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निधि भार्गव ‘मानवी’ की ग़ज़ल

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प्यार तुम्हारा  सबसे  जुदा  है, समझो  न
कैसे बताऊँ दिल में क्या है, समझो  न
तुम  छूलो  तो   पत्थर   सोना  बन   जाए
तुम से लिपट कर जान लिया है, समझो न
इतना   प्यार   कहाँ   से   लेकर  आए  हो
दिल  ये  जिसमें  डूब   गया  है, समझो  न
शर्म-ओ-हया  की  बेड़ी  हमको  जकड़े  है
वर्ना  क्या  क्या  टूट   रहा    है,  समझो न
अंदर  अंदर  इश्क़  का   कोपल  फूट  रहा
रोग  ये  मुझको  कैसा  लगा  है, समझो  न
जान   हथेली   पर   ले कर  हम  निकले हैं
इश्क़- ओ- वफा का पाठ  पढ़ा  है, समझो न
मेरी   ग़ज़लों  में   प्यार   निधि   का   देखो
लफ़्जों   में    तेरा   जलवा  है, समझो   न

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