संपादकीय : कोरोना को समझना आसान नहीं 3

होना तो यह चाहिये कि हर पार्टी के प्रत्येक सांसद और विधायक को अपने अपने चुनाव क्षेत्र में जाकर अपने अपने वोटरों को कोरोना के बारे में सही जानकारी उपलब्ध कराएं। मगर सवाल तो यह उठता है कि कितने सांसदों एवं विधायकों को कोरोना के बारे में रत्ती भर भी जानकारी है। हालांकि इन सब के बावजूद भारत के लिए संतोषजनक बात यह है कि वहाँ कोरोना से होने वाली मृत्युदर काफी कम है और रिकवरी रेट नब्बे प्रतिशत के करीब पहुँच चुका है। लेकिन लड़ाई अभी जारी है।

आजकल वह्ट्सएप पर एक पोस्टर ख़ासा वायरल हो रहा है जिस में पोलैण्ड की लेखिका मोनिका विस्निएसका के एक क्वोट का इस्तेमाल किया गया है। मोनिका लिखती हैं कि कोरोना वायरस की, “वैक्सीन का टेस्ट सबसे पहले राजनीतिज्ञों पर होना चाहिये। यदि वे बच गये तो वैक्सीन सेफ़ है यदि वे नहीं बचते तो देश सेफ़ है।”
इस उद्धरण से एक बात साफ़ होती है कि विश्वभर में कोरोना और राजनीतिज्ञों को लेकर सोच एक सी है। कोरोना किसी को समझ नहीं आ रहा और राजनीतिज्ञ अपने आप को एक्सपोज़ किये जा रहे हैं। 
हैरानी सबको होती है कि चीन, जहां कि इस वायरस की उत्पत्ति हुई, में कहीं कोरोना का नाम भी नहीं दिखाई दे रहा। जबकि युरोप, अमरीका, दक्षिण अमरीका और भारत में इस वायरस ने उत्पात मचा रखा है। 
इस संपादकीय के लिखते समय विश्व भर में चार करोड़ से अधिक लोग कोविद-19 से ग्रस्त हुए; 11,15,303 लोगों की मृत्यु हुई और 2,99,26,516 व्यक्ति इलाज से ठीक हुए। 
कुल कोरोना वायरस से ग्रस्त लोगों के मामले में अग्रणी देश हैं – अमरीका (83,43,140), भारत (74,94,551), ब्राज़ील (52,24,362), रूस (13,99,334), स्पेन (9,82,723), अर्जन्टीना (9,79,119), कोलम्बिया (9,52,371), फ़्रांस (8,67,197), पेरू (8,65,549), मेक्सिको (8,47,108), यू.के. (7,05,428)।  
वहीं मृतकों की संख्या के हिसाब से अमरीका (2,24,283), ब्राज़ील (1,53,690), भारत (1,14,064), मेक्सिको (86,059), यू.के. (43,579), स्पेन (33,775), फ़्रांस (33,392), ईरान (30,123), कोलम्बिया (28,803), अर्जन्टीना (26,107), रूस (24,187) सबसे आगे हैं। 
भारत के आसपास निगाह डालें तो कोरोना के आंकड़े कुछ इस प्रकार हैं – बांग्लादेश (3,87,295 मामले और 5,646 मौतें),  पाकिस्तान (3,22,452 मामले और 6,638 मौतें), नेपाल (1,29,000 मामले और 727 मौतें, श्रीलंका (5,475 मामले और मौतें 13)।
ब्रिटेन इस समय कोरोना वायरस के दूसरे दौर से जूझ रहा है। पूरे देश में कोरोना का आतंक बढ़ता जा रहा है। विशेष तौर पर उत्तरी ब्रिटेन में तो हालात ख़ासे नाज़ुक हैं। लिवरपूर, बर्नली, लीड्स, मैन्चैस्टर, न्यूकैसल, एक्सीटर, संडरलैण्ड, शेफ़ील्ड, नॉटिंघम, ब्रैडफ़र्ड आदि में हालात ख़ासे गंभीर हैं। 
लंदन की तमाम 32 चुनावी क्षेत्रों में कोरोना को लेकर हाई एलर्ट की घोषणा कर दी गयी है। प्रधानमन्त्री बॉरिस जॉन्सन को विपक्ष एवं जनता की ओर से ख़ासे दबाव का सामना करना पड़ रहा है। बॉरिस की नीतियों का व्हट्सएप और फ़ेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर भी बहुत मज़ाक उड़ाया जा रहा है।
भारत का नज़ारा कुछ अलग ही लगता है।  महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, कश्मीर, तमिलनाडु – हर जगह कोरोना का कहर जारी है मगर राजनीतिज्ञ अपना अपना खेल खेल रहे हैं। तमाम टीवी चैनल इसमें उनका साथ दे रहे हैं। और जो उनका साथ नहीं दे रहे, उनके विरुद्ध एफ़.आई.आर. दर्ज हो रही हैं। कुछ शशि थरूर जैसे भारतीय सांसद तो लाहौर लिट्रेचर फ़ेस्टिवल में अपने ऑनलाइन ख़िताब में  मोदी विरोध के कारण भारत की बुराइयां करने में व्यस्त हैं।
दरअसल होना तो यह चाहिये कि हर पार्टी के प्रत्येक सांसद और विधायक को अपने अपने चुनाव क्षेत्र में जाकर अपने अपने वोटरों को कोरोना के बारे में सही जानकारी उपलब्ध कराएं। मगर सवाल तो यह उठता है कि कितने सांसदों एवं विधायकों को कोरोना के बारे में रत्ती भर भी जानकारी है। हालांकि इन सब के बावजूद भारत के लिए संतोषजनक बात यह है कि वहाँ कोरोना से होने वाली मृत्युदर काफी कम है और रिकवरी रेट नब्बे प्रतिशत के करीब पहुँच चुका है। लेकिन लड़ाई अभी जारी है।
हम सबको यह समझ लेना चाहिये कि कोरोना को जाने की कोई जल्दी नहीं है। कोरोना यहां हमारे विश्व में रहने वाला है और हमें अपने आप को तैयार करना होगा कि नये हालात के साथ कैसे जीना है। पूरा विश्व मन्दी से जूझ रहा है। लोगों की नौकरियां  जा रही हैं। कम्पनियां बंद हो रही हैं। हर इन्सान को अपने जीने के अन्दाज़  बदलने होंगे। हमें जान लेना चाहिये कि पब, बार, सिनेमा इन्सान के अस्तित्व के लिये ज़रूरी नहीं हैं। उनके होने से जीवन में कुछ अच्छे पल आ सकते हैं। मगर उन अच्छे पलों के लिए  ज़िन्दा रहना ज़रूरी है। और इसके लिये ज़रूरी है कि हम  सुरक्षित दूरी बनाए रखें, फ़ेस मॉस्क और ग्लव्स का इस्तेमाल करें।
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

4 टिप्पणी

  1. सत्य वचन; किन्तु मात्र राजनीतिज्ञों पर भरोसा करना इस समस्या का समाधान नहीं है, इसके लिए हरेक नागरिक को अपना कर्तव्य निभाहना होगा; विशेष कर इस लिए भी कि यह वायरस अब हमारे संग रहेगा – आजकल में समाप्त होने वाला संकट नहीं है ये !

  2. अनलॉक के बाद भारत मे लोग कोरोना को लापरवाही से ले रहे हैं वरना हालात में कुछ और सुधार हो सकता था। राजनीति के परिदृश्य की बात करूं तो लोग तो हर बात में अपनी रोटियां सेंकने में माहिर हैं फिर चाहे वो किसी की मौत हो या बलात्कार हो। कोरोना का हल यही है कि कोरोना को लेकर रोना बन्द करें और सभी सावधानियों और सुरक्षा उपायों का पालन करें। ज़िन्दगी ना मिलेगी दोबारा, यह ध्यान रखें बाकी सब तो बाद में भी मिल जाएगा बशर्ते ज़िन्दगी रही तो।

  3. चीन में वायरस के कम फैलने और बाकी जगह क़हर ढाने का कारण यही हो सकता है कि उनलोगों ने कैरियर एजेंट्स भेजकर सारी दुनिया में इसे फ़ैलाया है!

  4. सम्पादकीय में आज के ज्वलन्त व भीषण विषय को ख़ूब चुना गया है। विश्व भर के आँकड़े भी ग़ज़ब के हैं। सम्पादक की सजग लेखनी पाठक को प्रभावित करने में सक्षम है।
    एक बात तो तय है कि अब हम सबको कोरोना के साथ ही जीने की आदत डालनी होगी।

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