Wednesday, July 24, 2024
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सपना सक्सेना की ग़ज़ल

हर सुबह बदलता है हर शाम बदलता है
मौसम की तरह पल पल इंसान बदलता है
कैसा यकीं उसका जो खुद को नहीं हासिल
कपड़ों की तरह देखो ईमान बदलता है
कहता है जिसे अपनी जागीर नहीं तेरी
ये वक्त है होकर मेहरबान बदलता है
उलझा है दीवाना अपने ही सायों में
कभी राह कभी मंजिल नादान बदलता है
जो साथ नहीं कोई तो ग़म न करो इसका
गिर गिर कर उठना ही पहचान बदलता है
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