Tuesday, March 17, 2026
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राजेश कुमार सिन्हा की कहानी – कर्मफल

रमा द्विवेदी जी मेरे पड़ोस में रहती हैं उनके पति फ़ौज मे डाक्टर थे जिनका कुछ वर्षों पहले ही हो गया था।वे खुद भी एक राष्ट्रीयकृत बैंक में मुख्य प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं  और साथ ही  वे एक एन जी ओ से जुड़ी हुई हैं और अपना अधिकांश समय इसकी गतिविधियों में दिया करती हैं।हमारे हाउसिंग सोसायटी की वे प्रेसीडेंट भी है और यहाँ भी वे काफी सक्रिय रहा करती हैं।सच तो ये है कि इस हाउसिंग सोसायटी में फ्लैट भी मैने उनकी  सलाह पर ही खरीदा था।दर असल मेरा अकाउंट उनके बैंक में था इसलिये उनसे गाहे बगाहे मुलाकात होते रहती थी और वे इतनी विनम्रता पूर्वक बातचीत किया करती थीं कि जब भी बैंक जाना होता था तो उनसे मिल कर ही आता था।एक दिन बातों ही बातों में उन्होनें मुझसे पूछा कि आप रहते कहाँ हैं तो मैने कहा कि मै तो सरकारी अधिकारी हूँ और सरकारी क़्वार्टर में रहता हूँ तो उन्होनें हँसते हुए कहा था कि “सर जी बेहतर होगा कि कुछ अपना देख लें “
-जी मन तो मेरा भी है पर बजट की भी प्रॉब्लम है दूसरे हाउसिंग सोसायटी का मेनटनेंस चार्ज भी बहुत आता है जो एक तरह से महीने का किराया जैसा ही लगता है।
-जी सही कहा आपने पर अगर आप थोड़े पुराने फ्लैट देखेंगे तो शायद खर्च कम आ सकता है ।
-अगर ऐसा है तो देख सकता हूँ और अगर आपकी नज़र में कोई ऐसा फ्लैट हो तो ज़रुर देखना चाहूँगा।
-है जी इसीलिये तो कह रही हूँ ज्यादा दूर नहीं मेरी सोसाइटी मे ही,वे लोग हैदराबाद शिफ्ट हो रहे हैं और इस फ्लैट को बेचना चाह्ते हैं
-कोई ब्रोकर भी है इसमें
-जी कोई नहीं मुझे ही ब्रोकर समझ लें आप, उन्होनें हँसते हुए कहा
-फिर तो ब्रोकर भी चलेगा.. मैने भी उसी अन्दाज़ में जवाब दिया
-बस एक दिन बढ़िया सी चाय पिला दीजियेगा,बस  इतना ही ब्रोकरेज लूँगी मैं आपसे।
-मैडम चाय क्यों साथ में लंच करेंगे आप को सपरिवार आमंत्रित करूँगा
-सर जी मैं अकेली ही हूँ,पति फ़ौज में डाक्टर थे जो अब नहीं रहे,हाँ एक  बेटा है जो अपने परिवार के साथ टोरंटो में रहता है।
-मैडम कोई बात नहीं यहाँ आपका अपना कोई नहीं तो क्या हुआ मुझे आप अपनी एक्सटेंडेड फैमिली का हिस्सा समझ सकती हैं।
-सो नाइस टू यू वर्मा जी ऑफकोर्स.. उन्होनें गर्मजोशी से कहा।
और उसके बाद कुछ ऐसा संयोग बना कि एक महीने के अंदर ही मैंने अरूणाचलम जी का फ्लैट खरीद लिया और वहाँ शिफ्ट भी हो गया।वैसे तो मेरी श्रीमती जी(सुनीता) की उम्र रमा द्विवेदी जी से कम थी पर दोनों में अच्छी दोस्ती  हो गई थी और महीने में एक बार तो हम साथ में लंच या डिनर कर ही लिया करते थे।मेरी बेटी की तो वे आइडियल थीं और उसे उनकी तरह ही बोल्ड बनना था और सोशल सर्विस भी करनी थी।रमा जी भी मेरी बेटी को बहुत प्यार करती थीं और हमेशा कहा करती थी कि इसकी शादी मुंबई में ही करियेगा।एक दिन बातों ही बातों मे मैने उनसे पूछ लिया कि आपका बेटा साल दो साल में तो एक बार आ ही जाता होगा तो उन्होनें मेरी बात को गंभीरता से नहीं लिया और एक हल्की सी मुस्कान के साथ कि पहले तो आ जाया करता था पर पिछले चार वर्षों में उसका आना नहीं हो पाया है शायद किसी स्पेशल प्रोजेक्ट में लगा है  जिसे दिये गये समय में ही पूरा किया जाना है।मैने भी इस बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया और बात आई गई खत्म हो गई।
समय के साथ-साथ मेरे परिवार और रमा जी के बीच के संबंध और मजबूत होते गये,मैं तो यही मानता था कि मुझे उनके रुप में ईश्वर ने एक करीबी रिश्तेदार से भी ज्यादा करीबी शुभ चिंतक उपहार में दे दिया है।
एक दिन तकरीबन सुबह साढ़े चार बजे मोबाईल फोन की लगातार बजने वाली घंटी की तरफ नज़र गई तो रमा जी का फोन देख कर नींद तो क्षण भर में गायब हो गई और मैने तुरंत फोन उठाते हुए पूछा,
-रमा जी इतनी सुबह, कोई परेशानी है क्या
-भाई साहब (उधर से उनकी कांपती हुई आवाज़ सुनाई दी)थोड़ा अनईजी सा लग रहा है दो तीन बार वोमिटिंग भी हो चुकी है मुझे लगता है शायद एडमिट हो जाना ही बेहतर होगा।माफ़ कीजियेगा आपको तकलीफ दे रही हूँ प्लीज आप मुझे आशीर्वाद नर्सिंग होम तक ड्रॉप कर दीजिए डा अग्रवाल मुझे जानते हैं।
-रमा जी आप ऐसा क्यों कह रही हैं मैं और सुनीता बस पांच मिनट में पहुँच रहे हैं।
मेरी बातचीत को सुन कर सुनीता की नींद भी खुल गई थी हम दोनों ने फटाफट कपड़े बदले और कार की चाबी लेकर रमा जी की घर की तरफ चल पड़े।रमा जी के घर की एक चाबी हमारे पास रहती थी,जिसे हमने साथ रख लिया था अत:हमारे लिये उनका दरवाजा खोलना आसान था।हमने फ्लैट के अंदर पहुँच कर देखा तो रमा जी बेचैन सी दिखीं और हमें देख कर वे बमुश्किल मुस्कुराईं।सुनीता ने उन्हें सहारा देते हुए उठाया तो उन्होने उसे ईशारे से उनका बैग लेने को कहा जिसे उसने ले लिया और हम तुरंत लिफ्ट से नीचे आ गये।हमलोगों ने उन्हें पीछे की सीट पर लिटा दिया और सुनीता उनके बगल में बैठ गई।सुबह सुबह बिलकुल ट्रैफिक नहीं होने की वजह से हम पन्द्रह मिनट में नर्सिंग होम पहुँच गये।रेजिडेंट डाक्टर को हमने उनकी स्थिति बताई तो उसने उन्हें तुरंत आई सी यू में भर्ती करने की प्रक्रिया शुरु कर दी और हमें कागजी कार्रवाई पूरी करने को कहा साथ ही उसने डा अग्रवाल को भी फोन कर दिया।कुछ देर बाद उसने बाहर आ कर बताया कि रमा जी अब खतरे से बाहर हैं यह मा इनर अटैक ही था और हम लोग सही समय पर यहाँ आ गये इसलिये अब टेंशन की बात नहीं है पर अभी उनके कुछ और टेस्ट और लाईन ऑफ ट्रीटमेंट के बारे में डा अग्रवाल सर के आने के बाद ही निर्णय लिया जायेगा पर ऑफकोर्से हमें चिंता करने की जरूरत नहीं है।रेजिडेंट डाक्टर की बात सुनकर हमें बहुत राहत मिली और फिर सुनीता ने बिटिया को भी इन सारी बातों से  अवगत करा दिया और यह भी बता दिया कि हमें आने में देर हो सकती है और हम वहीं एडमिशन काउंटर के पास लगी कुर्सियों पर बैठ गये।हमने कुछ ही देर बाद कार्डियोलॉजिस्ट डा अग्रवाल को नर्सिंग होम की तरफ आते हुए देखा और वे सीधे आई सी यू में चले गये।हम दोनों ही बेसब्री से उनके बाहर आने का इंतजार करने लगे वैसे तो रेजिडेंट डाक्टर ने बता तो ज़रुर दिया था कि हमें चिंता करने की कोई ज़रुरत नहीं है फिर भी जब तक सीनियर डाक्टर न देख ले तब तक चिंता बनी रहती है।तकरीबन पन्द्रह बीस मिनट बाद डा अग्रवाल औरत रेजिडेंट डाक्टर दोनों ही हमें बाहर आते दिखे और हमारे पास आकर डा अग्रवाल ने कहा,
-देखिये कोई विशेष चिंता की बात नहीं है और अब वो खतरे से बाहर हैं यह एक माइनर अटैक ही था पर अच्छा किया आप उन्हें समय पर यहाँ लेकर आ गये वर्ना उनकी जान को भी खतरा हो सकता था।पर मैं चाहता हूँ कि कुछ और टेस्ट कर लूँ और उसके प्रॉसीजर के लिए हमें इनके किसी करीबी रिश्तेदार के रिटेन कांसेंट की ज़रुरत होगी सो प्लीज डा भटनागर आपको फॉर्म दे रहे हैं आप सिग्नेचर कर दीजियेगा
-जी बिलकुल डाक्टर बेशक कर दूँगा वैसे मैं इनका रिश्तेदार तो नहीं हूँ।मेरी जानकारी में इनका एक बेटा है जो टोरंटो में रहता है पर उसका नम्बर मेरे पास अत: मै उससे बात भी नहीं कर सकता।
-कोई बात नहीं आप फटाफट सिग्नेचर कर दीजिए ताकि हम अपना काम शुरु कर सकें।
 डा भटनागर ने फॉर्म और पेन मेरी तरफ बढ़ा दिया और मुझे वो जगह दिखाई जहाँ मुझे सिग्नेचर करना था,मैने तुरंत सिग्नेचर करके फॉर्म उन्हें वापस कर दिया और वे दोनों फिर आई सी यू की तरफ बढ़ गये।सुनीता को ऐसा लगा कि फॉर्म पर सिग्नेचर करके मैने गलत तो नहीं कर दिया अत:उसने मुझसे पूछ ही लिया,
-आपने फॉर्म को बिना पढ़े साईन कर दिया कुछ प्रॉब्लम तो नहीं होगी आगे?
-नहीं नहीं यह तो अस्पताल वालों का एक रिक्वायर्मेंट होता है ज्यादा कुछ नहीं और मान लो मैं अगर नहीं करता तो फिर ये लोग आगे का टेस्ट करने से मना भी कर सकते थे ऐसे में नुकसान तो अपना ही होता।
शायद सुनीता को मेरी बात समझ में आ गई थी अत: उसने आगे फिर कोई सवाल नहीं किया।
अब तक सबेरा हो चुका था और हमारा टेंशन भी थोड़ा कम हो गया था,हालांकि मेरा ध्यान उस प्रॉसीजर की रिपोर्ट पर लगा था जो संभवतः अंदर चल रहा था।हमें परेशान देख कर बाहर बैठा वार्ड ब्वाय हमें सारी बातों की अपडेट लगातार दे रहा था।उसीने हमारे लिये चाय की व्यवस्था भी कर दी।लगभग दो घंटे के बाद डा अग्रवाल और डा भटनागर दोनों ही साथ में आते दिखे उनके चेहरे से ही लग रहा था कि जो भी टेस्ट उन्होनें किया है उसकी रिपोर्ट निगेटिव ही है।डा अग्रवाल ने हमें बताया कि जैसा उन्हें विश्वास था मैटर सीरियस नहीं है फिर भी रमा जी को  कम से कम दो तीन दिन ओब्जर्वेशन मे रहना होगा और अगर कोई कम्प्लीकेशन नहीं हुआ तो उन्हें डिस्चार्ज मिल जायेगा।डा अग्रवाल के कहने का अर्थ यही था कि हार्ट का मामला है इसलिये पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।मुझे उनकी बात से बहुत राहत मिली पर उन्होनें अभी उनसे मिलने से मना कर दिया पर यह ज़रुर कहा कि आप लोग शाम तक उनसे ज़रुर मिल सकेंगे,उन्होने यह भी कहा कि आपलोग काफी देर से यहाँ हैं घर जाकर थोड़ा आराम कर लीजिये फिर आ जाइयेगा तब तक हमारा स्टाफ उन्हें देख लेगा और मैं खुद भी अभी यहाँ रहूँगा।रमा जी मेरी भी परिचित हैं मेरे इस नर्सिंग होम का अकाउंट भी उन्हीं के बैंक में है।हम दोनों ने यही तय किया कि हम लोग घर जाकर फ्रेश  होते हैं और फिर आ जायेंगे साथ ही अपने ऑफिस को भी आज की छुट्टी के बारे में बता दूँगा और यही सोच कर  हम दोनों घर लौट आये।घर आकर मैने उनके  आशीर्वाद नर्सिंग होम में एडमिट होने के बारे में उनके सीनियर को बताया तो उन्होनें दर्जनों बार मुझे थैंक्स कहा और तुरंत नर्सिंग होम के लिए निकल पड़े। यह सब सुनने के बाद बिटिया ने  भी रमा जी से मिलने  की इच्छा जताई तो हमने तय किया कि हम लंच के बाद साथ ही चलेंगे।
हम तीनों लगभग 4 बजे नर्सिंग होम पहुंचे तब वहाँ मुझे बैंक के तीन चार कर्मचारी दिखे जो रमा जी के सहकर्मी थे।तब तक वे आई सी यू में ही थीं डा भटनागर ने हमें बताया कि आज वे आई सी यू में ही रहेंगी और कल दिन मे उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया जायेगा।आई सी यू में तीन लोगों को साथ में इन्ट्री नहीं मिल सकती थी इसलिये हम बारी बारी से उन्हें देख कर आ गये।डा ने हमसे कहा कि इन्हें किसी अटेन्डेँट की ज़रुरत नहीं है इसलिये कोई नहीं रुके तब भी कोई बात नहीं और फिर आपका घर तो पास में ही है अगर कुछ ज़रुरत हुई तो वो हमें कॉल कर लेंगे।हमें भी लगा कि यहाँ रहने की ज़रुरत नहीं है अत:हमलोग अपने घर लौट आये।कल मेरा ऑफिस जाना ज़रुरी था इसलिए मैने फोन पर रमा जी के सीनियर को अपनी असमर्थता बता दी तो उन्होने कहा कि मुझे  बिलकुल चिंता नहीं करनी चाहिए कल पूरे दिन कोई न कोई बैंककर्मी ज़रुर वहाँ उप्लब्ध रहेगा।दूसरे दिन मैं पूरे समय ऑफिस की गतिविधियों में व्यस्त रहा और फिर शाम में घर पहुँच कर मैने सुनीता को साथ लिया और सीधे नर्सिंग होम पहुँच गया।वहाँ पहुँच कर मुझे पता चला कि उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है और वे पहले से काफी बेहतर हैं।जब मैं और सुनीता उनके रूम मे पहुँचे तो हमें देख कर उनक चेहरा खिल उठा उन्होनें लेटे लेटे ही हाथ जोड़ कर हमारा अभिवादन किया।हमें भी उन्हें पहले से बेह्तर देख कर बहुत खुशी हुई।डाक्टर ने हमें उनसे कम से कम बात करने की हिदायत थी इसलिये हमने भी हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया और उनकी खैरियत पूछ ली,उन्होनें सिर्फ इतना ही कहा,
-भाई साहब आपका एहसान किन शब्दों में चुकाउं मेरे पास शब्द नहीं हैं
-रमा जी यह कह कर आप शर्मिन्दा कर रही हैं बस आप जल्दी ठीक हो कर घर आ जायें हम सब यही चाहते हैं
-बस जल्दी ही आ जाऊंगी
सुनीता ने उनके हाथों को अपने हाथों मे लेते हुए कहा डाक्टर से मैने आपके खाने के बारे में पूछ लिया है जब तक आप पूरी तरह से स्वस्थ नहीं हो जातीं आप हमारे साथ ही खाना खायेंगी
मैने देखा सुनीता की इस बात को सुनकर उनकी आँखें गीली हो गईं थीं अत:मैने माहौल बदलने के उदेश्य से कहा,
-रमा जी मेरे पास आपके बेटे का नम्बर नहीँ है यदि आप मुझे उसका नम्बर दें तो मैं उसे आपकी स्थिति के बारे में जानकारी दे सकता हूँ।
-भाई साहब वह बाहर रहता है यह सब सुनकर परेशान हो जायेगा जब डिस्चार्ज हो कर घर जाऊंगी तो उसे बता दूंगी। मुझे उनकी बात सही लगी इसलिये मैने उनसे अपनी सहमति व्यक्त की और उनसे इजाजत लेकर हम दोनों घर लौट गये।पर मुझे पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि रमा जी और उनके बेटे के सम्बंध ठीक नहीं हैं और यह बात जब मैने सुनीता से शेयर किया तो उसका जबाब रूटीन टाईप सा मिला कि आपको तो हर जगह शक़ करने की बीमारी है अत:मेरे लिये आगे कुछ बोलने की संभावना ही खत्म हो गई थी ऐसे में मैने चुप रहना ही बेहतर समझा।
दूसरे दिन मुझे ऑफिस से निकलने में देर हो गई मैं यही सोच रहा था कि सीधे नर्सिंग होम ही चला जाता हूँ तबतक रमा जी के सीनियर का फोन आ गया कि रमा जी डिस्चार्ज हो कर अपने घर चली गई हैं और वे बिलकुल ठीक हैं।उन्होने यह भी बताया कि उनके डिनर की व्यवस्था उन्होने कर दी है जिसे सुनकर मुझे बहुत राहत मिली और मैने मन ही मन ईश्वर का शुक्रिया अदा किया साथ ही  इसकी सूचना तुरंत सुनीता को दे दी।सुनीता ने भी तुरंत कहा कल शनिवार है आपकी भी छुट्टी रहेगी हम कल दिन का लँच लेकर रमा जी के घर चलेंगे, मैने कहा अभी ही मेसेज कर दो और उनकी खैरियत भी पूछ लेना।
सुनीता ने अगले दिन डा भटनागर द्वारा दी गई हिदायतों के अनुसार रमा जी का लंच तैयार किया और हम दोनों उनके घर पहुँच गए।रमा जी को देख कर ही लगा कि वे अब ठीक हैं तो हमें काफी सुकून मिला।जब सुनीता ने डाइनिंग टेबल पर उनका लँच रखा तो उन्होनें अपने चिरपरिचित अन्दाज़ में कहा,
-सुनीता इसकी क्या ज़रुरत है मेड है ना कर लेगी
-रमा जी मेड मेड होती है कुछ तो ज़रुर फर्क होगा हम दोनों में
-सुनीता अब इसका जबाब मेरे पास नहीं है
-मुझे जबाब चाहिये भी नहीं पन्द्रह दिन तक यह जिम्मेदारी मेरी है फिर मेड तो है ही
मैने देखा उनकी आँखें फिर से गीली हो गईं थीं तभी मुझे याद आया कि एक बार फिर से उनसे पूछ लूँ कि उन्होनें अपने बेटे को इन्फॉर्म किया है कि नहीं अत: मैने पूछ लिया,
-रमा जी आपने बेटे को इन्फॉर्म किया क्या?
-जी नहीं भाई साहब कर दूँगी पहले पूरी तरह से ठीक तो हो लूँ
-फिर तो आपको बेटे की डांट सुननी पड़ेगी इतनी इम्पोर्टेन्ट बात देर से बताने के लिए
-भाई साहब सच बोलूँ तो मेरे बेटे को इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता वह थोड़ा अलग नेचर का है हमारी तो कभी कभी 6 महीने भी बात नहीं होती,
मेरे लिए यह स्थिति थोड़ी अलग थी इसलिए मेरी उत्सुकता बढ़ गई तो मैने फिर पूछ लिया
-आपका भी मन नहीं होता उससे बात करने का?
मेरी बात सुनकर वे थोड़ी गम्भीर हो गईं और कहा
-अब आपसे क्या छिपाना दर असल मेरे और मेरे बेटे के बीच बातचीत होती ही नहीं है,उसकी नजरों में मैं उसकी सबसे बड़ी दुश्मन हूँ।
-ओह्ह्ह्ह्ह पर ऐसा क्यों
-यह एक लंबी कहानी है जिसे आपको बता ही देती हूँ शायद मेरा मन भी हल्का हो जाये।
-जी अगर आपको ऐसा लगता है तो ज़रुर बता दीजिए।
-मैं मूल रूप से कानपुर की हूँ पर पापा की नौकरी की वजह से हमलोग जम्मू में ही सेटल हो गए थे।अपने भाई बहनों में मैं दूसरे नम्बर पर थी और दीदी की शादी हो चुकी थी इसलिये मेरी शादी को लेकर पापा को बहुत जल्दी रहा करती थी कि शादी वाली प्रॉब्लम जितनी जल्दी निपट जाये उतना बेहतर।मेरे ग्रेजुएट होते ही उन्होनें मेरी शादी वहीं के  अपने एक सहकर्मी के लड़के से कर दी जो जम्मू पुलिस में सब इंस्पेक्टर था।सबकुछ व्यवस्थित सा चलने लगा मैं बहुत जल्दी प्रेगनेंट भी हो गई जिससे दोनों परिवारों में खुशी की लहर दौड़ गई मेरे पति मेरा बहुत ख्याल रखा करते थे।उन दिनों मेरी प्रेग्नेंसी का लास्ट स्टेज चल रहा था और सभी उस खास दिन का इंतजार था।पर उस मनहुस दिन ने मेरी दुनिया ही उजाड़ दी,मुझे बताया गया कि जेल से फरार एक कैदी ने पुरानी रंजिश की वजह से मेरे पति को गोली मार दी है और उन्हे मिलिट्री हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है।मुझे ऐसा लगा कि मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई है मैं जैसे तैसे घरवालों के साथ मिलिट्री हॉस्पिटल पहुँची ही थी कि हमें बताया गया की एक्सेस ब्लीडिंग के कारण मेरे पति को बचाया नहीं जा सका इतना सुनते ही मुझे अचानक लेबर पेन शुरु हो गया और थोड़ी देर बाद उसी हॉस्पिटल में मेरी डिलेवरी भी   हो गई।पता नहीं ईश्वर को क्या मंजूर था एक तरफ पति की अर्थी उठ रही थी और दूसरी तरफ मैं नवजात बेटे के साथ घर लौट रही थी।कुछ दिनों तक मैं इस सदमें से उबर ही नहीं पा रही थी और पति की मृत्यु होते ही ससुराल वालों का रवैया भी  बदल गया जबकि मेरे ससुर मेरे पापा के दोस्त थे। यह सब देख कर मैं तेरहवीं के बाद पापा के घर आ गई और धीरे धीरे अपने बेटे के लिए मैने  खुद को सम्भाल लिया।हालांकि मेरे पति की मृत्य के बाद पुलिस विभाग द्वारा मुझे जॉब ऑफर किया गया पर मुझे इस महकमें से इतनी घृणा हो चुकी थी कि मैने वह ऑफर स्वीकार नहीं किया।दरअसल डा द्विवेदी से मेरी दूसरी शादी थी और ये वही डाक्टर थे जिन्होनें गोली लगने के बाद मेरे पति को बचाने की हर सम्भव कोशिश की थी और उस दिन से ही हमारे इनसे पारिवारिक सम्बंध बन गये थे।ये नियमित रुप से हमारे घर आया करते थे पर मेरे ससुराल वालों को इनका मेरे घर आना जाना पसंद नहीं था।दर असल मेरे छोटे देवर ने यह अफवाह फैला दी थी कि डाक्टर साहब ने इसीलिये मेरे पति को बचाने की पूरी कोशिश नहीं कि क्योंकि मेरा उनसे पहले से ही अफेयर था।आप सोच सकते हैं यह सुन कर मुझ पर क्या गुजरी होगी।इस घटना के लगभग तीन साल बाद इन्होनें एक दिन मेरे पापा से कहा कि वे मेरे बेटे “यश “को अपना नाम देना चाहते हैं तो मेरे पापा ने कहा कि अगर रमा इसके लिए तैयार होगी तो मेरी भी सहमति रहेगी।जब यह प्रस्ताव मुझे बताया गया तो पहले तो मै इसके लिए तैयार नहीं हुई पर मेरी दीदी और मेरे छोटे भाई ने मुझे बहुत समझाया तो मैने अपने बेटे के भविष्य को देखते हुए अपनी सहमति दे दी।डा साहब ने पहली मुलाकात में ही यह स्पष्ट कर दिया था कि हमारा एक ही बच्चा रहेगा “यश”और फिर आर्य समाज मंदिर में हमारी शादी हो गई।इसी बीच इनका ट्रांसफर आगरा कैंट हो गया और हम लोग आगरा आ गए।बैंक की नौकरी के लिए एक्जाम तो मैने आगरा आने के बाद देना शुरु किया था और जल्दी ही मुझे नौकरी भी मिल गई।सच यही है कि यश ने इन्हें कभी भी अपना पापा नहीं माना जबकि इन्होने अपनी कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ी।दरअसल इसके जिम्मेदार मेरे ससुराल पक्ष के लोग ही हैं उन्होने इसके अंदर डाक्टर साहब के खिलाफ इतनी नफरत भर दी थी कि वह कभी सहज रहा ही नहीं। सेवेन्थ स्टैंडर्ड में ही उसने कहा कि मैं बोर्डिंग स्कूल में पढ़ना चाहता हूँ तो हमने उसे पन्चगनी मे डाल दिया और उसके बाद से फिर कभी वह लौट कर घर नहीं आया।इसके आगे की सारी पढ़ाई उसने हॉस्टल में रह कर की और वर्जीनिया यूनिवर्सिटी से एम एस करने के बाद टोरंटो में जॉब करता है और अपनी पसंद की लडकी से शादी भी कर ली है।साल दो साल में कभी एक दो मिनट के लिए  फोन कर लेता है बस इतना ही रिश्ता है हमारा।अब आप ही बताइये ऐसे में उसे बता के भी क्या फायदा।
मैं और सुनीता उनके अतीत के बारे में सुन कर दंग रह गए,कितना दुख और दर्द सहा है इन्होने और आज तक सहती आ  रही हैं जबकि इनके चेहरे और इनके व्यवहार को देख कर कोई सोच भी नहीं सकता है कि दुख का पूरा एक समन्दर इनके अंदर हिलोरे मार रहा है।मैने सिर्फ इतना ही पूछा कि क्या आपने कभी यश को सब कुछ विस्तार से समझाने की कोशिश नहीं कि तो उन्होनें अपनी गीली आँखों को पोंछ्ते हुए कहा,
भाई साहब हम सब अपना अपना मुकद्दर लिखवा कर लाते हैं जो हमारे पिछले कर्म की एक बानगी ही तो होता है फिर ज्यादा सोच कर भी क्या फायदा,
मेरे पास इसका न तो कोई तर्क था न कोई उत्तर बस मैने इतना ही कहा,
रमा जी आपकी शख्सियत को नमन करता हूँ।
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