Tuesday, November 3, 2026
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पद, प्रतिष्ठा और चमचागीरी…

कुछ लोगों के नामों का उल्लेख किया गया था –
जिनके ओहदे थे
बाकी सब इत्यादि थे
इत्यादि तादाद में हमेशा ही ज़्यादा होते थे

–  राजेश जोशी

हिंदी साहित्य के हर कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से होती है, मगर कार्यक्रम के अध्यक्ष और मुख्य अतिथि लक्ष्मीपति होते हैं। ये लक्ष्मीपति या तो धन-पशु हो सकते हैं या फिर चलते-फिरते पद, जैसे कि राजनीतिज्ञ या दूतावास के अधिकारी। किसी भी पदाधिकारी के साथ फ़ोटो खिंचवाकर साहित्यकार ऐसे धन्य होते दिखाई देते हैं, जैसे कुबेर का ख़ज़ाना हाथ लग गया हो।

निजी तौर पर भी देखा गया है कि साहित्यकार वही फ़ोटो सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, जिसमें वे किसी बड़ी हस्ती के साथ खड़े दिखाई देते हैं। एक ज़माना था, जब हिंदी साहित्य के कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक संघ के अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था कि “साहित्य राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

नारद मुनि, वशिष्ठ ऋषि, ऋषि विश्वामित्र, द्रोणाचार्य आदि हमेशा सत्ता के गुण गाते रहे। वे तो सही मायने में सरस्वती के सच्चे पुजारी थे। फिर भी वे तमाम उम्र समर्थन के लिए सत्ता की ओर देखते रहे।

मुझे याद पड़ता है कि मुंबई में कहीं बात हो रही थी, तो एक मित्र ने बहुत गर्व से कहा था कि वह अमिताभ बच्चन को जानता है। इस पर दूसरे मित्र ने कटाक्ष किया था- “यह तो अच्छा है कि तुम अमिताभ बच्चन को जानते हो, मगर क्या अमिताभ बच्चन भी तुम्हें जानता है?”

दिखावा एक बहुत बड़ी बीमारी है। यदि देश का कोई मंत्री मुझे साहित्य अकादमी सम्मान दे, तो क्या इससे सम्मान का महत्त्व बढ़ जाएगा?

मुझे निजी तौर पर भारत में हिंदी के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों में से एक, ज्ञानपीठ पुरस्कार के समारोह में शामिल होने का अवसर मिला था। सम्मानित होने वाली साहित्यकार थीं उर्दू की लेखिका क़ुर्रतुलऐन हैदर। उन्हें पुरस्कार देते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर ने कहा था, “राजनीति में होने का एक लाभ होता है कि स्वयं पढ़े-लिखे न होने पर भी आपको अवसर मिलता है कि आप पढ़े-लिखे लोगों को पुरस्कार दे सकें।”

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने ज़ाहिर है, उनका उपन्यास ‘आग का दरिया’ उपन्यास स्वयं नहीं पढ़ा होगा। उनके किसी सहायक ने उपन्यास और लेखिका पर कुछ लिख दिया होगा, जो उन्होंने मुख्य अतिथि के भाषण में पढ़ दिया होगा। मगर वे अपने दिल की बात भी उसमें जोड़ ही गए।

आज अंतर है तो केवल इतना कि आज के मुख्य अतिथि और अध्यक्ष, चाहे हिंदी का एक अक्षर भी न पढ़े हों, मंच पर अपना सत्कार करवाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं।

जब हमने मुंबई में इंदु शर्मा कथा सम्मान की शुरुआत की, तो यह निर्णय लिया गया कि हम सम्मान समारोह में कभी भी किसी राजनीतिज्ञ को आमंत्रित नहीं करेंगे। पाँच वर्षों तक हमने इस सम्मान समारोह का आयोजन भारत में किया, मगर अपने नियम का कठोरता से पालन किया।

हमारे पहले मुख्य अतिथि थे डॉ. धर्मवीर भारती और अध्यक्ष थे जगदंबा प्रसाद दीक्षित। उसके बाद कमलेश्वर, राजेंद्र यादव, मनोहर श्याम जोशी, ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, गुलज़ार, कामतानाथ, कन्हैयालाल नंदन, गोविंद मिश्र आदि ने हमारे मंच को सुशोभित किया।

हमारी दर्शक दीर्घा में पुष्पा भारती, सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा, जितेंद्र भाटिया, नंदकिशोर नौटियाल, विश्वनाथ सचदेव, राहुल देव, हरीश पाठक जैसे नाम शामिल रहते थे। सच तो यह है कि उस समय के तमाम हिंदी साहित्यकार एवं पत्रकार इंदु शर्मा कथा सम्मान समारोह का हिस्सा बनते थे।

सोशल मीडिया के आने के बाद से तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। कहीं कोई राज्यपाल या मुख्यमंत्री कतार में खड़े साहित्यकारों को सम्मान-पत्र या स्मृति-चिह्न बाँटता जा रहा है, कैमरामैन फ़ोटो खींचे जा रहा है और साहित्यकार फूले नहीं समा रहा है कि उसका चित्र एक बड़ी राजनीतिक हस्ती के साथ खिंच गया।

बेचारे की स्थिति दयनीय तब हो जाती है, जब उसके अपने ही परिवार के लोग पहचान नहीं पाते कि वह हस्ती है कौन, जिसके हाथों पुरस्कार पाकर लेखक धन्य हुआ जा रहा है।

किसी भी साहित्योत्सव की सफलता तभी मानी जाती है, जब उसके उद्घाटन और समापन सत्र में बड़े कद के राजनीतिज्ञ मंच की शोभा बढ़ाएँ। यानी कि साहित्य को सत्ता का आश्रय तो चाहिए ही।

दूसरी तरफ़ कहा जाता है कि साहित्य का काम सरकार की ग़लतियाँ बताना है, तारीफ़ करना नहीं। यानी कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध हम अपना साहित्य रच रहे हैं, उसी से सम्मान और पुरस्कार पाकर हम धन्य हो रहे हैं।

विदेशों में तो हालत और भी ख़राब है। वहाँ की स्थानीय संस्थाएँ सहयोग के लिए भारतीय दूतावास या उच्चायोग की ओर देखती हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस मामले में कोई नीति या नियम तय नहीं किए हैं कि हिंदी संस्थाओं के साथ दूतावास या उच्चायोग किस स्तर तक सहयोग कर सकते हैं या फिर करना चाहिए। मगर स्थानीय संस्थाएँ दूतावास और उच्चायोग के अधिकारियों की उपस्थिति के बिना अपने आपको यतीम-सा महसूस करती रहती हैं।

यदि आयोजन दूतावास में हो जाता है, तो साहित्यकार या साहित्यिक संस्थाएँ सातवें आसमान पर पहुँच जाती हैं। उस कार्यक्रम का मुख्य बिंदु बन जाता है राजदूत अथवा उच्चायुक्त के साथ फ़ोटो खिंचवाना। यदि राजदूत के हाथ में साहित्यकार की किताब भी हो, तो वह सोने पर सुहागा वाली बात हो जाती है। कई बार तो यह सोचकर दया आती है कि लेखक स्वयं को इतना बेचारा क्यों महसूस करने लगता है।

ऐसा भी देखा गया है कि विदेशों में हिंदी की संस्थाएँ और लेखक दूतावास को ईमेल करते हैं, तो उसका जवाब नहीं मिलता। निजी रिश्तों के आधार पर हिंदी साहित्य को आँका जाता है। दूतावास का मंत्री-समन्वय (जो कि एक आई.पी.एस. अधिकारी होता है) तय करता है कि किस संस्था के साथ कैसे संबंध रखने हैं या किस लेखक को हाशिए पर छोड़ना है। उनके आदेशानुसार ही निमंत्रण सूची तैयार की जाती है कि दूतावास के आयोजनों में किन हिंदी लेखकों को बुलाया जाना है।

लंदन इस मामले में भाग्यशाली शहर कहा जा सकता है कि यहाँ नेहरू सेंटर में गिरीश कार्नाड, पवन वर्मा, संगीता बहादुर और अमीश त्रिपाठी जैसी साहित्यिक विभूतियाँ निदेशक के पद पर विराजमान रहीं। उनके हाथों से सम्मान पाना अच्छा लगता था, क्योंकि वे राजनयिक से बढ़कर स्वयं महत्त्वपूर्ण लेखक थे।

वहीं उच्चायोग में भी विकास स्वरूप जैसे बड़े नाम कुछ वर्षों तक कार्यरत रहें। हमारे कुछ हिंदी अधिकारी तो अपने आप में पूरे साहित्यकार रहे हैं, जिनमें अनिल जोशी, तरुण कुमार और वर्तमान हिंदी एवं संस्कृति अधिकारी अनुराधा पांडेय के नाम शामिल हैं।

मगर समस्या यहाँ भी वही है कि हम उनसे साहित्यकार के रूप में सम्मानित होने की तुलना में उच्चायोग के अधिकारी से सम्मानित होने पर अधिक प्रसन्न दिखाई देते हैं।

आजकल जब कभी किसी हिन्दी भाषा एवं साहित्य के कार्यक्रम में शामिल होते हैं, तो मंत्री, सांसद, उच्चायुक्त, राजदूत, कुलपति आदि जो भाषण पढ़ते हैं वो उन्होंने स्वयं नहीं लिखा होता। उसे लिखते हैं हिन्दी अधिकारी… किसी-किसी मामले में हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी। आजकल तो वे भी ज़हमत नहीं उठाते और सीधे-सीधे कृत्रिम बौद्धिकता से लिखवा लेते हैं। पद पर आसीन व्यक्ति तो बस आ कर पढ़ देता है। यानी कि आज के युग में हिन्दी पर भाषण लिखने में हिन्दी अधिकारी से बेहतर कोई और नहीं। कई बार तो यहां तक देखा जाता है कि पदासीन व्यक्ति को भाषण मंच पर बैठे हुए मिलता है… बेचारे को ठीक से रियाज़ करने का अवसर भी नहीं मिलता।

अगले दिन के समाचारपत्रों में भी पदों पर बैठे लोगों का वक्तव्य ही हैडलाइन बन कर प्रकाशित होता है। दीन-हीन साहित्यकार  इस प्रेस कवरेज में भी इत्यादि बना रहता है… उसका कोई ज़िक्र नहीं होता।

मुझ से सवाल किया जा सकता है कि ऐ संपादक महोदय, दूसरों को नसीहत दे रहे हो, मगर एक साहित्यकार के रूप में तुम स्वयं क्या करते रहे हो?

यह सच है कि मैं भी ब्रिटेन की महारानी, भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों द्वारा सम्मानित हुआ हूँ। उनमें साहित्यिक व्यक्ति एक ही था- पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी।

वहीं यह भी सच है कि ये तमाम सम्मान मुझे दूसरी संस्थाओं ने दिए। उन समारोहों के आयोजन में मेरा कोई दख़ल नहीं था।

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40 टिप्पणी

  1. साधुवाद भ्राता श्री सच सभी जानते हैं मगर
    लिखने की हिम्मत हर कोई नहीं कर पाता,
    आपने आईना दिखाने की हिम्मत की है,
    फिर से साधुवाद। ऐसे ही लिखते रहिए।
    धन्यवाद सहित,
    आपका अनुज
    कपिल कुमार
    बेल्जियम

  2. इंदु शर्मा सम्मान के बारे में अच्छा बताया और ये वाकई अच्छा है बाकियों की बात लिखी ही है आपने.. इसी कारण मैंने अपने नाट्य संग्रह का लोकार्पण केवल नाट्य लेखकों और रंगकर्मियों की उपस्थित में श्री राम सेंटर के सामने रोड पर Sanjana book stall पर किया बाकी जगहों में खुद को फंसा हुआ पाता था..

  3. जबरदस्त संपादकीय। यथार्थ के धरातल पर खरा उतरनेवाला। बेचारे ‘इत्यादियों’ की स्थिति बड़ी नाजुक है। आजकल वो साहित्यकार भी कहाँ हैं राष्ट्रकवि दिनकर जैसे जो पंडित नेहरू को भी नसियत देनेवाले।

  4. आजकल साहित्यकारों को सम्मानित करने का एक नया धंधा निकल गया है। अपनी पांडुलिपि भेजें, अपनी किताबें भेजें और एंट्री फीस है 500 से लेकर ₹3000 तक।
    इनाम राशि मिलती है 1100,3000 अथवा 5001 रुपए।
    राजस्थान वाले तो अखिल भारतीय साहित्य प्रतियोगिता करते हैं लेकिन 85 फ़ीसदी सम्मान राजस्थान वालों को देते हैं।
    आप कितनी भी अच्छी कहानी लिख दें जरूरी नहीं की आपको सम्मान मिले। आप दो कौड़ी की कहानी भी लिखे हैं लेकिन आपको लोग जानते हों और आप चमचागिरी में अव्वल हैं तो आप जरूर सम्मानित किए जाएंगे। आजकल का यही ट्रेंड है। साहित्य अकादमी में भी यही खेल होता है।
    सरकार उन्हें सम्मानित करती है जो सरकार की चमचागिरी करते हैं ,नेता की मंत्री की। मैं हमेशा सरकार के खिलाफ लिखा हूं। इसलिए सरकार में बैठे लोग मुझे जानते हैं, लेकिन वह कभी सम्मानित करने के बारे में सपने में भी नहीं सोचते।
    मुझे संघ का एक बहुत बड़े पद वाला व्यक्ति ने कहा यदि आप कल से सरकार के पक्ष में लिखने लगे तो अगला बड़ा सम्मान आपको।
    नाम रिपु है तो फिर मित्र कैसे हो सकता हूं, वह भी सरकार का।

  5. आइना दिखाती सम्पादकीय। नेता और पदाधिकारियों को सम्मानित करने के लिए आमंत्रित करने के लिए बुलाना, अपनी पहुंच दिखाना मात्र है। वह लिखने वाले के नाम से भी परिचित नहीं होते हैं।
    साहित्य सम्मान के लिए साहित्यकार ही समुचित पात्र होता है।

  6. बहुत ज़रूरी बातें कही गईं हैं इस संपादकीय में साहित्यिक सम्मान और सत्ता के संबंधों पर एक ज़रूरी सवाल उठाया गया है। साहित्य की प्रतिष्ठा उसके सृजन और वैचारिक स्वतंत्रता से बनती है, किसी पदाधिकारी के हाथों सम्मानित होने या उसके साथ तस्वीर खिंचवाने से नहीं। जब लेखक अपनी पहचान और स्वीकार्यता के लिए सत्ता के निकट होने को ही उपलब्धि मानने लगे, तब उसकी स्वतंत्र आलोचनात्मक दृष्टि भी प्रभावित होने लगती है। सम्मान पाने से अधिक महत्त्वपूर्ण है उस सम्मान की गरिमा और उसके पीछे का साहित्यिक विवेक। यह संपादकीय आत्ममंथन की माँग भी करता है कि कहीं प्रतिष्ठा की चाह में साहित्यकार स्वयं अपनी स्वायत्तता से समझौता तो नहीं कर रहा?

    ख़ुदेजा

  7. वर्तमान समय की कटु सच्चाइयों पर आपकी पैनी दृष्टि द्वारा सुन्दर अवलोकन sir. साधुवाद आपको ऐसा लिखने का जोखिम उठाया आपने l

  8. तेजेन्द्र भाई: आपके इस सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद। साहित्य के नाम पर चमचागिरी करने वालों को आपने जो आईना दिखाया है उस हिम्मत की दाद देता हूँ। एक दम स्पष्ट और सच। साहित्यिक गोष्टियों में विदेश में रहते हुए तो यह आम देखा गया है कि जब तक कॉंसलेट का या हाई कमीशन का कोई अधिकारी चीफ़ गैस्ट नहीं होगा बात आगे नहीं बढ़ेगी। अभाव के कारण कई बार तो कॉंसलेट के जूनियर अधिकारी भी चीफ़ गैस्ट बन जाते हैं। साहित्य के बारे में इन्हें कुछ पता हो या न हो, फ़ोटो खिंचवाने में हमारे अपने कार्यकर्ता इन्हें सब से आगे करते हैं और ख़ुद आगे पीछे चमचागिरी करने से बाज़ नहीं आते।

    सोशल मीडिया को लेकर आपका यह कथन एक दम खरी कसॉटी पर उतरता है।
    सोशल मीडिया के आने के बाद से तो हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। कहीं कोई राज्यपाल या मुख्यमंत्री कतार में खड़े साहित्यकारों को सम्मान-पत्र या स्मृति-चिह्न बाँटता जा रहा है, कैमरामैन फ़ोटो खींचे जा रहा है और साहित्यकार फूले नहीं समा रहा है कि उसका चित्र एक बड़ी राजनीतिक हस्ती के साथ खिंच गया।

  9. यथा शीर्षक तथा संपादकीय!!! पूरा का पूरा आवा ही ऐसा है,,,,धनकुबेर,उच्च पदस्थ व्यक्तित्व और हाँ व्यवहारिक और व्यवहार कुशल यानी नेटवर्किंग वाले चमचें ही अब मंच पर दिखलाई पड़ते हैं।
    साहित्यकार तो अब रेड बुक यानी लुप्तप्रायः जीव हो चुके हैं तो फिर फोटो वाले और फोटो खिंचवाने वाले कव्वे ही काँव काँव ,सोशल सोशल मीडिया पर करेंगे ही।
    सरकारी संस्थान भी अब इस से अछूते नहीं हैं।
    नेटवर्क नेटवर्क और सात तार की चाशनी वाले कलाकार।
    बेबाक संपादकीय हेतु बधाई।

  10. कभी कभी ख़ुद पर और साथ ही
    हालात पर लिखना भी ज़रूरी होता है ।
    राजेश जोशी की कविता हर समय और शासन में प्रासंगिक है।
    DrPrabha mishra

  11. एकदम प्रासंगिक और सच का आईना दिखाता बेबाक़, बेहतरीन सम्पादकीय। कभी-कभी तो राजनेता या पदाधिकारी सम्मान लेने वाले साहित्यकार की ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। विशेषकर जो इत्यादि- इत्यादि में आतें है। जानते सब हैं अभिव्यक्त नहीं कर पाते । आपकी हिम्मत को नमन तेजेंद्र जी।

    • सुदर्शन जी, साहित्यिकार के लिए ज़रूरी है कि सच का सामना करें और आत्मसम्मान की रक्षा।

  12. पुरवाई पत्रिका के संपादकीय -‘ पद, प्रतिष्ठा और चमचागीरी ‘ में वर्तमान साहित्यकारों की पुरस्कार लोलुपता पर विहंगम दृष्टि डाली गई है। आज का साहित्यकार राजनीतिज्ञ एवं पदाधिकारियों के साथ मात्र से अपने को धन्य समझ बैठता है। उनसे प्राप्त सम्मानों एवं पुरस्कारों से वह गदगद हो जाता है। संपादक महोदय जी ने आज की स्थिति पर अच्छा व्यंग्य किया हैं।

    ऐसा कहीं-कहीं देखने को मिलता है कि साहित्यकार किसी राजनेता से सम्मान प्राप्त करता है तो वह उसे प्रचारित करता है और प्रसारित भी करता है। अपने को हाईलाइट करने में कोई कसर नहीं छोड़ता है। जबकि वह नहीं जानता है कि उससे ज्यादा राजनेता हाईलाइट होता है। वह प्रसिद्धि की मृग मरीचिका में यूं ही भटकता रहता है।
    साहित्यकार सत्ता से सम्मान पाकर खुश होता है। जबकि सत्ता की गलतियों पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी उसी की होती है। यह विरोधाभास साहित्यकार पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है! इस संपादकीय का मूल मुद्दा यही है।

    मैं ये मानता हूं कि साहित्यकार के पास कुछ हो या न हो, अगर वह सच में साहित्यकार है तो उसके अंदर यह फीलिंग जरूर होती है कि वह बहुत कुछ है। बड़े से बड़े पद वाला उसके आगे कुछ भी नहीं है। सत्ता की ताकत के आगे वह झुकता नहीं है।

    अधिकतर देखा गया है कि कार्यक्रम के आयोजक किसी नेता या पदाधिकारी को आमंत्रित करते हैं। वे उन्हें अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बना देते हैं। जबकि उन्हें साहित्य के बारे में अधिक जानकारी नहीं होती है। फिर भी वे वहां सीना तानकर खड़े रहते हैं और साहित्यकार बेचारा बनकर उनके मुंह की ओर ताकता रहता है। इसे विडंबना न कहें तो क्या कहें!
    इस संपादकीय का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि संपादक जी ने स्वयं ब्रिटेन की महारानी, भारत के प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्रियों से सम्मान प्राप्त किए हैं। तो क्या उन्होंने अपने निजी अनुभव इसलिए व्यक्त किए हैं ताकि अन्य कोई उन्हें कठघरे में खड़ा न कर सके। अथवा स्वयं सत्ता के प्रति नतमस्तक होने की कचोट ने यह संपादकीय लिखवाया है, अथवा सत्ता और साहित्य के गठजोड़ को वे सही नहीं मानते हैं। इन सारे अथवाओं में से वास्तविक कारण कुछ भी हो सकता है!

    आज का यह संपादकीय हर साहित्यकार के लिए एक आइना है, जिसमें उसका अपना अक्स साफ-साफ दिखाई दे जाता है।

    • भाई लखन लाल पाल जी, आपने लिखा है – साहित्यकार सत्ता से सम्मान पाकर खुश होता है। जबकि सत्ता की गलतियों पर सवाल उठाने की जिम्मेदारी उसी की होती है। यह विरोधाभास साहित्यकार पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है! इस संपादकीय का मूल मुद्दा यही है। – यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

  13. राजनेताओं का अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनकर मंच पर होना वैसा ही है जैसे राजा के दरबार में अज्ञानी राजा का चाटुकारों को सम्मानित करना व सम्बोधित करना। ये सत्य है कि बड़े बड़े साहित्यिक मंचों पर भी अध्यक्ष या मुख्य अतिथि वो राजनेता होते हैं जिन्हें पुस्तकों से कुछ लेना देना नहीं होता है पर जिन्हें पुरस्कार देना होता है या भविष्य में जो आपको बड़े सम्मान दिलवा सकते हैं। बस उसी सोच के रहते ये तय किया जाता है कि फ़लाँ व्यक्ति हमें क्या फ़ायदा दे सकता है जब किसी साहित्यिक कार्यक्रम में किसी राजनेता को मुख्य अतिथि बनाया जाता है, तो वहाँ का माहौल बड़ा ही दिलचस्प और विरोधाभासों से भरा होता है। एक तरफ़ शब्दों के साधक (लेखक/कवि) होते हैं और दूसरी तरफ़ सत्ता के साधक।आपने उस वातावरण को अपने संपादकीय में चित्रात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। सचमुच यह मंचों की राजनीति पर सटीक प्रहार है व बेहतरीन राजनीतिक व्यंग्य है,वो भी तब जब संपादक स्वयं अभी-अभी एक बड़े कार्यक्रम में मंचों पर राजनीतिज्ञ के साथ बैठ कर आएँ है। ऐसी स्थिति में यह सम्पादकीय और भी प्रासंगिक व प्रभावी बन जाता है। हालाँकि मेरा मानना है कि इस लेख में अगर कुछ लोगों के नाम ना लिखे जाते तो बेहतर होता।
    अनीता वर्मा

    • अनीता जी, आपने लिखा है कि – ये सत्य है कि बड़े बड़े साहित्यिक मंचों पर भी अध्यक्ष या मुख्य अतिथि वो राजनेता होते हैं जिन्हें पुस्तकों से कुछ लेना देना नहीं होता है पर जिन्हें पुरस्कार देना होता है या भविष्य में जो आपको बड़े सम्मान दिलवा सकते हैं। – मगर ये भी सच है कि ऐसा कुछ हो नहीं पाता है… साहित्यकार केवल याचक बना यह सोचता रहता है कि शायद कुछ हो जाए। प्रतिक्रिया के लिये हार्दिक धन्यवाद।

  14. सर, आपने साहित्यिक पुरस्कारों और आयोजनों के विषय में स्पष्टता, निष्पक्षता के साथ संपादकीय लिखा है और अंत में अपना उदाहरण देते हुए पाठक के संशय का समाधान भी किया है।

  15. आपने बहुत ही सामयिक मुद्दा उठाया है जिस पर न सिर्फ साहित्यकारों बल्कि साहित्य प्रेमियों के बीच भी उतनी ही शिद्दत से उठाया जाना चाहिए . अच्छा साहित्य और साहित्यकार राजाश्रय या फिर धनकुबेराश्रय का मोहताज नहीं होता है उसकी असली ताक़त वे लोग हैं जो उसे पढ़ते हैं . लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा यह है कि आजकल लिखा हुआ उन तक पहुँच भी पा रहा है या नहीं . सौ करोड़ हिंदी भाषियों के लिए धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी प्रसार संख्या का एक भी मंच अब नहीं बचा है , उन में छपी रचनाओं को पढ़ कर छोटे छोटे शहरों में भी गंभीर चर्चा होती थीं , मुझे याद है जब सातवें दशक में रमेश बतरा की कहानी “कुएँ की सफाई” छपी थी तब मुरादाबाद जैसे छोटे शहर में उस पर महिला महा विद्यालय में चर्चा आयोजित हुई थी जब कि उस चर्चा के आयोजकों में से कोई रमेश बतरा या फिर धर्मयुग से दूर दूर तक संबंधित नहीं थे ना ही यह चर्चा लेखक द्वारा प्रेरित प्रमोशन का नतीजा थी. आज कुछ सम्मानित अपवादों को छोड़ कर अधिकांश प्रकाशित साहित्यिक कृतियों की प्रतियां दस हज़ार तो छोड़िये एक हज़ार का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाती हैं बेचारा लेखक अपने मित्रों और समीक्षकों को प्रतियाँ बाँटता रहता है , कहानी की तुलना में कविताओं के संकलनों की स्थिति और भी दयनीय है . यह भी कितनी दुखद स्थिति है कि अधिकांश लेखकों को अपनी किताब प्रकाशित कराने के लिए प्रकाशक को पैसे देने पड़ते हैं , क्योंकि उसके पास अब सारिका , धर्मयुद्ध, साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसे मंच ही नहीं बचे हैं .
    हिंदी के साहित्यिक पुरस्कारों और मंचीय सम्मानों का आपने अच्छा खाका खींचा है , सम्मान करने वाले या तो लेखक के पैसे से आयोजन करते हैं या फिर सरकारी खाना पूरी के लिए होते हैं .
    आप लंदन में रहते हैं और अंग्रेज़ी या फिर अन्य यूरोपीय भाषाओं के लेखकों से भी मिलते रहे होंगे क्या ही बेहतर होता वहाँ की स्थिती की हल्की सी चर्चा कर देते. मैं अपना अनुभव बता देता हूँ , पिछले महीने मैं सिएटल में था वहाँ जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का स्थानीय एडिशन आयोजित किया गया था , अब देखिए उसके उद्घाटन संबोधन के लिए “लाइफ ऑफ़ पाई “ के लेखक यान मर्केल उपस्थित थे , अन्य उद्बोधनों में राजनैतिक शख़्सियतें नदारद थी केवल यू एस सीनेटर प्रमिला जयपाल थीं लेकिन वे राजनीतिज्ञ से कहीं अधिक एक लेखक के रूप में जानी जाती हैं . वहाँ एक रोचक बात देखने को मिली , जब मैंने हॉल में प्रवेश किया तब सिरे पर लगे बुक काउंटर पर यान मर्केल की “लाइफ ऑफ़ पाई” पुस्तक की दो सौ से अधिक प्रतियां थीं और समारोह के अंत में उसकी एक भी प्रति नहीं बची थी जबकि यह पुस्तक पहली बार 2001 में प्रकाशित हुई थी.
    बरहाल आपने काफ़ी हद तक खरी बात कहने की शुरुआत की है , इस पर जम कर संवाद होना चाहिए .

    • प्रिय भाई प्रदीप जी, आपने अपने निजी अनुभवों को साझा करते हुए कहा है कि – इस पर जम कर संवाद होना चाहिये -। आपसे पूरी तरह सहमत। विस्तृत टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद।

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