Wednesday, October 7, 2026
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 और कितने कुमारगिरी…

भगवती चरण वर्मा के उपन्यास ‘चित्रलेखा’ में एक चरित्र हैं कुमारगिरि, जो महाप्रभु रत्नांबर के शिष्य हैं और एक तपस्वी योगी हैं। वे मानते थे कि स्त्री-मोह मोक्ष के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। उन्हें अपने योग-बल और संयम पर बहुत घमंड था। 

ख़ैर, उपन्यास में तो चित्रलेखा उनका मनोबल तोड़ देती है, मगर वर्ष 2026 में कुमारगिरि की आत्मा केरल के ग्रैंड मुफ़्ती शेख अबू बकर अहमद के दिमाग़ में प्रवेश कर गई तो दूसरी तरफ़ BAPS यानी बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संप्रदाय के साधु भी कुमारगिरि की सोच के दायरे में घिर गए। स्वामीनारायण संप्रदाय के इन साधुओं के लिए महिलाओं को छूना तो दूर, उन्हें देखना भी पाप माना जाता है।

ग्रैंड मुफ़्ती के लिए ये साधु काफ़िर हैं, मगर सोच इन सबकी एक ही है। अबू बकर ने कहा, “महिलाओं को अपने घरों तक ही सीमित रहना चाहिए। उन्हें सार्वजनिक जगहों पर नहीं जाना चाहिए। पवित्र क़ुरान ऐसा कहता है।” ग्रैंड मुफ़्ती के वक्तव्य को लेकर पूरे भारत में इस समय बहस हो रही है।

ध्यान देने लायक बात यह है कि केरल पुलिस ने सोमवार को टेलीविज़न पत्रकार अपर्णा कुरुप के खिलाफ़ टीवी पर एक राजनीतिक चर्चा के दौरान धार्मिक भावनाएँ आहत करने के आरोप में मामला दर्ज किया। अपर्णा कार्यक्रम की प्रस्तोता थीं। यह चर्चा सुन्नी इस्लामिक विद्वान कंथापुरम ए. पी. अबू बकर मुसलियार की महिलाओं के खिलाफ़ विवादित टिप्पणी को लेकर हुई थी।

पुलिस ने बताया कि कासरगोड निवासी अब्दुल हकीम की शिकायत के आधार पर कोच्चि सिटी साइबर पुलिस ने पत्रकार अपर्णा कुरुप के खिलाफ़ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 192, 299, 302 और 353(2) के तहत मामला दर्ज किया।

अब ‘पुरवाई’ लंदन से फ़्रांस की तरफ़ बहने लगी है, जहाँ पेरिस के आइफ़िल टॉवर पर स्वामीनारायण संप्रदाय के साधुओं की यात्रा ने विवाद खड़ा कर दिया है। इस संप्रदाय के लगभग सौ साधु आइफ़िल टॉवर देखने पहुँच रहे थे। इन साधुओं की ओर से आग्रह किया गया कि उनके भ्रमण के दौरान इस दर्शनीय स्थल पर महिलाओं से “सीमित संपर्क” हो। आइफ़िल टॉवर के प्रबंधन ने उनकी बात का मान रखा, क्योंकि साधु लोग सुबह-सवेरे आने वाले थे। उन्होंने महिला कर्मचारियों की शिफ़्ट का समय बदल दिया, ताकि संतों को कोई असुविधा न हो।

आइफ़िल टॉवर की कर्मचारी यूनियन को जैसे ही इस निर्णय की सूचना मिली, उन्होंने एक तरह की हड़ताल कर दी और काम छोड़कर निकल गए। फ़्रांस में पुरुषों और स्त्रियों को समान अधिकार देने की एक परंपरा है। इसे बहुत शिद्दत से माना भी जाता है। स्टाफ़ यूनियन की प्रतिनिधि डायन डेवोइन ने इस विषय पर बोलते हुए कहा, “महिला कर्मचारियों से कहा गया कि वे अपने काम की जगह छोड़ दें।” ज़ाहिर है कि उन्हें अपमानित महसूस हुआ। अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिए कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने के कारण सोमवार को टॉवर बंद कर दिया गया।

फ़्रांस एक सेक्युलर देश है, जो पुरुष और नारी में किसी प्रकार का भेद नहीं करता। भारत के कुछ नेताओं की तरह वे वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए नारी के अधिकारों की बात नहीं करते। इसलिए फ़्रांस के राजनीतिक नेताओं ने भी आइफ़िल टॉवर के प्रबंधन की ख़ासी आलोचना की। इस सिलसिले में एक जाँच समिति भी बना दी गई है, जो जल्दी ही अपनी रिपोर्ट देगी।

मुझे निजी तौर पर थोड़ी हैरानी भी हुई, क्योंकि लंदन के स्वामीनारायण मंदिर में मैंने साधुओं को मुख्य पूजा भवन में पुरुषों और महिलाओं के सामने आरती करते हुए देखा है। ज़ाहिर है, मेरे मन में यह प्रश्न खड़ा हुआ कि ये भला कौन-से साधु-संत हैं, जिनके कारण पेरिस में इतना बखेड़ा हो गया।

मुझे जानकारी मिली कि इन साधुओं ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले रखा है। महिलाओं को लेकर उन पर आठ प्रतिबंध लगे रहते हैं। पहला नियम है कि ‘स्त्रियों की बातें नहीं सुनना’…महिलाओं द्वारा कही जा रही किसी भी बात को ध्यान से या फिर आसक्ति-भाव से न सुनना।

इससे अगली शर्त है कि ‘स्त्रियों के बारे में बात नहीं करना’…किसी भी परिस्थिति में स्त्रियों के बारे में चर्चा या बातचीत करने की अनुमति नहीं है।

जब स्त्रियों की बातें सुन नहीं सकते और उनके बारे में बात नहीं कर सकते, तो भला उनसे बात करने का प्रश्न कैसे उठ सकता है? इसलिए तीसरा प्रतिबंध है- ‘स्त्रियों से बात नहीं करना’… ये साधु-संत महिलाओं से आम तौर पर सीधे संवाद या बातचीत नहीं कर सकते।

जब पहले से ही इतने कठोर नियम लागू हैं, तो भला स्त्रियों के साथ मनोरंजन के बारे में कैसे सोचा जा सकता है? इन्हें महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का हास-परिहास, खेल या मनोरंजन करने की अनुमति नहीं है।

अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने के लिए उनकी आँखों पर भी प्रतिबंध लगा है, यानी वे जानबूझकर स्त्रियों को देख भी नहीं सकते। आदेश है कि महिलाओं को सचेत होकर या रुचि के साथ नहीं देखना है।

इन संतों को अपनी सोच को केवल ईश्वर पर केंद्रित रखना है। उन्हें स्त्रियों के बारे में सोचना भी पूरी तरह प्रतिबंधित है। वे मन में महिलाओं से जुड़े किसी भी विचार या कल्पना को नहीं ला सकते।

जब इतने कठोर नियम पहले से बने हैं, तो भला ‘स्त्रियों की संगति’ चाहने की अनुमति कैसे मिल सकती है? ये संत महिलाओं के पास रहने या उनकी संगति पाने का प्रयास नहीं कर सकते।

भला ऐसे में कोई भी स्वामीनारायण संत ‘स्त्रियों के साथ यौन संबंध या उसकी इच्छा’ कैसे रख सकता है? काम-भाव या शारीरिक संबंध का कोई भी विचार उनके निकट भी नहीं फटक सकता।

आप पूछ सकते हैं कि यह बोचासन क्या होता है? इस संस्था का नाम ‘बोचासनवासी’ इसलिए पड़ा, क्योंकि इसका पहला प्रमुख मंदिर गुजरात के आणंद ज़िले के बोचासन गाँव में ही बना था। यहीं से इस आध्यात्मिक आंदोलन का विस्तार हुआ। यह गाँव बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के मूल उद्गम स्थल के रूप में जाना जाता है। यह एक ऐसा आंदोलन है, जिसकी मान्यताएँ 18वीं सदी से जुड़ी हैं। यह मूल सनातन धर्म का हिस्सा नहीं है। यह गुजरात का एक संप्रदाय है। इस संप्रदाय में पुरुषों और महिलाओं को सख़्ती से अलग रखा जाता है। मंदिर में भी पुरुषों और महिलाओं के बैठने की अलग-अलग व्यवस्था होती है।

आइफ़िल टॉवर को चलाने वाली कंपनी के मुखिया एरियल वेल ने इसके प्रबंधकों को इस बात के लिए ज़िम्मेदार ठहराया कि उन्होंने यह सोचे बिना कि अनुरोध “अनुचित” है या नहीं, उसे पूरा करने में “कुछ अधिक ही उत्साह” दिखाया। एरियल वेल ने, जो पेरिस सेंटर के मेयर भी हैं, ज़ोर देकर कहा कि यह घटना “पूरी तरह से चौंकाने वाली और अस्वीकार्य” थी।

भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी करते हुए कहा कि यह मामला दो संस्थाओं के बीच है। इसमें भारत या फ़्रांस की सरकार का कुछ लेना-देना नहीं है।

‘पुरवाई’ पत्रिका महिला और पुरुषों में किसी भी भेदभाव के विरुद्ध है और उसकी निंदा करती है। हम स्वामीनारायण संप्रदाय के संतों के इस हक़ का सम्मान करते हैं कि वे ब्रह्मचर्य का पालन करें, मगर अपने प्रांगण में रहकर। यदि उन्हें सार्वजनिक स्थलों पर जाना है, तो उन्हें वहाँ के नियमों को समझना होगा और उनका पालन करना होगा। निजी स्वतंत्रता तभी तक जायज़ है, जब तक वह समाज द्वारा तय किए गए नियमों के साथ नहीं टकराती या अन्य लोगों की परेशानी का सबब नहीं बनती।

पेरिस में स्वामीनारायण मंदिर की स्थापना हाल ही में की गई है। 29 अगस्त से 16 सितंबर तक वहाँ स्थापना समारोह मनाए जा रहे हैं। हमें उम्मीद है कि आइफ़िल टॉवर विवाद का साया इन समारोहों पर नहीं पड़ेगा।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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45 टिप्पणी

  1. आदरणीय तजिंदर भाई जी बहुत सुन्दर विचार व्यक्त किए हैं आपने अपने आलेख में।

  2. भारत के विशेष सोच को शिरोधार्य करते पंथ विशेष की अपरिपक्व और अनुचित व्यवहार को भगवती चरण वर्मा की कृति चित्रलेखा के प्रमुख पात्र के प्रतिमान से मापते हुए, संपादक महोदय का एक और मास्टरपीस संपादकीय!!!
    स्त्री और पुरुष के बीच आज भी लैंगिक भेद कितने गहराए हुए हैं,इसी की तस्दीक वैश्विक स्तर पर करता है यह संपादकीय?!
    कुमारगिरी के सहोदर धर्म विशेष में तो बहुत है पर न तो आज चित्रलेखा है न ही सृजक आदरणीय भगवती चरण वर्मा।
    यह संपादकीय एफिल टावर,फ्रांस तक की पुरानी सोच को आज भी बताता है कि महिला स्वतंत्रता और अधिकार के क्षेत्र में अभी भी कार्य होने शेष हैं।
    सादर
    सूर्यकांत शर्मा

  3. “साधु ऐसा चाहिए जैसे सूप सुभाय
    सार- सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाए l”

    कितनी हैरानी की यह बात है कि जिस स्त्री स्त्री के गर्भ से ये स्वयं जन्में हैं, उसी स्त्री से परहेज l यह गणित आज तक समझ नहीं आया l मेरा प्रश्न है इनसे कि इसी लोक में जन्में हैं न ये लोग? या किसी अदृश्य शक्ति से उद्भव हुआ है इनका?
    This is not acceptable anymore. इन्हें अपनी मानसिकता बदलने की सख्त जरूरत है l वर्ना इनकी दशा भी कुमारगिरि जैसी न हो जाए l

    ” नारी तन की झांई परत , अँधा होत भुजंग l
    कबीरा तिन की कौन गति, जो नित नारी के संग l”

    लगता है कबीर को बहुत follow करते हैं ऐसे लोग l

    महत्वपूर्ण संपादकीय sir.

    • चैताली, आपने लिखा है कि -This is not acceptable anymore. इन्हें अपनी मानसिकता बदलने की सख्त जरूरत है l वर्ना इनकी दशा भी कुमारगिरि जैसी न हो जाए। – हार्दिक धन्यवाद।

  4. क्या यहां पर आत्मसंयम को प्रमुख भूमिका नही निभानी चाहिये? गार्गी, लोपामुद्रा जैसी परंपरा से आते हुए हमने आज भी अनेक ’गृहस्थ सन्यासी दंपत्तियों’ को प्रपंच और परमार्थ का सुवर्णमध्य साधते देखा है। स्वयं की साधना या कहें प्रतिबंधों का प्रदर्शन करना कितना सही है? इन नियमों को पढ़कर भी हैरानी हुई। क्या इन साधकों के जीवन में मातृतत्व शून्य है?
    प्रत्येक जीवात्मा के साथ एकाकार होकर निर्विकल्प समाधि को लक्ष्यित आत्मतत्व की साधनाओं के मार्ग में जैसे सिद्धियां एक अवरोध होती हैं, यह कुछ वैसा ही प्रकार है। प्रार्थना यही है कि हम सबका विस्तार हो!
    एक आवश्यक मुद्दे पर प्रखर लेखन हेतु साधुवाद!

  5. यह विषय विचार करने योग्य और प्रासंगिक है। चित्रलेखा के कुमारगिरि की तरह आज भी कुछ धार्मिक परंपराओं में स्त्री को साधना में बाधा या प्रलोभन के रूप में देखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। ब्रह्मचर्य और आत्मसंयम का दायित्व मूलतः साधक का होना चाहिए; उसके लिए स्त्रियों की स्वतंत्रता और सार्वजनिक उपस्थिति पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं।

    कुमारगिरि का चरित्र इसी विडंबना को सामने लाता है—जिस साधु को अपनी वासनाओं पर विजय पानी थी, वह स्त्री से दूरी को ही संयम का पर्याय मान बैठता है। इस दृष्टि से समकालीन घटनाएँ चित्रलेखा के इस प्रश्न को फिर प्रासंगिक बनाती हैं कि वास्तविक संयम बाहरी प्रतिबंधों में है या आत्मनियंत्रण में?

    • अर्पणा जी आपने लिखा है कि – कुमारगिरि का चरित्र इसी विडंबना को सामने लाता है—जिस साधु को अपनी वासनाओं पर विजय पानी थी, वह स्त्री से दूरी को ही संयम का पर्याय मान बैठता है। इस दृष्टि से समकालीन घटनाएँ चित्रलेखा के इस प्रश्न को फिर प्रासंगिक बनाती हैं कि वास्तविक संयम बाहरी प्रतिबंधों में है या आत्मनियंत्रण में?… आपसे सहमत। हार्दिक धन्यवाद।

  6. प्रणाम भाई
    चित्रलेखा उपन्यास मैने भी बी ए में पढा है। आपने कुमारगिरि का उल्लेख कर उसके पात्रों की याद दिला दी।इस बार संपादकीय में बिल्कुल आश्चर्यजनक मुद्दा और सहज स्वीकार्य न होने वाला प्रसंग चौंकाता है। हमारा देश अब स्त्री पुरुष समानता की राह पर है।कुछ विकृतियां हैं जो सुधारी जा रही हैं।परंतु फ्रांस में स्वामीनारायण संप्रदाय के सन्यासियों द्वारा यह विचित्र व्यवहार और नियम कदापि स्वागत योग्य नहीं है। महिलाओ को भी पुरुषोः के समकक्ष सम्मान मिलना चाहिए न कि उनसे बात करना , सुनना और अवहेलना करना किसी धर्म या संप्रदाय के नियमों में शामिल कर उन्हे अपमानित करना जायज हो.सकता है।फ्रांस की सरकार सराहना के योग्य है पुरवाई की तरह मैं भी इस विचारधारा से बिल्कुल सहमत नहीं.हूं।
    एक बार फिर नये और महत्वपूर्ण मुद्दे को संपादकीय का विषय बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई। आभार पुरवाई।

    • पद्मा आपने लिखा है कि – फ़्रांस की सरकार सराहना के योग्य है पुरवाई की तरह मैं भी इस विचारधारा से बिल्कुल सहमत नहीं.हूं।

      एक बार फिर नये और महत्वपूर्ण मुद्दे को संपादकीय का विषय बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद भाई। आभार पुरवाई।

      आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

  7. इतनी मान्यताओं और मर्यादा वाला सम्प्रदाय है तो उसे सार्वजनिक स्थलों पर नहीं जाना चाहिए और न ही जनसामान्य के लिए परेशानी का सबब बनना चाहिए ।
    उन्हें अपने एकांत में रहना ही उचित है बाकी तो बहुत बड़ी दुनिया है और कई पंथ भी।काश महिलाओं का भी ऐसा रिजर्व पंथ हो जाये
    Dr Prabha mishra

  8. विचारणीय एवं महत्वपूर्ण सम्पादकीय। उससे भी महत्त्वपूर्ण है, आपका शोध परक दृष्टिकोण , जो पूरी तह में जाकर तथ्यों को उजागर करता है।
    पुरुष और महिला के बीच के भेद को वैश्विक स्तर दूर करने की अत्यंत आवश्यकता है।
    हर पंथ के अपने नियम होते हैं, जिनका पालन करना अनुयायियों के लिए अनिवार्य होता है। पर यह बात समझ से परे है कि माँ के गर्भ से जन्म लेकर, उसकी गोद में खेलकर छत्र छाया में पलकर, उसी की जाति से परहेज़। अग्नि से दूर रहकर,उसकी उसकी ऊष्मा से बच जाना बड़ी बात नहीं है।अग्नि के सान्निध्य में इंद्रियों को साधकर नियन्त्रित कर, उसके ताप को सहन करने की क्षमता रखना बड़ी बात है। हर बार नई जानकारी देने के लिए साधुवाद तेजेंद्र जी

    • सुदर्शन जी, आपने लिखा है कि – विचारणीय एवं महत्वपूर्ण सम्पादकीय। उससे भी महत्त्वपूर्ण है, आपका शोध परक दृष्टिकोण , जो पूरी तह में जाकर तथ्यों को उजागर करता है।

      पुरुष और महिला के बीच के भेद को वैश्विक स्तर दूर करने की अत्यंत आवश्यकता है।-

      आपको हार्दिक धन्यवाद।

  9. इस पंथ के लोग यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो फिर स्त्रियों के सामने होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक आत्म संयम होता है और यदि हमारे में संयम है तो अवश्य ही हमारे सामने कोई भी आ जाए हम उसको नहीं तोड़ सकते। गांधी जी की सत्य के साथ अनुभव में यही बात कही गई कि वह अपने ब्रह्मचर्य की परीक्षा लेने के लिए महिलाओं से घिरे रहते थे, इससे भी स्वयं को परीक्षित करते थे कि उनका संयम उनके बस में है या नहीं। किसी भी धर्म में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि वे स्त्रियों की बात ना सुने या स्त्रियों के साथ कोई कार्य नहीं कर सकते अथवा वे अपने को एक सीमित सीमा में ही रखें। यह तो एक आवश्यकता से अधिक प्रतिबंध कहा जाएगा और फिर इसी तरह लोगों को बंधन में बांधकर धर्म का पालन नहीं कराया जा सकता। हमारे देश में इस तरह की कुछ संस्थाएं – जैसे ब्रह्म कुमारी विचारधारा के अनुयायी, लेकिन यहां तक मुझे पता है वहां पर ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि पुरुष वर्ग का प्रवेश या पुरुष वर्ग का जाना आना प्रतिबंधित हो। ऐसी स्थिति में ब्रह्मचर्य का पालन पूर्णतया नियंत्रण और अपने भावों पर नियंत्रण के द्वारा ही संभव है। तो इसके लिए परिस्थितियों कोई भी हो कोई किसी के हो ब्रह्मचर्य को भंग नहीं कर सकता स्त्रियां सिर्फ प्रेयसी ही नहीं हो सकती , वह मां हो सकती है, बेटी हो सकती और यह सभी संत किसी मां की ही संतान है और वह मां स्त्री ही है फिर यह सब बेकार के नियंत्रित करने वाले नियम है अगर यह बात भारत में धर्म भीरुता बहुत अधिक है वहां तो यह प्रतिबंध पाया जा सकता है लेकिन भारत से बाहर यदि इसको लागू कराया जाए या उनके अनुरूप व्यवस्था की जाए तो इसको कहीं से भी उचित नहीं कहा जाएगा। साधु और संत का अर्थ संयम और आत्म नियंत्रण होता है, चाहे वह किसी भी मत को मानने वाले हो।

    • रेखा जी, आपने लिखा है कि – इस पंथ के लोग यदि ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं तो फिर स्त्रियों के सामने होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह एक आत्म संयम होता है और यदि हमारे में संयम है तो अवश्य ही हमारे सामने कोई भी आ जाए हम उसको नहीं तोड़ सकते। –

      आपसे सहमत।

  10. आपकी विषय को पटाक्षेप करती रक्तवर्णी पंक्तियाँ ही निचोड़ हैं। हम सार्वजनिक स्थलों पर वैसा ही आचरण करें जिससे किसी को कोई आपत्ति न हो।

  11. विचार करने योग्य संपादकीय। बिना किसी पक्षपात के आपने तथ्यों का गहन अध्ययन करके, कुमार गिरी का संदर्भ लेते हुए संकीर्ण मानसिकता पर गहरी चोट की है। ब्रह्मचर्य में आत्म संयम अत्यंत आवश्यक है लेकिन उसके लिए स्त्रियों को नकार देना उचित नहीं है

    • आपसे पूरी तरह सहमत बबिता जी। जब नारी माॅं, बहन, पत्नी जैसे रूपों में पुरुष के साथ जुड़ी है, उसका सम्मान आवश्यक है।

  12. कितने कमजोर हैं वे पुरुष जो महिलाओं के दर्शन मात्र से बिखर जाते हैं, दर्शन क्या उनके विषय में सिर्फ सोचकर भी अपवित्र हो जाते हैं
    बहुत बड़ा उपहास है ये उनके खुद के द्वारा खुद का। ऐफिक टॉवर की कर्मचारियों कि हड़ताल सर्वथा जायज है।
    कौन से युग में जी रहे हैं नहीं जाने वे लोग!
    आपने उचित कहा कि उन्होंने उन्हें अपनी मान्यताएं मानने की स्वतंत्रता है परंतु अपने तक सीमित रहकर सार्वजनिक स्थानों पर तो समाज के नियम उन्हें मानने होंगे।

    एक शानदार संपाकीय पुनः

    • निर्देश निधि जी आपसे पूरी तरह सहमत : “कितने कमज़ोर हैं वे पुरुष जो महिलाओं के दर्शन मात्र से बिखर जाते हैं, दर्शन क्या उनके विषय में सिर्फ सोचकर भी अपवित्र हो जाते हैं!” पुरवाई पत्रिका नें साधुओं को सम्मान सहित सलाह दी है कि अपने मंदिर के कक्ष में उन्हें अपनी विचारधारा के अनुसार व्यव्हार कर सकते हैं। मगर यदि वे सार्वजनिक स्थलों पर आते हैं तो उन्हें वहां के नियमों का सम्मान करना चाहिए।

  13. बोचासन की जानकारी प्राप्त हुई। वे सब कुमार गिरि तब संयमित माने जाएंगे जब महिलाओं को देखकर भी संयम न खोएं।
    एफिल टावर की वह स्थिति निस्संदेह विवादपूर्ण है।

  14. सादर चरण स्पर्श।

    एफिल टावर से जुड़ी महिला कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने की खबर ऑनलाइन न्यूज़ के माध्यम से मिली थी अब आपकी संपादकीय के माध्यम से संस्था के बारे में और मौजूदा घटनाक्रम को लेकर विचार और स्पष्ट हुए हैं। संबंधित संस्था के बारे में हम सभी लोगों ने कभी ना कभी सुना ही है। कई सालों से संस्था के नाम से परिचित हूं ,परंतु जो घटना एफिल टावर विजिट के दौरान संस्था के अनुयायियों द्वारा किया गया। वह किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह महिला सम्मान और उनके गरिमा के विरुद्ध है। इराक सीरिया और तालिबान के नजरिये से बिल्कुल मेल खाता है। वैश्विक स्तर पर भिन्न-भिन्न देश में संस्था के साधु क्या कर रहे हैं यह तो नहीं पता परंतु फ्रांस में यह जो घटित हुआ है यह उनके महिलाओं के प्रति नकारात्मक कार्य शैली और रूढ़िवादी सोच को दर्शाता है।
    आपकी यह कैसी सिद्धि है और नियम है जो महिला को देखने / संपर्क/ अथवा स्पर्श आपकी तपस्या खंडित हो जाएगी इससे यही प्रतीत होता है कि आपके नियम/ सयम और विधि से अधिक शक्तिशाली महिला है।

    बिना मातृशक्ति के योगदान के सभ्य, सुंदर और व्यवस्थित समाज की परिकल्पना हो ही नहीं सकती। जिसकी माला वह लोग दिन-रात जप रहे हैं वह भी संभव नहीं है। माफी मांग लेने से सिर्फ वर्तमान विवाद को विराम लगेगा परंतु उनकी महिलाओं के प्रति घृणित दृष्टिकोण को वैश्विक रूप से उजागर कर दिया।

    • शुभम आपका सवाल एकदम जायज़ है कि : “आपकी यह कैसी सिद्धि है और नियम है जो महिला को देखने / संपर्क/ अथवा स्पर्श आपकी तपस्या खंडित हो जाएगी इससे यही प्रतीत होता है कि आपके नियम/ सयम और विधि से अधिक शक्तिशाली महिला है।”

      हार्दिक आभार।

  15. सादर नमस्कार सर… कितनी संवेदनशील विचरणीय संपादकीय है….!!!
    पूरे संपादकीय को पढ़कर यह महसूस हुआ… कि जिस स्त्री से इन सभी पुरुषों का जन्म हुआ है.लगता है दुर्भाग्यवश हुआ है….। यह इनका शेष पुरुष जन्म है…. इसके बाद इनको..स्त्री के रूप में जन्म लेना पड़ेगा …
    .. सयम के नाम पर घृणा और अपमान करना ही सिखाया गया है इनको…..

    साधुवाद….

  16. ‘द पुरवाई’ में प्रकाशित ‘और कितने कुमारगिरी…’ अपने शीर्षक से ही पाठक को ठहरकर सोचने के लिए विवश करता है। यह रचना केवल किसी एक व्यक्ति या प्रसंग की पड़ताल नहीं करती, बल्कि हमारे समय में बढ़ती उस मानसिकता पर प्रश्न उठाती है, जहाँ संवेदना, नैतिकता और मानवीय गरिमा लगातार हाशिए पर जा रही हैं। लेखक ने सहज भाषा और प्रभावशाली कथ्य के माध्यम से सामाजिक यथार्थ की विसंगतियों को सामने रखा है। रचना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पाठक को निष्क्रिय दर्शक नहीं रहने देती, बल्कि उससे आत्ममंथन की अपेक्षा करती है। ‘और कितने कुमारगिरी…’ इसलिए एक सार्थक और विचारोत्तेजक हस्तक्षेप है।

    • विजय भाई, आपने लिखा है कि : “लेखक ने सहज भाषा और प्रभावशाली कथ्य के माध्यम से सामाजिक यथार्थ की विसंगतियों को सामने रखा है। रचना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पाठक को निष्क्रिय दर्शक नहीं रहने देती, बल्कि उससे आत्ममंथन की अपेक्षा करती है। ‘और कितने कुमारगिरी…’ इसलिए एक सार्थक और विचारोत्तेजक हस्तक्षेप है।”

      इस सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  17. और कितने कुमारगिरी…

    “जब तपस्या मनुष्य से बड़ी हो जाए”
    आदरणीय तेजेंद्र शर्मा सर का संपादकीय ‘और कितने कुमारगिरी…’ को समझने के लिए यहाँ नीदरलैंड में मेरे पास चित्रलेखा उपन्यास नहीं था इसलिए चित्रलेखा फ़िल्म के तीन बार देखा । हर बार एक नया दृष्टिकोण सामने आया। उसके बाद यह प्रतिक्रिया आई । यहाँ यह भी कहना आवश्यक है की यह मेरा अपना मत है किसी अन्य का इससे सहमत होना ज़रूरी नहीं है । इस संपादकीय को पढ़ते हुए सबसे पहले लगता है कि यह आइफ़िल टॉवर की किसी घटना पर लिखी गई तात्कालिक टिप्पणी नहीं, बल्कि मनुष्य की उस पुरानी मानसिकता पर लिखा गया आईना है, जिसमें अपने संयम की रक्षा के लिए दूसरे की स्वतंत्रता को सीमित करना सहज मान लिया जाता है। संपादकीय की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि यही है कि लेखक ने किसी समकालीन विवाद को सीधे-सीधे नारे में बदलने के बजाय उसे भगवतीचरण वर्मा के ‘चित्रलेखा’ के कुमारगिरि के चरित्र से जोड़ दिया है। इसीलिए शीर्षक—“और कितने कुमारगिरी…”—सिर्फ व्यंग्य नहीं रह जाता; वह एक सभ्यतागत प्रश्न बन जाता है।
    कुमारगिरि को याद करना इसलिए सार्थक है कि वह केवल एक व्यक्ति नहीं, एक मानसिकता का चरित्र है। वह संसार से ऊपर उठने का दावा करता है, स्त्री को अपनी साधना में बाधा मानता है और अपने संयम पर गर्व करता है। लेकिन ‘चित्रलेखा’ का सौंदर्य इसी विडंबना में है कि अंततः प्रश्न स्त्री का नहीं, पुरुष के आत्मसंयम और उसके अहंकार का बन जाता है। जिस मनुष्य को अपनी साधना पर इतना विश्वास हो कि एक स्त्री की उपस्थिति मात्र से उसकी साधना संकट में पड़ जाए, वहाँ समस्या स्त्री में कम और साधक के भीतर अधिक है।
    यही वह बिंदु है जहाँ तेजेन्द्र शर्मा का संपादकीय साहित्य से समकालीन जीवन में प्रवेश करता है।
    आइफ़िल टॉवर दुनिया के आधुनिक, खुले और बहुलतावादी समाज का एक प्रतीक है। वहाँ किसी धार्मिक समूह के लिए महिला कर्मचारियों को उनके कार्यस्थल से हटाने की माँग स्वीकार कर लेना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह जाता; वह सार्वजनिक क्षेत्र में निजी धार्मिक अनुशासन की सीमा का प्रश्न बन जाता है। संपादकीय इसी असहजता को पकड़ता है। लेखक स्पष्ट करते हैं कि किसी साधु या धार्मिक व्यक्ति को ब्रह्मचर्य का पालन करने का पूरा अधिकार है, लेकिन उस निजी साधना का भार किसी अन्य व्यक्ति—विशेषतः महिला—पर क्यों डाला जाए? (The Purvai⁠)
    यहाँ संपादकीय का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उभरता है—

    यदि मेरी दृष्टि मेरे लिए संयमित नहीं रह सकती, तो क्या दूसरे की देह, उपस्थिति और स्वतंत्रता को नियंत्रित कर देना ही समाधान है?
    यह प्रश्न केवल धर्म का नहीं है। यह मनोविज्ञान का भी है, नैतिकता का भी, स्त्री-अधिकार का भी और आधुनिक लोकतांत्रिक जीवन का भी।
    संपादकीय में स्वामीनारायण संप्रदाय के साधुओं के कठोर ब्रह्मचर्य-संबंधी नियमों का उल्लेख आता है—स्त्रियों की बातें न सुनना, उनके बारे में बात न करना, उनसे संवाद न करना, उन्हें न देखना, उनके बारे में विचार तक न करना आदि। (The Purvai⁠)

    इन नियमों को पढ़ते हुए मनुष्य के सामने एक विचित्र दार्शनिक उलझन खड़ी होती है।
    क्या स्त्री से दूरी आध्यात्मिकता है या स्त्री की उपस्थिति से उत्पन्न होने वाले अपने ही मन के भय से दूरी?
    दोनों में बहुत महीन लेकिन निर्णायक अंतर है।

    भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में संयम का अर्थ केवल बाहरी निषेध नहीं रहा। योग का मूल आग्रह तो मन, इंद्रिय और चित्त पर अधिकार का रहा है। यदि साधना इतनी बाहरी हो जाए कि साधक को अपने आसपास की दुनिया को बदलना पड़े ताकि वह स्वयं स्थिर रह सके, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विजय किस पर हुई,वासना पर या संसार पर?
    यहीं कुमारगिरि फिर हमारे सामने खड़े हो जाते हैं।और शायद इसीलिए शीर्षक में लगा हुआ “और” अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    यह ‘एक और कुमारगिरि’ नहीं है।
    यह पूछता है,और कितने?
    कितने कुमारगिरि ऐसे हैं जो स्त्री को मनुष्य की तरह नहीं, अपनी साधना के लिए संभावित खतरे की तरह देखते हैं? कितने ऐसे हैं जिनका संयम उनकी अपनी साधना का विषय न रहकर स्त्रियों के व्यवहार का विधान बन जाता है? कितने ऐसे हैं जो अपनी आध्यात्मिक श्रेष्ठता की रक्षा के लिए स्त्री को सार्वजनिक जीवन से हटाने की माँग कर सकते हैं?
    और यह प्रश्न केवल धर्म के किसी एक पंथ से पूछना पर्याप्त नहीं होगा। यदि हम सचमुच साहित्य के पाठक हैं तो हमें कुमारगिरि को किसी एक समुदाय का प्रतिनिधि बनाकर सुरक्षित दूरी नहीं बना लेनी चाहिए। कुमारगिरि हमारे भीतर भी हो सकता है,,हर उस जगह जहाँ कोई व्यक्ति अपनी नैतिकता को सार्वभौमिक कानून समझ बैठता है।
    यही साहित्य की शक्ति है।
    साहित्य किसी व्यक्ति को इतिहास से उठाकर प्रतिमान बना देता है।
    भगवतीचरण वर्मा ने ‘चित्रलेखा’ में पाप और पुण्य की बहस को इतना मानवीय बनाया कि कुमारगिरि आज भी हमारे सामने जीवित हो उठते हैं। वह केवल एक पुराना योगी नहीं; वह हर युग का वह मनुष्य है जो बाहरी तपस्या को आंतरिक विजय का प्रमाण मान लेता है।
    तेजेन्द्र शर्मा ने इसी साहित्यिक स्मृति को समकालीन घटना पर आरोपित करके संपादकीय को एक अतिरिक्त गहराई दी है।
    लेकिन इस संपादकीय को पढ़ते हुए एक और बात भी ध्यान देने योग्य है।
    धर्म और धार्मिक व्यक्ति एक ही चीज़ नहीं हैं।
    किसी साधु की कठोर व्यक्तिगत साधना का सम्मान किया जा सकता है और साथ ही उसके सामाजिक प्रभाव पर प्रश्न भी उठाया जा सकता है। यही स्वस्थ लोकतांत्रिक दृष्टि है। आस्था को सम्मान देना और आस्था के नाम पर होने वाले व्यवहार की आलोचना करना परस्पर विरोधी नहीं हैं।
    दरअसल, असली कसौटी यही है कि मेरी आस्था दूसरे मनुष्य की गरिमा को कितना स्थान देती है।
    यदि मेरा धर्म मुझे स्वयं पर अनुशासन सिखाता है, तो वह साधना है।
    यदि वही धर्म मुझे दूसरे के जीवन, शरीर, काम और स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का अधिकार देने लगे, तो वह सामाजिक प्रश्न बन जाता है।और यदि किसी महिला को केवल इसलिए अपने कार्यस्थल से हटना पड़े कि किसी पुरुष साधु को उसकी उपस्थिति असुविधाजनक लग सकती है, तो वहाँ प्रश्न केवल धर्म का नहीं, नागरिक समानता का है। आइफ़िल टॉवर के मामले में महिला कर्मचारियों के विरोध और हड़ताल का उल्लेख इसी विडंबना को सामने लाता है।
    इस संपादकीय की एक और विशेषता इसका स्थान-बोध है।

    आइफ़िल टॉवर केवल लोहे की बनी कोई पर्यटन-संरचना नहीं है। वह आधुनिकता, फ्रांसीसी गणतांत्रिक चेतना और सार्वजनिक जीवन में समानता के विचार का वैश्विक प्रतीक है। उसी स्थान पर स्त्री की उपस्थिति को सीमित करने का प्रश्न इसलिए प्रतीकात्मक रूप से भी बड़ा हो जाता है।
    एक ओर सदियों पुरानी तपस्या की अवधारणा है।
    दूसरी ओर आधुनिक नागरिकता का विचार।
    एक ओर व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता है।
    दूसरी ओर दूसरे व्यक्ति की समान स्वतंत्रता।
    इन दोनों के बीच संतुलन ही आधुनिक समाज की परीक्षा है।
    संपादकीय का व्यंग्य इसलिए चुभता है क्योंकि लेखक केवल यह नहीं पूछते कि “ये साधु ऐसे क्यों हैं?” वे पाठक को अप्रत्यक्ष रूप से यह पूछने के लिए मजबूर करते हैं कि “हमने अपनी सभ्यता में अभी तक स्त्री को देखने की दृष्टि कितनी बदली है?”
    कुमारगिरि का सबसे बड़ा संकट शायद स्त्री नहीं थी।स्त्री के प्रति उसकी दृष्टि थी।
    और यही बात आज भी असली प्रश्न है।
    हम स्त्री को स्वतंत्र मनुष्य कब देखेंगे,,न देवी, न माया, न प्रलोभन, न पाप की वजह, न पुरुष के चरित्र की परीक्षा, बल्कि केवल एक पूर्ण मनुष्य के रूप में?
    इस प्रश्न का उत्तर धर्म के पास भी होना चाहिए, साहित्य के पास भी, समाज के पास भी और व्यक्ति के पास भी।
    कबीर की पंक्ति,,-
    “साधु ऐसा चाहिए जैसे सूप सुभाय…”
    यहाँ अनायास याद आती है। साधु का काम संसार से भागना नहीं, बल्कि सार और असार को पहचानना है। यदि स्त्री की उपस्थिति मात्र से साधना डगमगा जाए, तो शायद सूप ने अभी तक भूसा और अन्न अलग करना सीखा ही नहीं।
    इस संदर्भ में “कुमारगिरि” एक चरित्र से बढ़कर एक चेतावनी बन जाता है।
    हर युग में कुछ कुमारगिरि होंगे।
    कुछ गेरुए वस्त्रों में।
    कुछ धार्मिक उपदेशों में।
    कुछ सामाजिक संस्थाओं में।
    और कुछ हमारे अपने भीतर।
    इसलिए संपादकीय का शीर्षक अंततः किसी संप्रदाय पर टिप्पणी भर नहीं है। वह हम सबके लिए एक आत्मपरीक्षण है।
    और कितने कुमारगिरि चाहिए हमें यह समझने के लिए कि सच्चा संयम दूसरे मनुष्य को हटाने में नहीं, स्वयं को साधने में है?
    शायद आधुनिक मनुष्य की आध्यात्मिक परिपक्वता की असली पहचान यही होगी कि उसे अपने ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी स्त्री को रास्ते से हटाना न पड़े।
    क्योंकि जिस साधना को बचाने के लिए संसार की आधी आबादी को अदृश्य करना पड़े, वह साधना जितनी पवित्र दिखाई देती है, उतने ही गहरे उसके भीतर मनुष्य से भयभीत होने की संभावना भी छिपी हो सकती है।
    और इसलिए, कुमारगिरि से लड़ाई किसी एक धर्म से लड़ाई नहीं है।कुमारगिरि से लड़ाई मनुष्य के भीतर बैठे उस अहंकार से है, जो अपनी कमजोरी का नाम तपस्या और अपनी आशंका का नाम मर्यादा रख देता है।
    तेजेन्द्र शर्मा जी का संपादकीय इसी कारण एक सामयिक लेख से आगे बढ़कर साहित्य और समाज के बीच संवाद का दस्तावेज़ बन जाता है। भगवतीचरण वर्मा के कुमारगिरि से लेकर पेरिस के आइफ़िल टॉवर तक की यह यात्रा हमें बताती है कि समय बदल जाने से प्रश्न हमेशा नहीं बदलते। कभी-कभी पात्र बदलते हैं, स्थान बदलते हैं, वस्त्र बदलते हैं, लेकिन मानसिकता वही रहती है।

    और तब साहित्य हमारे सामने खड़ा होकर पूछता है—

    “और कितने कुमारगिरि…?”
    ©️डॉ. ऋतु शर्मा ननंन पाँडे
    अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी संगठन नीदरलैंड

    • ऋतु आपकी टिप्पणी बेहतरीन साहित्य का नमूना है। इस टिप्पणी से मैं भी कुछ सीखने का प्रयास करूंगा।

  18. ‘और कितने कुमारगिरी…’ संपादकीय में आपने में केरल के ग्रैंड मुफ़्ती शेख अबू बकर अहमद और BAPS यानी बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संप्रदाय के साधुओं की सोच पर प्रश्न उठाये हैं, जो उचित तो हैं ही, मेरे लिए आश्चर्यजनक भी हैं क्योंकि मैंने अहमदाबाद, दिल्ली के स्वामीनारायण मंदिर के साथ शिकागो का स्वामीनारायण मंदिर भी देखा है। वहां ऐसा कुछ भी नहीं था। स्त्री, पुरुष और बच्चे कुछ श्रद्धा से कोई सिर्फ घूमने के लिए वहां आये थे। एफिल टॉवर विवाद मैंने भी पढ़ा था किन्तु आपके संपादकीय से स्पष्ट समझ में आया। इस सम्बन्ध में सिर्फ यही कहना चाहूँगी कि जो स्वयं को नियंत्रित नहीं ऱख सकता वह दूसरों को नियंत्रित करने की बात कैसे कर सकता है?

  19. जितेन्द्र भाई: टोरॉण्टो में भी BAPS का मन्दिर है। काफ़ी समय पहले जब वहाँ गया था तब वहाँ पर मेन हॉल में, प्रवेशद्वार से मँच तक जाने के लिए, हॉल के बीच में से होकर जाना पड़ता था। रास्ते के एक ओर पुरुष तथा दूसरी ओर महिलाओं के बैठने का प्रबन्ध देखा था। वहाँ गेरुए वस्त्र धारण किए साधु संत भी नज़र आते थे। ऊपर मूर्तियों के दर्शन के समय भी पुरुष/महिला भक्त तथा गेरुए वस्त्र धारण किए साधु संत भी होते थे। अब यदि इस में कुछ बदलाव आगया है तो पता नहीं।
    अपने ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए आपने जो इन संतें पर पाबन्दियों का ज़िकर किया वो काबिल-ए-गॉर हैं। अपनी इन्द्रियों पर काबू पाने के लिए महिला जाति से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध न रखने से क्या इनकी वासना कम हो जाएगी? यदि यही सब महिलाओं को नीची नज़र से देखना है तो फिर पब्लिक में या मन्दिरों में या फिर आइफ़िल टॉवर पर या फिर किसी और स्थान पर, जहाँ महिलाएँ भी हों, इनका क्या काम है और इन्हें जाने की भी क्या ज़रूरत है? इनका असली स्थान तो किसी पर्वत की गुफ़ाह में आँखें मून्द कर अकेले बैठना है। केवल इन्हें ख़ुश करने के, जहाँ कहीं भी यह हों वहाँ से महिलाओं को हटा दिया जाए, चाहे उनके न होने पर कितना ही नुक्सान क्यों न हो।
    एक महिला के बहुत रूप होते हैं – वो इनकी दादी, नानी, माँ, बहन, भतीजी में से कोई भी हो सकती है। अपने गेरुए वस्त्र पहने हुए यदि इन में से कोई भी इनके सामने आजाए तो क्या ये एकदम नज़रें फेर कर अपने आठों प्रतिबंधनों का पालन करेंगे?इन में से कोई यदि बुढ़ापे में बीमार पड़ जाए और हस्पताल में भरती की नौबत आगई तो क्या उस नर्स को जिसका उद्देश्य केवल सेवा है, अपने पास फटकने भी नहीं देगे।
    यह एक बहुत गहरा और सोचने का विषय है। सम्पादकीय के लिए बहुत बहुत साधुवाद।

    • विजय भाई, आपकी टिप्पणी की बहुत सी परतें हैं। पाठकों को इसे सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए दो से अधिक बार पढ़ना चाहिए।

  20. आदरणीय तेजेंद्र जी, स्वामीनारायण संप्रदाय के साधुओं की बात हो या केरल के मुफ्ती शेख अबूबकर अहमद का बयान, 21वीं सदी में ये बातें चौंकाने वाली हैं। इससे भी चौंकाने वाली बात यह है कि एफिल टावर की प्रबंधन समिति उस दिन स्त्रियों को अपने कार्य स्थल से अनुपस्थित रहने का मौका दे देती है। मुझे लगता है कि स्वामीनारायण संप्रदाय में हर प्रकार के मनुष्य को आकर्षित करने की विभिन्न योजनाएं हैं। मेरे परिवार का एक लड़का न्यू जर्सी में रहता है, पति-पत्नी स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयाई हैं। उसने तथा उसके बहुत से दोस्तों ने अपने बच्चों को गुजरात के किसी शहर में भारतीय संस्कार प्राप्त करने के लिए गुरुकुल में भेजा है। बच्चा 6 से 7 वर्ष की उम्र में आ गया था; अभी वह 8 9 वर्ष का है।
    हमारे लिए तो ऐसीबातें बहुत विस्मय का कारण बनती हैं। इन लोगों की भी एक प्रजाति होती है। आपका धन्यवाद आपने इसी बहाने भगवती चरण वर्मा के उपन्यास और कुमार गिरी का उल्लेख किया, चित्रलेखा का उल्लेख किया तथा इस संप्रदाय के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

    • विद्या जी आपको संपादकीय पसंद आया और अपने एक सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी लिखने के लिए समय निकाला, हार्दिक धन्यवाद

  21. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    मूलतः धार्मिक आस्था,व्यक्तिगत स्वतंत्रता,स्त्री-पुरुष समानता और सार्वजनिक जीवन के लोकतांत्रिक थनियमों के बीच टकराव को केंद्रित करते इस संपादकीय को पढ़ते ही आक्रोश से मन भर गया।

    तत्काल जो विचार आए वह तो यही थे कि अगर स्त्रियों से इतना परहेज था तो आपको विदेश में जानेके पूर्व ही वहाँ की संस्कृति और नियमों को समझ लेना था।और आपको जाना ही नहीं था।

    फिर अगर आप इस तरह की अपेक्षा किसी शासन से करते हैं, इसका मतलब है कि आपका अपना मन संयमित नहीं!किसी भी संप्रदाय के हों आप, पर आपके लिये सबसे पहले अपने चंचल मन को संयमित करने का अभ्यास जरूरी है। अपने उद्देश्य को साधना ज्यादा जरूरी है। संभावनाओं और कारण से बचने की प्रार्थना दूसरों से करनी ही नहीं पड़ेगी।

    और फिर जब इस तरह की सोच या नियम पाल के रखा है तो आपको अपने नियत स्थान से कहीं बाहर जाना ही नहीं चाहिये था। ऐसे लोगों को अपने सीमित क्षेत्र में ही अपना जीवन यापन करना बेहतर होता है।

    दूसरी बात -अगर उन्होंने इस तरह की अनुमति चाही थी तो प्रबंधन समिति को भी अपने देश के नियमों का पालन करना चाहिए था। बेहतर था कि उन्हें मना कर देते शायद उन्हें इससे सीख मिलती, या तो फिर कभी देश से बाहर निकलते ही नहीं या स्वयं को कंट्रोल करते दोनों ही तरह से उनका फायदा होता।
    गलतियाँ दोनों तरफ की महसूस हुईं। किंतु फिर भी जिस देश में उपस्थिति दर्ज हुई है उस देश की गलती ज्यादा है।

    वैसे तो प्राय: मनुष्य की मानसिकता इस प्रकार की रहती है कि जिस विषय पर आपका बंधन होता है मन बार-बार उसकी सच्चाई जानने के लिए उत्सुक रहता है।

    अबकी बार संपादकीय सामान्य से थोड़ा हटकर है। जहाँ धर्म आता है बीच में वहाँ गंभीरता पहले व्याप्त होती है।बोलने के पहले सोचना और समझना ज्यादा जरूरी है।

    इसलिये संपादकीय के तर्क दृष्टिकोण और निष्पक्षता—इन सभी को साथ देखना उचित होगा।

    ‘और कितने कुमारगिरी…!

    संपादकीय का शीर्षक भगवती चरण वर्मा के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चित्रलेखा’ के पात्र कुमारगिरि के माध्यम से एक गहरे वैचारिकता की ओर संकेत करता है। कुमारगिरि के लिये स्त्री-मोह साधना और मोक्ष के मार्ग की बाधा है।आपने इसी मानसिकता को आधुनिक समय की कतिपय धार्मिक धारणाओं से जोड़ते हुए प्रश्न किया है कि क्या स्त्री को मनुष्य के रूप में देखने के बजाय आज भी केवल ‘मोह’ या ‘प्रलोभन’ के रूप में देखना उचित है?

    वैसे आपको शीर्षक विशेषज्ञ कहा जा सकता है। चाहे आपके संपादकीय- हों या आपकी कहानियाँ! शीर्षक में आपकी जादूगरी महसूस होती है।

    ‘और कितने कुमारगिरी…’ में ‘कुमारगिरि’ वास्तव में प्रतीकात्मकता में एक मानसिक प्रवृत्ति का ही प्रतीक है ,जो स्त्री से दूरी को आध्यात्मिक शुचिता का अनिवार्य अंग मानती है।

    शीर्षक में प्रयुक्त ‘और कितने’ काबिले गौर है।यह पाठकों को सोचने के लिए बाध्य करता है कि विज्ञान, लोकतंत्र और लैंगिक समानता के दौर में भी स्त्री को लेकर इतनी कठोर वर्जनाएँ क्यों?

    आपके कथ्य संपादन का तरीका चकित करता है।विवाद की खबर से पूर्व ‘चित्रलेखा’ के कुमारगिरि का प्रसंग संपादकीय के मुख्य विषय की दृष्टि से प्रासंगिक ही था,और फिर आधुनिक घटनाओं के संदर्भ में उसकी मानसिकता को पुनः देखने व सहजता से समझने के अवसर की तरह
    है।

    केरल के ग्रैंड मुफ़्ती के उस विवादित वक्तव्य की चर्चा, जिसमें महिलाओं को घर तक सीमित रखने की बात कही गई…! वैसे आप तो स्त्री- स्वतंत्रता के पक्षधर हैं।और संपादकीय यहाँ स्त्री-अधिकारों के पक्ष में दिखाई देता है।

    आपके इस आग्रह से हम भी सहमत हैं कि धार्मिक विश्वास व्यक्ति का निजी अधिकार है, लेकिन जब वही विश्वास स्त्री की सार्वजनिक उपस्थिति और स्वतंत्रता पर नियंत्रण की माँग करने लगे, तब उस पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

    यहाँ घटना स्त्री के अस्तित्व , सम्मान और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न से जुड़ जाती है।

    अब बात स्वामीनारायण साधुओं के प्रसंग की।
    इस संप्रदाय के बारे में कभी हमने पढ़ा था पर स्त्रियों को लेकर इस तरह के नियम की बात हमने पहले कभी किसी संप्रदाय के नियम में नहीं सुनी थी।

    उपन्यास पढ़ा था पिक्चर देखी या नहीं अब यह तो याद नहीं लेकिन गाना जरुर याद है और प्रसंग भी, लेकिन फिर भी… उपन्यास और उस पर बनी पिक्चर को सत्य के धरातल पर विश्वास से नहीं तौला जा सकता… ऐसा हम सोचते हैं।

    कायदे से तो यह उनकी अपनी परीक्षा है। खुद पर अविश्वास व असंयम के कारण उनका आग्रह रहा होगा और अगर ऐसा है तो यह पूरी तरह से अनुचित है।

    पेरिस के आइफ़िल टॉवर से जुड़े इन स्वामीनारायण संप्रदाय के साधुओं का महिलाओं से सीमित संपर्क की माँग सीमित भी क्यों? या तो एक भी न हो, या कोई भी हो कितनी भी हो!!!!

    यहाँ आपके साथ पाठकों को भी यह प्रश्न उठाने का अवसर मिलता है कि व्यक्तिगत धार्मिक अनुशासन की सीमा कहाँ तक , कितनी और कैसी हो सकती है?

    संपादक व्यंग्यकार भी हैं!आप चाहते तो इस विषय पर साधुओं के ब्रह्मचर्य-व्रत का उपहास कर सकते थे पर यहाँ न केवल आपकी लेखनी शालीन व संयमित रही, बल्कि आप स्पष्ट कहते हैं कि,” उनके ब्रह्मचर्य का पालन करने के अधिकार का सम्मान है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब उस निजी धार्मिक अनुशासन को सार्वजनिक संस्था के संचालन पर लागू करने का प्रयास किया जाए।”

    यही तर्क सम्मत प्रश्न है।निजी स्वतंत्रता तभी तक उचित है, जब तक वह समाज द्वारा तय किए गए नियमों से न टकराए और अन्य लोगों के लिये परेशानी का कारण न बने।

    आपका तर्क भी स्पष्ट है कि किसी साधु को अपने धार्मिक नियमों के अनुसार स्त्रियों से दूरी बनाए रखने का अधिकार है; लेकिन जब वह किसी सार्वजनिक स्थान पर जाता है, तो वहाँ काम करने वाले दूसरे लोगों के अधिकार भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं।

    संपादकीय दृष्टि से यहाँ आइफ़िल केवल एक धार्मिक विवाद नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में समानता के सिद्धांत का प्रश्न बन जाता है।

    संपादकीय का सबसे गंभीर सामाजिक प्रश्न यही है कि स्त्री से दूरी बनाने के लिए स्त्री को ही संभावित खतरे के रूप में क्यों देखा जाए?

    स्त्रियों की बात न सुनना, उनसे बातचीत न करना, उन्हें न देखना, उनके बारे में न सोचना आदि नियम यदि किसी विशेष धार्मिक साधना का हिस्सा हैं, तो उनका उद्देश्य साधु के आत्मसंयम से जुड़ा हो सकता है। लेकिन इसे भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है जिसमें स्त्री स्वयं एक सामान्य इंसान के बजाय पुरुष की आध्यात्मिक परीक्षा का कारण मोह या प्रलोभन समझी जाए।

    यहाँ आपका नारीवादी स्वर अधिक मुखरित दिखाई देता है और पाठकों को संतुष्ट करता है।

    आपने लंदन के अनुभव का उल्लेख किया है कि आपने लंदन में स्वामीनारायण मंदिर में साधुओं को पुरुषों और महिलाओं के सामने आरती करते देखा था इसीलिये आइफ़िल टावर वाली घटना आपका अधिक ध्यान खींच गई।

    आप स्वयं भी असमंजस में है कि पेरिस जाने वाले ये कौन-से साधु हैं जिनके कारण ऐसी परिस्थिति पैदा हुई!

    आपका संकेत किसी व्यक्ति की निजी साधना से अधिक उस मानसिकता की ओर है जो स्त्री की उपस्थिति को ही समस्या मान लेती है।
    आइफ़िल टॉवर जैसी आधुनिक, सार्वजनिक और वैश्विक पहचान वाली जगह में महिलाओं की शिफ्ट बदलने की घटना स्वयं एक ऐसी विडंबना उत्पन्न करती है जिसे आपने प्रभावी ढंग से पकड़ा।

    संपादकीय पाठकों से यह विचार करने को कहा कहता है कि—
    धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या हो?
    सार्वजनिक स्थानों पर धार्मिक नियम किस सीमा तक लागू किए जा सकते हैं?

    क्या स्त्री की उपस्थिति को पुरुष के आत्मसंयम का प्रश्न बनाया जाना चाहिए?

    क्या समानता का सिद्धांत धार्मिक पहचान से ऊपर सार्वजनिक संस्थानों में लागू होना चाहिए?

    और सबसे महत्त्वपूर्ण कि क्या स्त्री को एक स्वतंत्र इंसान के ही रूप में देखने की हमारी दृष्टि वास्तव में आधुनिक हुई है?

    ‘और कितने कुमारगिरी…’ एक ऐसा संपादकीय है जो किसी एक घटना पर टिप्पणी करने के बजाय उसके पीछे मौजूद मानसिकता को पकड़ने का प्रयास करता है। ‘चित्रलेखा’ के कुमारगिरि से शुरू होकर केरल के विवादित वक्तव्य, स्वामीनारायण साधुओं के नियम और पेरिस के आइफ़िल टॉवर तक पहुँचने वाली इसकी यात्रा मूलतः स्त्री की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में समानता की यात्रा बन जाती है।
    अपने पाठकों को आपने घटनाओं और प्रश्नों के माध्यम से सोचने के लिए विवश किया है। संपादकीय का केंद्रीय संदेश भी यही है कि किसी व्यक्ति या धार्मिक समुदाय को अपनी आध्यात्मिक साधना चुनने की स्वतंत्रता अवश्य होनी चाहिए, लेकिन सार्वजनिक जीवन में दूसरे नागरिकों की गरिमा, समानता और अधिकार भी उतने ही सम्मान के पात्र हैं। स्त्री को पुरुष के संयम की बाधा या प्रलोभन मानने के बजाय एक स्वतंत्र नागरिक और मनुष्य के रूप में स्वीकार करना ही आधुनिक लोकतांत्रिक समाज की वास्तविक कसौटी है ।
    एक समस्या मूलक संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई कि आपने निवारण के बरक्स काफी अच्छे सुझाव दिये।

    पुरवाई का आभार।

  22. आदरणीय नीलिमा जी, आपने लिखा है कि – “और कितने कुमारगिरी… एक ऐसा संपादकीय है जो किसी एक घटना पर टिप्पणी करने के बजाय उसके पीछे मौजूद मानसिकता को पकड़ने का प्रयास करता है। ‘चित्रलेखा’ के कुमारगिरि से शुरू होकर केरल के विवादित वक्तव्य, स्वामीनारायण साधुओं के नियम और पेरिस के आइफ़िल टॉवर तक पहुँचने वाली इसकी यात्रा मूलतः स्त्री की स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में समानता की यात्रा बन जाती है।”

    इस सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी के लिये आपका हार्दिक आभार।

  23. मेरी दृष्टि में तो बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था के संन्यासियों का एफिल टावर देखने जाना भी एक तरह की विलासिता ही है। जो व्यक्ति जीवित (महिला) के प्रति स्वयं को अनासक्त मानता हो, वह एक ढाँचे (एफिल टावर) के सान्निध्य के आकर्षण में क्यों बँधा है। ऐसे शुद्धतावादियों से कबीर ने ठीक ही कहा है—‘…और मार्ग से क्यों नहिं आया?’ सांसारिक तड़क-भड़क से दूर रहने का जैसा संयम कुंभनदास के पास था, वैसा शायद इनमें से किसी के पास न रहा हो। सन्दर्भत: कुंभनदास का पद देखिए :
    संतन को कहा सीकरी सो काम।
    आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम।
    जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम।
    कुंभनदास लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम।
    इस पद का संदर्भ यह है कि अकबर ने कुंभनदास जी को अपने दरबार में आमन्त्रित किया। उन दिनों आगरा के निकट स्थित फतेहपुर सीकरी, जहाँ के सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से अकबर को पुत्र की प्राप्ति हुई थी, अकबर की राजधानी हुआ करती थी। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए अकबर का अपने दरबार में बुलावा बहुत बड़ा सम्मान था। लेकिन कुंभनदास न तो सामान्य व्यक्ति थे और न ही सामान्य संत। बुलावे के जवाब में उन्होंने अकबर को लिख भेजा—संतों और ईश्वरीय भक्तों को सीकरी यानी अकबर के राजदरबार से क्या काम है? अर्थात् कोई काम नहीं है। मैंने बहुत-से ऐसे संतों को देखा है, नवाब की कृपा-दृष्टि पाने के लिए दरबार आने-जाने में जिनकी पनहियाँ (पैर की जूतियाँ) घिसकर टूट गईं, इस भागदौड़ में भगवान का नाम भी जपना वे लोग भूल गए। ऐसी सफलता अगर मिली भी हो, तो उससे क्या लाभ? कैसी त्रासदी है कि जिन लोगों यानी सांसारिक विलासिता में डूबे राजाओं और नवाबों का मुख देखने मात्र से मन में कष्ट होता है, दरबार में जाकर उन्हीं को सलाम करना पड़ता है अर्थात् उन्हीं के आगे सिर झुकाना पड़ता है। कुंभनदास का कहना है कि हमारे आराध्य गिरिधर लाल (श्रीकृष्ण) के नाम-जाप के बिना बाकी सब दुनियादारी और शान-शौकत बेकार है।

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