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सुधेश का एक गीत

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हवा बदली फिजा बदली है
कमबख्त  किस्मत पर नहीं बदली ।
पल पल यहां बदलता कुछ कुछ
जाने दिल को क्या हुआ है कुछ
तन तो पल पल छीज जाता है
दिल जवां लगता है कुछ कुछ ।
यह दुनिया कितनी बदली है
तेरी चाहत पर नहीं बदली ।
जीवन का डट कर सामना किया
गलती यह  समझौता नहीं किया
एक अजगर का सामना हुआ
उस ने पापी पेट पर प्रहार किया ।
दिन के उजाले में भी अभी
हृदयाकाश पर जैसे छा रही बदली ।
जीवन तो जीना है जीना है
जमाने ने चाहे कितना भी छीना है
मैं अपनी  शराफत क्यों छोड़ूं
मेरे साहस में तो कोई कमी ना है ।
मैं अब भी उसे याद कर लेता
मन मीत की चाहत हृदय में मचली ।

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