है ? “ बाहर से किसी ने आवाज़ लगाई।

सुमेर की जबान को मानो लकवा सा मार गया था। वह कुछ न कह पाया। धानी ने घबराकर सुमेर के पाँव पकड़ लिए थे। आँखों से नीर बहाती हुई, वह अपने निर्दोष होने की बात कहती जा रही थी। सुमेर की दृष्टि बड़ी तेजी से कमरे में कोई नुकीली वस्तु ढूँढ रहा था। तभी कमरे का दरवाजा खुला और सुमेर की माई अंदर आ गई। उसने आते ही पलंग में बिछी चादर को गौर से देखा और फिर तेज आवाज में बोली

“ सुमेर को माल खोटो -खोटो ” इस घोषणा के होते ही परिवार में उपस्थित सभी लोग कमरे में आ गए और चादर को देखने लगे। वह बेदाग सफ़ेद चादर, धानी के साथ पूरी दुश्मनी निभा रही थी।

तभी सुमेर की माँ ने आग्नेय दृष्टि से धानी को घूरा।

“ बता कुणके साथ तू मुंह काळो करयो है?“

“ मैं सांची बोल रही हूं माई, मारो कीके साथ कोई रिस्तो कोनी । “ उसे इंकार करता देखकर सुमेर की माई का पारा चढ़ गया और उसने धानी के बाल अपनी मुट्ठी में जकड़ लिए। वह उसे अपना अपराध स्वीकार कर लेने पर जोर देने लगी। बालों के खिंचने की टीस और अपमानजनक आक्षेप से धानी  रो पड़ी ।

“ बोल तूने जीजा रे साठे मुंह कालो करियो है या कोई और…? “

 “ माई, मैं सपथ खाके कह रही हूँ, कोई मारे करीब कोनी आयो  “

“ या ईशन सच कोनी बोली ” कहते हुए सुमेर कि माँ ने चटाक – चटाक उसके कई तमाचे दिए, इसके बाद घर के सभी सदस्य उसे पीटने लगे और यह कुबूल करने पर जोर देने लगे कि उसका किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध था। धानी कसमें  खा – खाकर अपनी पवित्रता की दुहाई दिए जा रही थी, पर उसकी सुनने वाला वहाँ कोई नहीं था। सुमेर अवाक, मौन खड़ा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि सच क्या है। उसे धानी पर विश्वास करना चाहिए या नहीं।

 सुमेर चैतन्य हुआ तो देखा कि धानी के वस्त्र कई जगह से फट चुके थे और परिवार के लोग उसे पीट रहे थे। वह अपने अनावृत अंगों को छुपाने का प्रयास करती हुई जोर -जोर से रो रही थी और स्वयं के निर्दोष होने की बात कह रही थी । सुमेर उसे बचाने को भागा, तो भाई सा ने उसे अपनी बाँहों में जकड़ लिया।

“ तू या पापिन ने बचावा की कोसिस कर रियो है? थारी बिंदनी कलंकिनी है “ माँ ने ऑंखें दिखाते हुए कहा।

“ ये सच कोनी , म्हारा विस्वास करो। “ धानी सबके पैर पकड़ रही थी। इससे पहले कि सुमेर किसी से कुछ कहता, उसका चचेरा भाई उसकी बाँह पकड़कर बाहर खींच ले गया।

सुमेर घिसटता सा चला गया। अब क्या होगा, कितनी उमंग से वह धानी को ब्याह कर लाया था। साप्ताहिक हाट में उसे पहली बार देखने के बाद ही सुमेर ने उसे अपना बनाने की ठान ली थी।

“ काईं साँची में वे कलंकनी है? पर वाकी ऐसी कोई हरकत तो कभी देखी कोनी…  वे पर विश्वास करन चाहिए की कोनी? कवे हैं की औरत के भेद तो ब्रह्मा भी ना जान पाए, फिर भला एक मनुस्य के जानी…पर कोनी, बाकी आँखों में सच्चाई दिख रही है…राम जाने काईं हो रहे होंगे वे के साथ? “

सुमेर का मन भैरो की बातों में बिल्कुल न लग रहा था। वह घर जाना चाह रहा था, पर उसे किसी ने वहाँ से जाने नहीं दिया। जब काफ़ी देर बाद वह घर गया, तो मालूम हुआ कि अब यह मामला पंचायत में रखा जाएगा। जिस घर में एक दिन पहले गीत- संगीत की रौनक़ थी , अब वहाँ मनहूसियत, ताने और सिसकियाँ गूँज रही थीं। पहाड़ सा दिन मुश्किल से गुजरा। धानी कमरे में बंद सिसकती रही और सुमेर हतप्रभ और विचारलीन सा मौन बैठा रहा। उसे अब धानी के पास जाने की इजाजत नहीं थी। धानी के मायके में उसके अपवित्र होने और उन लोगों को अगले दिन पंचायत में उपस्थित होने का आदेश पहुँचा दिया गया था ।

       अगले दिन पंचायत बैठी और जब पंचो ने धानी से उसके कलंक के विषय में पूछा, तो उसने पुनः कहा कि वह बिल्कुल निर्दोष है और यह उसपर लगाया गया यह  इल्जाम एकदम गलत है। जब बार – बार पूछने पर भी वह अपनी बात से नहीं डिगी , तो उसे अग्नि परीक्षा देने का हुकुम दिया गया। इस परीक्षा में उसे तालाब में तब तक डुबकी लगाए रखनी थी, जब तक कोई आदमी सौ कदम तक दूरी न तय कर ले। कोई और चारा न देख, धानी ने अग्नि परीक्षा के लिए हामी भर दी। परन्तु दुर्भाग्य से वह इतनी देर तक साँस न रोक पाई और उसकी पवित्रता पर लगा प्रश्नचिन्ह और भी गहरा हो गया। चारों ओर यही शोर उठने लगा कि वह झूठी है। अगर वह पवित्र होती, तो अग्निपरीक्षा में जरूर सफल होती। सब एकमत होकर उसपर यह स्वीकार करने का दबाव बना रहे थे, कि उसके किसी पराए पुरुष के साथ सम्बन्ध रहे हैं। वह लगातार अपनी बेगुनाही की बात करती जा रही थी, पर पूरी ढाणी में अब किसी को उसके ऊपर विश्वास न था। विवाद बढ़ता देखकर , पंचों द्वारा उसकी दूसरी अग्निपरीक्षा लेने का निर्णय लिया गया। अगले दिन उसकी हथेलियों पर पीपल का पत्ता रखकर, उनपर गर्म तवा रखा जाना था। उस कठिन अग्नि परीक्षा की बात सुनकर सुमेर सिहर उठा। धानी की कोमल हथेली, गर्म तवे का ताप कैसे सहन करेगी ?

“ माई, गर्म तवा सू विको हाथ जल जावेगो ” वह चिंता से बोल पड़ा।

“ जदी पापिन होएली तो जल जाएली, जदी सच्ची होएली तो बिने आँच भी कोनी आएली “ माई ने कड़वे स्वर में कहा।

सुमेर चिंता में डूबा रहा। क्या यह संभव है कि गर्म तवा हाथ न जलाये ? क्या वह पाप पुन्य में भेद करेगा ? क्या बादल बरसते हुए पापी और पुण्यात्मा  में भेद करते हैं ? क्या सूरज अपनी गर्मी देते हुए  भेदभाव करता है ? मन में सोच – विचार करते हुए, उसने आग पर चढ़ी बटलोई को लगभग बेध्यानी में छू दिया। तीव्र प्रतिक्रिया हुई और ‘श…’ के स्वर के साथ उसका हाथ विद्युत गति से अपने आप गर्म बटलोई से दूर हो गया।

“ के कर रया छोरा, तु तो बिल्कुल गैला हो गयो है “ माँ ने झट से उसकी उंगली पकड़कर फूँक मारी। उँगलियों में तीव्र पीड़ा की अनुभूति हुई।

‘ म्हारो हाथ जल गयो, तो काई मैं भी पवित्र कोनी ! ‘ उसके मन में विचार उभरा। मतलब आग, हवा, पानी, कदी कोई भेदभाव कोनी करै , बस इंसान अपने मन रे हिसाब रै मतलब ढूँढ लेवे करे । ये मनुस्य रै मन रा फितूर है, धानी पाछी जलेगी और फेर दोसी बनायी जाएगी “

उसके मन में विचार, बटलोई में चढ़ी उड़द की दाल की तरह खदबद -खदबद कर रहे थे। उफ़ान आया ही चाहता था। काश कोई चमत्कार हो जाए और धानी को आँच भी न आये। वह पवित्र साबित हो जाए। अगर अब भी वह परीक्षा में सफल न हुई तो क्या होगा? क्या उसे धानी को छोड़ना होगा?

“ तू काई सोच रया है छोरा, ऐसी कुलच्छनी के बारे मी सोचके अपनो माथो खराब कोनी कर, सैकड़ों मिल जावेंगी वा जैसी। “ माई ने उसे तसल्ली दी।

“अब काई होइ माई ?”

“ काई होएगो , अगर कोई बुरा करम कोनी कियो होएगो, तो कल परिच्छा में पास जावेगी। वरना आपन धानी रै  बाप से पाँच लाख से कम कोनी वसूल करेंगे । वाने अपणी बदचलन छोरी म्हारे मत्थे मढ़ दी री ।”

“ माई कहीं ऐसो तो कोनी कि वा सच में निर्दोस हो? “

“ थाने बड़ो रेहम  आ रयो है आपणी बिन्दणी पे ? “ माई के सवाल पर वह मौन रह गया।

उसके दिमाग़ में विचारों का सैलाब चल रहा था। क्या सच है और क्या झूठ, समझ में नहीं आ रहा था। एक ओर मन कहता कि वह धानी कि बात पर विश्वास करे, दूसरी ओर यह भी लगता कि जो परम्पराएं पुरखों ने बनाई हैं वे गलत कैसे हो सकती हैं? अगर उसे धानी को अपने घर से निकालना पड़ा, तो वह उसके बगैर क्या करेगा? उसे धानी बेहद पसंद है। वह किसी और को अपने जीवन में कैसे बर्दाश्त करेगा? वह क्या करे कि उनका साथ न छूटे? रात में वह बेचैनी से इधर -उधर चक्कर काटता रहा। बीच- बीच में धानी की सिसकियाँ और उसकी बड़बड़ाहट सुमेर को और बेचैन कर रही थीं।

उधर गर्म तवा हाथ में रखने का विचार ही धानी को दहशत में डाल रहा था।

“ रै भवानी म्हारी रच्छा कर। काल री परीक्षा में मैं पवित्र साबित होऊं । तू जाणे रे माँ, म्हारा कोई रिस्तो कोनी । पर म्हारे कन्ने ई बात रो कोई सुबूत कोनी है। काल तवे नू बिल्कुल ठंडो कर दीजे । म्हारे साथ ई रहिजे । मन्ने निर्दोस साबित कर दीजे माँ। “ वह कितनी मनौतियाँ मना रही थी। सारी रात अगले दिन की दुश्चिन्ता में गुजर गई।

पंचायत बैठी, तो उस दिन बहुत भीड़ जमा हो गई थी। हर कोई धानी की अग्निपरीक्षा देखने को उत्सुक था। भीड़ के बीच में धानी खड़ी थी। भय से उसके चेहरे पर हवाइयाँ उडी हुई थीं। ऑंखें सूजी हुई थीं और चेहरा रुखा व बेजान नज़र आ रहा था। उसने एक बार करूण दृष्टि से सुमेर की ओर देखा। उसकी दृष्टि में न जाने क्या- क्या था। सुमेर उसे देखकर विचलित हो उठा। उसके वश में होता तो वह किसी भी हालत में धानी की अग्निपरीक्षा न होने देता। उसने एक दृष्टि अपनी माई और बापू पर डाली। उसके दिमाग़ में माई के कहे शब्द गूँजने लगे। कल रात जब वह व्याकुलता में इधर- उधर चक्कर काट रहा था, तभी माई को बापू से कहते सुना

“ मैं तो प्रार्थना करूँ के सुमेर री बिंदनी काल री अग्नि परीच्छा में आपणी पबित्रता साबित न कर पाए। पाछे बाके बापू से पूरे पाँच लाख रुपए वसूलैला। इससे कम मा राजी कोनी होएना।“

“ और जो वे इत्ती रकम देवे वास्ते राजी कोनी हुओ तो? “

“ तो बोल लीजे आपणी छोरी नू ले जावे। हम सुमेर रो दूजो ब्याह कर देवांगे । “

यह सुनकर सुमेर का मन अपने माई बापू के प्रति थोड़ा खट्टा हो गया था।

“ इसको मतलब रै इन्ने म्हारे सुख -दुःख रो कोई मतलब कोनी, बस एन्ने तो रुपिया चाहिबे। हे ईसर.. माई री मनोकामना पूरी मत करजे “ वह देर तक प्रार्थना करता रहा।

सारी रात आँखों में गुजर गई और सुबह आ गई। पंचायत का समय होने से काफ़ी पहले ही, वहाँ काफ़ी मजमा लग गया था। धड़कते हृदय से सुमेर वहाँ पहुँचा। इससे पहले वह कुलदेवता के थान पर भी प्रार्थना कर आया था। उधर धानी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ी हुई थीं। दहशत से वह मरी जा रही थी। “ कैसा लगेगा ज़ब गर्म तवा उसके हाथों पर रखा जाएगा? कैसे बर्दाश्त करेगी वह उसकी जलन? क्या सचमुच वह पवित्र लोगों को नहीं जलाता ? हे ईसर, हे भवानी मैया…म्हारी रच्छा करो। “ भय से उसने ऑंखें ही बंद कर ली थीं।

तभी किसी ने उसके हाथ पकड़कर आगे फैला दिए और उनपर पहले पीपल का पत्ता और फिर उसपर जलता हुआ तवा रख दिया। एक भयंकर जलन उसकी हथेलियों को चीरती सी चली गई।

“ अरे माई री…” अपनी आवाज दबाते -दबाते भी वह जोर से चीख पड़ी और अपनी हथेलियां झटकने लगी। पीड़ा से वह दोहरी हुई जा रही थी। आँख से आँसू बहते जा रहे थे

“ म्हारे साँसी भाइ – बहन आज जा छोरी ढाणी आपणी दूजी परिच्छा में भी फ़ैल होगिये । यो साबित हो गियो कि जे  झूठी और मक्कार और बदचलन है। म्हारे समाज रै हर छोरे ने अच्छी लुगाई पाने रै अधिकार है। अब याके बापू बिनेसर रो पंचायत  हुकुम देवे है या तो आपणी छोरी नू  घर लै जावे नइ याके सासरे वाले नू पाँच लाख रूपये जुरमानें रै भरे। “

पंचायत का यह निर्णय सुनकर बिनेसर असहाय होकर रोने लगा और अपनी पगड़ी सुमेर के बापू के पैरों में रख दी

“ऐसो जुलुम कोनी करो भाई सा, म्हारे पास इत्ती बड़ी रकम कोनी है जो आपको दे सकूँ। “

“ तो अपणी बदचलन छोरी नू घर ले जाओ । “ उन्होंने टका सा जवाब दे दिया।

“ देखो बिनेसर, जुर्मानो तो ठाणे देनो ही पड़ेला । हम ठाणे एक महीने रो बखत देवे हैं, कठे सू वी रकम रो इतज़ाम कर और आपणी छोरी री जिंदगी सुधार दे, नई इने कठे भी ठोर कोनी मिली “ पंच ने अपना फैसला सुना दिया और पंचायत उठ गई। बिनेसर , सोच -विचार में अपना सर पकड़े वहीं बैठा रह गया, कि इतनी बड़ी रकम का इतज़ाम वह कहाँ से और कैसे करे।

सुमेर अपनी सोच में डूबा देर शाम घर लौटा, तो रात हो चुकी थी। उसकी कोठरी का दरवाजा बंद था और घर में मनहूसियत सी छाई थी। धानी के कराहने की आवाज आ रही थी। तभी उसे थप्पड़ की आवाज आयी। उसने अचकचा कर इधर -उधर देखा। अगले ही पल उसके दिमाग़ में कोई ख्याल आया और वह भागकर अपनी कोठरी के पास आया। उसने कोठरी के दरवाजे को धक्का दिया, तो वह धाड़ से खुल गया। वहाँ का दृश्य देखकर उसकी आँखों में खून उतर आया। उसके चचेरे भाई और उसका एक दोस्त धानी के साथ जबरदस्ती कर रहे थे और वह बचने को हाथ पाँव मार रही थी। सुमेर छलांग मारते हुए उनपर टूट पड़ा।

“ या सब काई हो रियो है, काई कर रये हो तुम “ वह गुर्राया।

“ इस बदचलन को सबक सिखा रहे हैं। घणी आग लग रिया थी न वाकी ज…..“ उसने भाई पर मुक्का जड़ दिया तो बाकी शब्द उसके मुँह में ही रह गए।

“ थाने या बदचलन लुगाई पर बड़ो रेहम आवे है। देख्या दोनों अग्निपरीच्छा में या पापिन साबित हो गई। याको बाप भी जुरमाने की रकम देने वास्ते तैयार कोनी।” भाई ने उत्तर दिया।

“ जा छोरी ने सबक मिलनो ही चइए, जिससे बाकी छोरियों नी अकल ठिकाने लागे, कि सादी से पेले ही अठे- वठे, कठे बी मुँह कोनी मारनो चइये । “ भाई के दोस्त ने कहा।

यह सुनकर उसके क्रोध का ठिकाना न रहा और वह दोनों पर लात घूँसे के साथ पिल पड़ा। उनदोनों ने भी प्रतिवादस्वरूप उसपर कई मुक्के जमाए। अंत में सुमेर को क्रोध से पागल होता देख, उन दोनों ने वहाँ से खिसक लेने में ही भलाई समझी। अब वह धानी की ओर उन्मुख हुआ, तो वह एक ओर सिकुड़ी हुई सिसक रही थी। उसने सुमेर को जिस दृष्टि से देख, वह उसका सामना नहीं कर पाया और वहाँ से निकल गया।

धानी की दृष्टि में शिकायत, उपेक्षा और न जाने क्या -क्या था। सुमेर को महसूस हुआ कि वह उससे पूछ रही थी कि “ काई इसी बूते नू तू म्हारे साथ बियाओ करियो हो तो? तन्ने म्हारे वास्ते इत्तो ही बिस्वास कोनी तो पाछे विवाह मंडप में कस्मा क्यूँ खाई थी? तू तो म्हारो सुख दुःख रो साथी हो, म्हारी रक्छा करन दायित्व थारे माथे, खूब रक्छा करी तन्ने। थारे पे लानत है सुमेर ”

“ घर रा सारा लोग कठे गया ? माँ बापू कई जानबूझ रै कहीं चला गया है ऐई लोग …”

सुमेर की ऑंखें सोचने के अंदाज में सिकुड़ गईं। उसकी आँखों के सामने कितनी ही नई दुल्हनों की दुर्दशा के दृश्य कौँध गए, जो उनके अपना कौमार्य साबित न कर पाने के बाद हुआ था। उनके अपने ही परिवार के पुरुषों ने उनका बलात्कार किया, उनके जननांग में मिर्च भर दी गई थी। क्या धानी भी अब उसी अंजाम की ओर अग्रसर है? यह विचार ही उसमें सिहरन भर गया था। अब वह क्या करे, क्या न करे? अपने समाज की इस परम्परा को वह कैसे बदल सकता है। यह सब तो हर घर में होता है। वह कोई अनोखा थोड़ी है जो उसके साथ न होगा। परंपराएं तो पुरखों के जमाने से चली आ रही हैं। वह सोच समझकर ही बनाई गई होंगी। इनमें टांग अड़ाना कोई अच्छी बात तो नहीं। क्या पता उसे पाप लगे। समाज के रिवाजों के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का अंजाम अच्छा नहीं होगा। वह इन परम्पराओं को मानने को विवश है। सोच -सोच कर उसके सर में भयंकर दर्द होने लगा।

देर रात जब वह घर लौटा तो नशे में झूम रहा था। फिर वह दरवाजे पर ही धुत होकर ढह गया। माई- बापू ने एक बार उसे सम्हालने का प्रयास किया, फिर असफल होने पर उसे उसकी हालत में छोड़कर सोने चले गए। धीरे -धीरे रात गहराती जा रही थी। सूने आसमान में इधर -उधर छिटके सितारों की रोशनी भी मानो धानी के दुर्भाग्य पर रोने से मद्धिम पड़ गई थी। चारों ओर निस्तब्धता फैली थी। बीच -बीच में झींगुरों की आवाज आ रही थी, तो कभी -कभी धानी की उसाँसों की।

वह कोठरी के एक कोने में लुटी पिटी सी, पीड़ा से पस्त भूमि पर पड़ी थी। लोगों ने उसके साथ हैवानियत दिखाने में कोई कसर न छोड़ी थी। पूरी देह में नोचने, खसोटने और जख्मों के निशान थे। वह तो भाग्य अच्छा था कि सुमेर समय से आ गया , वरना वे दोनों हैवान उसका न जाने क्या हाल करते।

“ काईं सुमेर नू म्हारी परवा है….अगर परवा होती तो यों अकेलो क्यों छोड़ रे जातो….लेकिन रसमों रिवाजों में भलो कुण बोल सके…पर म्हारे साथ ही ऐसो क्यों हुओ… म्हारो तो कोई दोस ही कोनी…मन्ने कदी किसी पुरुस रे बारे में सोच्यो ही कोनी । मैं तो पूरी तरह आपने पति नू ही समरपित थी… पाछे अग्निपरीच्छा नू क्यूँ नी खरी उतरी… अगर भगवान तू सचमुच है…तो मने बचा। ऐड़ो जीनो से तो मर जानो ही बेहतर है । अब जाने कौन सी बिपदा आये। बापू के कन्ने जो रकम थी, वा तो म्हारे ब्याओ में लाग गी। अब इत्ती बड़ी रकम वा कठ्ठो से ल्यावेगा… भगवान किसी ने लुगाई न बणावे, और बणावे तो वाके ऐसी जिल्लत भरी ज़िनगी न देवे ।” वह आहत स्वर में बुदबुदाए जा रही थी।

“ भगवान करे म्हारो समाज निर्वन्सी हो जावे । इसको धरती पे से निसान मिट जाए। जे औरतां वास्ते एड़ा एड़ा क़ानून -कायदे निकारे । भगवान करे इन सारे मर्दन ने एणी जिंदगी मिले इने लुगाईयाँ न मुँह कोनी देखने मिले। इने कीड़ा पड़ें…. तड़प तड़प के मरें… “

“ अब और बर्दास्त कोनी होवे , अब किके वास्ते जिन्दा रेवोँ। “ उसने एक बार निराशा भरी नज़रों से दरवाजे की ओर देखा, जो बाहर से बंद था। फिर उसने जोर से अपने सिर को दीवार पर मारा। पीड़ा की एक तीखी लहर मस्तक पर से उठी। धानी को अब किसी पीड़ा की परवाह न थी। वह अपना सिर बार – बार दीवार पर मारने लगी। तभी एक हाथ उसके सिर और दीवार के बीच आ गया। इससे पहले की वह कोई आवाज निकालती, सुमेर उसके कान में धीमे से फुसफुसाया।

“ अपणी जान देने के बजाय अठे सू निकलबा की कोसिस कर, आ…“ कहते हुए सुमेर ने एक चादर उसकी देह पर चारों ओर लपेट दी। अब वह उसका हाथ पकड़कर बाहर की ओर खींचने लगा। धानी ने अपने होंठों को कसकर दांतों के बीच भींच लिया, ताकि भूल से भी कोई स्वर उसके होंठों से न निकल जाए और पूरी शक्ति जुटाकर उठी व सुमेर का हाथ पकड़े हुए लड़खड़ाती सी चल दी।

  • ज्योत्स्ना कपिल
    संप्रति – स्वतंत्र लेखन, शिक्षा – एम ए (अंग्रेजी साहित्य) बी एड
    दो कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह तीन उपन्यास प्रकाशित
    सम्पादन – दो लघुकथा संकलन, त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका ‘ अविराम साहित्यिकी, ई पत्रिका ‘पंखुड़ी‘
    सम्पर्क – 9412291372
    मेल – [email protected]
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4 टिप्पणी

  1. मर्मस्पर्शी कहानी । कितने सलीब- सच कहा ज्योत्स्ना जी। पर ये सलीब केवल स्त्री के लिए ही क्यों? परम्पराओं को मानना अच्छा है, लेकिन जब वे अंधविश्वास का रूप लेकर नासूर बन जाएँ तो स्वस्थ समाज के लिए विनाशकारी हैं। पवित्रता की कसौटी का यह क्या मापदंड है। यह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके न होने के कारण हैं। मर्मस्पर्शी कहानी तो है
    प्रादेशिक भाषा का प्रवाह और सकारात्मक अंत बहुत सुंदर है।बहुत-बहुत बधाई ।

    • आपका बहुत बहुत आभार दीदी, रचना को समय देने और उसपर प्रतिक्रिया भी देने के लिए

  2. रोंगटे खड़े करने वाली कहानी । एक सांस में पढ़ गई । स्त्रियों ने क्या क्या अत्याचार झेले हैं, मात्र शक को दूर करने के लिए । कहानी कि भाषा ने भाव में चार चाँद लगा दिए । इस मार्मिक कहानी के लिए खूब बधाई

  3. आपका दिल से शुक्रिया वंदना जी, कहानी को समय व प्रतिक्रिया दोनों देने के लिए. आपकी टिप्पणी ने बहुत उत्साह बढ़ाया

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