- शताब्दी लेख – ऋषभदेव शर्मा एवं कुमार लव
एक : पगना परंपरा में
“पगना” रसोई का शब्द है। गुझिया चाशनी में पगती है। पगने के बाद वह वही गुझिया नहीं रह जाती, जो कड़ाही से निकली थी। चाशनी उसके ऊपर नहीं बैठती, भीतर उतरती है, और उतरकर उसका अपना स्वाद बदल देती है। यही कारण है कि हिंदी में हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति संस्कारों में पगा हुआ है, प्रेम में पगा हुआ है, भक्ति में पगा हुआ है। सना हुआ कहने से बात नहीं बनती, क्योंकि सना हुआ ऊपर से लिपटा रहता है। भीगा हुआ कहने से भी नहीं बनती, क्योंकि भीगा हुआ सूख सकता है।
यह भेद छोटा नहीं है, और डॉ. विद्यानिवास मिश्र (1926 – 2005) पर लिखते समय यह भेद ही सबसे पहली बात है जिसे साफ़ कर लेना चाहिए।
बीसवीं सदी के हिंदी साहित्य में परंपरा के जानकारों की कमी कभी नहीं रही। वेद, उपनिषद्, काव्यशास्त्र, पुराण, इनके उद्धरण देने वाले लेखक हर पीढ़ी में मिलते हैं। कुछ ने परंपरा को हथियार बनाया, कुछ ने ढाल, कुछ ने सजावट। लेकिन परंपरा को जानना और परंपरा में पगना, ये दो अलग स्थितियाँ हैं। जानने वाला परंपरा को उद्धृत करता है। पगा हुआ लेखक उसे बरतता है, और बरतते हुए उसका स्वाद बदल जाता है।
मिश्र जी की केंद्रीय उपलब्धि यही है, और शताब्दी वर्ष में उन पर लिखने का कोई अर्थ है तो यही है। वे भारतीय ज्ञान परंपरा के व्याख्याता भर नहीं थे। वे उसके एक जीवित प्रतिरूप थे। उनका ललित निबंध उस परंपरा पर लिखा गया गद्य नहीं है। वह स्वयं उस परंपरा की एक ज्ञान-पद्धति है, जो अपने पाठक को सूचना नहीं देती, दृष्टि देती है।
यह दावा बड़ा है। इसे सिद्ध करना होगा।
दो: दो शिक्षाएँ, एक साथ
गोरखपुर जनपद का पकड़डीहा गाँव। 14 जनवरी 1926 (कुछ स्रोत 28 जनवरी देते हैं, और इस विसंगति को छिपाने की कोई ज़रूरत नहीं)। पिता पंडित प्रसिद्ध नारायण मिश्र पेशे से अधिवक्ता थे, पर शास्त्र और धर्म के नीति-पक्ष के गंभीर अध्येता भी। माता गौरा देवी की आस्था लोक में थी, गाँव के अनुष्ठानों में, व्रत-पर्व में, उन गीतों में जो स्त्रियाँ काम करते हुए गाती हैं।
जीवनी-लेखक इस विवरण को पारिवारिक पृष्ठभूमि कहकर आगे बढ़ जाते हैं। हमें यह लेख का सबसे ज़रूरी तथ्य लगता है। एक ही घर में शास्त्र और लोक दो अलग कमरों में नहीं, एक साथ रह रहे थे, और बालक ने उन्हें परस्पर लड़ते हुए नहीं देखा। जिस अद्वैत को वे बाद में सिद्धांत की तरह स्थापित करेंगे, उसे उन्होंने पहले घर में घटित होते देखा था। सिद्धांत बाद में आया, अनुभव पहले।
आरंभिक शिक्षा गाँव में। फिर गोरखपुर के स्कूल और कॉलेज। इसी दौर में एक मोड़ आया जिसे उन्होंने स्वयं बिना किसी सफ़ाई के दर्ज किया है। कुल में संस्कृत-अध्ययन की परंपरा थी, पर उनका मन उधर से हट गया। रुद्री के “गणानांत्वा” से आगे वे बढ़ नहीं पाए और ए बी सी डी लिखने लगे।
यह वाक्य महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उस पूरी छवि को तोड़ता है जो शताब्दी-लेखों में गढ़ी जाती है। वे परंपरा में जन्मे और परंपरा में ही रम गए, ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने पहले परंपरा छोड़ी। संस्कृत की ओर वे लौटे, और लौटे विश्वविद्यालय पहुँचकर, चुनाव करके। जिस चीज़ की ओर छोड़कर लौटा जाता है, उससे संबंध विरासत का नहीं रह जाता, निर्णय का हो जाता है।
प्रयाग (इलाहाबाद) विश्वविद्यालय से 1945 में संस्कृत में स्नातकोत्तर। हिंदी विभागाध्यक्ष क्षेत्रेशचंद्र चट्टोपाध्याय उनके प्रेरक-गुरु रहे। साथ-साथ, और यही असल बात है, पितृव्य पंडित मुनिवर मिश्र से पारंपरिक ढंग की संस्कृत की दीक्षा ली, और 1946 में राजकीय संस्कृत कॉलेज वाराणसी से साहित्य शास्त्री की उपाधि अर्जित की।
दोनों शिक्षाएँ समानांतर चल रही थीं। एक ओर आधुनिक विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, डिग्री, भाषाविज्ञान। दूसरी ओर गुरुमुख से मिलने वाली वह शिक्षा जिसमें पाठ्यक्रम नहीं होता, केवल पाठ होता है। अधिकांश लोग इनमें से एक चुनते हैं और दूसरे को अपनी विशेषज्ञता के बाहर मानकर छोड़ देते हैं। मिश्र जी ने दोनों को एक साथ पूरा किया, और बाद में यही दोहरापन उनकी पूँजी बना।
हिंदी, संस्कृत, अंग्रेज़ी के अतिरिक्त उन्हें पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, भोजपुरी, मैथिली, बांग्ला, उर्दू, अवेस्ता, पुरानी फ़ारसी और फ़्रेंच का ज्ञान था। इस सूची को गिनाना आसान है और इसका अर्थ समझना मुश्किल। इतनी भाषाओं में आवाजाही करने वाला व्यक्ति भाषा को पवित्र वस्तु की तरह नहीं देख सकता। वह उसे औज़ार की तरह देखता है, और औज़ार को बरतने वाला जानता है कि हर औज़ार की एक सीमा होती है।
फिर वह प्रसंग, जिसे इस लेख में सजावट की तरह नहीं, प्रमाण की तरह रखना चाहिए। पिता के निधन के शोक में मुंडित सिर, शिखा, पारंपरिक भारतीय वेश। इसी रूप में वे अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पहुँचे। यूरोपीय, रूसी और यूनानी विद्वान देखकर चकित रह गए, और यह चकित होना स्वाभाविक था। फिर उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र पर धाराप्रवाह अंग्रेज़ी में व्याख्यान दिया।
इस दृश्य में जो बात असल में उल्लेखनीय है, वह वेश नहीं है। वेश तो कोई भी धारण कर सकता है, और आज तो सांस्कृतिक प्रदर्शन का एक पूरा उद्योग इसी पर टिका है। उल्लेखनीय यह है कि वेश और व्याख्यान के बीच कोई विरोध उन्हें महसूस ही नहीं हुआ। उन्हें अपनी वेशभूषा की सफ़ाई नहीं देनी पड़ी, और न ही अपनी अंग्रेज़ी की। यह आत्मविश्वास पढ़कर नहीं आता। यह पगे होने से आता है।
पुरी के जगन्नाथ मंदिर वाला प्रसंग इसे और स्पष्ट करता है। वे एकादशी का कठोर व्रत रखते थे और दूसरों के हाथ का बना भोजन नहीं करते थे। जगन्नाथ मंदिर में लोक-आस्था के सामने उन्होंने अपने दोनों नियम तोड़ दिए और कच्चा महाप्रसाद ग्रहण किया। डॉ. शंकरलाल पुरोहित की टिप्पणी इस पर सटीक है कि उन्होंने धर्म को मुकुट की तरह सिर पर नहीं, “जनेऊ की तरह भीतर” धारण किया था। जो चीज़ भीतर पहनी जाती है, उसे दिखाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, और ज़रूरत पड़ने पर उसे एक बार ढीला भी किया जा सकता है।
तीन: पहला प्रमाण; पाणिनि कठघरे में नहीं, मंच पर
1960-61 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से उनका शोध पूरा हुआ। विषय था पाणिनीय व्याकरण की विश्लेषण पद्धति, अंग्रेज़ी में “The Descriptive Technique of Panini”.
इस शोध का महत्व समझने के लिए उस समय की स्थिति देखनी होगी। पश्चिमी भाषाविज्ञान अपनी वर्णनात्मक और संरचनात्मक पद्धति का आरंभ सस्यूर से मानता आया था, और आगे चलकर चॉम्स्की से। भारतीय पक्ष से इसका उत्तर आमतौर पर दो में से एक होता था। या तो चुप्पी, या फिर वह गर्वोक्ति जो कहती है कि यह सब हमारे यहाँ पहले से था।
मिश्र जी ने तीसरा रास्ता लिया, और यही उनकी विद्वत्ता की असली कसौटी है। उन्होंने दावा नहीं किया, विश्लेषण किया। अष्टाध्यायी में धातु, प्रत्यय और आगम की जो व्यवस्था है, उसे उन्होंने पद्धति के स्तर पर खोलकर दिखाया, और दिखाया कि यह किसी भी अर्थ में एक पूर्ण वर्णनात्मक-संरचनात्मक प्रणाली है, जिसे आधुनिक भाषाविज्ञान की शब्दावली में पढ़ा और परखा जा सकता है।
फ़र्क़ महीन है पर निर्णायक। गर्वोक्ति परीक्षा से बचती है। पद्धति परीक्षा को आमंत्रित करती है। मिश्र जी ने पाणिनि को कठघरे में खड़ा नहीं किया, न ही मंदिर में बिठाया। उन्होंने उन्हें मंच पर रखा, जहाँ दूसरे व्याकरणविदों के साथ उनकी तुलना संभव हो।
आज जब भारतीय ज्ञान परंपरा एक नीतिगत श्रेणी बन चुकी है, पाठ्यक्रम में जिसके लिए क्रेडिट निर्धारित हैं, यह भेद और ज़रूरी हो गया है। परंपरा का गुणगान सस्ता है। परंपरा को उस भाषा में अनूदित करना जिसमें वह जाँची जा सके, महँगा है। मिश्र जी ने महँगा वाला काम किया।
डॉ. जगदीश डिमरी के अनुसार वे अष्टाध्यायी को अपनी बाइबल मानते थे और उसे सदा साथ रखते थे। यह भावुक श्रद्धा नहीं थी। जो पुस्तक साथ रहती है, वह बार-बार खुलती है, और बार-बार खुलने वाली पुस्तक याद नहीं की जाती, बरती जाती है।
भाषा-दर्शन के स्तर पर उनका सबसे बड़ा योगदान इस स्थापना में है कि भारतीय ज्ञान परंपरा मूलतः भाषा-केंद्रित परंपरा है। यहाँ शब्द की सत्ता ब्रह्म के समकक्ष रखी गई है। उन्होंने व्याकरण, न्याय और मीमांसा के आलोक में स्फोटवाद की पड़ताल की, और उणादि सूत्रों के महत्व को रेखांकित किया, जो उन जटिल शब्दों की व्युत्पत्ति संभव बनाते हैं जिन्हें सामान्य व्याकरणिक नियम नहीं पकड़ पाते।
सबसे उपयोगी सूत्र उन्हें ऋग्वेद और भर्तृहरि के वाक्यपदीय से मिला, वाक् के चार स्तर। परा और पश्यंती, जहाँ विचार और भाषा अभी अलग नहीं हुए हैं। मध्यमा, जहाँ विचार मन में आकार लेने लगता है। और वैखरी, वह स्थूल ध्वन्यात्मक रूप जो कान तक पहुँचता है।
आइए, अब इस बात को उनके निबंधों के साथ रखकर देखें, क्योंकि यहीं भाषावैज्ञानिक और निबंधकार एक होते हैं।
यदि वैखरी वाक् का सबसे बाहरी छिलका भर है, तो लिखने वाले का काम केवल स्पष्ट लिखना नहीं रह जाता। उसका काम बाहरी परत से भीतर की ओर लौटना बन जाता है। यही कारण है कि उनके निबंध सीधी बात नहीं कहते। वे बात के चारों ओर घूमते हैं, टेढ़े चलते हैं, प्रसंग से प्रसंग में उतरते हैं। यह शैली का चोंचला नहीं है, यह उनके अपने भाषा-दर्शन की तार्किक परिणति है।
वे स्वयं कहते थे कि शैली उनके लिए साधन है, साध्य नहीं। इस वाक्य को उनके विरोधी भी उद्धृत करते हैं और प्रशंसक भी। दोनों प्रायः चूक जाते हैं। साधन का अर्थ मामूली नहीं होता। साधन वह है जिससे साध्य तक पहुँचा जाए, और गलत साधन से साध्य तक पहुँचा ही नहीं जा सकता।
चार: दूसरा प्रमाण; लोक और शास्त्र का अद्वैत
औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीय अकादमिक जगत को एक साफ़-सुथरा विभाजन सौंपा था। लोक यानी ग्रामीण, अपरिष्कृत, आदिम, अध्ययन की वस्तु। शास्त्र यानी नागर, परिष्कृत, अभिजात, अध्ययन का उपकरण। यह विभाजन इतना गहरा बैठा कि लोक-साहित्य पर काम करने वाले विद्वान भी प्रायः इसी ढाँचे के भीतर काम करते रहे, बस मूल्य-क्रम उलटकर।
और यही वह जगह है जहाँ मिश्र जी की स्थिति को ठीक से समझना ज़रूरी है, क्योंकि उन्हें आमतौर पर ग़लत समझा जाता है।
बीसवीं सदी में लोक-पक्षधरता की एक पूरी धारा रही है, जो शास्त्र को सत्ता का उपकरण मानकर लोक को उसके विरुद्ध खड़ा करती है। यह उल्टा विभाजन है, पर विभाजन ही है। मिश्र जी ने यह नहीं किया। उन्होंने विभाजन को उलटा नहीं, रद्द किया।
उनका अपना सूत्र-वाक्य है कि लोक शास्त्र-विरुद्ध नहीं, शास्त्र-पूरक है, और शास्त्र भी लोक-स्वीकृतियों का एक घनीभूत रूप है।
इस वाक्य के दूसरे हिस्से पर रुकिए। घनीभूत! यानी शास्त्र कहीं बाहर से नहीं आया। वह लोक में जो पहले से स्वीकृत था, उसी का सघन, व्यवस्थित, संहिताबद्ध रूप है। इस तर्क में शास्त्र का दर्जा घटता नहीं है, उसकी वंशावली बदल जाती है। वह ऊपर से उतरा हुआ आदेश नहीं रह जाता, नीचे से जमा हुआ अनुभव बन जाता है।
और लोक की उनकी परिभाषा भी उतनी ही ज़रूरी है। लोक उनके यहाँ केवल गाँव की जनता नहीं है। लोक न प्राचीनता का सूचक है, न पिछड़ेपन का, न किसी सीमित समुदाय का। उसमें समूचा चराचर समाया हुआ है, नदियाँ, पेड़, पशु-पक्षी, ऋतुएँ, पर्व। डॉ. विद्याबिंदु सिंह ने ठीक लक्षित किया है कि उनके लोक-विमर्श में नदी केंद्रीय बिंब है, और वे लोक-संस्कृति तथा स्त्री, दोनों को नदी के बिंब में देखते थे।
यहीं आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से उनका भेद स्पष्ट होता है, और यह भेद बताए बिना उन पर लिखना अधूरा है।
द्विवेदी जी के निबंधों की रीढ़ ऐतिहासिकता है। वे संस्कृति के इतिहासकार हैं। अशोक का फूल हो या कुटज, वे वस्तु के पीछे की सांस्कृतिक यात्रा खोलते हैं, और उस खोलने में एक विद्वान की तटस्थ प्रसन्नता रहती है। मिश्र जी इतिहासकार नहीं, सहभागी हैं। उनके निबंध में शोध कम है और स्मृति ज़्यादा, तर्क कम है और राग ज़्यादा। द्विवेदी जी बताते हैं कि यह वृक्ष कहाँ से आया। मिश्र जी बताते हैं कि इस वृक्ष की छाँह में बैठने पर क्या होता है।
दोनों में कोई श्रेष्ठ-कनिष्ठ का प्रश्न नहीं है। पर जो लोग मिश्र जी को द्विवेदी जी का प्रतिरूप कहकर संतुष्ट हो जाते हैं, वे दोनों के साथ अन्याय करते हैं।
‘परंपरा बंधन नहीं’ (1976) में उनका सबसे प्रसिद्ध तर्क आता है, कि भारतीय संस्कृति की पाचन-शक्ति असाधारण रही है, जिसने शकों, हूणों और कुषाणों को अपने भीतर घोल लिया। परंपरा उनके लिए ज़ंजीर नहीं, गति थी।
यह तर्क सुंदर है और आंशिक रूप से सही भी। पर इसकी एक सीमा है जिसे शताब्दी वर्ष में दबा देना बेईमानी होगी। पाचन का रूपक अवशोषण की हिंसा को मुलायम कर देता है। जो पचा लिया गया, उसने भी कुछ खोया था, और वह खोना इस रूपक में दर्ज नहीं होता। मिश्र जी इस प्रश्न से टकराते नहीं। यह उनकी दृष्टि का एक अंधा कोना है, और इसे स्वीकार करके ही उनकी बाक़ी स्थापनाओं को गंभीरता से लिया जा सकता है।
पाँच: तीसरा प्रमाण – गद्य जहाँ स्वयं ज्ञान-पद्धति बन जाता है
अब तीन निबंधों पर। यही इस लेख का असल काम है, क्योंकि स्थापनाएँ पाठ से सिद्ध होती हैं, घोषणा से नहीं।
मेरे राम का मुकुट भीग रहा है
निबंध की शुरूआत किसी शास्त्र से नहीं होती। रात है, मूसलाधार बारिश हो रही है, और घर का लड़का अपने दोस्तों के साथ किसी संगीत समारोह में गया हुआ है। लौटने में देर हो रही है। पिता चिंतित हैं।
यह पूरी तरह घरेलू, पूरी तरह सामान्य चिंता है। हर घर में होती है।
फिर स्मृति में एक टेर उठती है, वही जो दादी-नानी गाया करती थीं। मेरे राम का मुकुट भीग रहा होगा। लक्ष्मण का दुपट्टा भीग रहा होगा। सीता की माँग का सिंदूर भीग रहा होगा।
और यहाँ से निबंध पलट जाता है।
मिश्र जी की व्याख्या में यह राम दशरथ के पुत्र भर नहीं रह जाते। वे वह हैं जिसे लोकमन ने अपना आदर्श मानकर मुकुट पहनाया है। और लोकगीत की चिंता ध्यान से देखिए, वह यह नहीं है कि राम भीग रहे हैं। वह यह है कि मुकुट भीग रहा है। शरीर की चिंता नहीं, मर्यादा की चिंता। जो समाज अपने नायक को वन भेज चुका है, वह वर्षा में उसके भीगने को रोक नहीं सकता, पर उसकी गरिमा के भीगने से काँप उठता है।
लक्ष्मण का कमरबंद दुपट्टा प्रहरी की सजगता का चिह्न है। सीता का सिंदूर न भीगे, यह स्त्री के सौभाग्य की मंगलकामना है। भवभूति को याद करते हुए वे कहते हैं कि जब सब कुछ उलट-पलट जाता है, तब पहचान के लिए ऊँचे पहाड़ और राजमुकुट ही शेष रहते हैं।
और फिर निबंध लौटता है, वहीं, उस बरसाती रात में, उस पिता के पास।
नई पीढ़ी को यह चिंता दक़ियानूसी लगती है, और वह ग़लत भी नहीं है। पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के भौतिक उत्कर्ष से नहीं डरती। वह उसके नैतिक क्षरण से डरती है, और यह डर प्रायः बिना प्रमाण के होता है, इसलिए संवाद असंभव हो जाता है।
अब उस गति को देखिए जो निबंध ने पूरी की। एक निजी चिंता से लोकगीत तक। लोकगीत से रामकथा तक। रामकथा से भवभूति तक। और भवभूति से वापस उसी बरसाती रात तक, जहाँ से चला था।
यह वृत्त है, सीधी रेखा नहीं। और वृत्त बंद होने पर पाठक वहीं खड़ा है जहाँ शुरू में था, पर अब वह जगह वैसी ही नहीं दीखती!
गऊचोरी
‘गऊचोरी’ निबंध की शुरूआत और भी मामूली है, लगभग बतकही से। बात गाय की चोरी से चलती है, जो गाँव की एक साधारण घटना है।
फिर वह चलती जाती है। गाय की चोरी से भूमि की चोरी। भूमि से राज्य की चोरी। राज्य से साहित्य की चोरी। और अंत में चित्तचोरी, यानी राधा-कृष्ण।
पढ़ते हुए लगता है कि लेखक बहक गया है। ध्यान से देखिए तो यह बहकना नहीं, चढ़ना है। वे एक शब्द पकड़ते हैं और उसकी सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ते जाते हैं, जब तक कि अपराध की शब्दावली में सबसे लौकिक और सबसे पवित्र, दोनों एक ही तख़्ते पर खड़े नहीं हो जाते। चोरी अपराध है, चोरी लीला भी है, और भाषा दोनों के लिए एक ही शब्द रखती है।
यह वक्रोक्ति की शुद्ध प्रविधि है। कुंतक ने कहा था कि काव्य का प्राण वक्रता में है, सीधी उक्ति में नहीं, क्योंकि सीधी उक्ति सूचना देती है और वक्र उक्ति अर्थ खोलती है। मिश्र जी वक्रोक्ति पर व्याख्यान नहीं देते। वे उससे चलते हैं। यह अंतर पूरे निबंध का केंद्रीय अंतर है।
व्यंग्य और विनोद यहाँ भरपूर है, पर बिना कड़वाहट के। मिश्र जी का व्यंग्य अपने विषय से घृणा नहीं करता, उसे खोलता है।
फागुन दुइ रे दिना
शीर्षक ही तर्क है। फागुन के दो ही दिन हैं। उत्सव की सबसे बड़ी सच्चाई उसका छोटा होना है।
निबंध इसी बिंदु से दर्शन में उतरता है। सुख की क्षणभंगुरता पर भवभूति और महाभारतकार को याद करते हुए वे वह वाक्य लिखते हैं जो अब उनसे अलग करके भी उद्धृत किया जाता है, कि: सुख दगाबाज़ है, पर दुख बड़ा वफ़ादार साथी है।
इस वाक्य की चतुराई इसकी संरचना में है। यह सुख की निंदा नहीं करता, उसे बेवफ़ा प्रेमी बना देता है, और दुख को स्तुति नहीं देता, उसे वह रिश्तेदार बना देता है जो कभी नहीं छोड़ता। यह लोक की कहन है, शास्त्र की नहीं। शास्त्र सुख-दुख को श्रेणियाँ कहता है, लोक उन्हें चरित्र बना देता है।
फिर वे शिव को ले आते हैं, और यहीं निबंध सबसे तीखा होता है।
शिव इस निबंध में यायावर हैं। विरूपिया भिखमंगा, जो दर-दर घूमकर लोगों से अहंकार की भीख माँगता है! पार्वती पूछती हैं कि आप अपात्रों को ऐश्वर्य क्यों बाँट देते हैं, बाणासुर को, रावण को। शिव हँसकर उत्तर देते हैं कि ऐश्वर्य की परिणति मद है, और मद को अंततः नष्ट होना ही है।
यह ऋतु-निबंध की आड़ में लिखी गई राजनीतिक टिप्पणी है। सत्ता जिसे वरदान समझती है, वह वरदान नहीं, प्रतीक्षा है। शिव अपात्र को ऐश्वर्य देकर दंड नहीं टालते, दंड की व्यवस्था करते हैं।
तीनों में एक ही प्रविधि
तीनों निबंध अलग हैं, पर तीनों में एक ही चाल है।
पहले लोक की कोई टेर, कोई कहावत, कोई साधारण घटना उठाई जाती है। फिर उसे शास्त्रीय संदर्भ से जोड़ा जाता है, भवभूति, महाभारत, पुराण, रामकथा। और फिर, यही सबसे ज़रूरी है, उसे वापस लोक में उतार दिया जाता है। निबंध शास्त्र में समाप्त नहीं होता। वह लौटता है।
अधिकांश विद्वान लेखक इस यात्रा का पहला और दूसरा चरण पूरा करते हैं। लोक से उठाते हैं, शास्त्र तक ले जाते हैं, और वहीं छोड़ देते हैं। परिणाम यह होता है कि लोक व्याख्या की वस्तु बन जाता है और शास्त्र व्याख्या का अधिकार। पदानुक्रम बना रहता है, बस उसे विनम्रता से ढक दिया जाता है।
मिश्र जी तीसरा चरण पूरा करते हैं, और इसी से उनका दावा प्रमाणित होता है। जब निबंध लोक में लौटता है, तो वह यह घोषित करता है कि शास्त्र मंज़िल नहीं था, रास्ता था।
इसीलिए हम इसे शैली नहीं, ज्ञान-पद्धति कहना चाहेंगे। शैली में विषय अलग रहता है और तरीक़ा अलग। यहाँ तरीक़ा ही विषय है। निबंध लोक और शास्त्र के मेल की सूचना नहीं देता, वह मेल घटित करता है, और पाठक उसे पढ़ते हुए सीखता नहीं, अनुभव करता है।
पढ़ना यहाँ जानकारी लेना नहीं, अभ्यास करना है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की अपनी शिक्षण-दृष्टि है, जहाँ ज्ञान हस्तांतरित नहीं होता, घटित होता है।
छह: भाषा जहाँ स्वयं तर्क बन जाती है
पंडित विद्यानिवास मिश्र के निबंधों में पुरइन, कँवलगट्टा, टिकोरा, होरहा, कँवलदेइया जैसे ठेठ शब्द बिना किसी हिचक के आते हैं। पेड़ की गाँठ से नई कोंपल निकलने को वे कल्ले फूटना कहते हैं।
इन शब्दों को आंचलिक रंग कहकर टाल देना आसान है। पर, वह टालना ग़लत होगा।
कल्ले फूटना कहिए, फिर अंकुरण कहिए। दोनों एक ही जैविक घटना बताते हैं। पर कल्ले फूटने में एक दबाव है, एक ज़िद है, कुछ भीतर से बाहर आने की चेष्टा जो गाँठ को फोड़कर निकलती है। अंकुरण में यह नहीं है। अंकुरण प्रक्रिया का नाम है, कल्ले फूटना घटना का।
मिश्र जी का तर्क यही था। लोक-शब्द सजावट नहीं होते, वे भंडार होते हैं। हर लोक-शब्द अपने साथ एक पूरा अनुभव-संदर्भ लेकर चलता है, और उसका तत्सम पर्याय उस संदर्भ को नहीं ढो पाता। शब्द खोने का अर्थ पर्याय बदलना नहीं होता, अनुभव खोना होता है।
इसीलिए उनके यहाँ गंध सबसे प्रबल तत्त्व है। छितवन की छाँह, कटहल की डाल, गाँव की गीली मिट्टी। गंध ही वह इंद्रिय-अनुभव है जिसका अनुवाद सबसे कठिन है, और स्मृति से जिसका रिश्ता सबसे सीधा।
अब इसे उनकी पत्रकारिता के साथ रखिए, क्योंकि दोनों एक ही दर्शन के दो रूप हैं।
1992 से 1994 तक वे “नवभारत टाइम्स” के प्रधान संपादक रहे। उस दौर में हिंदी पत्रकारिता दो तरफ़ से दबाव में थी। एक ओर सरकारी हिंदी, वह क्लिष्ट राजभाषा जिसे कोई नहीं बोलता और सब लिखते हैं। दूसरी ओर हिंग्लिश का तेज़ी से बढ़ता प्रवाह।
मिश्र जी ने दोनों का विरोध किया, और यही उनकी स्थिति को दिलचस्प बनाता है। वे शुद्धतावादी नहीं थे। उनका आग्रह था कि अख़बार आंचलिक बोलियों के शब्दों को जगह दे, ताकि भाषा दुरूह होने से बचे। यानी हिंदी की रक्षा संस्कृत की ओर भागकर नहीं, बोलियों की ओर लौटकर होगी।
अंग्रेज़ी पर उनकी स्थिति भी उतनी ही साफ़ थी। विज्ञान, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय संपर्क की भाषा के रूप में उन्हें उससे कोई शिकायत नहीं थी। शिकायत उसे रुतबे की भाषा बना देने से थी। एक संस्मरण में वे दिल्ली के लक्ष्मीनगर की एक घटना का ज़िक्र क्षोभ के साथ करते हैं, जहाँ एक पिता ने अपने छोटे बच्चे को “आम” कहने पर चाँटा मारा और “मैंगो” कहलवाया।
यह प्रसंग उनके पूरे भाषा-चिंतन का सार है। बच्चे से “आम” शब्द नहीं छीना जा रहा था। उससे वह आम छीना जा रहा था जो गर्मियों में पेड़ से गिरता है, जिसे टिकोरा कहते हैं जब वह कच्चा हो। मैंगो एक फल है। आम एक मौसम है।
अगस्त 1995 में उन्होंने ‘साहित्य अमृत’ की स्थापना की और आजीवन उसका संपादन किया। इससे पहले वे “एनसाइक्लोपीडिया ऑफ़ हिंदुइज़्म” के भारत-संस्करण के प्रधान संपादक भी रहे, और राहुल सांकृत्यायन के निर्देशन में कोश-कार्य से तो उनके कार्यजीवन की शुरूआत ही हुई थी।
कोशकार, संपादक, निबंधकार, भाषावैज्ञानिक। ये चार अलग वृत्तियाँ नहीं थीं। चारों में एक ही आदमी शब्दों की देखभाल कर रहा था।
सात: भ्रमरानंद; वह स्वर जिसे लोग छोड़ देते हैं
शताब्दी-लेखों में मिश्र जी की जो छवि सबसे ज़्यादा दोहराई जाती है, वह है ऋतुओं और पर्वों का सरस चितेरा। यह छवि झूठी नहीं है, पर अधूरी है, और अधूरी छवि अपने ढंग से झूठ ही होती है।
‘भ्रमरानंद के पत्र’ उसी लेखक की रचना है।
भ्रमरानंद उनका छद्म नाम था, और पत्र लिखे गए ‘सरस्वती’ के संपादक पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी को। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। मिश्र जी ने अपने दो प्रेरणा-पुरुष गिनाए थे, श्रीनारायण चतुर्वेदी और हजारीप्रसाद द्विवेदी, जिन्हें वे दो फक्कड़ कहते थे। अपने व्यंग्य-पत्र उन्होंने इन्हीं में से एक को संबोधित किए। श्रद्धा और शरारत का यह मेल अपने आप में उनके स्वभाव का परिचय है।
इस परंपरा की वंशावली साफ़ है। भारतेंदु, और उससे भी सीधे बालमुकुंद गुप्त के ‘शिवशंभु के चिट्ठे’। यानी हिंदी की वह धारा जिसमें राजनीतिक असहमति को व्यंग्य के मुखौटे में कहा जाता है, ताकि बात तीखी भी रहे और कही भी जा सके।
एक निबंध में देवता पृथ्वी पर आकर चुनाव लड़ते हैं और मंत्री बनने का जुगाड़ करते हैं। इंद्र सेकुलर होने को तैयार हैं, पर जनतंत्र में उनकी आस्था नहीं है, क्योंकि पहले लोग उनके हुक्म पर नाचते थे और अब नेता के हुक्म पर नाचेंगे, फ़र्क़ बस मालिक का है। पवनदेव विदेश मंत्री बनना चाहते हैं, इस तर्क पर कि जनतंत्र स्वयं एक हवा है। अग्नि किसी भी सरकार का साथ देने को तैयार हैं, बशर्ते उनके हिस्से का बकरा तय हो जाए।
यह टिप्पणी 1981 के आसपास की है और आज भी लगभग उतनी ही चुभती है, जो व्यंग्य के लिए तारीफ़ भी है; और समाज के लिए शिकायत भी।
बात यहाँ यह समझने की है कि परंपरा-निष्ठा उनके यहाँ बचाव की मुद्रा नहीं थी। जो लेखक परंपरा को केवल ढाल की तरह बरतते हैं, वे वर्तमान पर हमला नहीं कर पाते, क्योंकि उनका सारा बल अतीत की रक्षा में लगा होता है। मिश्र जी परंपरा को औज़ार की तरह उठाते हैं। देवताओं को चुनाव लड़वाकर वे धर्म का मज़ाक नहीं उड़ा रहे, वे उस राजनीति का मज़ाक उड़ा रहे हैं जिसने धर्म को अपने काम की चीज़ बना लिया है।
‘कँटीले तारों के आर-पार’ (1976) और उनकी अंतिम पुस्तक ‘थोड़ी सी जगह दें’ (2004) में यही विचारात्मक और चिंतित स्वर अलग-अलग रूपों में मिलता है। यहाँ भाषा में कसाव है, वाक्य छोटे हैं, राग की जगह तर्क है। वही लेखक, दूसरा गियर।
आठ: असहमतियाँ; और उन्हें दर्ज करने की ज़रूरत
शताब्दी वर्ष की सबसे बड़ी फिसलन यह है कि वह लेखक को संत बना देता है। मिश्र जी के साथ यह करना उनके काम का अपमान होगा, क्योंकि वे स्वयं तर्क से चलने वाले आदमी थे।
तीन असहमतियाँ दर्ज होनी चाहिए।
पहली, वैचारिक प्रतिबद्धता।
वे स्वयं को सनातन हिंदू कहते थे और प्रगतिशील खेमे के आलोचक थे। प्रगतिशील पक्ष की उनसे दूरी भी उतनी ही स्पष्ट रही। 2003 में राष्ट्रपति द्वारा उनका राज्यसभा में मनोनयन हुआ, और अटल बिहारी वाजपेयी से उनकी निकटता ज्ञात है। कुछ आलोचक इसे उनके वैचारिक झुकाव से जोड़ते हैं, और यह जोड़ना अनुचित भी नहीं।
पर यह चित्र इतना सीधा नहीं है, और यहीं ईमानदारी की परीक्षा है। गोरखपुर से जुड़े संस्मरण बताते हैं कि उनकी मित्रता राममनोहर लोहिया से भी उतनी ही रही। जो व्यक्ति लोहिया और वाजपेयी, दोनों के साथ सहज रह सके, उसे किसी एक खाँचे में रखकर पढ़ना उसे कम करके पढ़ना है। और नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील आलोचक ने भी उनकी मेधा को सदा मान दिया, वैचारिक असहमति के बावजूद। यह उस दौर की उस उदारता का प्रमाण है जो अब दुर्लभ है।
दूसरी, लोक की सीमा।
यह हमारे लिए सबसे गंभीर प्रश्न है। मिश्र जी का लोक बहुत विस्तृत है, उसमें नदी, वृक्ष और ऋतुएँ तक समाई हैं। पर वह लोक जिस आँख से देखा गया है, वह पूर्वांचल के एक संस्कारवान ब्राह्मण घर की आँख है। यह कहना उन्हें ख़ारिज करना नहीं है, यह उनके देखने की जगह बताना है, और हर देखने की एक जगह होती है।
इसका परिणाम यह है कि उनके लोक में सामंजस्य बहुत है और संघर्ष कम। लोक-जीवन के भीतर जो जाति है, जो श्रम का असमान बँटवारा है, जो स्त्री की स्थिति है, वे सब उनके निबंधों में प्रायः उस रागात्मक चित्र के नीचे दब जाते हैं, जिसमें सब कुछ सुंदर और संगत दिखता है। वे स्त्री को नदी के बिंब में देखते हैं, जो सुंदर है, पर बिंब बना देना भी एक तरह की चुप्पी है।
यह आलोचना उनके काम को छोटा नहीं करती। यह बताती है कि उनका काम कहाँ तक जाता है, और आगे का काम किसे करना है।
तीसरी, वे कम पढ़े जाते हैं।
यह तथ्य है और इसे स्वीकार करना चाहिए। इसके दो कारण हैं। एक, उनका निबंध-संसार ऋतु, पर्व, वृक्ष और गाँव पर टिका है, और आज का पाठक नगर-केंद्रित है, जिसके लिए फागुन एक तारीख़ है, अनुभव नहीं। दो, अकादमिक जगत के खेमों ने उन्हें एक ख़ास खाने में डाल दिया, और खाने में डाल दिए गए लेखक को पढ़ने की ज़रूरत महसूस नहीं होती, उसके बारे में राय पहले से उपलब्ध रहती है।
शताब्दी वर्ष का काम स्तुति नहीं है। शताब्दी वर्ष का काम यह है कि जिन लेखकों के बारे में राय बन चुकी है और पढ़ना छूट चुका है, उन्हें वापस पढ़ने की मेज़ पर रखा जाए।
नौ: उपसंहार
अज्ञेय ने विद्यानिवास मिश्र को सर्जनात्मक गद्य के रचयिताओं में “अग्रगण्य” कहा था, और यह भी लक्षित किया था कि उन्होंने संस्कृत साहित्य को मथकर उसका नवनीत चखा है, और साथ ही लोकवाणी से भी निरंतर स्फूर्ति पाई है। मथना ठीक शब्द है। मथने में वस्तु टूटती है, फिर उससे कुछ नया अलग होता है।
14 फरवरी, 2005 को मऊ-आज़मगढ़ के रास्ते में एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु हुई। जीवन भर बसंत, फागुन और राग के गायक रहे इस लेखक का जाना वेलेंटाइन दिवस पर हुआ, और अंत्येष्टि काशी के मणिकर्णिका पर। इस संयोग पर वे स्वयं होते तो शायद एक निबंध लिख देते, और वह निबंध लोक की किसी कहावत से शुरू होकर मृत्यु के शास्त्र तक जाता, और फिर लौटकर उसी घाट पर उतर आता।
अस्तु; लौटते हैं उस शब्द पर, जहाँ से हम चले थे। पगना!
परंपरा को उद्धरण की तरह चिपकाया नहीं जा सकता। यह इस लेख की एकमात्र बात है, और आज इसे कहने की ज़रूरत पहले से ज़्यादा है, क्योंकि अब भारतीय ज्ञान परंपरा एक नीतिगत श्रेणी है। उसके लिए पाठ्यक्रम बन रहे हैं, क्रेडिट तय हैं, प्रकोष्ठ स्थापित हैं। यह अच्छा है; और अपने आप में पर्याप्त नहीं है।
क्योंकि, परंपरा को पाठ्यक्रम में रखा जा सकता है, आदमी में उतारा नहीं जा सकता, जब तक वह उसमें पगे नहीं। और पगने की कोई शॉर्टकट विधि नहीं है। इसमें समय लगता है, वैसा ही समय जैसा चाशनी में डूबी वस्तु को लगता है। मिश्र जी ने वह समय दिया। रुद्री छोड़कर ए बी सी डी लिखने वाले लड़के से लेकर अष्टाध्यायी को जेब में रखने वाले आचार्य तक, यह पूरा एक जीवन का काम था। जीवन-उपलब्धि!
उनके सबसे प्रसिद्ध निबंध का बिंब इस समय बहुत काम का है। बाहर वर्षा हो रही है, और चिंता यह नहीं है कि हम भीग रहे हैं। चिंता यह है कि मुकुट भीग रहा है।
तो प्रश्न सीधा है। हमारे पास परंपरा की जानकारी बहुत है, संग्रहालय बहुत हैं, पाठ्यक्रम बन रहे हैं। पर मुकुट किसके सिर पर है, और क्या हममें से कोई उसे भीगने से बचाने के लिए उस रात जाग रहा है?

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