Friday, June 21, 2024
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अशोक व्यास की दो ग़ज़लें

1
किसी सपने को जगाया जाये
इस तरह ख़ुद को बचाया जाये
नदी ये ज़िंदगी की रुक रही है
गति का गीत फिर गाया जाये
बेवजह लग रही हर बात अगर
चलो बिन बात मुसकुराया जाये
कहाँ हूँ, क्यूँ हूँ, ये ख़बर पाने
किससे पूछें, कहाँ जाया जाये
सैलाब थम तो गया आंसू का
इसी का जश्न मनाया जाये
2
बेबसी का लॉकेट सा बनवाया है
ख़ुद पहना और हमें भी पहनाया है
सिसकते रंगों का दर्द नकार दिया
काले रंग की शान में गीत गाया है
शिष्ट दिखते रहने की ज़िद लेकर हमने
घर, बस्ती, नगर और मुल्क को गँवाया है
लपटें उठा गया जिनका ग़ुस्सा किताबों तक
अख़बार उन पे अंगुली उठाने में भी शर्माया है
ज़िंदा बचे रहे जो मर जाने का डर लेकर
जीने का हुनर उनसे आगे निकल आया है
धुएँ की लिखाई को हम पढ़ नहीं पाए पर
जीने की चाह लेकर विश्वास बचाया है
हर रास्ते को रोशन करने निकल पड़े हम
हर शब्द सारथी है, सच साथ में आया है

अशोक व्यास
न्यूयॉर्क (अमरीका)
मोबाइलः 00-1-(917) 573-7775
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